वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३३० | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १८३-१८४ |
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कि राजा, राष्ट्र, ब्राह्मण, बालक, वृद्ध, गौएँ, कन्याएँ तथा पतिव्रताओंमें भलीभाँति शान्ति रहे। रोग नष्ट हो जायँ, किसानोंके यहाँ सदा अच्छी फसल उत्पन्न हो। दुर्भिक्ष न रहे। समयपर अच्छी वृष्टि हो और विश्वमें शान्ति बनी रहे।*
वसुंधरे! व्रती पुरुष इस प्रकारकी विधिका पालन करते हुए शास्त्रमें निर्दिष्ट विधिके द्वारा देवेश्वर भगवान्की भली प्रकारसे आराधना करे। इसके पश्चात् ब्राह्मणोंको निरहंकार-भावसे भोजन कराये। यदि अपनेमें शक्ति हो तो गरीबों एवं अनाथोंको भी तृप्त करनेका प्रयत्न करे। इस विधिसे मेरी अर्चाकी स्थापना करनी चाहिये। इसके परिणामस्वरूप पुरुष मेरे लोकमें प्रतिष्ठा पाता है। फिर तो मेरे अङ्गोंपर जलकी जितनी बूँदें गिरती हैं, उतने हजार वर्षोंतक वह विष्णुलोकमें रहनेका अधिकारी होता है। भूमे! अहंकारसे रहित जो व्यक्ति मेरी स्थापना करता है, वह मानो अपने उनचास पीढ़ीके पुरुषोंका उद्धार कर देता है।
[अध्याय १८१-१८२]
मृण्मयी एवं ताम्रप्रतिमाओंकी प्रतिष्ठाविधि
भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! अब मृत्तिकासे बनी अपनी प्रतिमाका स्थापन-विधान कहता हूँ, सुनो। मृण्मयी मूर्ति सुन्दर, स्पष्ट और अखण्डित होनी चाहिये। यदि काष्ठ न मिल सके तो मिट्टीका अथवा पाषाणका विग्रह बनानेका विधान है। कल्याणकी कामनावाले विद्वान् पुरुष ताँबा, काँसा, चाँदी, सोना अथवा शीशा—इन वस्तुओंसे भी मेरी सुन्दर प्रतिमाका निर्माण कराते हैं। यदि कर्मकाण्डके संकोचकी इच्छा हो तो वेदीपर ही मेरी पूजा की जा सकती है। कुछ लोग जगत्में यश फैलनेकी कामनासे भी मेरी प्रतिमाओंकी स्थापना करते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो अपना अभीष्ट पूरा होनेके लिये प्रतिमाएँ स्थापित करते हैं, कुछ लोग उत्तम तीर्थको देखकर वहीं मेरा पूजन कर लेते हैं अथवा मेरे तेजसे प्रकट हुए सूर्यमण्डलमें ही मेरी आराधना करते हैं।
देवि! तुम्हें ऐसा समझना चाहिये कि मैं विभिन्न व्यक्तियोंकी भावनाके अनुसार वहीं उपस्थित हो जाता हूँ और पूजा प्राप्त कर मैं उपासकको सम्पूर्ण सम्पत्तियोंसे पूर्ण कर देता हूँ, इसमें कोई संशय नहीं। मनुष्य जिस-जिस फलका उद्देश्य रखकर मन्त्रोंका उच्चारण अथवा विधिपूर्वक कर्मोंके सम्पादनद्वारा मेरी आराधनामें लगा रहता है, उसे वह अभिलषित फल प्राप्त हो जाता है। यही नहीं, मेरी कृपासे उसे सर्वोत्तम गति भी प्राप्त हो जाती है। मेरा भक्त प्रतिदिनके नियमित कार्योंमें सदा व्यस्त रहते हुए मनसे भी मेरी आराधना कर सकता है। मेरे लिये यदि किसीने श्रद्धापूर्वक एक अञ्जलि जल भी अर्पण कर दिया तो मैं उसकी उस भक्तिसे संतुष्ट हो जाता हूँ। उसके लिये बहुतसे फूलों, जपों एवं नियमकी क्या आवश्यकता है। जो अपने अन्तःकरणको स्वच्छ रखकर नित्य मेरा चिन्तन करता है, मैं उसकी भी सम्पूर्ण कामनाएँ पूरी कर देता हूँ और उसे दिव्य एवं मनोरम भोग तथा ज्ञान एवं मोक्ष भी
* तुलनीय यजुर्वेद—'आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतामा राष्ट्रे राजन्यः शूर इषव्यो…………योगक्षेमो नः कल्पताम्॥' (शु० यजुर्वेदसं० २२।२२)