वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१०७- कुब्जाम्रकतीर्थ (हृषीकेश) का माहात्म्य, रैभ्यमुनिपर भगवत्कृपा
अध्याय १२५ ] माया-चक्रका वर्णन तथा मायापुरी (हरिद्वार)-का माहात्म्य २०५
अनुसार उत्तम कर्म हैं, जिनका मैंने तुमसे वर्णन किया है। महाभागे! यह वृत्त सर्वथा गोपनीय है। इसके प्रभावसे मेरे कर्मपरायण रहनेवाले मनुष्य संसारसागरको तर जाते हैं। देवता भी इसे नहीं जानते; क्योंकि मैं भगवान् नारायण यहाँ स्वयं वराहके रूपमें विराजमान हूँ। इस प्रकारके ज्ञानका उन्हें भी अभाव है। यह विषय दीक्षा-हीन, मूर्ख, चुगली करनेवाले, निन्दित शिष्य एवं शास्त्रके अर्थोंमें दोषारोपण करनेवालेसे नहीं कहना चाहिये। गोघाती एवं धूर्तोंके बीच भी इसका कथन अनुचित है; क्योंकि उनके मध्य इसको कहनेसे लाभके बदले हानि ही होती है। जो भगवान्में श्रद्धा रखनेवाले हैं तथा जिन्होंने धार्मिक दीक्षा ली है, उनके सामने ही इसकी व्याख्या करनी चाहिये।
[अध्याय १२४]
माया-चक्रका वर्णन तथा मायापुरी (हरिद्वार)-का माहात्म्य
सूतजी कहते हैं—पवित्र व्रतोंका अनुष्ठान करनेवाली भगवती वसुंधराने छः ऋतुओंके वैष्णव-कृत्योंका वर्णन सुनकर भगवान् नारायणसे पुनः पूछा—'भगवन्! आपने मङ्गल एवं पवित्रमय जिन विषयोंका वर्णन किया है, जिनकी स्वर्गादि लोकों तथा मेरे भूलोकमें प्रसिद्धि हो चुकी है, वे आपके—वैष्णव-धर्मके कृत्य मेरे मनको आनन्दित कर रहे हैं। माधव! आपके मुखारविन्दसे निकले हुए इन कर्मोंको सुनकर मेरी बुद्धि निर्मल हो गयी। पर मेरे मनमें एक सूक्ष्म कौतूहल उत्पन्न हो गया है। मेरा हित करनेके विचारसे उसे आप बतलानेकी कृपा कीजिये। भगवन्! आप अपनी जिस मायाका सर्वदा वर्णन किया करते हैं, उसका स्वरूप क्या है तथा उसे 'माया' क्यों कहा जाता है? मैं इसे तथा इसके आन्तरिक रहस्योंको जानना चाहती हूँ।'
इसपर मायापति भगवान् नारायण हँसकर बोले—'पृथ्वी देवि! तुम जो मुझसे यह मायाकी बात पूछ रही हो, इसे न पूछनेमें ही तुम्हारी भलाई है। तुम व्यर्थमें यह कष्ट क्यों मोल लेना चाहती हो? इसे देखनेसे तो तुम्हें कष्ट ही होगा। ब्रह्मासहित रुद्र एवं इन्द्र आदि देवता भी आजतक मुझे तथा मेरी मायाको जाननेमें असफल रहे हैं, फिर तुम्हारी तो बात ही क्या? विशालाक्षि! जब मेघ पानी बरसाते हैं तो जलसे सारा जगत् भर उठता है। पर कभी वही सारा देश फिर शुष्कबंजर बन जाता है। कृष्णपक्षमें चन्द्रदेव क्षीण होते हैं और शुक्लपक्षमें बढ़ते हैं, यह सब मेरी मायाका ही तो प्रभाव है। सुन्दरि! अमावास्याकी रात्रिमें चन्द्रमा दृष्टिगोचर नहीं होते, हेमन्त-ऋतुमें कुएँका जल गर्म हो जाता है—विचारकी दृष्टिसे देखें तो यह सब मेरी माया ही है। इसी प्रकार ग्रीष्म-ऋतुमें जल ठंडा हो जाता है। पश्चिम दिशामें जाकर सूर्य अस्त हो जाते हैं। पुनः वे प्रातःकाल पूरबमें उदित होते हैं। प्राणियोंके शरीरमें रक्त और शुक्र—इन दोनोंका समावेश रहता है, वस्तुतः यह सब मेरी माया ही तो है। सुन्दरि! प्राणी गर्भमें आता है, उसे वहाँ सुख और दुःखका अनुभव होता है, पुनः उत्पन्न हो जानेपर उसे वह बात भूल जाती है। अपने कर्ममें रचा-पचा जीव अपने स्वरूपको भूल जाता है, उसकी स्पृहा समाप्त हो जाती है, वस्तुतः यह सब मेरी मायाका ही प्रताप है। कर्मके प्रभावसे जीव दूसरी जगह पहुँच जाता है। शुक्र और रक्तके संयोगसे जीवधारियोंकी उत्पत्ति होती है, दो भुजाएँ, दो पैर, बहुत-सी अँगुलियाँ, मस्तक, कटि, पीठ,
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पेट, दाँत, ओंठ, नाक, कान, नेत्र, कपोल, ललाट और जीभ इत्यादिसे संगठित प्राणीकी उत्पत्ति मेरी मायाका ही चमत्कार है। वही प्राणी जब खाता-पीता है तो जठराग्निके द्वारा उसका पाचन होता है। तत्पश्चात् जीवके शरीरसे वही अधोमार्गसे बाहर निकल जाता है, यह सब मेरी प्रबल मायाकी ही करामात है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—इन पाँच विषयोंमें अन्न खानेसे प्रवृत्ति होती है, ये सभी कार्य मेरी मायाकी ही देन हैं।
देवि! कुछ जल आकाशस्थ बादलोंमें लटके रहते हैं और कुछ जलराशि भूमिपर नदी, सरोवर आदिमें रहती है। पर जिन नदियों आदिमें इस जलकी प्रतिष्ठा है, वे नदियाँ भी कभी बढ़ती और कभी घटती हैं—यह सब मेरी मायाका ही प्रभाव है। वर्षा-ऋतुमें सभी नदियोंमें अथाह जल हो जाता है, बावलियाँ और तालाब जलसे भर जाते हैं, पर ग्रीष्म-ऋतुमें वे ही सब सूख जाते हैं, यह सब मेरी मायाका ही तो बल है। मेघ ‘लवणसमुद्र’ से खारा जल लेकर मधुर जलके रूपमें उसे भूलोकमें बरसाते हैं, यह मेरी मायाका ही प्रभाव है। रोगसे दुःखी हुए कितने प्राणी रसायन तथा ओषधियाँ खाते हैं और उस ओषधिके प्रभावसे नीरोग हो जाते हैं, किंतु कभी उसी ओषधिके देनेपर प्राणीकी मृत्यु भी हो जाती है, उस समय मैं ही कालका रूप धारण कर ओषधिकी शक्तिका हरण कर लेता हूँ, यह सब मेरी मायाका ही प्रभाव है। पहले गर्भकी रचना होती है, इसके उपरान्त पुरुष उत्पन्न हो जाता है, फिर युवावस्था होती है, बुढ़ापा भी आ जाता है, जिसमें सभी इन्द्रियोंकी शक्ति समाप्त हो जाती है—यह सब मेरी मायाका बल है। भूमिमें बीज गिराया जाता है और उससे अङ्कुरकी उत्पत्ति हो जाती है। तत्पश्चात् वह अङ्कुर अद्भुत पत्तोंसे सम्पन्न हो जाता है—यह विचित्रता मेरी मायाका ही स्वरूप है। एक ही बीज गिरानेसे वैसे ही अनेक अन्नके दाने निकल जाते हैं, वस्तुतः मैं ही अपनी मायाके सहयोगसे उसमें अमृत शक्तिकी उत्पत्ति कर देता हूँ।
जगत्को विदित है कि गरुड़ मुझ भगवान् विष्णुका वहन करते हैं। वस्तुतः मैं ही स्वयं गरुड़ बनकर वेगसे अपने-आपको वहन करता हूँ। जितने देवता जो यज्ञका भाग पाकर संतुष्ट होते हैं, उस अवसरपर मैं ही अपनी इस मायाका सृजनकर उन अखिल देवताओंको तृप्त करता हूँ, किंतु सभी प्राणी यही जानते हैं कि ये देवता ही सदा यज्ञका भाग ग्रहण करते हैं। पर वस्तुतः मैं ही मायाकी रचना कर देवताओंके लिये यज्ञ कराता हूँ। बृहस्पतिजी यज्ञ कराते हैं—यह जानकर संसारमें सभी लोग उनकी सेवा करते हैं। पर आङ्गिरसी मायाका सृजन करना और देवताओंके लिये यज्ञकी व्यवस्था करना मेरा ही काम है। सम्पूर्ण संसार जानता है कि वरुण देवताकी कृपासे समुद्रकी रक्षा होती है, किंतु वरुणसे सम्बन्ध रखनेवाली इस मायाका निर्माण कर मैं ही महान् समुद्रकी रक्षा करता हूँ। सारा विश्व यही जानता है कि कुबेरजी धनाध्यक्ष हैं। परंतु रहस्य यह है कि मैं ही मायाका आश्रय लेकर कुबेरके भी धनकी रक्षा करता हूँ। ‘इन्द्रने ही वृत्रासुरको मारा था,’ इस प्रकारकी बात संसार जानता है, किंतु वज्रसे वस्तुतः मैंने ही उसे मारा था। सूर्य, ध्रुव आदि तपते हैं—ऐसी बात सर्वविदित है किंतु तथ्य यह है कि इनमें मेरा ही तेज है। संसारमें लोग कहते हैं, अरे! जल कहाँ चला गया ? पर बात यह है कि बड़वानलका रूप धारणकर सम्पूर्ण जलका शोषण मैं ही करता हूँ। मायासे ओत-प्रोत वायुरूप बनकर मेघोंको संचालित करना मेरा ही
अध्याय १२५ ] माया-चक्रका वर्णन तथा मायापुरी (हरिद्वार)-का माहात्म्य २०७
कार्य है। अमृतका निवास कहाँ है? इस गहन विषयको देवता भी नहीं जानते हैं, पर तथ्य यह है कि मेरी मायाके शासनसे वह ओषधिमें निवास करता है। संसार जानता है कि राजा ही प्रजाओंकी रक्षा करता है। किंतु तथ्य यह है कि राजाका रूप धारण करके मैं ही स्वयं पृथ्वीका पालन करता हूँ। युगकी समाप्तिके अवसरपर ये जो बारह सूर्य उदित होते हैं, उनमें मैं ही अपनी शक्तिका आधान करके वह कार्य सम्पन्न करता रहता हूँ। वसुंधरे! संसारमें मायाकी सृष्टि करना मुझपर निर्भर है। देवि! सूर्य अपने किरणसे सम्पूर्ण जगत्में निरन्तर ताप पहुँचाता है। ऐसी स्थितिमें किरणमयी मायाकी सृष्टि करना और सम्पूर्ण संसारमें उसका प्रसारण करना मेरे ही हाथका खेल है। जिस समय संवर्तक मेघ मूसल-जैसी धाराओंसे जल बरसाते हैं, उस अवसरपर मायाका आश्रय लेकर संवर्तक मेघोंद्वारा मैं ही समस्त जगत्को जलसे भर देता हूँ। वरारोहे! मैं जो शेषनागकी शय्यापर सोता हूँ, यह मेरी मायाका ही पराक्रम है। शेषनागका रूप धारण करना और उनपर शयन करना यह सब एकमात्र मेरी योगमायाका ही कार्य है। वसुंधरे! वाराही मायाका आश्रय लेकर मैंने तुम्हें ऊपर उठाया था—क्या तुम यह भूल गयी?
