वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १८३-१८४] मृण्मयी एवं ताम्रप्रतिमाओंकी प्रतिष्ठाविधि ३३१
सुलभ हो जाते हैं।
वसुंधरे! ये सभी बातें अत्यन्त गोपनीय हैं, मेरे कर्मोंमें श्रद्धा रखनेवाला व्यक्ति मृण्मयी प्रतिमाका निर्माण कर श्रवण नक्षत्रमें उसके स्थापन एवं प्रतिष्ठाकी तैयारी करे। इसमें भी पूर्वोक्त मन्त्रोंका उच्चारणकर उसी विधिसे स्थापना करनी चाहिये। जलके साथ पञ्चगव्य और चन्दनको मिलाकर उससे मेरी प्रतिमाको स्नान कराये। उस समय कहे—'अच्युत! जो विश्वकी रचना करते हैं तथा जिनकी कृपासे जगत्की सत्ता सुरक्षित है, वे आप ही हैं। भगवन्! मुझपर कृपा करके आप इस मृण्मयी प्रतिमामें प्रतिष्ठित होइये। प्रभो! आप कारणके भी कारण, प्रचण्ड तेजस्वी, परम प्रकाशमान तथा महापुरुष हैं। आपको मेरा निरन्तर नमस्कार है।' ऐसा कहकर उस प्रतिमाकी मन्दिरमें स्थापना करे। यहाँ भी पहलेकी ही तरह चार कलशोंका स्थापन करना चाहिये। उन चारों कलशोंको लेकर इस भावका मन्त्र पढ़ना चाहिये—'भगवन्! आप ओंकारस्वरूप हैं। समुद्र आपका ही रूप है, जो वरुणकी कृपा प्राप्त करके सम्यक् प्रकारसे पूजा पाता है तथा उसके हृदयमें जलराशि एवं प्रसन्नता भरी रहती है। इस विचारको सामने करके मैं आपको उत्तम अभिषेक अर्पित करता हूँ। जिसकी विशाल भुजाएँ हैं; अग्नि, पृथ्वी एवं रस—ये सभी जिनसे सत्तावान् बने हैं, ऐसे आपको मैं प्रणाम करता हूँ।'
अर्चाविग्रहका इस प्रकार स्नान कराकर पूर्वकथित नियमोंके अनुसार चन्दन, पुष्प, माला, अगरु, धूप, कपूर एवं कुंकुमयुक्त धूपसे—'ॐ नमो नारायणाय'—इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए पूजनकर न्यायके अनुसार पितृ-तर्पण करे। फिर वस्त्र अर्पण करते समय भी 'ॐ नमो नारायणाय' कहकर मन्त्र पढ़े। तत्पश्चात् नैवेद्य अर्पित करे और पूर्वोक्त मन्त्रसे पुनः आचमन देकर शान्तिपाठ करे। मन्त्रका भाव यह है—'देवताओं, ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्योंको शान्ति सुलभ हो। वृद्ध और बालवृन्द उत्तम शान्ति प्राप्त करें। भगवान् पर्जन्य जलकी वृष्टि करें और पृथ्वी धान्योंसे परिपूर्ण हो जाय।' इस अर्थवाले मन्त्रसे विधिपूर्वक शान्तिपाठ करना चाहिये। तत्पश्चात् श्रीहरिमें श्रद्धा रखनेवाले ब्राह्मणोंका पूजन कर उनकी वन्दना करे और पूजाकी त्रुटियोंके लिये क्षमा-प्रार्थना कर विसर्जन करे। विसर्जनके बाद वहाँ जितने लोग हों, उनका उचित सत्कार करना चाहिये। यदि किसीको मेरा सायुज्य प्राप्त करनेकी इच्छा हो तो वह गुरुकी भी विधिपूर्वक पूजा करे। जो व्यक्ति शास्त्र-विहित कर्मको सम्पन्न कर भक्तिके साथ गुरुकी पूजा करता है, वह मानो निरन्तर मेरी ही पूजा करता है। यदि कोई राजा किसीपर प्रसन्न होता है तो बड़ी कठिनतासे उसे कहीं एक गाँव दे पाता है, किंतु गुरु यदि किसी प्रकार प्रसन्न हो गये तो उनकी कृपासे ब्रह्माण्डपर्यन्त पृथ्वी सुलभ हो जाती है। शुभे! मैंने जो बात कही है, यह सभी शास्त्रोंका निच्योत है। कल्याणि! सम्पूर्ण शास्त्रोंमें गुरुदेवके पूजनकी समुचित व्यवस्था दी गयी है। जो मनुष्य इस विधिसे मेरी प्रतिष्ठा करता है, उसके इस प्रयाससे दोनों कुलोंकी इक्कीस पीढ़ियाँ तर जाती हैं। पूजा करते समय मेरे विग्रहपर जितनी जलबिन्दुएँ गिरती हैं, उतने हजार वर्षोंतक वह व्यक्ति मेरे लोकोंमें आनन्द भोगता है। भूमे! मैं तुमसे मृत्तिकासे बनी हुई मूर्तिकी प्रतिष्ठाका वर्णन कर चुका। अब जो सम्पूर्ण भागवत पुरुषोंके लिये प्रिय है, वह दूसरा प्रसङ्ग तुम्हें सुनाऊँगा।