वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
अध्याय १८९ ] श्राद्धके दोष और उसकी रक्षाकी विधि ३४७
दाताको नरकमें पहुँचा देता है। पितृसम्बन्धी या देवकार्यमें कदाचित् एक भी कुण्ड या गोलक ब्राह्मण उपस्थित हो जाय तो उसे देखकर पितर निराश होकर लौट जाते हैं।
यशस्विनि! अपात्रको भी कभी दान न दे। इस सम्बन्धमें एक प्राचीन प्रसङ्ग कहता हूँ, तुम उसे सुनो। अवन्तीपुरीमें पहले एक मनुके वंशमें उत्पन्न परम धार्मिक राजा रहते थे, जिनका नाम मेधातिथि था। उनके अत्रिगोत्रकुलोद्भव पुरोहितका नाम चन्द्रशर्मा था, जो सदा वेद-पाठमें संलग्न रहते थे। राजा मेधातिथि अत्यन्त दानी थे। वे प्रतिदिन ब्राह्मणोंको गौएँ दान दिया करते थे। विधिके साथ सौ गौएँ रोज दान करनेके पश्चात् ही उनका अन्न ग्रहण करनेका नियम था। वैशाखमासमें उन महाराजने अपने पिताके श्राद्ध-दिवसपर अनेक ब्राह्मणोंको आमन्त्रित किया। फिर उन ब्राह्मणों एवं गुरु (राजपुरोहित)-के आनेपर उन्होंने उन्हें प्रणाम किया और विधिके साथ श्राद्धकार्य प्रारम्भ हुआ। पिण्ड-प्रदानके बाद अन्नदानका संकल्प करके उसे ब्राह्मणोंमें वितरित किया गया, पर उसी विप्रसमाजमें एक गोलक ब्राह्मण भी था। राजाने श्राद्धमें संकल्पित अन्न उस ब्राह्मणको भी दिया, जिससे श्राद्धमें एक महान् दोष उत्पन्न हो गया। इसी कारणसे राजा मेधातिथिके पितर स्वर्गसे नीचे उतर आये और उन्हें काँटोंसे भरे हुए जंगलमें रहना पड़ा और रात-दिन भूख-प्यासकी पीड़ा उन्हें सताने लगी। एक समयकी बात है—स्वयं राजा मेधातिथि संयोगवश दो-तीन परिजनोंके साथ मृगयाके लिये उसी जंगलमें पहुँच गये। राजाने वहाँ उन पितरोंको देखकर पूछा—‘महानुभाव! आपलोग कौन हैं? और आपलोगोंकी ऐसी दशा कैसे हुई? आप सभी किस कर्मके कारण यह दारुण दुःख भोग रहे हैं?—यह मुझे बतानेकी कृपा करें।’
पितरोंने कहा—हमारे वंशकी निरन्तर वृद्धि करनेवाला एक शक्तिसम्पन्न पुरुष है। लोग उसे मेधातिथि कहते हैं। हम सभी उसीके पितर हैं; किंतु इस समय नरकमें पड़े हैं। देवि! उस समय पितरोंकी यह बात सुनकर राजा मेधातिथिके हृदयमें अवर्णनीय दुःख हुआ। उन्होंने पितरोंको सान्त्वना दी। साथ ही कहा—‘पितृगण! मेधातिथि तो मैं ही हूँ। आपलोग मेरे ही पितर हैं। मैं जानना चाहता हूँ कि किस कर्मके दोषसे आपको नरकमें जाना पड़ा है।’
पितर बोले—पुत्र! तुमने जो हमलोगोंके लिये श्राद्धमें अन्न संकल्प किये, दैववश वह अन्न एक गोलक ब्राह्मणके पास पहुँच गया। अतः श्राद्ध-कर्म दूषित हो गया, उसीके फलस्वरूप हमें नरकमें जाना पड़ा और उसी समयसे हम दुःख भोग रहे हैं। हमारे मनमें इच्छा है कि हमको किसी प्रकार पुनः स्वर्ग सुलभ हो। पुत्र! तुम तो सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें सदा संलग्न रहते हो। दान करना तुम्हारा स्वाभाविक गुण है। तुम्हारे द्वारा अनगिनत गौएँ दानमें दी जा चुकी हैं। दक्षिणाएँ भी तुमने पर्याप्त दी हैं। उसी पुण्यके प्रभावसे हम स्वर्ग पाना चाहते हैं। पर तुम्हें पुनः एक बार श्राद्ध करना चाहिये, जिससे हम सभी पितरोंका उद्धार हो सके।
१५६- नचिकेताद्वारा यमपुरीकी यात्रा
| ३४८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १९० |
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वसुंधरे! पितरोंकी बात सुनकर राजा मेधातिथि घर वापस गये और उन्होंने अपने पुरोहित चन्द्रशर्माको बुलाया और उनसे उपर्युक्त वृत्तान्त कहा तथा पुनः श्राद्ध करनेकी इच्छा व्यक्त की और निवेदन किया कि इस श्राद्धमें 'कुण्ड-गोलक' ब्राह्मण सर्वथा न बुलाये जायें।
देवि! राजा मेधातिथिके आदेशसे पुरोहित चन्द्रशर्माने ब्राह्मणोंको पुनः बुलाकर पिण्डदान एवं श्राद्ध सम्पन्न कराया और ब्राह्मणोंको भोजन कराया फिर दक्षिणाएँ देकर उनकी पूजा की। इसके बाद सबको विदा करके उन्होंने स्वयं प्रसाद ग्रहण किया। तत्पश्चात् राजा पुनः वनमें गये और वहाँ उन्होंने अपने उन पितरोंको हृष्ट-पुष्ट तथा परम पराक्रमीरूपमें देखा। अब उन नरेशके हर्षकी सीमा न रही। उस अवसरपर पितरोंमें श्रद्धा रखनेवाले राजा मेधातिथिको देखकर पितरोंके मुखमण्डलपर भी प्रसन्नता छा गयी और उन्होंने कहा—'तुम्हारा कल्याण हो। तुमने हमारा हित कर महान् कार्य सम्पन्न किया है। अब हम स्वर्गको जाते हैं।'
देवि! श्राद्धमें संकल्पित अन्नपात्र ब्राह्मणके अभावमें गौको दे अथवा गौके अभावमें भी यत्नपूर्वक उसे नदीमें छोड़ दे, पर किसी प्रकार भी अपात्र, नास्तिक, गुरुद्रोही, गोलक अथवा कुण्डको वह अन्न न दे।
भामिनि! इस प्रकार अपना उद्गार प्रकट करके सभी पितर स्वर्ग चले गये और राजा मेधातिथि ब्राह्मणोंके साथ अपनी पुरीको लौटे। उन्होंने पितरोंकी आज्ञाका यथाविधि पालन किया। देवि! यह इसीलिये मैंने तुम्हें बताया है कि एक भी उत्तम ब्राह्मण मिल जाय तो वही पर्याप्त है। उसीकी कृपासे यज्ञकर्ता कठिनाइयोंसे तर सकता है—इसमें कोई संशय नहीं। वह एक ही विप्र दाताको इस प्रकार पार करनेमें समर्थ है, जैसे अगाध जलको पार करनेके लिये एक नाव। वसुंधरे! अतएव सुपात्र ब्राह्मणको ही दान देना चाहिये। देवता, दानव, मानव, राक्षस, गन्धर्व और उरग—इन सभीके लिये यह विधान है।
[ अध्याय १८९]
श्राद्ध और पितृयज्ञकी विधि तथा दानका प्रकरण
पृथ्वी बोली— भगवन्! देवता, मनुष्य, पशु, एवं पक्षी-प्रभृति सभी प्राणी कालवश प्रेत होते हैं, वे कभी नरकोंमें जाते हैं और पुनः संसारमें भी आते हैं। अब मैं यह जानना चाहती हूँ कि पितर कौन-से हैं, जिन्हें विधिपूर्वक अर्पण करनेसे श्राद्ध-सम्बन्धी पदार्थ भोजनके लिये उपलब्ध होता है? प्रत्येक मासमें संकल्पपूर्वक दिया गया पिण्ड किस प्रकार पितरोंके पास पहुँचता है? पितृक्रियासे सम्बन्ध रखनेवाले श्राद्धमें कौन पितर भोजन पानेके अधिकारी हैं? इस विषयमें मुझे महान् कौतूहल हो रहा है, कृपया निर्णयपूर्वक बतलायें।
भगवान् वराह बोले— देवि! तुम मुझसे जो पूछती हो, उसे मैं बताता हूँ। माधवि! पितृसम्बन्धी यज्ञोंमें भाग पानेके जो अधिकारी हैं, उन्हें सुनो—पिता, पितामह तथा प्रपितामह—इन पितरोंके लिये पिण्डका संकल्प करना चाहिये। पितृपक्ष आनेपर नक्षत्र और तिथिकी जानकारी प्राप्त
अध्याय १९०] श्राद्ध और पितृयज्ञकी विधि तथा दानका प्रकरण [३४९
करके पितरके लिये उन्हें पुण्यपर्व मान ले। उन्हीं अवसरोंपर पिण्डदान करनेसे विशेष फल प्राप्त होता है। शुभलोचने! जिन ज्ञानवान् पुरुषोंको जिस प्रकार श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करनेका विधान है, वह सभी मैं तुम्हें बताता हूँ, तुम सावधान होकर सुनो। ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ और मनुष्ययज्ञ—ये अनेक प्रकारके यज्ञ हैं। कुछ द्विजाति ब्रह्मयज्ञ, कुछ गृहस्थाश्रममें रहकर भूतयज्ञ तथा मनुष्ययज्ञ करके इष्टदेवकी उपासना करते हैं। अब मैं पितृयज्ञका वर्णन करता हूँ, उसे सुनो। वरारोहे! जो लोग सौ यज्ञ करते हैं, उन सभीके द्वारा प्रायः मेरी ही आराधना होती है। तुम्हें मैं यह बिलकुल सत्य बात बताता हूँ। माधवि! हव्य एवं कव्य ग्रहण करनेके लिये देवताओंका मुख अग्नि है। यज्ञोंमें आवस्थ्य (उत्तराग्नि), दक्षिणाग्नि और आहवनीयाग्नि प्रयुक्त होती हैं। इन सभी अग्नियोंमें मैं ही व्याप्त हूँ एवं समस्त कार्यों तथा देवयज्ञोंमें भी पावनरूपसे मैं ही व्यवस्थित हूँ। देवतीर्थोंमें भिक्षुक, वानप्रस्थी और संन्यासी—इनका सत्कार करना उचित है; किंतु श्राद्धमें इन्हें भोजन नहीं कराना चाहिये; क्योंकि देवताओंके निमित्त ही इनकी पूजा करनेका विधान है। अब जो व्रती ब्राह्मण श्राद्धमें निमन्त्रित करनेके लिये योग्य हैं, उनका निर्देश करता हूँ। जो अपने घरपर सदा संतुष्ट रहता है तथा क्षमाशील, संयमी, इन्द्रिय-विजयी, उदासीन, सत्यवादी, श्रोत्रिय एवं धर्मका प्रचारक है—ऐसे ब्राह्मणको श्राद्धके लिये ग्राह्य मानना चाहिये। माधवि! जो वेद-विद्याके पारगामी तथा स्वच्छ एवं मधुर अन्न खानेके स्वभाववाले हों, ऐसे ब्राह्मणोंको पितृयज्ञ-सम्बन्धी श्राद्धमें भोजन कराना हितकर है। सुन्दरि! श्राद्धमें सर्वप्रथम देवतीर्थोंमें अवगाहन करनेकी आवश्यकता है। पहले अग्निमें हवन कर बादमें विधिका पालन करते हुए पितरके निमित्त ब्राह्मणोंके मुखमें हवन करना उचित है।