तुम भी वैष्णवी मायाका लक्ष्य हुई हो, क्या इस बातको नहीं जानती हो। सुश्रोणि! सत्रह बार तो तुम मेरे दाढ़ोंपर नित्य प्रलयकालमें आश्रय पा चुकी हो। उस समय मेरे द्वारा मायाका सृजन हुआ था और तुम 'एकार्णव'—समुद्रमें डूब रही थी। मैं मायाके ही योगसे जलमें रहता हूँ। ब्रह्मा और रुद्रका सृजन करना और भरण-पोषण करना मेरी ही मायाका कार्य है। फिर भी मेरी मायासे मोहित हो जानेके कारण वे मेरी इस मायाको नहीं जानते हैं। पितरोंका समुदाय जो सूर्यके समान तेजस्वी है, वह भी वस्तुतः मैं ही हूँ तथा पितृमयी मायाका आश्रय लेकर पितरोंका रूप धारण कर मैं ही पितृभाग कव्यको ग्रहण करता हूँ। अधिक क्या, एक दूसरी विचित्र बात सुनो, जो एक बार एक (पुरुष) ऋषि भी मायाद्वारा स्त्रीके स्वरूप (योनि)-में परिणत (परिवर्तित) कर दिये गये थे।
पृथ्वी बोली—भगवन्! उस ऋषिने कौन-सा अपकर्म किया था, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें स्त्रीकी योनि प्राप्त हुई? इस बातसे तो मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है। आप यह सारा प्रसङ्ग बतानेकी कृपा कीजिये। उस ब्राह्मणश्रेष्ठने फिर स्त्रीरूप धारण कर कौन-से पापयुक्त कर्म किये, यह सब भी विस्तारसे बतायें। पृथ्वीकी बात सुनकर श्रीभगवान् अत्यन्त प्रसन्न हो गये और मधुर वचनमें कहने लगे, देवि! यह विषय अत्यन्त गूढ़ और महत्त्वपूर्ण है। सुन्दरि! तुम यह धर्मयुक्त कथा सुनो। देवि! मेरी माया ज्ञान एवं विश्वकी सभी वस्तुओंको आच्छादित किये है, उसकी बात सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इस मायाके प्रभावसे सोमशर्मा नामक ऋषि भी प्रभावित हुए थे। इससे वे उत्तम, मध्यम और अधम—अनेक प्रकारकी स्थितियोंके चक्करमें घूमते रहे। फिर मेरी मायाकी प्रेरणासे उन्हें पुनः ब्राह्मणत्व सुलभ हुआ। सोमशर्मा उत्तम ब्राह्मण होकर भी स्त्रीकी योनिमें परिवर्तित हो गये, यद्यपि उसमें भी उनके द्वारा कोई विकृत कर्म नहीं हुआ और न कोई अपराध ही किया। वसुंधरे! बात यह है कि वे (सोमशर्मा) सदा मेरी आराधना, उपासनादि कर्मोंमें ही लगे रहते थे। वे निरन्तर मेरी रमणीय आकृति—मेरे सुन्दर स्वरूपका ही चिन्तन करते रहते। भामिनि! इस प्रकार पर्याप्त समयतक उनकी भक्ति, तपश्चर्या, अनन्यभावसे स्तुति करते रहनेपर मैं उनपर प्रसन्न
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हुआ। देवि! मैंने उस समय उन्हें अपने स्वरूपका दर्शन कराया और कहा—'ब्राह्मणदेवता! मैं तुम्हारी तपस्यासे संतुष्ट हूँ, तुम मुझसे जो चाहो वर माँग लो। रत्न, सुवर्ण, गौएँ तथा अकण्टक राज्य—जो कुछ तुम्हारे हृदयमें हो माँगो, मैं सब कुछ तुम्हें दे सकता हूँ। अथवा विप्रवर, उस स्वर्गका सुख, जहाँ वाराङ्गनाएँ तथा आनन्दका अनुभव करनेकी अनन्त सामग्रियाँ हैं तथा जो सुवर्णके भाण्डोंसे सुशोभित एवं धन और रत्नोंसे परिपूर्ण है, जहाँ अप्सराएँ दिव्य रूप धारण किये रहती हैं, उसे ही माँग लो। अथवा जो भी इष्ट वस्तु तुम्हारे ध्यानमें आती हो, वह सब मेरे वरसे तुम्हें सुलभ हो सकती है।'
वसुंधरे! उस समय मेरी बात सुनकर उन श्रेष्ठ ब्राह्मणने भूमिपर पड़कर मुझे साष्टाङ्ग प्रणाम किया और मधुर शब्दोंमें कहने लगे—'देव! आप मुझपर यदि रुष्ट न हों तो मैं आपसे जो वर माँग रहा हूँ, वही दीजिये। भगवन्! आपके द्वारा निर्दिष्ट वरदानों—सुवर्ण, गौएँ, स्त्री, राज्य, ऐश्वर्य एवं अप्सराओंसे सुशोभित स्वर्ग आदिसे माधव! मेरा कोई भी प्रयोजन नहीं है। मैं तो केवल आपकी मायाका—जिसकी सहायतासे आप सारी क्रीडाएँ करते हैं, रहस्य ही जानना चाहता हूँ।'
वसुंधरे! ब्राह्मणकी बात सुनकर मैंने कहा—'द्विजवर! मायासे तुम्हारा क्या प्रयोजन है? ब्राह्मणदेव! तुम अनुचित तथा अकार्यकी कामना कर रहे हो।' पर मेरी मायासे प्रेरित होकर उस ब्राह्मणने मुझसे पुनः यही कहा—'भगवन्! आप यदि मेरे किसी कर्म अथवा तपस्यासे तनिक भी संतुष्ट हैं तो मुझे बस वही वर दें (अर्थात् अपनी मायाका ही दर्शन करायें)।'
अब मैंने उस तपस्वी ब्राह्मणसे कहा—'द्विजवर! तुम 'कुब्जाम्रक'* तीर्थमें जाओ और वहाँ गङ्गामें स्नान करो, इससे तुम्हें मायाका दर्शन होगा।' देवि! मेरी इस बातको सुनकर ब्राह्मणने मेरी प्रदक्षिणा की और दर्शनकी अभिलाषासे वह ऋषिकेश चला गया। वहाँ उसने बड़ी सावधानीसे अपनी कुण्डी, दण्ड और भाण्डको गङ्गातटपर एक ओर रखकर विधिपूर्वक तीर्थकी पूजा की और उसके बाद वह गङ्गामें स्नान करनेके लिये उतरा। वह स्नानार्थ अभी डूबा ही था और उसके अङ्ग बस भींग ही रहे थे कि इतनेमें देखता है कि वह किसी निषादके घरमें उसकी स्त्रीके गर्भमें प्रविष्ट हो गया है। उस समय गर्भके क्लेशसे जब उसे असह्य वेदना होने लगी तो वह अपने मनमें सोचने लगा—'मेरे द्वारा अवश्य ही कोई बुरा कर्म बन गया है, जिससे मैं इस निषादीके गर्भमें आकर नरक-यातना भोग रहा हूँ। अहो! मेरी तपस्या एवं जीवनको धिक्कार है, जो इस हीन स्त्रीके गर्भमें वास कर रहा हूँ और नौ द्वारों तथा तीन सौ हड्डियोंसे पूर्ण विष्ठा और मूत्रसे सने रक्त-मांसके कीचड़में पड़ा हुआ हूँ। यहाँकी दुर्गन्ध असह्य है तथा कफ, पित्त, वायुसे उत्पन्न रोगों-दुःखोंकी तो कोई गणना ही नहीं। बहुत कहनेसे क्या प्रयोजन? मैं इस गर्भमें महान् दुःख पा रहा हूँ? अरे! देखो तो कहाँ तो वे भगवान् विष्णु, कहाँ मैं और कहाँ वह गङ्गाजीका जल? किसी प्रकार इस गर्भसे मेरा छुटकारा हो जाय तो फिर मैं उसी भक्तिकार्य—गङ्गा-स्नानादिमें लग जाऊँगा।'
