वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १८८] अशौच, पिण्डकल्प और श्राद्धकी उत्पत्तिका प्रकरण ३४३
मार्गसे यमके लोकमें प्राणी अकेले ही जाता है। वहाँ यमराजके दूत पीछे-पीछे दण्ड लेकर शासन करनेमें सदा तत्पर रहते हैं। माधवि! दिन-रात दूतकी चेष्टा प्रेतको यमपुरीमें ले जानेके लिये बनी रहती है। अतः पैर सुखपूर्वक काम करते रहें—इस निमित्त ब्राह्मणको उपानहका दान करना अत्यन्त आवश्यक है। यमपुरीके मार्गकी भूमिपर तपती हुई बालुकाएँ बिछी रहती हैं। कण्टक भी बिखरे रहते हैं। ऐसी स्थितिमें वह उस दिये गये उपानहकी सहायतासे कठिन मार्गको पार कर पाता है।
भूमे! इसके पश्चात् मन्त्र पढ़कर धूप और दीप देनेका विधान है। प्रेतके साथ पृथक्-पृथक् इनकी योजना उपयुक्त है। नाम और गोत्रके उच्चारणसे प्रेत उन्हें प्राप्त करता है। इसके बाद भूमिपर कुश बिछाकर प्रेतका आवाहन करना चाहिये। आवाहनके मन्त्रका भाव यह है—'प्रेत! तुम इस लोकको परित्यागकर परमगतिको प्राप्त कर चुके हो। मैंने भक्तिपूर्वक तुम्हारे लिये यह गन्ध उपस्थित किया है, तुम प्रसन्न होकर इसे स्वीकार करो।' साथ ही विप्रके प्रति कहे—'विप्रवर! मेरे प्रयाससे ये सब प्रकारके गन्ध, पुष्प, धूप एवं दीप प्रेतके सेवार्थ समर्पित हैं। आप इन्हें स्वीकार करके प्रेतका उद्धार करनेकी कृपा करें।'
वसुंधरे! इसी प्रकार प्रेतके निमित्त सिद्ध अन्न, वस्त्र एवं आभूषण भी ब्राह्मणको दान करना चाहिये। माधवि! प्रेतके उपभोगके योग्य अनेक द्रव्य-दान करनेके पश्चात् तीन बार अपने पैरकी शुद्धि भी समुचित है। चारों वर्णोंको ऐसी ही विधिको पालन करना चाहिये। ग्रहीता ब्राह्मण भी मन्त्रका उच्चारण करके ही दातव्य वस्तु ग्रहण करे। प्रेतश्राद्धमें भोजन करनेवाले ब्राह्मणको ज्ञानी एवं शुद्धस्वरूप होना अनिवार्य है। सर्वप्रथम प्रेतके लिये अन्न देना चाहिये। उस समय एक-दूसरेका स्पर्श होना निषिद्ध है। उन सभी व्यञ्जनोंकी कल्पना प्रेतके निमित्त ही हो—ऐसा नियम है। सुव्रते! प्रेतके लिये पिण्डदान करते समय देवता और ब्राह्मण भी भाग पानेके अधिकारी हैं। बुद्धिमान् पुरुषको इस बातपर सदा ध्यान रखना चाहिये कि ऐसे अवसरोंपर मानवोचित व्यवहार भी बना रहे। विधिके साथ मन्त्र पढ़कर पितृतीर्थसे* पिण्ड अर्पण करना चाहिये। इस प्रकारके कार्य प्रेतों और ब्राह्मणोंके लिये स्वल्पान्तरके समयसे होना उचित है। प्रेतकार्यसे निवृत्त होकर हाथ-पैर धोना तथा विधिवत् आचमन करना चाहिये। फिर मन्त्रपूर्वक भक्षण करनेके योग्य सिद्ध अन्न हाथमें उठाये। जो ब्राह्मण प्रेतकार्यमें सदासे भोजन करता हो, अपनी जाति, बन्धु एवं गोत्रोंमें जो भोजनका अधिकारी हो तथा जिसके लिये जैसा उचित हो, उसको समुचित रूपसे वैसा ही भाग देना चाहिये। ब्राह्मणको जब कुछ दिया जा रहा हो, उस समय किसीको मना नहीं करना चाहिये। यदि कोई दूसरा दान करता हो और कोई दूसरा उसे रोकता है तो गुरुकी हत्या-जैसे बुरे फलका भागी होता है। यही नहीं, ऐसे व्यक्तिके दिये हुए पदार्थको देवता, अग्नि और पितर भी ग्रहण नहीं करते और प्रेतको भी
* अँगूठे तथा तर्जनी अँगुलीके बीचका स्थान 'पितृतीर्थ' कहलाता है—'कायमङ्गुलिमूलेऽग्रे दैवं पित्र्यं तयोरधः।' (मनु० २।५९ तथा द्रष्टव्य भविष्यपुराण १।१३। ६१–९५; बौधायनधर्मसूत्र ५।१४–१८, याज्ञवल्क्यस्मृति १।१९ आदिकी व्याख्याएँ।)