देवि! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र—ये चारों वर्ण श्राद्ध करनेके अधिकारी हैं। श्राद्धके पदार्थको कुत्ते, मुर्गे, सूअर तथा अपवित्र व्यक्ति न देख सकें। जो अपनी श्रेणीसे च्युत हो गये हैं, जिनका संस्कार नहीं हुआ है, जो सब प्रकारके अकार्य कर्म करते रहते हैं तथा जो सर्वभक्षी हैं, ऐसे ब्राह्मणको पितृयज्ञसे सम्बन्धित श्राद्धको नहीं देखना चाहिये। यदि कदाचित् ऐसे ब्राह्मणोंकी दृष्टि श्राद्धपर पड़ गयी तो उसे ‘आसुरी श्राद्ध’ कहते हैं। बहुत पहले जब मैंने इन्द्रका कार्य सिद्ध करनेके लिये वामनका अवतार ग्रहण किया था तो ऐसे श्राद्धोंको मैं बलिको दे चुका हूँ। इसलिये विद्वान् पुरुषको चाहिये कि पितृयज्ञोंमें ऐसे ब्राह्मणोंको सम्मिलित न करे, जहाँ सर्व-साधारणकी दृष्टि न पड़े, ऐसे स्थानमें पवित्र होकर तर्पणपूर्वक ब्राह्मणको श्राद्धमें भोजन कराये। भूमे! मन्त्र पढ़कर पितरोंका आवाहनकर तीन पिण्ड देने चाहिये। इन पिण्डोंके अधिकारी पिता, पितामह तथा प्रपितामह हैं। प्रति मासमें अपसव्य होकर इनके लिये तिलोदक तथा पिण्डदान करना चाहिये। फिर वैष्णवी, काश्यपी और अजया—इन नामोंका उच्चारणकर सिर झुकाकर तुम्हें भी प्रणाम करना चाहिये।
१५७- यमपुरीका वर्णन
३५० संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १९०
देवी! इस प्रकार पिण्ड-दान करनेसे पितर प्रसन्न हो जाते हैं—इसमें कोई संशय नहीं है। सृष्टिके प्रारम्भमें तीन पुरुष पितरोंके रूपमें प्रकट हुए थे। पिण्ड ही उनका आहार है। देवता, असुर, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व एवं पन्नग—ये सब-के-सब वायुका रूप धारण करके पितृयज्ञ करनेवाले पुरुषकी श्राद्धक्रियाके छिद्रपर दृष्टि लगाये रहते हैं—यह निश्चित है। जो विवेकी व्यक्ति पितृयज्ञ करते हैं, उन्हें पितरोंकी कृपासे आयु, कीर्ति, बल, तेज, धन, पुत्र, पशु, स्त्री तथा आरोग्य सदाके लिये सुलभ हो जाते हैं—इसमें कोई संशय नहीं। यही नहीं—अपने इस उत्तम कर्मके प्रभावसे वे मनुष्य परम पवित्र लोकोंके अधिकारी हो जाते हैं और वे प्रेत एवं पशु-पक्षीकी योनिमें नहीं पड़ते हैं। ऐसा पुरुष नरकमें गये हुए अपने पितरोंका उद्धार करनेमें पूर्ण समर्थ बन जाता है। देवताओं तथा पितरोंकी उपासना करनेवाला मनुष्य गृहस्थाश्रममें रहता हुआ भी पूरी विधिके साथ द्विजाति वर्गके पितरोंको तृप्त कर सकता है। श्राद्धमें तृप्त हुए पितर उस प्राप्त वस्तुको अविनाशी मानते हैं। जिनकी पितरोंके प्रति श्रद्धा है, उनकी भी परमगति होती है। इस प्रकारके ज्ञानीजन मृत्युके पश्चात् सत्त्वगुणसे सम्पन्न शुक्लमार्गसे प्रयाण करते हैं।
देवी! जिनके मनपर अज्ञानका आवरण है, जो कृतघ्न एवं प्रचण्ड मूर्ख हैं, ऐसे मनुष्य स्नेहमयी सैकड़ों रस्सियोंसे बँधकर भयंकर नरकमें गिरते हैं। पर जो मानव कल्पपर्यन्तके लिये नरकमें पड़े हैं, उनके भी पुत्र अथवा पौत्र यदि कहीं श्राद्ध-क्रिया कर दें तो उसके प्रभावसे उन प्राणियोंकी सद्गति हो जाती है। अमावास्याको जो जलाशयमें जाकर पितरोंके निमित्त विन्दुमात्र भी जल देते हैं, उससे उनके नरकस्थित पितरोंको भी तृप्ति प्राप्त हो जाती है। जो द्विजातिवर्गके पुरुष पितरोंके लिये भक्तिपूर्वक तर्पण, तिलाञ्जलि एवं पिण्डपातप्रभृति श्राद्ध कार्य करते हैं, उनके पितरोंकी नरकसे मुक्ति मिल जाती है और वे सदाके लिये तृप्त हो जाते हैं। श्राद्धमें गूलरकी लकड़ीके पात्रसे तिल और जलद्वारा तर्पणकी बड़ी महिमा है। पितरोंका उद्धार करनेके लिये ब्राह्मणोंके वचनपर श्रद्धा रखना और अपने वैभवके अनुसार उन्हें दक्षिणा देना परम आवश्यक है। नीले साँड़ छोड़नेसे जो पुण्य भूमण्डलपर होता है, उसके प्रभावसे पुरुषके पितर छाछठ हजार वर्षोंतक चन्द्रमाके लोकमें आनन्दपूर्वक निवास करते हैं। उन्हें भूख-प्यास नहीं लगती।
श्राद्ध-तर्पण गृहस्थोंके लिये महान् धर्म है। चींटी आदि जङ्गम प्राणी एवं आकाशमें विचरनेवाले जीव गृहस्थोंके आश्रयपर ही जीवन धारण करते हैं, इसमें कोई संशय नहीं। गृहस्थाश्रम ही सभी धर्मोंका मूल है। सारे वर्ण एवं आश्रम इसीपर आधृत हैं। इस आश्रममें रहकर जो व्यक्ति प्रति मास पर्व तथा प्रत्येक निर्दिष्ट तिथिपर श्राद्ध करते हैं, उनके द्वारा पितरोंका निश्चय ही उद्धार हो जाता है। गृहस्थके घरमें धर्मपूर्वक श्राद्ध करनेसे जैसा फल प्राप्त होता है, वैसा फल यज्ञ, दान, अध्ययन, उपवास, तीर्थस्नान, अग्निहोत्र तथा विधिपूर्वक अनेक प्रकारके दानोंसे भी प्राप्य नहीं है। ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्रके शरीरमें प्रविष्ट पितृगण पिता, पितामह एवं प्रपितामहके रूपसे प्रकट होकर विराजते हैं। कश्यप उनके जनक हैं। पहले कभी अग्निमें हवन न करके ब्राह्मणके मुखमें हवन किया गया अर्थात् ब्राह्मणको भोजन कराया गया। भूमिपर कुश बिछाकर पिण्ड संकल्प करके
अध्याय १९० ] श्राद्ध और पितृयज्ञकी विधि तथा दानका प्रकरण [ ३५१
उनपर रख दिये गये। उस पिण्डसे पितृदेवोंको अजीर्ण हो गया और उन्हें महान् पीड़ा होने लगी। उन्होंने भोजन करना छोड़ दिया और दुःखसे अत्यन्त संतप्त होकर वे सोमदेवके पास गये। सुश्रोणि! अजीर्णसे दुःखी उन पितरोंपर चन्द्रमाकी दृष्टि पड़ी तो उन्होंने मधुर वाक्योंसे उनका स्वागत किया।
सोमने पूछा—'पितरो! तुम्हारे इस दुःखका क्या कारण है?' इसपर पितरोंने कहा—'सोमदेव! आप हमारी बातें सुननेकी कृपा करें। ब्रह्मा, विष्णु और शंकरके शरीरसे उत्पन्न हुए हम तीनों पितृदेवता हैं। हमलोगोंकी नियुक्ति श्राद्धमें हुई थी। पुत्र आदि द्वारा दिये गये पिण्डोंसे हम अत्यन्त तृप्त हो गये। यहाँतक कि हमें अजीर्ण हो गया। इसीसे हम दुःख पा रहे हैं।'
सोमने कहा—'पितृगण! मैं तुमलोगोंका मित्र बन जाता हूँ। अब तुम तीन ही नहीं रहे। एक चौथा पितर मैं भी बन गया। अब हम सभी ऐसी जगह चलें, जहाँ हमारे कल्याण होनेकी सम्भावना हो।' वसुंधरे! सोमके इस प्रकार कहनेपर वे पितर उनके साथ सुमेरुपर्वतके शिखरपर गये, जहाँ पितामह ब्रह्माजी ब्रह्मर्षियोंद्वारा सेवित एवं सुशोभित हो रहे थे। सभीने उन्हें प्रणाम किया। फिर सोमने उनसे कहा—'भगवन्! ये पितर अजीर्णसे पीड़ित होकर आपकी शरण आये हैं, आप इन्हें क्लेश-नाशका उपाय करें।'
इसपर श्रीब्रह्माजी एक मुहूर्ततक परम योगीश्वर भगवान् श्रीहरिके ध्यानमें लीन रहे। फिर भगवान् श्रीहरिने प्रकट होकर उनसे कहा—ब्रह्मन्! यह मेरी वैष्णवी मायाका ही प्रभाव है कि पहले जो देवता थे, वे अब पितरके रूपमें प्रकट हैं। मेरे अङ्गसे निकले हुए पिता ब्रह्माके रूप, पितामह विष्णुके रूप तथा प्रपितामह रुद्रके रूप माने जाते हैं। मर्त्यलोकमें श्राद्धके अवसरपर इन्हें पितृ-देवताके रूपमें नियोजित किया गया है। ब्राह्मणोंके हितार्थ विष्णुमायाकी आज्ञासे प्रजा इन्हें पितृयज्ञोंसे तृप्त करती है। अब मैं इनके अजीर्ण दूर होनेका उपाय बतला रहा हूँ। धूम्रकेतु और विभावसु* नामके शाण्डिल्य मुनिके दो तेजस्वी पुत्र हैं। मानवमात्रके लिये यह कर्तव्य है कि वे श्राद्ध करते समय पहले अग्निको भाग देकर शेष पिण्ड उन तेजस्वी विभावसुके साथ ही पितरोंको अर्पित करें।'