इस प्रकार सोचते-सोचते वह ब्राह्मण शीघ्र ही निषादीके गर्भसे बाहर आया। पर भूमिपर गिरते
* यह 'ऋषिकेश' का ही अन्यतम (एक दूसरा) नाम है। इसका वर्णन वराहपु० अ० ५५, १२५-२६, महाभारत ३।८४।४०, कूर्मपुराण ३४।३४, ३६।१०, पद्मपुराण, स्वर्गखण्ड २८।४० तथा 'अर्चावतारस्थलवैभवदर्पण' पृ० १०० आदिपर भी है (—'नन्दलाल दे')।
अध्याय १२५ ] माया-चक्रका वर्णन तथा मायापुरी ( हरिद्वार )-का माहात्म्य २०९
ही उसने जो गर्भमें निश्चय किया था, वह सब विस्मृत हो गया। अब वह धन-धान्यसे परिपूर्ण निषादके घरमें एक कन्याके रूपमें रहने लगा। भगवान् विष्णुकी मायासे मुग्ध होनेके कारण पूर्वकी कुछ भी बातें उसे याद न रहीं। इस प्रकार बहुत दिन बीत गये। फिर उस कन्याका विवाह हुआ। मायाके प्रभावसे ही उसके बहुतसे पुत्र और पुत्रियाँ उत्पन्न हुईं। अब कन्यारूपमें वह (ब्राह्मण) सभी भक्ष्य एवं अभक्ष्य वस्तुओंको भी खा लेता तथा पेय एवं अपेय वस्तुएँ भी पी लेता। वह निरन्तर (मत्स्यादि) जीवोंकी हिंसामें निरत रहता तथा कर्तव्याकर्तव्यज्ञानसे भी शून्य हो गया।
वसुंधरे! इस प्रकार जब निषादी स्त्रीरूपमें रहते उस ब्राह्मणके पचास वर्ष बीत गये, तब मैंने उसे पुनः स्मरण किया। वह (निषादीरूप ब्राह्मण) घड़ा लेकर विष्ठालिप्त वस्त्रोंको धोनेके लिये पुनः गङ्गाके तटपर गया और उसे एक ओर रखकर स्नान करनेके लिये गङ्गाके जलमें प्रविष्ट हुआ। कड़ी धूपसे संतप्त होनेके कारण उसका शरीर पसीनेसे लथपथ-सा हो रहा था। अतः उसकी इच्छा हुई कि सिर डुबाकर स्नान कर लूँ। पर ऐसा करते ही वह तपस्याका धनी (निषादीरूप) ब्राह्मण उसी क्षण पूर्ववत् तपस्वी बन गया। स्नान करके बाहर निकलते ही उसकी दृष्टि पूर्वके रखे हुए दण्ड, कमण्डलु और वस्त्रोंपर पड़ी, जिन्हें देखते ही उसे पहले-जैसा ज्ञान उत्पन्न हो गया। पूर्व समयमें उस ब्राह्मणने जिस प्रकार विष्णुकी माया जाननेकी कामना की थी, वह भी उसे याद हो आयी; गङ्गासे बाहर निकलकर अब उसने अपने वस्त्र पहने और लज्जित होकर वह वहीं पुनः बालुकापर बैठकर योग एवं तपके विषयमें विचार करने लगा और कहने लगा—'अरे! मुझ पापीद्वारा कितने निन्दनीय अकार्य कर्म बन गये।'
इस प्रकार उसने अपनेको निन्दनीय मानकर बहुत धिक्कारा और कहने लगा—'साधु पुरुषोंद्वारा निन्दित कर्म करनेवाले मुझको धिक्कार है। मैं सदाचारसे सर्वथा भ्रष्ट हो गया था, जिस कारण मुझे निषादकी योनिमें जाना पड़ा। इस कुलमें उत्पन्न होनेपर मैंने कितने ही भक्ष्य और अभक्ष्य वस्तुओंका सेवन किया और सभी प्रकारके जीवोंका वध किया, अभक्ष्य-भक्षण तथा अपेय वस्तुओंका पान किया और न बेचने योग्य वस्तुओंका विक्रय किया, मुझे वाच्यावाच्यका भी ध्यान न रहा। निषादके सम्पर्कसे मैंने अनेक पुत्रों और पुत्रियोंकी भी उत्पत्ति की। किस दुष्कर्मके फलस्वरूप मुझे निषादकी पत्नी होना पड़ा, यह भी विचार करने योग्य है।'
वसुंधरे! इधर तो वह ब्राह्मण इस प्रकार यहाँ ऐसा सोच रहा था, उधर निषाद क्रोध एवं दुःखसे पागल हो रहा था। वह उसी समय अपने पुत्रोंसे घिरा अपनी भार्याको खोजता हुआ हरिद्वार पहुँचा और वहाँ प्रत्येक तपस्वीसे अपनी उस स्त्रीके विषयमें पूछने लगा। फिर वह विलाप-सा करता हुआ कहने लगा—'प्रिये! तुम मुझे तथा अपने सभी पुत्रोंको छोड़कर कहाँ चली गयी? अभी दूध पीनेवाली तुम्हारी छोटी बालिका भूखसे व्याकुल होकर रो रही है। फिर वह वहाँ उपस्थित तपस्वियोंसे पूछने लगा—'तपस्वियो! मेरी पत्नी जल लेनेके लिये हाथमें घड़ा लेकर गङ्गाके तटपर आयी थी। क्या आपलोगोंने उसे देखा है? उस समय सभी मनुष्य जो हरिद्वारमें आये हुए थे, वे उस तपस्वी ब्राह्मण तथा उसके घड़ेको यथापूर्व उपस्थित देख रहे थे। इसके पश्चात् दुःखसे संतप्त उस निषादने जब अपनी प्रिय भार्याको नहीं देखा तो उसकी दृष्टि वस्त्र और घड़ेपर पड़ी। अब वह अत्यन्त करुण
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विलाप करने लगा—'अहो! मेरी स्त्रीके ये वस्त्र और घड़ा तो नदीके तटपर ही पड़े हैं, किंतु गङ्गामें स्नान करनेके लिये आयी हुई मेरी पत्नी नहीं दिखायी पड़ रही है। लगता है, जब वह बेचारी दुःखी अबला स्नान कर रही होगी उस समय जिह्वालोलुप किसी ग्राहने उसे पानीमें पकड़ लिया होगा अथवा वह पिशाचों, भूतों या राक्षसोंका आहार बन गयी। प्रिये! मैंने कभी जाग्रत् या स्वप्नमें भी तुमसे कोई अप्रिय बात नहीं कही। लगता है किसी रोगसे वह उन्मत्त-सी होकर गङ्गाके तटपर चली आयी थी। पूर्वजन्ममें मैंने कौन-सा पापकर्म किया था, जो मेरे इस महान् संकटका कारण बन गया, जिसके फलस्वरूप मेरी पत्नी मेरे देखते-ही-देखते आँखोंसे ओझल हो गयी और अब उसका कहीं कुछ पता नहीं चल रहा है। फिर वह प्रलापमें कहने लगा—'प्रिये! तुम सदा मेरे चित्तका अनुसरण करती रही हो। सुभगे! मेरे पास आ जाओ। देखो, ये बालक डर गये हैं, इधर-उधर भटक रहे हैं और इन्हें अनाथ-जैसे क्लेशोंका सामना करना पड़ता है। सुन्दरि! तुम मुझे तथा इन तीन नन्हे-नन्हे बालकोंको तो देखो! चारों कन्याएँ और सभी बच्चे बड़ा कष्ट पा रहे हैं, इनपर ध्यान दो। मेरे ये छोटे-छोटे पुत्र तुम्हें पानेके लिये लालायित हो रो रहे हैं। मुझ पापीकी इन संतानोंकी तुम रक्षा करो। मुझे भी क्षुधा सता रही है, मैं प्याससे भी अत्यन्त व्याकुल हूँ। तुम्हें इसका पता होना चाहिये।'
