भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 358, कुल 414 में से

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पृष्ठ 358

अध्याय १८९ ] श्राद्धके दोष और उसकी रक्षाकी विधि ३४७

दाताको नरकमें पहुँचा देता है। पितृसम्बन्धी या देवकार्यमें कदाचित् एक भी कुण्ड या गोलक ब्राह्मण उपस्थित हो जाय तो उसे देखकर पितर निराश होकर लौट जाते हैं।

यशस्विनि! अपात्रको भी कभी दान न दे। इस सम्बन्धमें एक प्राचीन प्रसङ्ग कहता हूँ, तुम उसे सुनो। अवन्तीपुरीमें पहले एक मनुके वंशमें उत्पन्न परम धार्मिक राजा रहते थे, जिनका नाम मेधातिथि था। उनके अत्रिगोत्रकुलोद्भव पुरोहितका नाम चन्द्रशर्मा था, जो सदा वेद-पाठमें संलग्न रहते थे। राजा मेधातिथि अत्यन्त दानी थे। वे प्रतिदिन ब्राह्मणोंको गौएँ दान दिया करते थे। विधिके साथ सौ गौएँ रोज दान करनेके पश्चात् ही उनका अन्न ग्रहण करनेका नियम था। वैशाखमासमें उन महाराजने अपने पिताके श्राद्ध-दिवसपर अनेक ब्राह्मणोंको आमन्त्रित किया। फिर उन ब्राह्मणों एवं गुरु (राजपुरोहित)-के आनेपर उन्होंने उन्हें प्रणाम किया और विधिके साथ श्राद्धकार्य प्रारम्भ हुआ। पिण्ड-प्रदानके बाद अन्नदानका संकल्प करके उसे ब्राह्मणोंमें वितरित किया गया, पर उसी विप्रसमाजमें एक गोलक ब्राह्मण भी था। राजाने श्राद्धमें संकल्पित अन्न उस ब्राह्मणको भी दिया, जिससे श्राद्धमें एक महान् दोष उत्पन्न हो गया। इसी कारणसे राजा मेधातिथिके पितर स्वर्गसे नीचे उतर आये और उन्हें काँटोंसे भरे हुए जंगलमें रहना पड़ा और रात-दिन भूख-प्यासकी पीड़ा उन्हें सताने लगी। एक समयकी बात है—स्वयं राजा मेधातिथि संयोगवश दो-तीन परिजनोंके साथ मृगयाके लिये उसी जंगलमें पहुँच गये। राजाने वहाँ उन पितरोंको देखकर पूछा—‘महानुभाव! आपलोग कौन हैं? और आपलोगोंकी ऐसी दशा कैसे हुई? आप सभी किस कर्मके कारण यह दारुण दुःख भोग रहे हैं?—यह मुझे बतानेकी कृपा करें।’

पितरोंने कहा—हमारे वंशकी निरन्तर वृद्धि करनेवाला एक शक्तिसम्पन्न पुरुष है। लोग उसे मेधातिथि कहते हैं। हम सभी उसीके पितर हैं; किंतु इस समय नरकमें पड़े हैं। देवि! उस समय पितरोंकी यह बात सुनकर राजा मेधातिथिके हृदयमें अवर्णनीय दुःख हुआ। उन्होंने पितरोंको सान्त्वना दी। साथ ही कहा—‘पितृगण! मेधातिथि तो मैं ही हूँ। आपलोग मेरे ही पितर हैं। मैं जानना चाहता हूँ कि किस कर्मके दोषसे आपको नरकमें जाना पड़ा है।’

पितर बोले—पुत्र! तुमने जो हमलोगोंके लिये श्राद्धमें अन्न संकल्प किये, दैववश वह अन्न एक गोलक ब्राह्मणके पास पहुँच गया। अतः श्राद्ध-कर्म दूषित हो गया, उसीके फलस्वरूप हमें नरकमें जाना पड़ा और उसी समयसे हम दुःख भोग रहे हैं। हमारे मनमें इच्छा है कि हमको किसी प्रकार पुनः स्वर्ग सुलभ हो। पुत्र! तुम तो सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें सदा संलग्न रहते हो। दान करना तुम्हारा स्वाभाविक गुण है। तुम्हारे द्वारा अनगिनत गौएँ दानमें दी जा चुकी हैं। दक्षिणाएँ भी तुमने पर्याप्त दी हैं। उसी पुण्यके प्रभावसे हम स्वर्ग पाना चाहते हैं। पर तुम्हें पुनः एक बार श्राद्ध करना चाहिये, जिससे हम सभी पितरोंका उद्धार हो सके।

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