परम प्रभुके इस कथनपर ब्रह्माजीने मन-ही-मन हव्यवाहन अग्निका आवाहन किया। उनके स्मरण करते ही सर्वभक्षी अग्निदेव उनके पास आये। अग्निका शरीर प्रचण्ड तेजसे उद्दीप्त हो रहा था। मेरी प्रेरणासे ब्रह्माजीने उन्हें पाँच प्रकारके यज्ञोंमें भाग पानेका अधिकारी बनाया और अग्निसे कहा—'हुताशन! तुम ब्रह्मस्वरूप हो। पितरोंके निमित्त श्राद्धमें दिये गये पिण्डके भागमें—'ॐ अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा'—इस मन्त्रद्वारा सर्वप्रथम तुम्हें ही भाग पानेका अधिकार दिया जाता है। तुम्हारे बाद मरुद्गणसहित देवता भाग प्राप्त करनेके अधिकारी होंगे। तुम सभीके ग्रहण कर लेनेपर श्राद्धका अन्न पितरोंके लिये पथ्यस्वरूप हो जायगा और सोमसहित पितर उसके अधिकारी होंगे।
वसुंधरे! ब्रह्माकी इस व्यवस्थासे अग्नि, देवता एवं पितर श्राद्धके भागी बने। तबसे अग्नि एवं सोमके साथ पितृयज्ञमें सभीका पितरोंके साथ भोजन करनेका सदाके लिये नियम बन
* ये अग्निके भी नामान्तर हैं।
३५२ संक्षिप्तश्रीमद्वराहपुराण [ अध्याय १९०
गया। जगत्को प्रश्रय देनेवाली पृथ्वी देवि! इस नियमका अनुसरणकर पितरोंके निमित्त श्राद्ध करते समय सर्वप्रथम पिण्ड अग्निको देकर पश्चात् पितरोंको तृप्त करना चाहिये। वसुंधरे! इस प्रकार जो मनुष्य मन्त्रोंका उच्चारणकर विधिके साथ पितरोंके लिये श्राद्ध करते हैं, वे तृप्त हुए पितरोंकी कृपासे निरन्तर सुख-समृद्धिके भागी होते हैं।
देवि! अब श्राद्धकी श्रेणीमें जो निन्द्य हैं, उन ब्राह्मणोंका विवेचन करता हूँ। नपुंसक, चित्रकार, पशुपाल, कुमार्गी, काले दाँतवाला, कण (एक नेत्रसे रहित), लम्बोदर, नाच करनेवाला, गायक, कपड़ा रँगकर जीविका चलानेवाला, वेदविक्रयी, सभी वर्णोंसे यज्ञ करानेवाला, राजाका सेवक, व्यापारके निमित्त खरीदने एवं बेचनेवाले, ब्रह्म-योनिमें उत्पन्न, निन्दक, पतित, संस्काररहित, गणक, गाँवमें घूमकर याचना करनेवाला, दीक्षित, काण्डपृष्ठ, (शस्त्र लेकर घूमनेवाला), सूदखोर, रसविक्रेता, वैश्यकी वृत्तिसे जीविका चलानेवाला, चोर, लेखकार, याजक, शौण्डिक (शराब बनानेवाला), गैरिक (गेरुआ कपड़ा पहननेवाला) दम्भी, सभी वर्णसे सम्बन्धित कार्यमें रत तथा सब कुछ बेचनेमें तत्पर—ये सभी ब्राह्मण श्राद्ध-कर्मके लिये निन्द्य माने जाते हैं। इन्हें पितरोंके निमित्त श्राद्धमें भोजन नहीं कराना चाहिये। पण्डितसमाजका कथन है कि जो जीविकाके निमित्त दूर चले जाते हैं, रस बेचते हैं तथा धूर्त एवं तिलविक्रयी हैं, ऐसे ब्राह्मणोंके श्राद्धमें सम्मिलित हो जानेसे वह श्राद्ध राजस हो जाता है। देवि! इनके अतिरिक्त मैंने जिन निन्दित ब्राह्मणोंको बताया है, वे सभी ब्राह्मण राजस हैं। माधवि! श्राद्धसम्बन्धी कर्मोंमें पितरोंके लिये पिण्डदान करते समय ऐसे पङ्क्तिदूषित ब्राह्मणोंका दर्शनतक नहीं करना चाहिये। यदि ऐसे ब्राह्मण श्राद्धमें भोजन करते हों और उनपर श्राद्धकर्ताकी दृष्टि पड़ गयी तो उसके पितर छः महीनोंतक दारुण दुःख उठाते हैं। वसुधे! यदि कहीं ऐसी त्रुटि हो जाय तो श्राद्धकर्ता और भोक्ता दोनोंके लिये आवश्यक है कि वे यथाशीघ्र प्रायश्चित्त करें। प्रायश्चित्तका स्वरूप है कि प्रज्वलित अग्निमें घृतका हवन, सूर्यका दर्शन, सिरका मुण्डन, पिता-पितामह आदिके लिये पुनः गन्ध-पुष्प-धूप आदिसे पूजन, अर्घ्य तथा तिलोदकका दान एवं विधिके साथ पवित्र होकर वह ब्राह्मण-भोजन आदि कराये।
सुन्दरि! अब पुनः एक अन्य बात बताता हूँ, उसे सुनो। ज्ञानद्वारा जिसका अन्तःकरण पवित्र हो गया है, वह ब्राह्मण विधिके अनुसार मन्त्रशुद्धि करे। माधवि! जो कभी भी मृतक सम्बन्धित अन्नका भक्षण नहीं करते हैं, ऐसे ब्राह्मणको वैश्वदेवनिमि्त्तक भाग देना चाहिये, उन्हें श्राद्धोंमें भोजन कराना अनुचित है। जो ब्राह्मण श्राद्धमें प्रेतान्न खाते हैं, अब उनका दोष बताता हूँ। प्रेतान्न खानेके प्रभावसे ऐसे दम्भी मनुष्यको नरकमें जाना पड़ता है। अब उसकी शुद्धिका उपाय बतलाता हूँ। ऐसे द्विजातिपुरुषका कर्तव्य है कि माघमासके द्वादशी तिथिको पुष्य नक्षत्रमें मधु और फलसे पितरोंको तृप्त करके घृतयुक्त खीरका प्राशन करे। 'मुझे पवित्रता प्राप्त हो जाय'—इस संकल्पसे वह कपिला गौका दान करे तथा अपने कल्याणकी अभिलाषासे पितृ-श्राद्ध सम्पन्न कर, युग्म ब्राह्मणको भोजन कराकर विसर्जन करना चाहिये।
विशालाक्षि! अमावास्या तिथिको दन्तधावन
१५८- यम-यातनाका स्वरूप
अध्याय १९१-१९२ ] 'मधुपर्क' की विधि और शान्तिपाठकी महिमा ३५३
करना प्रायः सभीके लिये निषिद्ध है। जो बुद्धिहीन व्यक्ति अमावास्याको दातुन करता है, उसके इस कर्मसे चन्द्रमा, देवता तथा पितर कष्ट पाते हैं। रात बीत जानेपर जब प्रातःकाल हो जाय और सूर्यकी किरणें प्रकाशित होने लगें तो दिनका कार्य आरम्भ करे। यह काम ब्राह्मणको सविधि सम्पन्न करना चाहिये। पितरोंके प्रति श्रद्धा रखनेवाला मानव बाल बनवाने, नाखून कटवाने और तेल लगाकर स्नान करनेके पश्चात् पवित्र पक्वान्न तैयार करे। पाक बन जानेपर दिनके मध्यकालमें श्राद्ध करनेकी विधि है। फिर तीर्थके शुद्ध जलके द्वारा ब्राह्मणको पाद्य देकर मण्डपके भीतर प्रवेश कराकर विधिके साथ अर्घ्यपूर्वक चन्दन, माला, धूप-दीप, वस्त्र और तिल एवं जलसे पूजा करनी चाहिये। फिर भोजनके लिये सामने पात्र रखे और भस्मसे मण्डलकी रचना करे। पृथक्-पृथक् मण्डल होनेसे पङ्क्तिका दोष नहीं लगता। फिर अग्निसम्बन्धी कार्य सम्पन्न करके अन्नपरिवेषण करे। सपात्रक*श्राद्धमें पितरोंको लक्ष्य करके संकल्प नहीं करना पड़ता। इसमें केवल ब्राह्मणसे प्रार्थना करे—'द्विजदेव ! अब आपको सुखपूर्वक भोजन करना चाहिये। विद्वान् पुरुष भोजन करते समय 'रक्षोघ्न-मन्त्र' का भी पाठ करें। ब्राह्मणके तृप्त हो जानेपर अन्न-विकरण करनेका विधान है।
इसके पश्चात् दूसरा आसन देकर पिण्ड देना चाहिये। भूमिपर कुश बिछाकर दक्षिणकी ओर मुख करके पिता, पितामह और प्रपितामह—इन पितरोंके लिये पिण्ड अर्पण करे। फिर अपनी संतानमें वृद्धि होनेके उद्देश्यसे विधिपूर्वक उनकी पूजा करे। पूजाके अन्तमें ब्राह्मणके हाथमें अक्षय्योदक देना चाहिये। जब ब्राह्मण संतुष्ट हो जायँ तो स्वस्तिवाचनपूर्वक विसर्जन करे। वसुधे ! जबतक तीनों पिण्ड पृथ्वीपर रहते हैं, तबतक पितरोंको सुख मिलता रहता है।
फिर श्राद्धकर्ता आचमन करके पवित्र हो शान्ति-निमित्तक जल दे। फिर जहाँ पिण्डपात हुआ है, उस भूमिको वैष्णवी, काश्यपी और अक्षया—इन नामोंका उच्चारणकर सिर झुकाकर प्रणाम करे। पहला पिण्ड स्वयं ग्रहण करे, दूसरा पत्नीको दे और तीसरा पिण्ड पानीमें डाल दे, फिर प्रणाम करके पितरों एवं देवताओंका विसर्जन करे। इस प्रकार पिण्डदान करनेसे पितृदेव प्रसन्न हो जाते हैं—इसमें कोई संशय नहीं। उन पितरोंकी कृपासे लम्बी आयु, पुत्र-पौत्र तथा सम्पत्ति सुलभ हो जाती है। श्राद्धके अवसरपर उत्तम ज्ञानी ब्राह्मणोंको तथा योगियोंको भी श्राद्धसम्बन्धी वस्तुएँ समर्पण करे। अन्यथा वह श्राद्ध फल प्रदान करनेमें असमर्थ हो जाता है—इसमें कोई संशय नहीं। [अध्याय १९०]
'मधुपर्क' की विधि और शान्तिपाठकी महिमा
पृथ्वी बोली— भगवन् ! यद्यपि आपसे मैं बहुत कुछ सुन चुकी, किंतु अभी तृप्ति नहीं हुई। अब मुझपर दयाकर आप यह बतानेकी कृपा कीजिये कि 'मधुपर्क' में कौन पदार्थ किस मात्रामें हो तथा उसके अर्पणकी क्या-क्या विधि एवं पुण्य है?