(भगवान् वराह कहते हैं—) कल्याणि! उस समय जो ब्राह्मण स्त्रीका जन्म पाकर निषादकी पत्नी बना था और जो अब मेरी उस मायासे मुक्त होकर बैठा हुआ था, निषादके इस प्रकार कहनेपर लज्जाके साथ उससे कहने लगा—'अब तुम जाओ। तुम्हारी वह भार्या यहाँ नहीं है। वह तुम्हारा सुख और संयोग लेकर चली गयी और अब कभी न लौटेगी।' इधर वह निषाद जहाँ-तहाँ भटककर विलाप ही करता रहा। अब उस ब्राह्मणका हृदय करुणासे भर गया और कहने लगा—'जाओ, अब क्यों इतना कष्ट पा रहे हो। अनेक प्रकारके आहार हैं, उनसे बच्चोंकी रक्षा करना। ये बच्चे दयाके पात्र हैं। तुम कभी भी इनका परित्याग मत करना।'
संन्यासीकी बात सुनकर उनके सामने दुःख एवं शोकसे भरे हुए निषादने उनसे मधुर वाणीमें कहा—'निश्चय ही आप प्रधान मुनिवरोंमें भी श्रेष्ठ एवं धर्मात्माओंमें भी परम धर्मात्मा पुरुष हैं। विप्रवर! तभी तो आपके मीठे वचनोंसे मुझे सान्त्वना मिल गयी।' उस समय निषादकी बात सुनकर श्रेष्ठ व्रतका पालन करनेवाले मुनिके मनमें भी दुःख एवं शोक छा गया। उन्होंने मधुर वचनमें कहा—'निषाद! तुम्हारा कल्याण हो। अब विलाप करना बंद करो। मैं ही तो तुम्हारी प्रिय पत्नी बना था। वही मैं यहाँ गङ्गातटपर आया और स्नान करते हुए मैं एक मुनिके रूपमें परिवर्तित हो गया।'
फिर तो संन्यासीकी बात सुनकर निषादकी भी चिन्ताएँ दूर हो गयीं। उसने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणसे कहा—'विप्रवर! आप यह क्या कह रहे हैं, आजतक कभी ऐसी घटना नहीं घटी है। अथवा ऐसी घटना तो सर्वथा असम्भव है कि कोई स्त्री होकर पुनः पुरुष हो जाय।' अब दुःखके कारण ब्राह्मणके मनमें भी घबराहट उत्पन्न हो गयी। उस गङ्गाके तटपर ही ब्राह्मणने निषादसे मीठी बात कही—'धीवर! अब यथाशीघ्र इन बालकोंको लेकर अपने देशमें चले जाइये और क्रमानुसार सभी बच्चोंपर यथायोग्य स्नेह रखकर इनकी देखभाल रखिये।'
अध्याय १२५ ] माया-चक्रका वर्णन तथा मायापुरी (हरिद्वार)-का माहात्म्य २११
ब्राह्मणके इस प्रकार कहनेपर भी निषाद वहाँसे नहीं गया, उसने मीठे स्वरमें उनसे पूछा—'विप्रवर! आपके द्वारा कौन-सा पाप बन गया था, जिससे आप स्त्री बन गये थे और अब फिर पुरुष हो गये? यह मुझे बतानेकी कृपा करें।'
इसपर ऋषिने कहा—'मैं हरिद्वार तीर्थके तटवर्ती क्षेत्रोंमें भ्रमण करता और एक ही बार भोजन कर जगदीश्वर जनार्दनकी पूजा करता रहता था। उन प्रभुके दर्शनकी आकाङ्क्षासे मैंने बहुत-से उत्तम धर्म-कर्म किये। बहुत समय बीत जानेके पश्चात् मुझे भगवान् श्रीहरिने दर्शन दिया और मुझसे वर माँगनेको कहा। मैंने प्रार्थना की—'प्रभो! आप भक्तोंपर कृपा करनेवाले सर्वव्यापक पुरुष हैं। आप मुझे अपनी मायाका दर्शन कराइये।'
इसपर भगवान् विष्णुने कहा था—'ब्राह्मणदेव! माया देखनेकी इच्छा छोड़ दो।' किंतु मैंने बार-बार उनसे वही आग्रह किया, तब भगवान्ने कहा—'अच्छा, नहीं मानते हो तो 'कुब्जाम्रक' क्षेत्र (ऋषिकेश)-में जाओ। वहाँ गङ्गामें स्नान करनेपर तुम्हें माया दिखलायी पड़ेगी और वे अन्तर्धान हो गये। मैं भी माया-दर्शनकी लालसासे गङ्गातटपर गया और वहाँ अपने दण्ड, कमण्डलु एवं वस्त्रको यत्नसे एक ओर रखकर स्नान करनेके लिये निर्मल जलमें पैठा। इसके बाद मैं कुछ भी न जान सका कि कहाँ क्या है और क्या हो रहा है? तत्पश्चात् मैं किसी मल्लाहिनके उदरसे कन्याके रूपमें उत्पन्न होकर तुम्हारी पत्नी बन गया। वही मैं आज फिर किसी कारण जब गङ्गाके जलमें पैठकर स्नान करने लगा तो पहले-जैसे ही ऋषिके रूपमें परिणत हो गया हूँ। निषाद! देखो, पहले-जैसे ही यहाँ मेरी कुण्डी और मेरे वस्त्र भी विराजमान हैं। पचास वर्षोंतक मैं तुम्हारे घरमें रह चुका हूँ, परंतु मेरे पास जो दण्ड एवं वस्त्र थे, जिन्हें गङ्गाके तटपर मैंने रखा था, अभी जीर्ण-शीर्ण नहीं हुए हैं और न वे गङ्गाके प्रवाहोंद्वारा प्रवाहित ही हुए हैं।
ब्राह्मणके इस प्रकार कहते ही वह निषाद सहसा गायब हो गया। उसके साथ जो बालक थे, वे भी तिरोहित हो गये। देवि! यह देखकर वह ब्राह्मण भी चकित होकर पुनः तपमें संलग्न हो गया। उसने अपनी भुजाओंको ऊपर उठाकर साँसकी गति भी रोक ली और केवल वायुके आहारपर रहने लगा। इस तरह अपराह्न हो गया। इस प्रकार कुछ समय तपस्या कर जब वह जलसे बाहर आया तो श्रद्धापूर्वक पूजाके लिये कुछ पुष्पोंको तोड़कर विधिपूर्वक भगवान्की पूजा करनेके लिये वीरासनसे बैठ गया। अब बहुत-से प्रधान तपस्वी ब्राह्मणोंने जो वहाँ गङ्गामें स्नान करनेके लिये आये थे, उसे घेर लिया और उससे कहने लगे—'द्विजवर! आपने आज पूर्वाह्नमें अपने दण्ड, कमण्डलु और अन्य उपकरण यहाँ रख दिये थे और स्नान कर मल्लाहोंके पास गये थे, फिर क्या आप यह स्थान भूलकर कहीं अन्यत्र चले गये थे? आपके आनेमें इतनी देर कैसे हुई?'
देवि! जब उस मुनिने ब्राह्मणोंकी बात सुनी तो वह मौन हो गया। साथ ही बैठकर वह मन-ही-मन ब्राह्मणोंद्वारा निर्दिष्ट बातपर सोचने लगा। "एक ओर तो उधर पचास वर्षका समय व्यतीत हो गया है और इधर अमावस्या भी आज ही है। ये सब ब्राह्मण मुझसे कह रहे हैं 'तुमने पूर्वाह्नमें अपने वस्त्रोंको यहाँ स्नानके लिये रखा तो अब अपराह्नमें इन्हें लेने क्यों आये हो? तुम्हें इतनी देर कैसे हो गयी,' यह सब क्या बात है?" देवि! ठीक इसी समय मैंने ब्राह्मणको पुनः अपना रूप
| २१२ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १२५ |
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दिखलाया और कहा—'ब्राह्मणदेव! आप कुछ घबड़ाये-से क्यों दीखते हैं? क्या आपने कुछ विशेष बात देखी है? आप कुछ मुझे व्यग्र-से दीख रहे हैं। अस्तु! जो कुछ हो, अब आप पूर्ण सावधान हो जाइये!'
