भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय १८७ ] सृष्टि और श्राद्धकी उत्पत्ति-कथा एवं पितृयज्ञका वर्णन [ ३३९

निश्चित है। हाँ, कोई विशेष कर्म अथवा प्रायश्चित्तका सहयोग प्राप्त होनेसे मोक्ष होना भी निश्चित है।^१ सत्त्व, रज और तम—ये तीनों शरीरके गुण कहे जाते हैं। कुछ दिनोंके पश्चात् युगके अन्तमें मनुष्य अल्पायु हो जायँगे। तमोगुणकी प्रधानतावाले मानव कर्म-दोषके प्रभावसे सात्त्विक विषयपर ध्यान नहीं देते, अतः उस कर्मके प्रभावसे उन्हें नरकमें जाना पड़ता है। फिर अगले जन्मोंमें उन्हें पशु, पक्षी अथवा राक्षसकी योनि मिलती है। वेदको जाननेवाले सात्त्विक ज्ञानी लोग धर्म, ज्ञान और वैराग्यके सहारे मुक्ति-मार्गकी ओर अग्रसर होते हैं। क्रूर, भयभीत, हिंसक, निर्लज्ज, अज्ञानी, श्रद्धाहीन मनुष्यको और पिशाचके समान व्यवहार करनेवालेको तमोगुणी जानना चाहिये। उसे कोई अच्छी बात बतायी जाय तो वह समझता नहीं है। इसी प्रकार पराक्रमी, अपने वचनके पालन करनेवाले, स्थिरबुद्धि, सदा संयमशील, शूरवीर तथा प्रसिद्ध व्यक्तिको राजस पुरुष मानना चाहिये। जो क्षमाशील, इन्द्रियविजयी, परम पवित्र, उत्तम ज्ञानवान्, श्रद्धालु तथा तप एवं स्वाध्यायमें सदा संलग्न रहते हैं, वे सात्त्विक पुरुष हैं।

ब्रह्माजीने निमिसे कहा था—पुत्र! इस प्रकार सोच-विचारकर तुम्हें शोक करना अनुचित है; क्योंकि शोक सबका संहारक है। वह लोगोंके शरीरको जला देता है, उसके प्रभावसे मनुष्यकी बुद्धि नष्ट हो जाती है। लज्जा, धृति, धर्म, श्री, कीर्ति, नीति तथा सम्पूर्ण शोकाकुल मनुष्यका परित्याग कर देते हैं।^२ अतएव पुत्र! तुम शोकका त्याग करके परम सुखी बननेका प्रयत्न करो। मूर्ख मनुष्य मोहवश हिंसा तथा मिथ्या-भाषण करनेमें तत्पर हो जाता है। ऐसे मनुष्यको अपने दोषोंके कारण घोर नरकमें निवास करना पड़ता है, अतः अब मैं धार्मिक जगत्का कल्याण होनेके लिये सच्ची बात बताता हूँ, तुम उसे सुनो। सम्पूर्ण संसारसे आसक्ति हटाकर धर्ममें बुद्धिको लगाना चाहिये—यह सार वस्तु है। स्वायम्भुव मनुने जो कहा है तथा तुमने जो श्राद्ध किया है, इसपर विचार करके मैं चारों वर्णोंके लिये विधान बतलाता हूँ, उसे सुनो।

जिस समय प्राण कण्ठस्थानपर पहुँच जाता है, उस समय मनुष्य भय और भ्रान्तिवश अत्यन्त घबड़ा जाता है और वह सभी दिशाओंमें दृष्टि डालनेमें असमर्थ हो जाता है। किसी क्षणमें स्मृति भी आ जाती है। माधवि! जीवकी जबतक आँख नहीं खुलती, तबतक भूमिके देवता ब्राह्मणगण स्नेहपूर्वक सामने सत्-शास्त्र पढ़ें और यथायोग्य दान आदि धर्म कराना समुचित है। दूसरे लोकमें उस प्राणीका कल्याण हो—इसलिये गोदान करना चाहिये। इसकी विशेष महिमा है, धरातलपर विचरना और अमृत-तुल्य दुग्ध प्रदान करना गौका स्वाभाविक गुण है। इसके दानसे मनुष्य यथाशीघ्र तापसे छूट जाता है। इसके बाद मरणासन्न प्राणीके कानमें श्रुतिकथित दिव्य मन्त्र सुनाना चाहिये। जब प्राणी अत्यन्त विवश हो जाय तो मनुष्य उसे देखकर मन्त्र पढ़कर मरणकालोचित कर्म विधिपूर्वक सम्पन्न करे। इस


१. जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च। मोक्षः कर्मविशेषेण प्रायश्चित्तेन निश्चितम्॥
(१८७।८७)
२. शोको दहति गात्राणि बुद्धिः शोकेन नश्यति। लज्जा धृतिश्च धर्मश्च श्रीः कीर्तिश्च स्मृतिर्वयः॥
त्यजन्ति सर्वधर्माश्च शोकेनोपहतं नरम्। (१८७। ९७८, तुलनीय-वाल्मी०रामा० २।६२। १५-१६ आदि)