भगवान् वराहने कहा— देवि ! मैं 'मधुपर्क' की उत्पत्ति और दानका प्रसङ्ग बताता हूँ, सुनो। इससे सारे अनिष्ट दूर हो जाते हैं। जब संसारकी सृष्टि हुई, तब मेरे दक्षिण अङ्गसे एक पुरुषका प्रादुर्भाव
* किसी देशमें पहले सपात्रक श्राद्ध भी होता है। वहाँ अन्न-परिवेषणमें स्वयं ब्राह्मण भोजन करते हैं।
३५४ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १९१-१९२
हुआ, जो बड़ा द्युतिमान् एवं कीर्तिमान् था। उसे देख ब्रह्माजीने पूछा—'प्रभो! यह कौन है?' तब मैंने उनसे कहा—'यह तो मधुपर्क है, जो मेरे ही शरीरसे उत्पन्न है तथा मेरे भक्तोंको संसारसे मुक्त करनेवाला है। जो व्यक्ति मेरी आराधनाके समय इस मधुपर्कको अर्पण करता है, उसे वह सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त होता है, जहाँ जानेपर प्राणीको शोक नहीं होता।' अब इसके निर्माण और दानकी विधि भी बताता हूँ, जिसे करनेपर मानव मेरे दिव्य धाममें पहुँच जाते हैं। यदि सर्वश्रेष्ठ सिद्धि पानेकी अभिलाषा हो तो मधु, दही और घृतको समान भागमें लेकर मन्त्र पढ़नेके साथ ही विधिपूर्वक मिलाना चाहिये। जो इस विधिका पालन करते हैं, वे मेरे परम प्रिय हो जाते हैं। फिर मधुपर्क हाथमें लेकर यह कहना चाहिये—'ॐकारस्वरूप भगवन्! यह मधुपर्क आपको समर्पित है, आप इसे स्वीकार करनेकी कृपा करें। प्रभो! यह आपके ही श्रीविग्रहसे प्रकट हुआ है। संसारसे मुक्त होनेके लिये यह परम साधन है। भक्तिपूर्वक मैंने इसे सेवामें समर्पण किया है। देवेश! आपको मेरा बार-बार नमस्कार है।'
**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! मधुपर्ककी उत्पत्ति, उसके दानका पुण्य-फल तथा ग्रहणकी आवश्यकता सुनकर उत्तम व्रतका पालन करनेवाली पृथ्वीदेवीको बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने भगवान् श्रीहरिके चरण स्पर्श कर पूछा—'भगवन्! आपका प्रिय पदार्थ मधुपर्क शान्तिपाठसहित आपके श्रद्धालु भक्त किस प्रकार अर्पण करें? कृपया इस महान् कर्मकी विधि बतायें।
**भगवान् वराह कहते हैं—**महाभागे! मैं सभी प्रसङ्ग बताता हूँ। इसके प्रभावसे मानव दुःखरूपी संसारसे मुक्त हो जाते हैं। तुमने पहले जिस बातकी चर्चा की है, उसे मेरी भक्तिमें रहनेवाले व्यक्ति सम्पन्न करके शान्ति-पाठ करें।
शान्तिका पाठ करनेके पश्चात् मेरी भक्तिमें लगे पुरुष मुझे जलाञ्जलि प्रदान करके पुनः इस भावका मन्त्र पढ़ें। मन्त्रका भाव यह है—'भगवन्! जिनके द्वारा जगत्की सृष्टि होती है, देवसम्बन्धी यज्ञोंमें कर्मके जो साक्षी हैं, वे प्रभु स्वयं आप ही हैं। वासुदेव! मुझे शान्ति प्रदान करनेके साथ ही संसारके आवागमनसे मुक्त कर दें।'
पृथ्वि! यह सिद्धि, कीर्ति, बलोंमें महान् बल, लाभोंमें परम लाभ और गतियोंमें परम गति है। ऐसे शान्तिपाठका विचारपूर्वक जो पठन करता है, वह मुझमें लीन हो जाता है। संसारमें पुनः उसे आना नहीं पड़ता, इस प्रकार शान्तिपाठ करके मुझे मधुपर्क निवेदन करना चाहिये। 'ॐ नमो नारायणाय' कहकर मन्त्र पढ़नेकी विधि है। मन्त्रका भाव यह है—'भगवन्! आप सर्वश्रेष्ठ देवताओंके भी स्रष्टा हैं। मधुपर्क आपके नामसे सम्बन्ध रखता है। जो सभी जगह सुपूजित होते हैं, वे प्रभु आप ही हैं। आप संसार-सागरसे मेरा उद्धार करनेके लिये यहाँ पधारें और इन पात्रोंमें विराजमान हों।'
सुश्रोणि! गूलरकी लकड़ीसे बने हुए पात्रमें घी, दही और मधुको समानरूपसे रखकर मधुपर्क बनाना चाहिये। यदि शहद न मिल सके तो गुड़ भी मिलाया जा सकता है। घृतके अभावमें उसकी जगह धानके लावेसे भी काम चल सकता है। दही न मिले तो दूध ही मिला दे। इस प्रकार दही, शहद और घृत समान मात्रामें मिलाकर मधुपर्क बना
१- संदंश
अध्याय १९१-१९२] 'मधुपर्क' की विधि और शान्तिपाठकी महिमा ३५५
ले*। फिर उसे इस प्रकार अर्पित करें—'देवेश! रुद्र भी आपके ही रूप हैं। मैं दधि, घृत, मधुसे बना हुआ यह मधुपर्क आपको अर्पित करता हूँ।' यदि सभी वस्तुओंका अभाव हो तो श्रद्धालु भक्त केवल जल ही हाथमें लेकर यह मन्त्र पढ़े—'जिन प्रभुकी नाभिसे निकले हुए कमलपर संसारकी सृष्टि अवलम्बित है तथा यज्ञों, मन्त्रों और रहस्ययुक्त जपोंसे जिनकी अर्चना होती है, वे भगवान् आप ही हैं। भगवन्! यह मधुपर्क आपसे सम्बद्ध है। इस दिव्य पदार्थको आप स्वीकार करनेकी कृपा करें।'
भगवति! इस मधुपर्कको जो मुझे अर्पित करता है, उसे यज्ञसम्बन्धित सभी फल प्राप्त हो जाते हैं और वह मेरे लोकमें चला जाता है।
पृथ्वि! अब दूसरी बात सुनो—मेरे कर्ममें लगे रहनेवाले व्यक्तिके प्राण त्यागनेके समय यह प्रयोग करना चाहिये। उसकी प्राण-यात्राके समय विधिपूर्वक मन्त्र पढ़कर इस संसारमें ही मधुपर्क देनेका विधान है। प्राण-प्रयाणके समयमें ही अनेक कर्मोंका करना आवश्यक है। मेरा भक्त मरणासन्न (मृत्युको प्राप्त हो रहे) व्यक्तिको सम्पूर्ण संसारसे मुक्त करनेवाला मधुपर्क अवश्य दे। जब देखे कि यह व्यक्ति आतुर हो गया है तो हाथमें उत्तम मधुपर्क लेकर इस भावका मन्त्र पढ़े—'देवलोकके स्वामी भगवन्! जो सारे संसारमें प्रधान हैं तथा सबके शरीरमें जिनकी सत्ता शोभा पाती है, वह भगवान् नारायण आप ही हैं। प्रभो मैंने! मधुपर्क आपकी सेवामें भक्तिपूर्वक समर्पित किया है। इसे आप स्वीकार करें। मृत्युके समय इसी मन्त्रके साथ मधुपर्क दे। पृथ्वि! मधुपर्कके इस सामर्थ्यको कोई नहीं जानता है, अतः सिद्धिके अभिलाषीको ऐसा मधुपर्क अवश्य देना चाहिये। उस समय सर्वप्रथम संसार-सागरसे मुक्त करनेवाले भगवान् श्रीहरिका अर्चन भी आवश्यक है। जो 'मधुपर्क' देता है, उसे परम-गति मिलती है। यह प्रसङ्ग पवित्र, स्वच्छ, सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला है। जो दीक्षित हो, गुरुमें भक्ति रखनेवाला शिष्य हो, उसके सामने इसका प्रसङ्ग सुनाना चाहिये। मधुपर्कका यह आख्यान पापोंको नष्ट करनेवाला है। जो इसे सुनता है, वह मेरी कृपासे परम दिव्य सिद्धिको प्राप्त होता है।'
भद्रे! 'मधुपर्क' के परिचयका यह प्रसङ्ग मैंने तुम्हें सुना दिया। राजदरबारमें, श्मशानभूमिपर अथवा भय एवं दुःखकी परिस्थिति सामने आनेपर जो लोग इस शान्तिदायक प्रसङ्गका अध्ययन करेंगे, उन्हें कार्यमें शीघ्र सफलता मिलेगी। इसके प्रभावसे पुत्रहीनोंको पुत्र, भार्याहीनोंको भार्या और पतिहीना स्त्रीको सुन्दर पति मिलता है। मानवके बन्धन कटते हैं। भूमे! सुख देनेवाला महान् शान्तिदायक यह प्रसङ्ग तुम्हें सुना चुका। यह विषय जगत्से उद्धारक परम रहस्यपूर्ण है। जो व्यक्ति विधिसहित इसका प्रयोग करता है, वह संसारकी आसक्तियोंको त्याग कर मेरे लोकको प्राप्त होता है।
[अध्याय १९१-१९२]
* अन्यत्र दधि, मधु, जल, गुड़ और घी—इन पाँचके योगसे 'मधुपर्क' निर्माणका विधान है। द्रष्टव्य—मनु० ३।३, ११९-२०, आपस्तम्बधर्मसूत्र २।८।५-९, गृह्य० १।१०।१-२, गौतम० ५।२७-३०, बृहस्पति ११।१ वें तथा याज्ञवल्क्य० १।१०९ आदिकी व्याख्याएँ।
७- प्राणरोध
| ३५६ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [अध्याय १९३-१९४ |
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नचिकेताद्वारा यमपुरीकी यात्रा
लोमहर्षणजी कहते हैं—एक बार व्यासजीके शिष्य वेद-वेदाङ्गके पारगामी वैशम्पायन राजा जनमेजयके दरबारमें गये। पर उस समय राजाके अश्वमेधयज्ञमें दीक्षित होनेके कारण उन्हें फाटकपर रुकना पड़ा। जब यज्ञ समाप्त होनेपर वे हस्तिनापुर लौटे तो उन्हें ज्ञात हुआ कि परम ज्ञानी वैशम्पायन ऋषि वहाँ पधारे हैं और गङ्गाके तटपर उन्होंने अपने रहनेका स्थान बना रखा है। 'ऋषि मुझसे मिलने आये थे, मेरे न मिल पानेसे एक प्रकारसे यह उनका अपमान ही हुआ।' इससे जनमेजय चिन्तासे व्याकुल हो गये। उनकी आँखें अकुला उठीं। राजा जनमेजयका जन्म कुरुवंशकी अन्तिम पीढ़ीमें हुआ था, अतः वे शीघ्र ही वैशम्पायन ऋषिके पास गये और उनका स्वागत करनेके बाद कहा—'भगवन्! मेरा चित्त चिन्तासे व्याकुल है। मैं जानना चाहता हूँ कि यमराजकी पुरी कैसी और कितनी दूरमें विस्तृत है? मैंने सुना है कि प्रेतपुरीके अध्यक्ष धर्मराज बड़े धीर हैं और सम्पूर्ण जगत्पर उनका शासन है। प्रभो! कैसे कर्म किये जायँ कि वहाँ जाना न पड़े।'