मेरे इस प्रकार कहनेपर उस ब्राह्मणने अपना मस्तक भूमिपर टेक दिया और दुःखी होकर बार-बार दीर्घ श्वास लेता हुआ कहने लगा—
"जगद्गुरो! ये ब्राह्मण मुझसे कह रहे हैं कि 'तुमने पूर्वाह्नकी वेलामें वस्त्र, दण्ड और कमण्डलु आदि वस्तुएँ यहाँ रखीं और फिर अपराह्नमें यहाँ आये हो? क्या तुम इस स्थानको भूल गये थे?' माधव! इधर समस्या यह है कि निषादकी योनिमें कन्यारूपसे उत्पन्न होकर मैं एक निषादकी स्त्रीके रूपमें पचास वर्षोंतक रहा। उस शरीरसे उस कुकर्मी निषादद्वारा मेरे तीन पुत्र और चार पुत्रियाँ उत्पन्न हुईं। फिर एक दिन जब मैं गङ्गामें स्नान करनेके लिये यहाँ आकर तटपर अपना वस्त्र रखकर निर्मल जलमें स्नान करने लगा और डुबकी लगायी तो पुनः मुझे मुनियोंद्वारा अभिलषित तपस्वीका रूप प्राप्त हो गया। माधव! मैं तो सदा आपकी सेवामें लगा रहता था, किंतु पता नहीं, मेरे किस विकृत कर्मका ऐसा फल हो गया, जिसके परिणामस्वरूप मुझे निषादके यहाँ नरककी यातना भोगनी पड़ी? मैंने तो केवल माया-दर्शनका वर माँगा था, परंतु मेरे ध्यानमें और कोई पाप नहीं आता, जिसके फलस्वरूप आपने मुझे नरकमें गिरा दिया।"
वसुंधरे! उस समय वह ब्राह्मण बड़ी करुणाके साथ ग्लानि प्रकट कर रहा था। इसपर मैंने उससे कहा—"ब्राह्मणश्रेष्ठ! आप चिन्ता न करें। मैंने आपसे पहले ही कहा था कि ब्राह्मणदेवता! आप मुझसे अन्य वर माँग लें; किंतु आपने मुझसे वरके रूपमें माया-दर्शनकी ही याचना की। द्विजवर! आपने वैष्णवी माया देखनेकी इच्छा की थी, उसे ही तो देखा है। विप्रवर! दिन, अपराह्न, पचास वर्ष और निषादका घर—तत्त्वतः यह सब कहीं कुछ भी नहीं है। यह सब केवल वैष्णवी मायाका ही प्रभाव है। आपने कोई भी अशुभ कर्म नहीं किया है। आश्चर्यमें पड़कर आप जो पश्चात्ताप कर रहे हैं, वह सब भी मायाके अतिरिक्त कुछ नहीं है। न तुम्हारे द्वारा किया हुआ अर्चन भ्रष्ट हुआ है, न तुम्हारी तपस्या ही नष्ट हुई है। द्विजवर! पूर्वजन्ममें तुमने कुछ ऐसे कर्म अवश्य किये थे, जिसके फलस्वरूप यह परिस्थिति तुम्हें प्राप्त हुई। हाँ! पूर्वजन्ममें तुमने मेरे एक शुद्ध ब्राह्मण भक्तका अभिवादन नहीं किया था। यह उसीका फल है कि तुम्हें इस दुःखपूर्ण प्रारब्धका भोग भोगना पड़ा। मेरे शुद्ध भक्त मेरे ही स्वरूप हैं। ऐसे ब्राह्मणोंको जो लोग प्रणाम करते हैं, वे वस्तुतः मुझे ही प्रणाम करते हैं और वे तत्त्वतः मुझे जान जाते हैं—इसमें कोई संदेह नहीं। जो ब्राह्मण मेरे दर्शनकी अभिलाषा करते हैं, वे ब्राह्मण मेरे भक्त, शुद्धस्वरूप एवं पूज्य हैं। विशेषरूपसे कलियुगमें मैं ब्राह्मणका ही रूप धारण करके रहता हूँ, अतएव जो ब्राह्मणका भक्त है, वह निःसंदेह मेरा ही भक्त है। ब्राह्मण! अब तुम सिद्ध हो चुके हो, अतः अपने स्थानपर पधारो। जिस समय तुम अपने प्राणोंका त्याग करोगे, उस समय तुम मेरे उत्तम स्थान—श्वेतद्वीपको प्राप्त करोगे, इसमें कोई संदेह नहीं।"
वरारोहे! इस प्रकार कहकर मैं वहीं अन्तर्धान हो गया और उस ब्राह्मणने फिर कठोर तपस्या आरम्भ की। अन्तमें वह 'मायातीर्थ'* में अपना
* यह 'मायातीर्थ' या 'मायापुरी'—'हरिद्वार' का ही नामान्तर है।
१०८- दीक्षासूत्रका वर्णन
अध्याय १२६ ] कुब्जाम्रकतीर्थ (हृषीकेश)-का माहात्म्य, रैभ्यमुनिपर भगवत्कृपा [ २१३
शरीर त्यागकर श्वेतद्वीपमें पहुँचा, जहाँ वह धनुष, बाण, तलवार और तूणीर (तरकस) धारणकर मेरा सारूप्य प्राप्तकर मुझ मायाके आश्रयदाताका सदा दर्शन करता रहता है। अतः वसुंधरे! तुम्हें भी इस मायासे क्या प्रयोजन? माया देखनेकी इच्छा करना ठीक नहीं। देवता, दानव और राक्षस भी मेरी मायाका रहस्य नहीं जानते।
वसुंधरे! यह 'माया-चक्र' नामक मायाकी आश्चर्यमयी कथा मैंने तुम्हें सुनायी। यह आख्यान पुण्योंसे युक्त तथा सुखप्रद है। जो पुरुष भक्तोंके सामने इसकी व्याख्या करता है और भक्तिहीनों तथा शास्त्रोंमें दोषदृष्टि रखनेवालोंसे नहीं कहता, उसकी जगत्में प्रतिष्ठा होती है। देवि! जो व्रती पुरुष इसका प्रातःकाल उठकर पाठ करता है, उसने मानो बारह वर्षोंतक तपपूर्वक मेरे सामने इसका पाठ किया। वसुंधरे! इस महान् आख्यानको जो सदा श्रवण करता है, उसकी बुद्धि कभी मायासे लिप्त नहीं होती और न उसे निकृष्ट योनियोंमें ही जाना पड़ता है।
[ अध्याय १२५]
कुब्जाम्रकतीर्थ (हृषीकेश)-का माहात्म्य, रैभ्यमुनिपर भगवत्कृपा
इस प्रकार मायाके पराक्रमकी बातको सुनकर पृथ्वीने भगवान्से फिर पूछा।
पृथ्वी बोली—'भगवन्! आपने जिस 'कुब्जाम्रक'-तीर्थकी चर्चा की, उसमें रहने तथा स्नानादि करनेसे जो पुण्य होता है, आप अब उसे मुझे बतानेकी कृपा कीजिये।
भगवान् वराह बोले—पृथ्वीदेवि! 'कुब्जाम्रक' तीर्थका जो सार-तत्त्व है, अब उसे मैं तुम्हें विस्तारसे बतला रहा हूँ। सुन्दरि! 'कुब्जाम्रक' तीर्थकी जैसे उत्पत्ति हुई, जिस क्रमसे यह 'तीर्थ' बना, वहाँ जो अनुष्ठेय धर्म है तथा वहाँ प्राणत्याग करनेपर जिस लोककी प्राप्ति होती है, यह सब तुम ध्यान देकर सुनो। वसुंधरे! आदि सत्ययुगमें जब पृथ्वी जलमग्न थी, तब ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे मैंने मधु और कैटभ नामक राक्षसोंका वध किया और ब्रह्मदेवकी रक्षा की। उसी समय मेरी दृष्टि अपने आश्रित भक्त रैभ्यमुनिपर पड़ी। वे अत्यन्त निष्ठासे सदा मेरी स्तुति-आराधनामें निरत रहते थे। वे युक्तिमान्, गुणी, परम पवित्र, कार्यकुशल और जितेन्द्रिय पुरुष थे और ऊपर बाँहें उठाकर दस हजार वर्षोंतक तपस्यामें संलग्न रहे। वे एक हजार वर्षोंतक केवल जल पीकर तथा पाँच सौ वर्षोंतक शैवाल खाकर तपस्या करते रहे। देवि! महात्मा रैभ्यकी इस तपस्यासे मेरा हृदय करुणासे अत्यन्त विह्वल हो उठा। उस समय हरिद्वारके कुछ उत्तर पहुँचकर मैंने एक आम्रके वृक्षका आश्रय लिया और उन मुनिको तपस्या करते देखा। मेरे आश्रय लेनेसे वह आम्र-वृक्ष थोड़ा कुबड़ा हो गया। मनस्विनि! इस प्रकार वह स्थान 'कुब्जाम्रक' नामसे प्रसिद्ध हो गया। यहाँपर (स्वतः) मरनेवाला व्यक्ति भी मेरे लोकमें ही रह जाता है।
मैंने रैभ्यमुनिको कुबड़े आम्रवृक्षका रूप धारण कर दर्शन दिया था, फिर भी वे मुझे पहचान गये और घुटनोंके बल भूमिपर गिरकर मेरी स्तुति की। वसुंधरे! अपने व्रतमें अडिग रहनेवाले उन मुनिको इस प्रकार अपनी स्तुति तथा प्रणाम करते देखकर मैंने प्रसन्न मनसे उन्हें वर माँगनेके लिये कहा। मेरी बात सुनकर उन तपस्वीने मीठी वाणीमें कहा—'भगवन्! आप जगत्के स्वामी हैं और याचना करनेवालोंकी आशा पूर्ण करते हैं। भगवन्! मधुसूदन!! यदि
