वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३४० | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १८८ |
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मन्त्रमें सम्पूर्ण संसारसे प्राणीको मुक्त करनेकी शक्ति है। फिर तत्काल मधुपर्क हाथमें लेकर कहे—'ओंकारस्वरूप भगवन्! आप मेरा अर्पण किया हुआ मधुपर्क स्वीकार करनेकी कृपा करें। यह परम स्वच्छ संसारमें आने-जानेका नाशक, अमृतके समान भगवत्प्रेमी व्यक्तियोंके लिये नारायणरचित, दाह मिटानेवाला तथा देवलोकमें परम पूजनीय है। यह कहकर उसे मरणासन्न प्राणीके मुखमें डाल दे। इसके फलस्वरूप व्यक्ति परलोकमें सुख पाता है। इस प्रकारकी विधि सम्पन्न होनेपर यदि प्राण निकलते हैं तो वह प्राणी फिर संसारमें जन्म नहीं पाता। मृत प्राणीकी सद्गतिके उद्देश्यसे उसे वृक्षके नीचे ले जाकर अनेक प्रकारके गन्धों तथा घृत, तेलके द्वारा उस प्राणीके शरीरका शोधन करे। साथ ही तैजस एवं अविनाशी सभी कार्य उसके लिये करना उचित है। जलके संनिकट दक्षिणकी ओर पैर करके लेटा देना चाहिये। तीर्थ आदिका आवाहन करके उसे स्नान करानेका विधान है। गया आदि जितने तीर्थ, ऊँचे, विशाल एवं पुण्यमय पर्वत, कुरुक्षेत्र, गङ्गा, यमुना, कौशिकी, पयोष्णी, गण्डकी, भद्रा, सरयू, बलदा, अनेक वन, वराहतीर्थ, पिण्डारक्षेत्र, पृथ्वीके सम्पूर्ण तीर्थ तथा चारों समुद्र—इन सभीका मनमें ध्यान करके मृत प्राणीको उस जलसे स्नान कराना चाहिये। फिर विधिके अनुसार उसे चितापर रखना चाहिये। उसके पैर दक्षिणकी दिशामें हों। प्रधान दिव्य अग्नियोंका ध्यान करके हाथमें अग्नि उठा ले। उसे प्रज्वलित करके विधिवत् यह मन्त्र पढ़ना चाहिये। मन्त्रका भाव है—'अग्निदेव! यह मानव जाने अथवा अनजाने जो कुछ भी कठिन काम कर चुका है, किंतु अब मृत्युकालके अधीन होकर यह इस लोकसे चल बसा। धर्म, अधर्म, लोभ और मोहसे यह सदा सम्पन्न रहा है। फिर भी आप इसके गात्रोंको भस्म कर दें और यह स्वर्गलोकमें चला जाय।' इस प्रकार कहकर प्रदक्षिणा कर जलती हुई अग्नि उसके सिरके स्थानमें प्रज्वलित कर दे। फिर तर्पणकर मृत व्यक्तिका नाम लेकर पृथ्वीपर उसके लिये पिण्ड दे। पुत्र! चारों वर्णोंमें इसी प्रकारका संस्कार होता है। फिर शरीर और वस्त्रोंको धोकर वहाँसे लौटना चाहिये। उसी समयसे दस दिनपर्यन्त सभी सगोत्रके लोग अशौचके भागी बन जाते हैं और उन्हें देवकर्मोंमें अधिकार नहीं रह जाता है।
[अध्याय १८७]
अशौच, पिण्डकल्प और श्राद्धकी उत्पत्तिका प्रकरण
धरणीने कहा— माधव! प्रभो! अब मैं आपसे 'अशौच'–सम्बन्धी कर्मको विधिवत् सुनना चाहती हूँ, आप उसे बतलानेकी कृपा करें।
भगवान् वराह कहते हैं— कल्याणि! जिस प्रकार अशौचसे मनुष्योंकी शुद्धि होती है, वह सुनो। क्षयाहके तीसरे दिन श्राद्धकर्ता नदीके जलसे स्नान कर चूर्णसे निर्मित तीन पिण्ड एवं तीन अञ्जलि जल दे। चौथे, पाँचवें और छठे दिन, सातवें दिन भी ऐसे ही एक-एक पिण्ड तथा जल देनेका विधान है। पिण्डकी जगह पृथक्-पृथक् हो। दस दिनपर्यन्त क्रमशः इस प्रकारकी विधिका पालन करना आवश्यक है।