वैशम्पायनजी बोले—राजन्! इस विषयमें एक पुराना इतिहास सुनाता हूँ, सुनो। जिसे सुनते ही मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। प्राचीन समयमें उद्दालक नामक एक वैदिक महर्षि थे। उनका नचिकेता नामका एक तेजस्वी योगाभ्यासी पुत्र था। संयोगवश उसके पिता उद्दालकने एक दिन रोषमें आकर अपने इस परमधार्मिक पुत्रको शाप दे दिया—'दुर्मते! तुम यमराजकी पुरीमें चले जाओ।' इसपर नचिकेताने कुछ क्षण विचारकर फिर बड़ी नम्रतासे पिता उद्दालकसे कहा—'पिताजी! आप धार्मिक पुरुष हैं। आपकी बात कभी मिथ्या नहीं हुई है। अतः मैं इसी समय आपकी आज्ञासे बुद्धिमान् धर्मराजकी सुरम्य नगरीमें जाता हूँ।'
अब उद्दालक पश्चात्ताप करते हुए कहने लगे—'तुम मेरे एक ही पुत्र हो। तुम्हारा दूसरा कोई भाई भी नहीं है। मैंने क्रोध किया, इससे मुझे अधर्म, निन्दा अथवा मिथ्यावादी कहलानेका दोष भले ही लग जाय, परंतु वत्स! अब तुम्हारा व्यवहार ऐसा होना चाहिये, जिससे मेरा उद्धार हो जाय। मैंने तुम-जैसे सदा धर्मका आचरण करनेवाले पुत्रको जो शाप दिया, वह ठीक नहीं किया। तुम्हें यमपुरी जाना उचित नहीं है। उस पुरीके राजा वैवस्वत देव हैं। यदि तुम स्वेच्छासे भी वहाँ चले जाओगे तो वे महान् यशस्वी राजा रोषके कारण कभी भी तुम्हें आने नहीं देंगे। पुत्र! तुम्हें देखना चाहिये कि अपने कुलके भविष्यका संहार करनेवाला मैं प्रायः नष्ट हो रहा हूँ। नरकका एक नाम (पुत्) है। उससे त्राण देनेके कारण लड़केको 'पुत्र' कहते हैं। अतएव लोग इस लोक तथा परलोकके लिये पुत्रकी कामना करते हैं। संतानहीन व्यक्तिका किया हुआ हवन, दिया हुआ दान, तप की हुई तपस्या तथा पितरोंका तर्पण—प्रायः ये सब-के-सब व्यर्थ हो जाते हैं।
'पुत्र! मैंने सुना है कि सेवापरायण शूद्र, खेतीसे जीविका चलानेवाला वैश्य, धनकी रक्षा करनेवाला राजसमूह, उपासना-कर्ममें निरत ब्राह्मण, महान् तप करनेवाला तपस्वी अथवा उत्तम दान करनेवाला कोई दानी व्यक्ति भी यदि संतानहीन है तो वह स्वर्ग प्राप्त नहीं कर सकता। पुत्रसे पिताको, पौत्रसे पितामहको और प्रपौत्रसे प्रपितामह-
अध्याय १९३-१९४] नचिकेताद्वारा यमपुरीकी यात्रा ३५७
को परम आनन्द प्राप्त होता है। अतएव मैं अपने वंशकी वृद्धि करनेवाले तुम-जैसे पुत्रका त्याग नहीं करूँगा। मैं इसके लिये याचना करता हूँ, तुम यमपुरी न जाओ।'
वैशम्पायनजीने कहा—राजन्! मुनिवर उद्दालककी बात सुनकर नचिकेताने कहा—'पिताजी! आप विषाद न करें। मैं पुनः यहाँ लौटकर वापस आऊँगा और आप मुझे निश्चितरूपसे पुनः देख सकेंगे। सारा संसार जिनको नमस्कार करता है, उन दिव्य पुरुष धर्मराजका दर्शन करके मैं पुनः यहाँ निश्चय ही लौट आऊँगा। मुझे मृत्युसे बिलकुल भय नहीं है। पिताजी! सत्यमें बड़ी शक्ति है, वह सत्य स्वर्गकी सीढ़ी है। सूर्य भी सत्यके बलपर ही तपते हैं। अग्निको सत्यसे ही दाहकताशक्ति प्राप्त हुई है। सत्यपर ही पृथ्वी टिकी है। सत्यका पालन करनेके लिये ही समुद्र अपनी मर्यादाका अतिक्रमण नहीं करता है। जगत्का हित करनेके लिये ही सामवेद सत्यमन्त्रोंका गान करता है। सत्यपर ही सबकी प्रतिष्ठा है। स्वर्ग और धर्म—ये सभी सत्यके रूप हैं। सत्यके अतिरिक्त दूसरा कुछ भी नहीं है। पिताजी! मैंने तो ऐसा सुना है कि सत्यसे सब कुछ मिल सकता है और यदि उसका परित्याग कर दिया गया तो कोई भी उत्तम वस्तु हाथ नहीं लग सकती।
'ब्रह्माजीने भी सृष्टिके आरम्भमें यत्नपूर्वक सत्यकी दीक्षा ली थी। सत्यका आश्रय लेकर ही और्वमुनिने अग्निको बड़वामुखमें फेंक दिया था। पिताजी! प्राचीन समयमें सर्वशक्तिसम्पन्न संवर्तने देवताओंपर कृपा करनेके लिये सम्पूर्ण लोकोंको आश्रय दिया था। पातालमें निवास करनेवाले बलिने भी सत्यके रक्षार्थ ही बन्धन स्वीकार किया था। सैकड़ों शिखरोंसे शोभा पानेवाला महान् विन्ध्यपर्वत बढ़ता जा रहा था। सत्यका पालन करनेके लिये बढ़नेसे रुक गया। सम्पूर्ण चर और अचरसे सम्पन्न यह जगत् सत्यसे ही शोभा पाता है। गृहस्थ, वानप्रस्थी एवं योगियोंके जितने उत्तम दृश्यमान (पालनीय) धर्म हैं तथा हजार अश्वमेधयज्ञोंका जो धर्म है, उसकी यदि सत्यसे तुलना की जाय तो सत्य ही सबसे बढ़कर सिद्ध हो सकता है। सत्यसे धर्मकी रक्षा होती है और रक्षित धर्म प्राणियोंकी रक्षा करता है। अतएव आप इस समय सत्यकी रक्षा कीजिये।'
सुव्रत! इस प्रकार कहकर ऋषि-पुत्र नचिकेता यमराजकी उत्तम पुरीको चल पड़ा। तप एवं योगके प्रभावसे शीघ्र ही यमपुरी पहुँच गया। पहुँचनेपर यमराजने उसका यथोचित स्वागत-सत्कार किया और कुछ ही दिनों बाद उसे वहाँसे वापस होनेकी सम्मति दे दी और फिर वह ऋषिकुमार घर आ गया। वापस आये हुए पुत्रको देखकर उद्दालकमुनिने उसे दोनों बाँहोंमें भरकर छातीसे लगा लिया। उसका सिर सूँघा। उस समय अपार हर्षके कारण पृथ्वी और आकाशमें भी हर्षध्वनि होने लगी।
फिर उद्दालकने उससे पूछा—'वत्स! यमपुरीमें तुम्हें कोई यातना तो नहीं पहुँचायी गयी? उस समय यमपुरीसे लौटे नचिकेताको देखनेके लिये वहाँ ऋषि, मुनि और बहुत-से देवता भी पधारे। उन ऋषियोंमें बहुत-से नंगे थे। अनेक ऐसे थे, जिनका पत्थरसे कूटकर अन्न खानेका स्वभाव था। बहुत-से ऋषि पत्थरसे कूटकर अन्न भक्षण करते थे। बहुतोंने मौनव्रत धारण कर रखा था। कुछ ऋषि वायु पीकर रह जाते थे। अनेक ऋषियोंका नियम अग्निसेवन था, उस व्रतके व्रती ऋषि धुआँ पीकर ही रह जाते थे। समस्त
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समुदाय उस ऋषिकुमारके चारों ओर खड़े हो उसे देखने लगा। कुछ ऋषि बैठे थे और कुछ खड़े थे। वे सभी शान्त, शिष्ट, अनुशासित एवं शालीन थे। उन सभी ऋषियोंने वेदान्तका साङ्गोपाङ्ग अध्ययन किया था। जब प्रथम बार यमलोकसे आये हुए नचिकेतापर उनकी दृष्टि पड़ी तो उनमेंसे कुछ भयके कारण घबड़ा-से गये तथा कुछ महान् कौतूहलसे ग्रस्त थे। साथ ही उनके हृदयोंमें हर्ष भी भरा था। कुछ ऋषियोंके मनमें बेचैनी उत्पन्न हो गयी तथा कुछ लोग संदेहास्पद बातें करनेमें संलग्न थे। फिर उन ऋषियोंने तपके महान् धनी ऋषिकुमार नचिकेतासे एक साथ ही प्रश्न पूछना आरम्भ कर दिया।
ऋषियोंने उसे बार-बार सम्बोधित करके पूछा—'वत्स! तुम बड़े विज्ञ और गुरुके परम सेवक तथा अपने धर्मपर अडिग रहनेवाले हो। तुम सच्ची बात बताओ कि यमपुरीकी तुमने कौन-सी विशेषताएँ देखी और सुनी हैं? उपस्थित सभी ऋषियोंके मनमें इसे सुननेकी इच्छा है। तुम्हारे पिता तो इस विषयको विशेषरूपसे सुनना चाहते हैं। तात! हमारे पूछनेपर यदि कोई गुप्त बात हो तो भी विशिष्ट मानकर उसे स्पष्ट कर ही देना चाहिये। क्योंकि उस पुरीसे सभी भयभीत रहते हैं—इस बातको प्रायः सभी जानते हैं। इस मायाराज्यमें स्थित सम्पूर्ण जगत् लोभ एवं मोहजनित अन्धकारसे व्याप्त है। चिन्तन तथा अन्वेषणकी क्रियाएँ तो होती रहती हैं; किंतु जो हितकी बात है, वह चित्तपर नहीं चढ़ती। यमपुरीमें चित्रगुप्तकी कार्यशैली कैसी है? पुनः उनके कथनका क्या रूप है? मुने! धर्मराज और कालका कैसा स्वरूप है? वहाँ किस रूपसे व्याधियाँ दृष्टिगोचर होती हैं? कर्मविपाकका स्वरूप भी हम जानना चाहते हैं और यह भी जानना चाहते हैं कि किस कर्मसे उससे छुटकारा हो सकता है?