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आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मैं यह चाहता हूँ कि जबतक यह संसार रहे तथा अन्य लोक रहें, तबतक आपका यहाँ निवास हो और जनार्दन जबतक आप यहाँ स्थित रहें, तबतक आपमें मेरी निष्ठा बनी रहे। प्रभो! यदि आप मुझपर संतुष्ट हैं तो मेरा यह मनोरथ पूर्ण करनेकी कृपा कीजिये।'
वसुंधरे! उस समय ऋषिवर रैभ्यकी बात सुनकर पुनः मैंने कहा—'ब्रह्मर्षे! बहुत ठीक। ऐसा ही होगा।' फिर उन ब्राह्मणने बड़े हर्षके साथ मुझसे कहा—'प्रभो! आप इस प्रधान तीर्थकी महिमा भी बतलानेकी कृपा करें और मैं उसे सुनूँ। यही नहीं, इस क्षेत्रमें अन्य भी जितने क्षेत्र हैं, उनका भी आप माहात्म्य बतलायें।' देवि! तब मैंने कहा—'ब्रह्मन्! तुम मुझसे जो पूछ रहे हो, वह विषय तत्त्वपूर्वक सुनो। मेरा 'कुब्जाम्रक' तीर्थ परम पवित्र स्थान है। इसका सेवन करनेसे सभी सुख सुलभ हो जाते हैं। यह 'कुब्जाम्रक' तीर्थ कुमुदपुष्पकी आकृतिमें स्थित है। यहाँ केवल स्नान करनेसे मानव स्वर्ग प्राप्त कर लेता है। कार्तिक, अगहन एवं वैशाख मासके शुभ अवसरपर जो पुरुष यहाँ दुष्कर धर्मोंका अनुष्ठान करता है, वह स्त्री, पुरुष अथवा नपुंसक ही क्यों न हो—अपने प्राणोंका त्याग कर मेरे लोकको प्राप्त होता है।'
वसुंधरे! 'कुब्जाम्रक'तीर्थमें जो दूसरा तीर्थ है, उसे भी बतलाता हूँ, सुनो। सुन्दरि! यहाँ 'मानस' नामसे मेरा एक प्रसिद्ध तीर्थ है। सुनयने! वहाँ स्नान कर मनुष्य इन्द्रके नन्दनवनमें जाता है और अप्सराओंके साथ देवताओंके वर्षसे एक हजार वर्षोंतक वह आनन्दका उपभोग करता रहता है।
वसुंधरे! अब यहाँके एक दूसरे तीर्थका वर्णन करता हूँ सुनो—वह स्थान 'मायातीर्थ'के नामसे विख्यात है, जिसके प्रभावसे मायाकी जानकारी प्राप्त हो जाती है। उस तीर्थमें स्नान करनेवाला पुरुष दस हजार वर्षोंतक मेरी भक्तिमें रत रहता है। यशस्विनि! 'मायातीर्थ'में जो प्राण छोड़ता है, महान् योगियोंके समान वह मेरे लोकको प्राप्त होता है।
देवी पृथ्वि! अब यहाँका एक दूसरा तीर्थ बतलाता हूँ—उस तीर्थका नाम 'सर्वकामिक' है। वैशाख मासकी द्वादशी तिथिके दिन जो कोई वहाँ स्नान करता है, वह पंद्रह हजार वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करता है। यदि इस 'सर्वकामिक' तीर्थमें वह प्राण त्याग करता है तो सभी आसक्तियोंसे मुक्त होकर मेरे लोकको प्राप्त होता है।
सुलोचने! अब एक 'पूर्णमुख' नामक तीर्थकी महिमा बतलाता हूँ, जिसे कोई नहीं जानता। गङ्गाका जल इधर प्रायः सर्वत्र शीतल रहता है, किंतु यहाँ जिस स्थानपर गङ्गामें गर्म जल मिले, उसे ही 'पूर्णतीर्थ' समझना चाहिये। देवि! वहाँ स्नान करनेवाला मनुष्य चन्द्रलोकमें प्रतिष्ठा पाता है और पंद्रह हजार वर्षोंतक उसे चन्द्र-दर्शनका आनन्द मिलता है। फिर जब वह स्वर्गसे नीचे गिरता है तो ब्राह्मणके घर उत्पन्न होता है और मेरा पवित्र भक्त, कार्य-कुशल और सम्पूर्ण धर्म एवं गुणोंसे सम्पन्न होता है और अगहन महीनेके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिके दिन प्राण त्यागकर वह मेरे लोकमें पहुँचता है, जहाँ वह सदा मुझे चतुर्भुजरूपमें प्रकाशित देखता है तथा पुनः कभी जन्म और मृत्युके चक्करमें नहीं पड़ता।
वसुंधरे! मैं अब पुनः एक दूसरे तीर्थका वर्णन करता हूँ। यहाँ वैशाख मासके शुक्लपक्षकी द्वादशीके दिन तप तथा धर्मके अनुष्ठानके पश्चात् अपने शरीरका त्याग करनेवाला पुरुष मेरे लोकको प्राप्त करता है, जहाँ जन्म-मृत्यु, ग्लानि, आसक्ति, भय तथा अज्ञानजनित अभिनिवेशादिसे उसे किसी
१०९- क्षत्रियादि-दीक्षा एवं गणान्तिकादीक्षाकी विधि तथा दीक्षित पुरुषके कर्तव्य
अध्याय १२६ ] कुब्जाम्रकतीर्थ (हृषीकेश)-का माहात्म्य, रैभ्यमुनिपर भगवत्कृपा २१५
प्रकारका क्लेश नहीं होता। अब मैं (ऋषिकेश)- में ही स्थित एक दूसरे तीर्थकी बात बतलाता हूँ। वह 'करवीर' नामसे प्रसिद्ध है एवं सम्पूर्ण लोकोंको सुखी करनेवाला है। शुभे! अब उसका चिह्न भी बतलाता हूँ, जिसकी सहायतासे ज्ञानी पुरुष इसे पहचान सकें। सुन्दरि! माघ मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशी तिथिके दिन मध्याह्न कालके समय इस 'करवीर' तीर्थमें कनेरके फूल खिल जाते हैं—यह निश्चय है। उस तीर्थमें स्नान करनेवाला मनुष्य स्वतन्त्रतापूर्वक सर्वत्र अव्याहत- गमन करनेमें पूर्ण समर्थ हो जाता है। यदि माघ मासकी द्वादशी तिथिके दिन उस क्षेत्रमें किसीकी मृत्यु हो जाती है तो उसे ब्रह्मा, रुद्र और मेरे दर्शनका सौभाग्य प्राप्त होता है। वसुंधरे! अब एक दूसरे तीर्थका प्रसङ्ग सुनो। भद्रे! उस 'कुब्जाम्रकक्षेत्र' का यह स्थान मुझे बहुत प्रिय है। इस स्थानका नाम 'पुण्डरीकतीर्थ' है, जो महान् फल देनेकी शक्तिवाला है। सुमुखि! उस तीर्थका विशेष चिह्न बतलाता हूँ, सुनो—'सुन्दरि! द्वादशी तिथिके दिन मध्याह्नकालमें वहाँ रथके चक्केकी आकृतिवाला एक कछुआ विचरण करता है।' वसुमति! अब तुमसे इसके विषयमें एक दूसरी बात बताता हूँ, उसे सुनो—'सुन्दरि! वहाँ अवगाहन करनेपर 'पुण्डरीकयज्ञ' के अनुष्ठानका फल मिलता है। यदि वहाँ किसीकी मृत्यु होती है तो उसे दस 'पुण्डरीक' यज्ञोंके अनुष्ठानका फल प्राप्त होता है।'
अब मैं 'कुब्जाम्रक' (ऋषिकेश)-में स्थित एक दूसरे—'अग्नितीर्थ' की बात बतलाता हूँ, उसे सुनो—'देवि! द्वादशी तिथिके दिन पुण्यात्मा लोगोंको ही इस तीर्थकी स्थिति ज्ञात होती है। कार्तिक, अगहन, आषाढ़ एवं वैशाख मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशीके दिन जो पुरुष उस तीर्थमें यत्नपूर्वक निवास करता है, वह उस तीर्थका रहस्य जान सकता है।' वसुंधरे! उस तीर्थका चिह्न यह है कि हेमन्त ऋतुमें तो वहाँका जल उष्ण रहता है, पर ग्रीष्म ऋतुमें वह शीतल हो जाता है। महाभागे! इसी विचित्रताके कारण इस स्थानका नाम 'अग्नितीर्थ' पड़ गया है।
