वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 357, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३४६ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १८९ ] |
|---|
हृदयमें यह शङ्का है कि दान किसे देना उचित है? प्रेतश्राद्धका दान ग्रहण करना निन्दित एवं गर्हित कार्य है, अतः पुरुषोत्तम! आपसे मैं यह भी जानना चाहती हूँ कि विप्रसमाजमें जिस ब्राह्मणने प्रेतभाग स्वीकार कर लिया, वह क्या कर्म करे, जिससे उसके पाप दूर हो जायँ और दाताका भी श्रेय हो।
**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! जब पृथ्वीदेवीने इस प्रकार परम प्रभुसे प्रश्न किया तो शङ्ख एवं दुन्दुभियोंकी ध्वनि होने लगी। उस समय वराहरूपधारी भगवान् नारायणने भगवती वसुंधरासे कहा।
**भगवान् वराह बोले—**देवि! ब्राह्मण जिस प्रकार दाताका उद्धार कर सकते हैं, वह मैं तुम्हें बताता हूँ। जो ब्राह्मण अज्ञानमें प्रेतके निमित्त दिया हुआ अन्न ग्रहण कर लेता है, उसे शरीरकी शुद्धिके लिये एक दिन और रात निराहार रहकर प्रायश्चित्त करना चाहिये। ऐसा करनेसे वह ब्राह्मण शुद्ध हो जाता है। उसे पूर्वकी ओर बहनेवाली नदीमें विधिके अनुसार स्नानकर प्रातः-संध्या करनेके बाद तर्पण, अग्निमें तिलका हवन, शान्तिपाठ एवं मङ्गलपाठ करना चाहिये। फिर पञ्चगव्य-पान और मधुपर्कका सेवन परम शुद्धिका साधन है। तदनन्तर गूलरकी लकड़ीसे बने हुए पात्रमें शान्तिका जल लेकर वह ब्राह्मण अपने घरका मार्जन करे। पापोंको भस्म करनेके लिये देवताओंका मुख अग्निका काम करता है, अतः समस्त देवताओंका क्रमशः तर्पण, भूतोंके लिये बलि तथा इसके बाद ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। गौके दान करनेसे सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, अतः गोदान भी करे। ऐसी विधिका पालन करनेसे परमगति होती है। जिसके पेटमें प्रेतनिमित्तक अन्न हो और काल-धर्मके अनुसार उसके प्राण प्रयाण कर जायँ तो वह ब्राह्मण कल्पपर्यन्त भयंकर नरकमें निवास करता है और उसे कठिन दुःख भोगने पड़ते हैं। बादमें उसे राक्षसकी योनि मिलती है। इसलिये दाता और भोक्ता—दोनोंको स्वकल्याणार्थ प्रायश्चित्त करना नितान्त आवश्यक है। माधवि! गौ, हाथी, घोड़ा तथा समुद्रपर्यन्त सम्पूर्ण सम्पत्तियाँ दानमें लेनेवाला ब्राह्मण भी यदि मन्त्रपूर्वक प्रायश्चित्तका कार्य सम्पन्न कर ले तो निश्चय ही उसमें दाताके उद्धार करनेकी शक्ति आ जाती है।
जो ज्ञानसे सम्पन्न तथा वेदका अभ्यास करनेमें सदा संलग्न रहता है, वह ब्राह्मण स्वयं अपनेको एवं दाताको तारनेमें पूर्ण समर्थ है—इसमें कोई संशय नहीं। वसुंधरे! तीनों वर्णोंका परम कर्तव्य है कि वे कभी भी ब्राह्मणका अनादर न करें। देवकार्यके अवसरपर, जन्मनक्षत्रके दिन, श्राद्धकी तिथिमें, किसी पर्वकालपर अथवा प्रेत-सम्बन्धी कार्यमें प्रवीण ब्राह्मणको सम्मिलित करे। जो वैदिक विद्या जानता हो, जिसकी व्रतमें निष्ठा हो, जो सदा धर्मका पालन करता हो, शीलवान्, परम संतोषी, धर्मज्ञानी, सत्यवादी, क्षमासे सम्पन्न, शास्त्रका पारगामी तथा अहिंसाव्रती हो, ऐसे ब्राह्मणको पाकर उसे तुरंत दान देना चाहिये। वही ब्राह्मण दाताका उद्धार करनेमें समर्थ है। 'कुण्ड' अथवा 'गोलक' ब्राह्मणको दिया हुआ दान निष्फल हो जाता है।* वह
* पिताके रहते हुए जार पुरुषसे जिसकी उत्पत्ति होती है, वह बालक 'कुण्ड' कहलाता है और जिसे पतिकी मृत्युके पश्चात् स्त्री अन्य पुरुषसे जन्म देती है, उसे 'गोलक' संतान कहते हैं।