विप्रवर! वहाँका जैसा दृश्य तुम्हें दिखायी पड़ा हो अथवा श्रवणगोचर हुआ हो तथा तुमने जिसे निश्चित रूपसे जाना हो, वह सब-का-सब विस्तारपूर्वक यथावत् वर्णन करनेकी कृपा करो।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! नचिकेता महान् मनस्वी मुनि थे। महाराज! जब ऋषियोंने उनसे इस प्रकार पूछा और उन श्रेष्ठ मुनिपुत्रने जो उत्तर दिया—अब मैं वह बताता हूँ, सुनो।
[अध्याय १९३-१९४]
यमपुरीका वर्णन
नचिकेताने कहा—'सदा तपमें तत्पर रहनेवाले द्विजवरो! आपलोगोंको मैं यमपुरीका प्रसङ्ग बताता हूँ। जो असत्य बोलते हैं, स्त्री एवं बालक आदि प्राणियोंका वध करते हैं, जो ब्राह्मणकी हत्यामें तत्पर रहनेवाले एवं विश्वासघाती हैं, जिनमें शठता, कृतघ्नता तथा लोलुपता भरी है, तथा जो दूसरोंकी स्त्रीका अपहरण करते और सदा पापमें रत रहते हैं, वे यमपुरीको जाते हैं। जो वेदोंकी निन्दा करते, वैदिकमार्गपर आघात पहुँचाते, मदिरा पीते, ब्राह्मणका वध करते, ब्याज उगाहते, कपट करते, माता-पिता और पतिव्रता स्त्रीका त्याग करते हैं, वे नरकमें जाते हैं। जो गुरुसे द्वेष करते, बुरे आचरणका पालन करते, कपटभरी बातें बोलते, दूतका काम करते, गृह-ग्रामकी सीमा ध्वंस करते तथा व्यर्थ ही फल-फूल तोड़ते रहते हैं, जो पतिव्रतापर दया नहीं
१५९- राक्षस-यमदूत-संघर्ष तथा नरकके क्लेश
अध्याय १९५-१९७] यमपुरीका वर्णन ३५९
करते तथा पापी, हिंसक, व्रत-भञ्जक, सोमविक्रयी, स्त्रीके ही अधीन रहते हैं, जिन्हें झूठ बोलनेकी आदत है तथा जो द्विज होकर वेद बेचते हैं, जो घर-घर नक्षत्रकी सूचना देते हैं, वे नरकमें जाते हैं और वहाँ अपने बुरे कर्मोंका फल भोगते हैं।'
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! जब उन परम तपस्वी मुनियोंने नचिकेताके मुखसे इस प्रकारकी बातें सुनीं, तब उनके आश्चर्यकी सीमा न रही। अतः वे उससे पुनः पूछने लगे।
ऋषियोंने कहा—'मुने! तुम बड़े ज्ञानी पुरुष हो। तुमने यमपुरीमें जो कुछ देखा है, वह सभी हमें बतानेकी कृपा करो। विद्वानोंका कहना है कि सूक्ष्म शरीर यमयातनाके अनेक क्लेश भोगने, आगसे जलाने तथा अस्त्रोंसे काटनेपर भी नष्ट नहीं होता। विप्र! वैतरणी नदीका क्या रूप है? तथा उसमें कैसा जल बहता है? रौरव नरककी कैसी स्थिति है? अथवा कूटशाल्मलिका क्या रूप है? यमराजके दूत कैसे हैं? उनका क्या कार्य है? और उनमें कैसा पराक्रम है? वहाँके दूत किस प्रकार कार्यमें उद्यत रहते हैं? और उनका कैसा आचार है? उनके अपूर्व तेजसे आच्छन्न हो जानेके कारण प्राणी प्रायः अचेत-सा हो जाता है। प्राणीके द्वारा समय-समयपर दोष होते रहते हैं। वह रज-तमसे भरा रहता है, अतः धैर्य भी उसका साथ नहीं देता। यह किसकी माया है, जिसके प्रभावसे प्राणी परम प्रभुको भूलकर संसारके चकाचौंधमें विह्वल रहते हैं। बहुत-से व्यक्ति मूर्खताके कारण पाप करते हैं और उसके फलस्वरूप उन्हें कष्ट भोगने पड़ते हैं। वत्स! तुमने यमपुरीमें जाकर सभी बातें स्वयं देखी हैं, अतः इसे बतानेकी कृपा करो।'
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! उन सभी ऋषियोंका अन्तःकरण अत्यन्त पवित्र था। उनकी बात सुननेके पश्चात् बोलनेमें परम कुशल नचिकेताने सभी बातोंका स्पष्टीकरण करते हुए कहा—'द्विजवरो! धर्मराजकी वह पुरी दो परिखाओंसे घिरी और सोनेसे बनी एक हजार योजनमें फैली हुई है तथा अट्टालिकाओं और दिव्य भवनोंसे सुशोभित है। उसमें कहीं तो भीषण युद्ध तथा कहीं संघर्ष चलता है और कहीं प्राणी विवश होकर बँधे पड़े हैं। वहाँ पुष्पोदका नामकी एक नदी है, जिसके तटपर अनेक प्रकारके वृक्ष हैं। उसकी सीढ़ियाँ सोनेकी तथा बालुकाएँ सुवर्ण-जैसे रंगवाली हैं।
वहाँ वैवस्वती नामकी एक प्रसिद्ध बहुत बड़ी नदी है। वह नदी वहाँकी सभी नदियोंमें पवित्र तथा श्रेष्ठ मानी जाती है। वह परम रमणीय सरिता पुरीके मध्यमें इस प्रकार विचरती है, मानो माता अपने पुत्रकी रक्षामें तत्पर हो। उसका जल सबके लिये सुखदायी तथा मनको मुग्ध करनेवाला है। वह नदी सदा दिव्य जलसे भरी रहती है। कुन्द एवं चन्द्रमाके समान सफेद रंगवाले हंस आनन्दके उमंगमें उसके तटोंपर निरन्तर घूमते रहते हैं। जिनका आकार तथा रंग बड़ा आकर्षक है और जिनकी कर्णिकाएँ तपाये हुए सुवर्णके समान चमकती हैं, ऐसे रमणीय कमलोंसे युक्त वह नदी बड़ी ही मनोहर दिखायी पड़ती है। सुवर्णनिर्मित सीढ़ियोंके कारण उसकी सुन्दरता और भी बढ़ गयी है। उसके निर्मल जल स्वादिष्ट, सुगन्धपूर्ण तथा अमृतकी तुलना करते हैं। उसके तटवर्ती वृक्षोंपर फूलों एवं फलोंका कभी भी अभाव नहीं होता। भूलोकमें जो मनुष्योंके द्वारा पितरोंके लिये जल दिये जाते हैं, उन्हींसे उस नदीका यह सुन्दर रूप बन गया है। उस नदीके तीरपर अनेक ऊँचे
३६० संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १९५-१९७
भवनोंकी पङ्क्तियाँ हैं, जिनकी आभासे उसकी रमणीयता बहुत अधिक बढ़ गयी है।
यह पुरी अनेक प्रकारके यन्त्रों, प्रकाशके साधनों तथा अन्य आवश्यक उपकरणोंसे भी परिपूर्ण है। देवताओं, ऋषियों और धर्मपर दृष्टि रखनेवाले मनुष्योंके लिये यहाँ पृथक्-पृथक् निवास बने हैं। यहाँके गोपुर ऐसे प्रकाशमान हैं, मानो वे शरद्-ऋतुके मेघ ही हों। यहाँ पुण्यात्मा मनुष्योंका इन्हीं दरवाजोंसे प्रवेश होता है। अग्नि एवं धूपके यहाँ सभी दोष शान्त हो जाते हैं, पर इस पुरीके दक्षिणका द्वार अत्यन्त भयंकर एवं लौहमय है, जो आतपादिसे सदा संतप्त रहता है। जो पापमें रत हैं, दूसरोंसे शत्रुता रखते हैं, मांस खाते हैं तथा दूषित स्वभाववाले हैं, उन महान् पापियोंके लिये 'औदुम्बर', 'अवीचिमान्' तथा 'उच्चावच' नामकी खाइयाँ बनी हैं। यमपुरीके पश्चिम फाटकके पास तो आगकी लपटें निरन्तर उठती रहती हैं। पापी जीवोंका इसी मार्गसे प्रवेश होता है।
उस परम रमणीय पुरीमें एक ओर सर्वोत्कृष्ट सभाभवनका भी निर्माण हुआ है, जिसमें सब प्रकारके रत्नोंका उपयोग हुआ है। धार्मिक और सत्यवादी व्यक्तियोंसे उसके सभी स्थान भर गये हैं। जिन्होंने क्रोध और लोभपर विजय प्राप्त कर ली है तथा जो वीतराग एवं तपस्वी हैं—वह सभा ऐसे धर्मात्मा-महात्माओंसे भरी रहती है। इस सभामें प्रजापति-मनु, मुनिवर व्यास, अत्रि, औद्दालकि, असीम पराक्रमी महर्षि आपस्तम्ब, बृहस्पति, शुक्राचार्य, गौतम, महातपा शङ्ख, लिखित, अङ्गिरा मुनि, भृगु, पुलस्त्य तथा पुलह-जैसे ऋषि-मुनि-महाराज भी विराजते हैं। इनके अतिरिक्त भी धर्मके प्रपाठकोंका समुदाय वहाँ विचार करता है।
द्विजवरो! यमराजके पार्श्ववर्ती अनेक ऐसे ऋषि हैं, जो छन्दःशास्त्र, शिक्षा, सामवेदका पाठ करते रहते हैं तथा धातुवाद, वेदवाद और निरुक्तवाद करनेवालोंकी भी कमी नहीं है। विप्रो! धर्मराजके भवनपर उत्तम कथाओंका प्रवचन करनेवाले बहुत-से ऋषियों और पितरोंको भी मैंने देखा है।
ऋषियो! वहाँ एक कल्याणमयी देवीका भी मुझे दर्शन हुआ है, जो मानो सभी तेजोंकी एकत्र राशि-सी है। स्वयं यमराज दिव्य गन्धों और अनुलेपनोंसे उसकी पूजा करते हैं। समस्त संसारका उद्भव-पालन-संहार उसीके हाथोंमें है। विश्वकी गतियोंमें उसे ही सर्वोत्तम गति कहते हैं। विज्ञ पुरुषोंका कथन है कि किसी भी कर्तव्य-साधनमें इतनी शक्ति नहीं है, जो उसका सामना कर सके। जिससे समस्त प्राणी त्रस्त हो जाते हैं, वह काल भी वहाँ मूर्तरूपमें विराजमान है। वह काल प्रकृतिका सहयोग पाकर अत्यन्त भयंकर, क्रोधी तथा दुर्विनीत बन जाता है। उसमें अथाह बल एवं तेज है। वह न कभी बूढ़ा होता है और न उसकी सत्ता ही समाप्त होती है। उसका कोई तिरस्कार नहीं कर सकता। मैंने देखा है कि दिव्य चन्दन तथा अनुलेपन उसकी भी शोभा बढ़ा रहे थे। उसके सहवासियोंमें कुछ व्यक्ति ऐसे थे, जो गीत गाते, हँसते और सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्साहित करनेमें उद्यत थे। उन्हें कालका रहस्य ज्ञात था और उसकी सम्मतिके वे समर्थक थे।