देवि! अब एक दूसरे तीर्थका परिचय देता हूँ, उसका नाम 'वायव्य-तीर्थ' है। उस तीर्थमें जो स्नान करके तर्पण आदि कार्य करता है, उसे वाजपेय-यज्ञका फल प्राप्त होता है। यह वायव्यतीर्थ एक 'सरोवर'के रूपमें है। वहाँ केवल पंद्रह दिनोंतक रहकर मेरी उपासना करते हुए जिसकी मृत्यु हो जाती है, उसका इस पृथ्वीपर पुनः जन्म या मरण नहीं होता। वह चार भुजाओंसे युक्त होकर मेरा सारूप्य प्राप्तकर मेरे लोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। उस 'वायव्य' तीर्थकी पहचान यह है कि वहाँ वनमें पीपलके ऐसे वृक्ष हैं, जिनके पत्ते चौबीसों द्वादशियोंको निरन्तर हिलते ही रहते हैं।
पृथ्वि! अब 'कुब्जाम्रक' तीर्थके अन्तर्वर्ती 'शक्रतीर्थ' का परिचय देता हूँ। वसुंधरे! वहाँ इन्द्र हाथमें वज्र लिये हुए सुशोभित रहते हैं। महातपे! उस तीर्थमें दस रात्रि उपवास रहकर जो मनुष्य मर जाता है, वह मेरे लोकको प्राप्त कर लेता है। इस शक्रतीर्थके दक्षिण भागमें पाँच वृक्ष खड़े हैं, यही उसकी पहचान है। देवि! वरुणदेवने बारह हजार वर्षोंतक इस 'कुब्जाम्रक'-तीर्थमें तपस्या की थी। अतः यहाँ स्नान करनेसे व्यक्ति आठ हजार वर्षोंतक वरुणलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। वहाँ ऊपरसे पानीकी एक धारा निरन्तर गिरती रहती है, यही उस तीर्थकी पहचान है।
पृथ्वि! उक्त 'कुब्जाम्रक'-तीर्थ (ऋषिकेश)- में 'सप्तसामुद्रक' नामका भी एक श्रेष्ठ स्थान है। उस तीर्थमें स्नान करनेवाला धर्मात्मा मनुष्य तीन
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अश्वमेध-यज्ञोंका फल पा लेता है। यदि आसक्तिरहित होकर कोई प्राणी सात रातोंतक यहाँ निवास कर प्राणत्याग करता है तो वह मेरे लोकमें चला जाता है। सुन्दरि! अब उस ‘सप्तसामुद्रक’ तीर्थका लक्षण बताता हूँ, सुनो—‘वैशाख मासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिके दिन वहाँ एक विशेष चमत्कार दीखता है। उस दिन उस तीर्थमें गङ्गाका जल कभी तो दूधके समान उज्ज्वल वर्णका दीखता है और कभी पुनः उसी जलमें पीले रंगकी आभा प्रकट हो जाती है। फिर वही कभी लाल रंगमें परिणत हो जाता है और फिर थोड़ी देर बाद ही उसमें मरकतमणि तथा मोतीके समान झलक आने लगती है। आत्मज्ञानी पुरुष इन्हीं चिह्नोंसे उस तीर्थका ज्ञान प्राप्त करते हैं।’
शुभाङ्गि! कुब्जाम्रक तीर्थके मध्यवर्ती एक अन्य महान् तीर्थका अब तुम्हें परिचय देता हूँ। भगवान्में भक्ति रखनेवाले समस्त पुरुषोंके प्रिय उस तीर्थका नाम ‘मानसर’ है। उसमें स्नान करनेपर मानवको मानसरोवरमें जानेका सौभाग्य प्राप्त होता है। वहाँ इन्द्र, रुद्र एवं मरुद्गण आदि सम्पूर्ण देवताओंका उसे दर्शन मिलता है। वसुंधरे! इस तीर्थमें यदि कोई मनुष्य तीस रात्रियोंतक निवासकर मृत्युको प्राप्त होता है तो वह सम्पूर्ण सङ्गोंसे मुक्त होकर मेरे लोकको प्राप्त करता है। अब ‘मानसर’-तीर्थका स्वरूप बतलाता हूँ, जिससे मनुष्योंको उसकी पहचान हो जाय—जानकारी प्राप्त हो सके। वह तीर्थ पचास कोसके विस्तारमें है।
अब तुम्हें एक दूसरी बात बताता हूँ, उसे सुनो। इस ‘कुब्जाम्रक-तीर्थ’ में बहुत पहले एक महान् अद्भुत घटना घट चुकी है। उसका प्रसङ्ग यह है—जहाँ मेरे भोगकी सामग्री रखी पड़ी रहती थी, वहीं एक सर्पिणी निर्भय होकर निवास करती थी। वह अपनी इच्छासे चन्दन, माला आदि पूजनकी वस्तुओंको खाया करती। इतनेमें ही एक दिन वहाँ कोई नेवला आ गया और उसने स्वच्छन्दतासे आनन्द करनेवाली उस सर्पिणीको देख लिया। अब उस नेवले और सर्पिणीमें भयंकर युद्ध छिड़ गया। उस दिन माघ मासकी द्वादशी तिथि थी और दोपहरका समय था। यह संघर्ष मेरे उस मन्दिरमें ही पर्याप्त समयतक चलता रहा। अन्तमें सर्पिणीने नेवलेको डस लिया, साथ ही विषदिग्ध नेवलेने भी उस सर्पिणीको तुरंत मार गिराया। इस प्रकार वे दोनों आपसमें लड़कर मर गये। अब वह नागिन प्राग्ज्योतिषपुर (आसाम)-के राजाके यहाँ एक राजकुमारीके रूपमें उत्पन्न हुई। इधर उसी समय कोसलदेशमें उस नेवलेका भी एक राजाके यहाँ जन्म हुआ। देवि! वह राजकुमार रूपवान्, गुणवान् और सम्पूर्ण शास्त्रोंका ज्ञाता तथा सभी कलाओंसे युक्त था। दोनों अपने-अपने घर सुखपूर्वक रहते हुए इस प्रकार बढ़ने लगे, जैसे शुक्लपक्षका चन्द्रमा प्रतिरात्रि बढ़ता दीखता है। पर वह कन्या यदि कहीं किसी नेवलेको देख लेती तो तुरंत उसे मारनेके लिये दौड़ पड़ती। इसी प्रकार इधर राजकुमार भी जब किसी नागिन या साँपिनको देखता तो उसे मारनेके लिये तुरंत उद्यत हो जाता। कुछ दिन बाद मेरी कृपासे कोसल देशके राजकुमारने ही उस कन्याका पाणिग्रहण किया और इसके बाद वे दोनों लाक्षा एवं काष्ठकी तरह एक साथ रहने लगे। जान पड़ता था, मानो इन्द्र और शची नन्दनवनमें विहार कर रहे हों।
वसुंधरे! इस प्रकार उस राजकुमार एवं राजकुमारीके परस्पर प्रेमपूर्वक रहते हुए पर्याप्त समय व्यतीत हो गये। वे दोनों उपवनमें एक
अध्याय १२६ ] कुब्जाम्रकतीर्थ (हृषीकेश)-का माहात्म्य, रैभ्यमुनिपर भगवत्कृपा २१७
साथ आनन्दपूर्वक इस प्रकार विहार करते, मानो समुद्र और उसकी वेला (तटी)। इस प्रकार पूरे सतहत्तर वर्ष व्यतीत हो गये। मेरी मायासे मोहित होनेके कारण वे दोनों एक-दूसरेको पहचान भी न सके। एक समयकी बात है, वे दोनों ही उपवनमें घूम रहे थे कि राजकुमारकी दृष्टि एक सर्पिणीपर पड़ी और वह उसे मारनेके लिये तैयार हो गया। राजकुमारीके मना करते रहनेपर भी वह अपने विचारोंसे विचलित न हुआ और उसने उस सर्पिणीको मार ही डाला। अब राजकुमारीके मनमें प्रतिक्रियास्वरूप भीषण रोष उत्पन्न हो गया। किंतु वह कुछ बोल न पायी। इधर उसी समय राजपुत्रीके सामने बिलसे एक नेवला निकला और भोजनके लिये किसी सर्पकी खोजमें इधर-उधर घूमने लगा। राजकुमारीने उसे देख लिया। यद्यपि नेवलेका दर्शन शुभ-सूचक है और वह नेवला केवल इधर-उधर घूम रहा था, फिर भी क्रोधके वशीभूत होकर राजकुमारी उसे मारने लगी। राजकुमारने उसे बहुत रोका, किंतु प्राग्ज्योतिषनरेशकी उस पुत्रीने शुभदर्शन नेवलेको मार ही डाला।
वसुंधरे! अब राजकुमारको बड़ा क्रोध हुआ, उसने राजकुमारीसे कहा—'देवि! स्त्रियोंके लिये पति सदा आदरका पात्र होता है और मैं तुम्हारा पति हूँ, किंतु तुमने मेरी बातको निष्ठुरतापूर्वक ठुकरा दिया। यह नेवला मङ्गलमय, शुभदर्शन प्राणी है और विशेषकर राजाओंकी यह प्रिय वस्तु है, इसका दर्शन शुभकी सूचना देता है। कहो तुमने इस मङ्गलस्वरूप नेवलेको मेरे मना करनेपर भी क्यों मार डाला?'
