वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३४४ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १८८ |
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प्रसन्नता नहीं प्राप्त होती है। अतएव मनुष्यको ऐसा कार्य करना चाहिये कि जिससे दान-धर्मका लोप न हो सके। जातिवाले तथा सम्बन्धियोंके बीच प्रसन्नमनसे जो ब्राह्मणको विशेषरूपसे प्रेतभाग भोजनके लिये प्रदान करता है, उसकी अचल प्रतिष्ठा होती है, केवल देखनेमात्रसे कोई तृप्त नहीं होता। इस प्रकार प्रेतकी भावना करके भोजन आदि पदार्थ अर्पण करनेके प्रभावसे प्राणी यथाशीघ्र पापसे मुक्त हो जाता है।
शान्तिके लिये जलसे विधिवत् स्नानकर सिर झुकाकर प्रणाम करना चाहिये। तत्पश्चात् पितरोंके लिये दान देनेके स्थानपर आ जाय। देवि! तुम्हारी भक्तिमें निष्ठा रखते हुए मानवको इन मन्त्रोंको पढ़कर स्तुति करनेकी विधि है। मन्त्रका भाव यह है—'वसुधे! आप जगत्की माता हैं तथा मेदिनी, उर्वी, महाशैलशिलाधारा—आदि नामोंसे विभूषित हैं। आप जगत्की जननी तथा उसे आश्रय प्रदान करनेवाली हैं। जगत् आपपर आधारित है। आपको मेरा निरन्तर नमस्कार है।' सुन्दरि! इस विधिसे जब भक्त पिण्डदान करता है तो उसे महान् पुण्य प्राप्त होता है। फिर प्रेतके नाम और गोत्रका उच्चारण करके तिलोदक देना चाहिये। साथ ही दोनों घुटनोंको जमीनपर टेककर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको नमस्कार करे। मन्त्रपूर्वक अपने हाथसे ब्राह्मणका हाथ पकड़कर उठाये और उन्हें शय्यापर बैठाकर अञ्जन आदि वस्तुओंको अर्पित करे। कुछ क्षणतक वहाँ विश्राम करके निवाप (श्राद्ध)-स्थानपर आ जाय और गौकी पूँछ पकड़कर ब्राह्मणके हाथमें उसका दान करना चाहिये। गूलरकी लकड़ीसे बने हुए पात्रमें काला तिल और जल लेकर द्विजातिगण 'सौरभेय्यः सर्वहिताः०'—'इन मन्त्रोंका उच्चारण करे। मन्त्रसे जब जलकी शुद्धि हो जाती है तो उसके उपयोगसे सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं। इसके बाद प्रेतका विसर्जन करके ब्राह्मणको दान देना उचित है। अन्तमें अपसव्य रूपसे काकबलि देनी चाहिये। इसके बाद प्रेतके लिये बने हुए पदार्थसे चींटी आदि प्राणियोंके लिये भी सम्यक् प्रकारसे बलि देकर तर्पण करनेकी विधि है। माधवि! सब लोग भोजन कर लें, इसके बाद अनाथों और गरीबोंको भी संतुष्ट करना चाहिये। इससे वे यमपुरीमें जाकर मृत प्राणीकी सहायता करते हैं। सुन्दरि! अनाथोंको दिया हुआ सम्पूर्ण अन्न अक्षय हो जाता है। अतः प्रेतका संस्कार अवश्य करना चाहिये।
इस प्रकार चारों वर्णोंके लिये निमि प्रभृति आदर्श ऋषियों तथा स्वायम्भुव आदि मनुओँने सब प्रकारसे शुद्ध होनेके नियम प्रदर्शित किये हैं। अतः इससे पुरुष शुद्ध होता है, इसमें कोई संदेह नहीं। प्रेतसम्बन्धी कार्यमें धर्मपूर्वक संकल्प करनेकी विशेष आवश्यकता है। आत्रेयने भी कहा था—'पुत्र! तुमने जो प्रेतकार्य किया है और इसके विषयमें भयका अनुभव करते हो, यह कार्य अनुचित है। यह प्रसङ्ग मैं नारदके सामने विस्तारसे व्यक्त कर चुका हूँ। पुत्र! तुम्हारे लिये मैं एक यज्ञकी प्रतिष्ठा कर देता हूँ। आजसे लेकर यह यज्ञ अखिल जगत्में पितृयज्ञके नामसे प्रसिद्ध होगा। वत्स! अब तुम जा सकते हो। शोक करना तुम्हारे लिये अशोभनीय है। ब्रह्मा, विष्णु और शिवके लोकमें रहनेका तुम्हें सुअवसर मिलेगा। इसमें कोई संशय नहीं।'
इस प्रकार पितृसम्बन्धी कर्मका वर्णन करके