धर्मराजकी पुरीमें कूष्माण्ड, यातुधान तथा मांसभक्षी राक्षसोंके भी अनेक समूह हैं। किसीके एक पैर, किसीके दो पैर, किसीके तीन पैर तथा किसीके अनेक पैर हैं। वहाँ एक बाहु, दो बाहु, तीन बाहु एवं छोटे-बड़े कान, हाथ-पैरवाले भी
१६०- कर्मविपाक-निरूपण
अध्याय १९८—२०० ] यम-यातनाका स्वरूप ३६१
हैं। हाथी, घोड़े, बैल, शरभ, हंस, मोर, सारस और चक्रवाक-प्रभृति पशु-पक्षियों—इन सभीसे यमराजकी पुरी परम शोभा पा रही है।
[ अध्याय १९५—१९७ ]
यम-यातनाका स्वरूप
नचिकेताने कहा—द्विजवरो! जब मैं यमपुरीमें पहुँचा तो उस प्रेतपुरीके अध्यक्ष यमराजने मुझे एक मुनि मानकर आसन, पाद्य एवं अर्घ्य अर्पणपूर्वक मेरा सम्मान किया और कहा—'मुने! यह सुवर्णमय आसन है, आप इसपर विराजिये।' वे मुझे देखते ही परम सौम्य बन गये थे।
फिर मैंने उनकी स्तुति करते हुए कहा—'महाभाग! आप ही श्राद्धमें धाता और विधाताके रूपसे दिखायी देते हैं। पितृसमूहमें आप प्रधान देवता हैं। वृषभस्वरूप होनेसे आपको चतुष्पाद कहा जाता है। आप कालज्ञ, कृतज्ञ, सत्यवादी एवं दृढ़व्रती हैं। प्रेतोंपर शासन करनेवाले धर्मराज! आपको निरन्तर नमस्कार है। प्रभो! आप कर्मके प्रेरक, भूत, भविष्य एवं वर्तमानमें विराजमान हैं। श्रीमन्! आपसे ऐसा प्रकाश फैल रहा है, मानो दूसरे सूर्य ही हों। आपको नमस्कार है। प्रभविष्णो! हव्य और कव्य पानेके अधिकारी आप ही हैं। आपकी आज्ञासे व्यक्ति कठोर तपस्या, सिद्धि एवं व्रतमें सदा तत्पर होकर पापोंसे छुटकारा पा जाता है। आप धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ, कृतज्ञ, सत्यवादी तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके हितैषी हैं।'
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! ऋषिपुत्र नचिकेताके मुखसे ऐसी स्तुति सुनकर धर्मराज अत्यन्त संतुष्ट हो गये और ऋषिकुमारसे उन्होंने अपना अभिप्राय स्पष्ट करना आरम्भ किया।
यमराजने कहा—अनघ! तुम्हारी वाणी यथार्थ एवं परम मधुर है। मैं इससे अतिशय संतुष्ट हूँ। अब तुम्हें दीर्घायुष्य, नीरोगता अथवा अन्य जो कुछ भी अभीष्ट हो, वह मुझसे माँग लो।
ऋषिकुमार नचिकेताने कहा—'प्रभो! आप यहाँके अधिष्ठाता हैं। महाभाग! मैं जीना-मरना—कुछ नहीं चाहता। आप सदा सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें संलग्न रहते हैं। भगवन्! यदि आप मुझे वर देना ही चाहते हैं तो मेरी इच्छा है कि आपके देशको मैं भलीभाँति देख सकूँ। पापात्माओं और पुण्यात्माओंकी जो गति है—प्रायः वह सभी यहाँ दृष्टिगोचर हो रही है। राजन्! आप यदि मेरे लिये वरदाता बनना चाहते हैं तो मुझे ये सभी दिखानेकी कृपा करें। आपके कार्यकी व्यवस्था करनेमें कुशल एवं शुभचिन्तक जो चित्रगुप्त हैं, उन्हें भी दिखाना आपकी कृपापर निर्भर है।'
इस प्रकार मेरे कहनेपर महान् तेजस्वी यमराजने द्वारपालको आज्ञा दी—'तुम इस ब्राह्मणको समुचित रूपसे चित्रगुप्तके पास ले जाओ। उन महाबाहुसे कहना कि ऋषिकुमारसे वे मृदुताका व्यवहार करें। समयोचित अन्य सभी बातें भी उनसे बता देना।
द्विजवरो! जब यमराजने दूतको आज्ञा दी तो उसने तुरंत मुझे चित्रगुप्तके पास पहुँचाया। मुझे देखकर चित्रगुप्त अपने आसनसे उठ गये। वस्तुस्थितिका विचार करके उन्होंने कहा—'मुनिवर! आपका स्वागत है। आप इच्छानुसार यहाँ पधारिये' और फिर उन्होंने अपने दूतोंसे कहा—'दूतो! तुम लोग सदा मेरे मनके अनुसार आचरण करते हो। तुम इन्हें यमपुरी इस प्रकार दिखलाओ कि कोई जान भी न सके। इन्हें सर्दी,
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गर्मी, भूख अथवा प्याससे भी क्लेश न हो।'
**ऋषिकुमार नचिकेता कहते हैं—**द्विजवरो! चित्रगुप्तकी आज्ञासे दूतोंके साथ जब मैं वहाँ पहुँचा तो देखा कि अनेक दूत बड़ी उतावलीके साथ इधर-उधर दौड़ रहे थे। वे किसीको पकड़ते तथा किन्हींपर प्रहार करते, पापियोंको बाँधते, आगमें जलाते तथा डंडोंसे बार-बार पीटते थे। कितनोंके सिर फूट गये थे और कई भयंकर चीत्कार कर रहे थे, पर वहाँ उनका कोई रक्षक न था। ऐसे ही बहुत-से प्राणी अन्धकारपूर्ण अगाध नरकमें पच रहे थे। कुछ प्राणी नरकोंमें पकाये जाते थे, जिनसे अग्निके लिये ईंधनका काम लिया जा रहा था। जो अधिक पापकर्मी थे, वे प्राणी खौलते हुए घृत, तेल एवं क्षार वस्तुवाले नरकमें गिरे थे। उनकी देह खौलते हुए घृत, तेल एवं क्षार पदार्थोंसे जलायी जा रही थी। भयंकर यातनाओंसे उनकी देह जल रही थी। अपने कर्मोंके अनुसार यत्र-तत्र विवश होकर वे रो रहे थे। कितने प्राणी तो तिलकी भाँति कोल्हूमें डालकर पेरे जा रहे थे। उन पापात्मा प्राणियोंके रुधिर, मेदादिसे एक दुस्तर वैतरणीनदी प्रकट हो गयी थी। उस भयंकर नदीमें फेनमिश्रित रुधिर भँवरें उठने लगीं। हजारों दूत ऐसे दृष्टिगोचर हुए, जो पापियोंको शूलकी नोकपर चढ़ाते और स्वयं वृक्षोंपर चढ़कर उन जीवोंको अत्यन्त भयंकर वैतरणीनदीमें फेंक देते थे। वह नदी अत्यन्त उष्ण रुधिरों तथा फेनोंसे भरी थी। उसमें अनेक सर्प थे, जो वहाँ पड़े हुए प्राणियोंको डँसा करते थे। उस नदीसे बाहर होना किसीके वशकी बात न थी। वे उस रुधिरमय जलमें डूबते और उतराते थे। उनके मुखसे वमन हो रहा था। उन्हें उनका कोई रक्षक नहीं मिलता।
वहाँ बहुत-से ऐसे प्राणी भी थे, जिन्हें दूतोंने 'कूटशाल्मलि' नामके वृक्षपर लटका दिया था। उस वृक्षमें लोहेके असंख्य काँटे थे। दूतोंद्वारा तलवारों और शक्तियोंसे बार-बार उनपर प्रहार हो रहा था। उस वृक्षकी शाखाएँ रोमाञ्चकारी थीं। उनपर लटके हुए हजारों पापी जीवोंको मैंने देखा है। कूष्माण्ड और यातुधान—ये यमराजके अनुचर हैं। इनकी आकृति बड़ी लम्बी है। इन्हें देखते ही प्राणी डर जाते हैं। तीखे काँटोंसे भरे हुए शाल्मलिवृक्षकी शाखाओंपर ये बड़ी शीघ्रतासे चढ़ते और निःशङ्क होकर पापी प्राणियोंके सुन्दर अङ्गोंपर प्रहार करने लगते थे। वे कूष्माण्ड-प्रभृति प्राणियोंको मारकर उनके मांस खानेमें तत्पर हो जाते। कारण, उनकी जाति भयंकर राक्षसकी है। पापियोंके मांस वे इस प्रकार खाने लगते थे, मानो बंदर वृक्षोंपर फल खा रहे हों। जैसे मनुष्य वनमें आम्रके पके फल खाता है, ठीक वैसे ही लम्बे मुखवाले एवं दुर्धर्ष वे कूष्माण्ड आदि राक्षस मुखमें लेकर उन प्राणियोंको अपने उदरमें पहुँचा देते थे। वे वृक्षपर ही उन पापी प्राणियोंको चूस लेते और जब केवल हड्डियाँ बच जाती थीं, तब उन जीवोंको जमीनपर फेंक देते थे। पृथ्वीपर पड़नेके पश्चात् वनवासी जानवर झट वहाँ आते और जो बचा-खुचा मज्जा-मांस रहता, उसे पुनः वे चूसने लगते थे। फिर भी अवशिष्ट कर्मोंका क्रम यथाशीघ्र चलता रहता था। वहाँ कभी पत्थरों और धूलोंकी वर्षा होती है, जिससे घबड़ाकर कितने पापात्मा प्राणी वृक्षके नीचे जाते हैं, पर वहाँ भी उनके शरीरमें आग लग जाती है। कोई जीव जोरसे भागनेका प्रयास करते हैं, किंतु दूत उन्हें सावधानीके साथ पकड़कर बाँध लेते हैं। भयंकर स्थानोंमें वे आगके द्वारा पचाये जाते हैं।
