वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १८९ ] श्राद्धके दोष और उसकी रक्षाकी विधि ३४५
आत्रेय मुनिने निमिको आश्वासन दिया। अतएव तीसरे, सातवें, नवें, ग्यारहवें मासोंमें सांवत्सरिक क्रियाका नियम चल पड़ा। इन मासोंमें पिण्डदानकी विधि बन गयी है। प्रेतका यह कार्य पूरे एक वर्षमें पूर्ण होता है। कितने प्राणी इस लोकसे जाते हैं और जाकर बहुतोंको अन्य लोकमें भी पहुँचना पड़ता है। पिता-पितामह, पुत्रवधू, स्त्री, जातिवाले, सम्बन्धीजन और बन्धु एवं बान्धव—इन बहुसंख्यक प्राणियोंसे सम्बन्ध रखनेवाला यह संसार स्वप्नके समान मिथ्या और सारहीन है। किसीकी मृत्यु हो गयी तो उसका स्वजन कुछ समय रोता है और फिर मुँह पीछे करके लौट जाता है। स्नेहरूपी बन्धनसे प्राणी जकड़ा हुआ है। फिर आधे क्षणमें वह स्नेह-बन्धन कट भी जाता है। किसकी कौन माता, किसका कौन पिता, किसकी कौन स्त्री और किसके कौन पुत्र हैं! प्रत्येक युगमें इनके सम्बन्ध होते-टूटते रहते हैं। अतः इनपर कोई आस्था नहीं रखनी चाहिये। संसार मोहकी रस्सीमें बँधा है। मृतक व्यक्तिके लिये संस्कारकी विधि श्रद्धा एवं स्नेहपूर्वक की जाती है, इसीलिये उसे 'श्राद्ध' कहते हैं।
माता, पिता, पुत्र और स्त्री प्रभृति संसारमें आते हैं तथा चले भी जाते हैं। अतः वे किसके हैं और हमारा किससे सम्बन्ध है? मृत प्राणीके प्रेत-संस्कार सम्पन्न हो जानेपर वह पितरोंकी श्रेणीमें सम्मिलित हो जाता है। फिर प्रत्येक मासकी अमावास्या तिथिके दिन उसके लिये तर्पण करना चाहिये। ब्राह्मणके मुखमें हवन करनेसे अर्थात् ब्राह्मणको भोजन करानेसे पितामह एवं प्रपितामह सदाके लिये तृप्त हो जाते हैं। पितृयज्ञके प्रतिनिधि आत्रेयमुनिने इस प्रकारकी निश्चयात्मक बात बताकर कुछ समयतक भगवान् श्रीहरिका ध्यान किया और वहीं अन्तर्धान हो गये।
नारदजी कहते हैं— मुने! हमने आत्रेयके लिये जो संस्कार-सम्बन्धी बात बतायी है और तुमने उसका श्रवण भी किया है, वह प्रायः चारों वर्णोंसे सम्बन्ध रखता है, अतः उसे विधिपूर्वक करना चाहिये। तभीसे तपके परम धनी ऋषियोंके द्वारा प्रत्येक मासकी अमावास्याके दिन न्यायके अनुसार यह पितृयज्ञ होता आ रहा है। निमिद्वारा निर्दिष्ट यह यज्ञ द्विजातियोंको मन्त्रसहित और शूद्रवर्गको बिना मन्त्र पढ़े करना चाहिये—यह विधि है। तबसे इसका नाम 'नेमिश्राद्ध' पड़ गया और द्विजातिवर्णके प्राणी सदा इसे करते आ रहे हैं। महाभाग! तुम मुनिगणोंमें परम प्रतिष्ठित हो। तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं जाना चाहता हूँ। माधवि! इस प्रकार कहकर नारदमुनि अमरावतीके लिये प्रस्थान कर गये। [अध्याय १८८]
श्राद्धके दोष और उसकी रक्षाकी विधि
धरणीने कहा— भगवन्! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—इन चारों वर्णोंको जिस विधिसे श्राद्ध करना चाहिये, इन्हें जैसे अशौच लगता है और जैसे शुद्ध होते हैं तथा जिस विधिसे प्रेतकी सद्गतिके लिये भोजन आदि करानेका विधान है—यह प्रसङ्ग मैं सुन चुकी। प्रभो! ऐसा वर्णन मिलता है कि चारों वर्णोंके सभी व्यक्तियोंका कर्तव्य है कि उत्तम ब्राह्मणको ही दान दें। मेरे