वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १८८ ] अशौच, पिण्डकल्प और श्राद्धकी उत्पत्तिका प्रकरण ३४१
दसवें दिन क्षौर-कर्म कराकर दूसरा पवित्र वस्त्र धारण करना चाहिये। गोत्रके सभी स्वजन तिल, आँवला और तेल लगाकर स्नान करें। दसवें दिन बाल बनवाकर विधिपूर्वक स्नान करनेके पश्चात् भाई-बन्धुओंके साथ अपने घर जाना चाहिये। ग्यारहवें दिन समुचित विधिसे एकोद्दिष्ट श्राद्ध करनेका नियम है। स्नान करके शुद्ध होनेके बाद अपने उस प्रेतको अन्य पितरोंमें सम्मिलित करनेके लिये पिण्ड दे। माधवि! चारों वर्णोंके मनुष्योंके लिये एकोद्दिष्टका विधान एक समान है। तेरहवें दिन ब्राह्मणोंको श्रद्धापूर्वक पक्वान्न भोजन कराना चाहिये। इसमें जिस दिवंगत व्यक्तिके लिये श्राद्ध किया जाता हो, उसका नाम लेकर संकल्प करना आवश्यक है। इसके लिये पहले ब्राह्मणके घरपर जाकर स्वस्थ चित्तसे नम्रतापूर्वक निमन्त्रण देना चाहिये। देवि! उस समय मन-ही-मन यह मन्त्र पढ़ना चाहिये, जिसका भाव है—'विप्रवर! तुम इस समय यमराजके आदेशानुसार दिव्य लोकमें पहुँच गये हो, अब वायुका रूप धारण करके मानसिक प्रयत्नद्वारा इस ब्राह्मणके शरीरमें स्थित होनेकी कृपा करो।' फिर उस श्रेष्ठ ब्राह्मणको नमस्कार करके पाद्यार्पण करना चाहिये।
सुन्दरि! उस समय ब्राह्मणके शरीरमें प्रेतके विग्रहकी कल्पनाकर उसका हित करनेके विचारसे पाद-संवाहन (पैर दबाना) आदि कार्य परम उपयोगी है। भूमे! मनुष्यका कर्तव्य है कि अशौचके दिनोंमें मेरे गात्रका स्पर्श न करे। रात बीत जानेपर प्रातःकाल सूर्योदयके पश्चात् श्राद्धकर्ताको विधिपूर्वक बाल बनवाकर तेल आदि लगाकर स्नान करना चाहिये। फिर पृथ्वीको स्वच्छ करके यहाँ वेदी बनाये। इसका उपयुक्त देश नदीतट अथवा श्राद्धकर्मके लिये निश्चित भूमि है। ऐसे स्थानपर पिण्डदान करना उत्तम है। चौंसठ पिण्ड देनेसे यथार्थ सुकृत सुलभ होता है। सुन्दरि! दक्षिण और पूर्वकी ओर मुख करके ये सभी पितृभाग सम्पन्न होते हैं। नदीके तटपर वृक्षके नीचे अथवा कुंजर* (पीपल) वृक्षकी छायामें भी इस कार्यको करनेका विधान है। उस स्थानपर हीन प्राणियोंकी दृष्टि न पड़े। जिस स्थानमें प्रेत-सम्बन्धी कार्य किये जायँ, वहाँ मुर्गा, कुत्ता, सूकर प्रभृति पशु-पक्षियोंका प्रवेश या नेत्र-दृष्टि निषिद्ध हैं। उनके शब्द भी वहाँ नहीं होने चाहिये। वसुंधरे! मुर्गेकी पाँख-सम्बन्धी वायुसे तथा चण्डालकी दृष्टिसे युक्त स्थानमें श्राद्ध करनेसे पितरोंको बन्धन प्राप्त होता है।
सुन्दरि! इसलिये विवेकी मनुष्यका परम कर्तव्य है कि वे प्रेतकार्यमें इनका उपयोग न करें। देवता, दानव, गन्धर्व, उरग, नाग, यक्ष-राक्षस, पिशाच तथा स्थावर और जङ्गम आदि जितने प्राणी हैं, वे सभी तुम्हारे पृष्ठभागपर प्रतिष्ठित हो स्नान आदि क्रियाएँ यथावसर करते रहते हैं। यह सारा जगत् भगवान् विष्णुकी मायाका क्षेत्र है। चण्डालसे लेकर ब्राह्मणपर्यन्त सभी वर्णके मनुष्य शुभ अथवा अशुभ कार्य करनेके लिये स्वतन्त्र हैं। भूमे! इसलिये आवश्यकता यह है कि प्रेत-कार्य करनेके समय पहले स्नानपूर्वक स्थानकी
* संस्कृतके कोशोंमें 'कुञ्जर' शब्दके अनेक अर्थ हैं, जिनमें यह पीपल वृक्ष भी एक है, किंतु इस अर्थमें इसका प्रयोग प्रायः नहीं मिलता, जो यहाँ दृष्ट होता है।