१६१- दानधर्मका महत्त्व
नरकोंके दृश्य और उनके नाम
| असिपत्रवन | महारौरव |
| संतप्त | रौरव |
| संदंश | कुम्भीपाक |
नरकोंके दृश्य और उनके नाम
| अयःपान | सूर्मि |
|---|---|
| (चित्र) | (चित्र) |
| अवीचिमान | शूलग्रह |
|---|---|
| (चित्र) | (चित्र) |
| प्राणरोध | सूकरमुख |
|---|---|
| (चित्र) | (चित्र) |
अध्याय १९८-२०० ] यम-यातनाका स्वरूप ३६५
वे दुःखी प्राणियोंसे कहते हैं—तुम सभी कृतघ्न, लोभी थे और परायी स्त्रियोंसे प्रेम करते थे। तुम्हारे मनमें सदा पाप बसा रहता था। तुमने कोई भी सुकृत नहीं किये। तुम सदा दूसरोंकी निन्दा किया करते थे। इस यातनाभोगके बाद भी जब तुम्हारा जगत्में जन्म होगा तो वहाँ भी दुर्गति ही होगी, क्योंकि पाप-कर्म करनेवाले प्राणी पुनः अत्यन्त दरिद्रकुलोंमें जन्म पाते हैं। जो सदाचारी हैं तथा सत्य भाषण करते, प्राणियोंपर दया रखते हैं, वे ही उत्तम कुलमें जन्म पाते हैं। उनके मनमें किसी प्रकारकी चिन्ता नहीं रहती। वे इन्द्रियोंको वशमें रखकर श्रेष्ठ साधना करते हुए अन्तमें परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं।
नचिकेताने कहा—द्विजवरो! यमपुरीमें एक ऐसा भी स्थान है, जहाँ लोहेके काँटे बिछे हैं और सर्वत्र अन्धकार-ही-अन्धकार फैला रहता है। उसकी स्थिति बड़ी विषम है। वहाँ कुछ पापाचारी प्राणी पड़े हैं। इनके अतिरिक्त कुछ ऐसे हैं, जिनके पैर कट गये हैं। अधिकतर बिना हाथ और सिरके हैं। उसी यमपुरीमें लोहेकी बनी हुई एक स्त्री है, जिसका शरीर अग्निके समान जलता है। उसकी आकृति बड़ी भयंकर है। जब वह किसी पापी पुरुषके अङ्गसे अपना अङ्ग सटाती है तो जलनेके कारण वह भागने लगता है। तब वह भी उसके पीछे दौड़ती और कहती है—'अरे पापी! मैं तेरी बहन थी। ऐसे ही अन्य स्त्रियाँ भी हैं, जो कहती है—मैं तेरी पुत्रवधू थी। अरे मूर्ख! मैं तेरी मौसी थी, मामी थी, फुआ थी, गुरुपत्नी थी, मित्रकी भार्या थी, भाई तथा राजाकी स्त्री थी। श्रोत्रिय ब्राह्मणोंकी पत्नी होनेका मुझे सौभाग्य मिला था। उस समय तूने हमसे बलात्कार किया था। अब तू इस क्लेशसे बच नहीं सकता। अरे निर्लज्ज! अब विपत्तियोंसे घबड़ाकर भागता क्यों है? दुष्ट! मैं तुझे अवश्य मार डालूँगी। तूने जैसा काम किया है, उसका अब फल भोग।'
द्विजवरो! फिर बाघ, सिंह, सियार, गदहा, राक्षस, हिंसक जन्तु, कुत्ते और कौवे उन पापियोंको अपना ग्रास बनानेमें तत्पर हो जाते हैं तथा यमराजके दूत उन्हें 'असिपत्रवन' एवं 'तालवन' संज्ञक नरकोंमें फेंक देते हैं। वहाँ धुआँ और ज्वालाओंसे परिपूर्ण दावानलकी भाँति धायँ-धायँ अग्नि जलती रहती है। जब पापात्मा प्राणियोंको अग्निकी ज्वालाएँ असह्य हो जाती हैं, तब वे वृक्षोंके नीचे विश्राम करनेके लिये चले जाते हैं। वहाँ तलवारके समान पत्रोंसे उनका शरीर छिद उठता है। फिर तो छिन्न-भिन्न होने, जलाये जाने तथा बुरी तरह मार खानेके कारण वे कराहते रहते हैं। पीड़ासे मर्माहत होकर वे चिल्लाने लगते हैं। असिपत्र और तालवन नामवाले नरकोंके फाटकपर महारथी वीर पहरा करते हैं। उनके रूपकी भयंकरता अवर्णनीय है।
विप्रो! मैंने यमपुरीमें यह भी देखा कि वहाँ अनेक पक्षी अग्निकी ज्वालाके समान जलानेकी शक्ति रखते हैं। उनके शब्द अत्यन्त तीक्ष्ण एवं कर्कश होते हैं। उनका स्पर्श होते ही प्राणी जलने लगते हैं। उनके चोंच ऐसे हैं, मानो लोहेके बने हों। कहीं अत्यन्त भयंकर बाघोंका झुंड है, कहीं मांसभक्षी क्रूर कुत्तोंकी टोली है तथा अनेक हिंसक जानवर क्रोधमें भरकर पापी प्राणियोंको खा रहे हैं। एक जगह 'असितालवन' भालुओं और हाथियोंसे खचाखच भरा है। यमपुरमें मेघ हड्डियों, पाषाणों, रुधिरों और अश्मखण्डोंकी भी वर्षा करते हैं। उस समय पापी प्राणी उनसे आहत होकर उछलते-दौड़ते हैं और भागते हैं। अत्यन्त आहत हो जानेके कारण उनके मुँहसे
१६२- पतिव्रतोपाख्यान
| ३६६ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १९८–२०० |
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दारुण शब्द निकलते रहते हैं। प्रत्येक प्राणी कहता है—हा! अब मैं मारा गया। उनके करुण क्रन्दनसे सभी दिशाएँ व्याप्त हो जाती हैं। कहीं कोई रोता है, कहीं कोई बुरी तरहसे छिदा है, कहीं कोई मोटे पत्थरोंसे दबा है तथा कहीं कोई उठनेका प्रयास करता है। सर्वत्र हाहाकारपूर्ण अत्यन्त करुण पुकार सुनायी पड़ता है।
ऋषिकुमार नचिकेता कहते हैं—द्विजवरो! तप्त, महातप्त, रौरव, महारौरव, सप्तताल, कालसूत्र, अन्धकार, करीषगर्त, कुम्भीपाक तथा अन्धकाररव—ये दस प्रसिद्ध भयंकर नरक हैं, जिनमें उत्तरोत्तर दुगुना, तिगुना और दसगुना क्लेश है; यातनाएँ भोगनी पड़ती हैं। प्रेत यहाँसे दिन-रात मार्गपर चलते रहनेपर यमपुरी पहुँचते हैं। दुःखियोंका दुःख क्रमशः बढ़ता ही जाता है। मार्गमें तथा वहाँ केवल दुःख-ही-दुःख रहता है, सुख सामने आता ही नहीं है। दुःख-ही-दुःख आ घेरता है। कोई उपाय नहीं जिससे थोड़ा भी सुख मिले। परिवारसे सम्बन्ध छूट जाता है। पाँचों भूत अलग हो जाते हैं। उसकी मृतक या प्रेत संज्ञा हो जाती है। इस दुःखका कहीं अन्त मिल जाय—यह असम्भव-सी बात है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये सुखके साधन हैं। किंतु इनके रहनेपर भी वहाँ उस जीवको कुछ भी सुख नहीं मिल सकता। दुःखकी अन्तिम सीमापर पहुँचे हुए व्यक्तिको शरीर एवं मनःसम्बन्धी अनेक क्लेश कष्ट देते रहते हैं। कहीं लोहेके बने हुए तीखे काँटों तथा अत्यन्त तपती हुई बालुकाओंसे भरी पृथ्वीपर उसे पैर रखना पड़ता है। धधकती आगकी भाँति जीभवाले अनेक पक्षी आकाशमें भरे रहते हैं। अतः उसे वहाँ भी कष्टका सामना करना पड़ता है। भूख और प्यासकी मात्रा चरम सीमापर पहुँच जाती है। ऐसी स्थितिमें यदि कहीं पानी मिलता है तो वह भी अत्यन्त गरम। कहीं ठंडा मिला तो उसकी शीतलता भी मात्रासे अति अधिक। जब पापात्मा प्राणी पानी पीनेकी इच्छा करता है तो राक्षस उसे तालाबपर ले जाते हैं। हंस एवं सारससे भरे हुए उस तालाबकी कमल और कुमुद शोभा बढ़ाते रहते हैं। प्राणीको जल पीनेकी उत्कट इच्छा रहती है। अतः दौड़कर वहाँ चले जाते हैं, पर वहाँका जल अत्यन्त संतप्त रहता है। उसमें जाते ही उनके मांस पक जाते हैं और राक्षसोंकी उदरपूर्तिका वह साधन बन जाता है। फिर जब पापी व्यक्ति क्षार जलवाले महान् ह्रदमें गिराया जाता है, तब उसमें रहनेवाले अनेक मगरमच्छ उसे खाने लगते हैं। कुछ समय यों व्यतीत होनेके बाद प्राणी किसी प्रकार वहाँसे भाग जाते हैं। इसी प्रकार ‘शृङ्गाटकवन’ नामक नरकमें नारकी सियारोंका जत्था घूमता रहता है। अत्यन्त जलती हुई बालुओंसे वहाँकी भूमि भरी है। अतः पापकर्मके परिणामस्वरूप वे प्राणी उन नरकोंमें जलते, छिदते, कटते, मरते, गिरते तथा पिटते रहते हैं। इतना ही नहीं, वहाँ सर्पों एवं बिच्छुओंके समान दुःखदायी बहुत-से कुत्ते भी उन्हें काटते रहते हैं। उन दुर्धर्ष कुत्तोंकी आकृति काले और साँवले रंगकी है, जो सदा क्रोधके आवेशमें रहते हैं। यहीं ‘कूटशाल्मलि’ नामक एक दूसरा नरक भी है, जो काँटोंसे परिपूर्ण है। यमराजके दूत उसमें नारकी जीवको घसीटते रहते हैं। जब केवल उसकी हड्डी शेष रह जाती है, तब उसे अन्यत्र भेजते हैं। वहाँ करम्भवालुका नामकी एक नदी है, जिसकी चौड़ाई सौ योजन है। वैतरणीनदीका विस्तार पचास योजन है और वह पाँच योजन गहरी है। इसमें त्वचा, मांस और