वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३४२ | संक्षिप्त श्रीवराहपुराण | [ अध्याय १८८ |
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शुद्धि करे। भूमिको बिना पवित्र किये श्राद्ध करना अनुपयुक्त होता है। भद्रे! जगत् तुमपर आधारित है और तुम स्वभावतः शुद्ध हो। पर अपवित्र कार्योंके द्वारा तुम्हें दूषित बना दिया जाता है। इसलिये कभी बिना पवित्र किये स्थानपर श्राद्ध नहीं करना चाहिये; क्योंकि उसे देवता और पितर स्वीकार नहीं करते। यहाँतक कि उस उच्छिष्ट स्थानके प्रभावसे उन्हें घोर नरकमें गिरना पड़ता है। अतएव स्थानकी शुद्धि करके ही प्रेतको पिण्ड देना चाहिये। माधवि! नाम और गोत्रके साथ संकल्प करके पिण्ड अर्पण करनेकी विधि है। यह सभी कार्य पूरा हो जानेपर अपने गोत्र एवं कुल-सम्बन्धी सभी सज्जन एक स्थानपर बैठकर भोजन करें। चारों वर्णोंके लिये प्रेत-निमित्त कार्योंमें यही नियम है।
देवि! इस प्रकार पिण्डदान करनेसे प्रेतलोकमें गये हुए प्राणी पूर्णतः तृप्त हो जाते हैं। जो असपिण्ड मनुष्य पिण्ड दान नहीं करता, किंतु अशौचग्रस्त व्यक्तियोंके भोजनमें सम्मिलित रहता है, उसकी भी शुद्धि आवश्यक है। वह किसी नदीपर जाकर वस्त्रसहित उसमें स्नान करे। यदि वह वहाँ जानेमें असमर्थ हो तो मानसिक तीर्थयात्रा करके मन्त्रमार्जनपूर्वक जलके छींटे दे। माधवि! उस समय पूर्ण स्वस्थ पुरुषको चाहिये कि ब्राह्मणके लिये अर्घ्य एवं पाद्य अर्पण करे। सर्वप्रथम मन्त्र पढ़कर विधिपूर्वक आसन देनेका नियम है। आसनके मन्त्रका भाव यह है—'द्विजवर! आपकी सेवामें यह आसन प्रस्तुत है। आप इसपर विश्राम करें। विप्रवर! साथ ही परम प्रसन्न होकर मुझे कृतार्थ करना आपकी कृपापर ही निर्भर है।' जब ब्राह्मण आसनपर बैठ जायँ, तब संकल्पपूर्वक छातेका दान करना चाहिये। आकाशमें बहुत-से देवता, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस एवं सिद्धोंका समुदाय तथा पितरोंका समाज उपस्थित रहता है, जो अत्यन्त तेजस्वी होते हैं। अतः उनसे तथा आतपवर्षादिसे बचनेके लिये छत्र धारण करना आवश्यक है। वसुंधरे! प्रेतका हित हो, इस विचारसे भी छत्र-दान अनिवार्य है। पहले प्रसन्नतापूर्वक प्रेतभाग देना चाहिये। प्रेत किसी आवरणके नीचे रहे, इसलिये भी उसके निमित्त ब्राह्मणको छत्र-दान करना परम उपयोगी है। देवता-दानव, सिद्ध-गन्धर्व तथा मांसभक्षी राक्षस आकाशमें रहकर नीचे देखते रहते हैं। उन सबकी दृष्टि पड़नेपर प्रेत विशेष लज्जाका अनुभव करता है। जब प्रेत लज्जित हो जाता है तो उसे देखकर असुर एवं राक्षस उसका उपहास करते हैं। इसलिये बहुत पहलेसे ही भगवान् आदित्यने इसके निवारणके निमित्त छत्रकी व्यवस्था कर रखी है।
देवि! पूर्वकालकी बात है एक बार अनेक देवता एवं ऋषि प्रेतलोकमें पहुँचे, पर वहाँ उनपर अग्नि, पत्थर, जलते हुए जल तथा भस्मकी दिन-रात वर्षा होने लगी। उसी उपद्रवको शान्त करनेके लिये भगवान् आदित्यको छत्रकी व्यवस्था करनी पड़ी थी, अतः प्रेत-कार्यमें ब्राह्मणको छत्र-दान अवश्य करना चाहिये।
शुभे! इसके पश्चात् उपानह (जूता) दान करनेका भी विधान है। इसे धारण करनेसे पैरोंको आराम पहुँचता है। इसके दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह भी बताता हूँ। यमराजकी पुरीमें जाते समय उपानह-दान करनेसे प्रेतके पैर नहीं तपते। यममार्ग अत्यन्त अन्धकारसे व्याप्त, महान् कठिन एवं देखनेमें भयावह है। उसी