वसुंधरे! इसपर प्राग्ज्योतिषनरेशकी वह कन्या कोसलनरेशके पुत्रसे रोष भरकर कहने लगी कि मेरे बार-बार रोकनेपर भी आपने उस सर्पिणीको मार डाला, अतएव मैंने भी सर्पोंके मारनेवाले इस नेवलेको मार डाला। वसुंधरे! राजकुमारीकी इस बातको सुनकर कठोर शब्दोंमें डाँटते हुए राजकुमारने उससे कहा—भद्रे! साँपके दाँत बड़े तीक्ष्ण तथा उसका विष बड़ा तीव्र होता है। उसे देखते ही लोग डर जाते हैं। यह दुष्ट प्राणी मनुष्य आदिको डस लेता है और उससे वे मर जाते हैं। अतः सबका अहित करनेवाले एवं विषसे भरे हुए इस जीवको मैंने मारा है। इधर प्रजाकी रक्षा करना राजाओंका धर्म है। जो बुरे मार्गपर चलते हैं, उनकी उचित तथा कठोर दण्डोंद्वारा ताड़ना करना हमारा कर्तव्य है। जो निरपराध साधुओं एवं स्त्रियोंको भी क्लेश पहुँचाते हैं, वे भी यथार्थ-राजधर्मके अनुसार दण्डके पात्र हैं और वधके योग्य हैं। मुझे तो राजधर्मोंका पालन करना ही चाहिये, पर मुझे तुम यह तो बताओ कि इस नेवलेका क्या अपराध था? यह दर्शनीय एवं सुन्दर रूपवाला था। यह राजाओंके घरमें पालने योग्य तथा शुभदर्शन और पवित्र माना जाता है, फिर भी तुमने इसे मार डाला। तुमने मेरे बार-बार मना करनेपर भी इस नेवलेको मारा है, अतएव अबसे तुम मेरी पत्नी नहीं रही और न अब मैं ही तुम्हारा पति रह गया। अधिक क्या? स्त्रियाँ सदा अवध्य बतलायी गयी हैं, इसी कारण मैं तुम्हें छोड़ देता हूँ और तुम्हारा वध नहीं करता।
देवि! राजकुमारीसे इस प्रकार कहकर राजकुमार अपने नगर लौट गया। क्रोधके कारण उन दोनोंका परस्परका सारा स्नेह नष्ट हो गया। धीरे-धीरे मन्त्रियोंद्वारा यह बात कोसलनरेशको विदित हुई तो उन्होंने उन मन्त्रियोंके सामने ही द्वारपालोंको आज्ञा देकर राजकुमार और वधूको आदरपूर्वक बुलवाया। पुत्र और पुत्रवधूको अपने पास उपस्थित देखकर राजाने कहा—"पुत्र! तुमलोगोंमें जो
११०- पूजाविधि और ताम्रधातुकी महिमा
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परस्पर अकृत्रिम और अपूर्व स्नेह था, वह सहसा कहाँ चला गया? तुम लोग परस्पर अब सर्वथा विरुद्ध कैसे हो गये? पुत्र! यह राजकुमारी कार्यकुशल, सुन्दर स्वभाववाली एवं धर्मनिष्ठ है। आजसे पहले इसने हमारे परिवारमें भी कभी किसीको अप्रिय वचन नहीं कहा है, अतः तुम्हें इसका परित्याग कदापि नहीं करना चाहिये। तुम राजा हो, तुम्हारा राजधर्म ही मुख्य धर्म है और उसका पालन स्त्रीके सहारे ही हो सकता है। अहो! लोगोंका यह कथन परम सत्य ही है कि 'स्त्रियोंके द्वारा ही पुत्र एवं कुलका संरक्षण होता है।'
पृथ्वि! उस समय राजपुत्रने पिताकी बात आदरपूर्वक सुन ली और उनके दोनों चरणोंको पकड़कर वह कहने लगा—''पिताजी, आपकी पुत्रवधूमें कहीं कोई भी दोष नहीं है, किंतु इसने बार-बार रोकनेपर भी मेरे देखते-ही-देखते एक नेवलेको मार डाला। उसे सामने मरा पड़ा देखकर मुझे क्रोध आ गया और मैंने कह दिया कि 'अब न तो तुम मेरी पत्नी हो और न मैं तुम्हारा पति।' महाराज! बस इतना ही कारण है, और कुछ नहीं।'' पृथ्वि! इस प्रकार अपने पतिकी बात सुनकर प्राग्ज्योतिषपुरकी उस कन्याने भी अपने श्वशुरको सिर झुकाकर प्रणाम किया और कहने लगी—'इन्होंने एक सर्पिणीको जिसका कोई भी अपराध न था तथा जो अत्यन्त भयभीत थी, मेरे सैकड़ों बार मना करनेपर भी उसे मार डाला। सर्पिणीकी मृत्यु देखकर मेरे मनमें बड़ा क्षोभ और दुःख हुआ, पर मैंने इनसे कुछ भी नहीं कहा। बस यही इतनी-सी ही बात है।'
वसुंधरे! उन कोसलदेशके राजाने अपने पुत्र और पुत्रवधूकी बात सुनकर सभाके बीचमें ही उन दोनोंसे बड़ी मधुर वाणीमें कहना आरम्भ किया। वे बोले—'पुत्रि! इस राजकुमारने तो सर्पिणीको मारा और तुमने नेवलेको, फिर इस बातको लेकर तुमलोग आपसमें क्यों क्रोध कर रहे हो? यह तो बतलाओ। पुत्र! नेवलेके मर जानेपर तुम्हें क्रोध करनेका क्या कारण है? अथवा राजकुमारी! यदि सर्पिणी मर गयी तो इसमें तुम्हारे क्रोधका क्या कारण है?'
उस समय कोसलनरेशको आनन्द देनेवाले उस यशस्वी राजकुमारने पिताकी बात सुनकर मधुर स्वरमें कहा—'महाराज! इस प्रश्नसे आपका क्या प्रयोजन है? आप इसे न पूछें। आपको जो कुछ पूछना हो, वह इस राजकुमारीसे ही पूछिये।' पुत्रकी बात सुनकर कोसलनरेशने कहा—'पुत्र! बताओ। तुम दोनोंके बीच स्नेहविच्छेदका क्या कारण है? पुत्रोंमें जो योग्य होनेपर भी अपने पिताके पूछनेपर गोपनीय बात छिपा लेते हैं, वे अधम ही हैं, उन्हें तप्त-बालुकामय घोर रौरव नरकमें गिरना पड़ता है। किंतु जो शुभ अथवा अशुभ सभी बातोंको पिताके पूछनेपर बता देते हैं—ऐसे पुत्रोंको वह दिव्य गति मिलती है, जिसे सत्यवादी लोग पाते हैं। अतएव पुत्र! तुम्हें मुझसे वह बात अवश्य बतलानी चाहिये, जिसके कारण गुणशालिनी पत्नीके प्रति तुम्हारी प्रीति समाप्त हो गयी है।'
पिताकी यह बात सुनकर कोसलवासियोंके आनन्दको बढ़ानेवाले उस राजकुमारने जनसमाजमें स्नेह-सनी वाणीसे कहा—'पिताजी! यह सारा समाज यथायोग्य अपने-अपने स्थानपर पधारे, कल प्रातःकाल जो आवश्यक बात होगी, मैं आपसे निवेदन करूँगा।' रात्रिके समाप्त होनेपर प्रातःकाल दुन्दुभियोंके शब्दोंसे तथा सूत, मागध एवं वन्दीजनोंकी वन्दनाओंसे कोसलनरेश जगाये गये। इतनेमें ही कमलके समान आँखोंवाला वह
अध्याय १२६ ] कुब्जाम्रकतीर्थ (हृषीकेश)-का माहात्म्य, रैभ्यमुनिपर भगवत्कृपा २१९
महान् यशस्वी राजकुमार भी स्नान कर मङ्गलद्रव्योंसहित राजद्वारपर उपस्थित हुआ। द्वारपालने राजाके पास पहुँचकर इसकी सूचना दी और कहा—‘महाराज! आपके दर्शनकी लालसासे राजकुमार दरवाजेपर उपस्थित हैं।’ उसकी बात सुनकर कोसलनरेश बोले—‘कञ्चुकिन्! मेरे साधुवादी पुत्रको यहाँ शीघ्र लाओ।’
नरेशके ऐसा कहनेपर उनकी आज्ञाके अनुसार द्वारपालने राजकुमारका वहाँ प्रवेश करा दिया। विनीत एवं शुद्धहृदय राजकुमारने पिताके महलमें जाकर उनके चरणोंमें सिर झुकाकर प्रणाम किया। पिताने भी आनन्दपूर्वक राजकुमारको ‘जयजीव’ कहकर दीर्घजीवी होनेका आशीर्वाद दिया और उन्होंने हँसकर अपने पुत्र राजकुमारसे कहा—‘शुभोदय! मैंने पहले तुमसे जो पूछा था, वह बात बताओ।’ तब राजकुमारने अपने पितासे कहा—‘महाराज! इसके बतलानेसे किसी अच्छे फलकी सम्भावना नहीं है, राजेन्द्र! यदि आप इसे सुननेके लिये उत्सुक ही हैं तो मेरे साथ ‘कुब्जाम्रक’ तीर्थमें चलनेकी कृपा करें। मैं इसे वहाँ चलकर आपको बतला दूँगा।’
सुनयने! उस समय राजाने पुत्रकी बात सुनकर उससे प्रेमपूर्वक कहा—‘बेटा! बहुत ठीक।’ फिर जब राजकुमार वहाँसे चला गया तो राजाने अपने उपस्थित मन्त्रिमण्डलसे मीठे स्वरमें कहा—‘मन्त्रियो! आपलोग मेरी निश्चित की हुई एक बात सुनें, इस समय हम ‘कुब्जाम्रक’ तीर्थमें जाना चाहते हैं, इसकी आपलोग शीघ्र व्यवस्था कर दें। शीघ्राति-शीघ्र हाथी, घोड़े, रथ आदि जुतवाये जायें।’ उस समय राजाकी बात सुननेके पश्चात् मन्त्रियोंने उत्तर दिया—‘महाराज! आप इन सबोंको तैयार ही समझें।’
इसके बाद बड़े पुत्रकी अनुमतिसे राजाने अपने छोटे पुत्रको राज्यपर अभिषिक्त कर दिया और राजधानीसे चलकर सम्पूर्ण द्रव्यों तथा अन्तःपुरकी स्त्रियोंके साथ वे लोग बहुत दिनोंके बाद ‘कुब्जाम्रक’ नामक तीर्थमें पहुँचे। वहाँ पहुँचकर उन्होंने उस तीर्थके नियमोंका पालन करते हुए अन्न-वस्त्र, सुवर्ण-गौ, हाथी-घोड़े और पृथ्वी आदि बहुत-से दान किये। इस प्रकार बहुत दिन व्यतीत हो जानेपर एक दिन राजाने राजकुमारसे पूछा—‘वत्स! अब वह गोपनीय बात बताओ। तुमने कुल, शील और गुणोंसे सम्पन्न मेरी इस निर्दोष सुन्दरी पुत्रवधूका क्यों परित्याग कर दिया है?’ इसपर राजकुमारने कहा—‘इस समय आप शयन करें, प्रातःकाल यह सब बातें मैं आपको बतला दूँगा।’
रात बीत जानेके बाद प्रातःकाल सूर्योदय होनेपर राजकुमारने गङ्गामें स्नानकर रेशमी वस्त्र धारण करके विधिपूर्वक मेरी पूजा की। तत्पश्चात् उस गुरुवत्सल राजकुमारने पिताकी प्रदक्षिणा कर यह वचन कहा—‘पिताजी! आइये, हमलोग वहाँ चलें, जहाँकी आप गोपनीय बातें पूछ रहे हैं। इसके बाद राजा, राजकुमार और कमलके समान नेत्रोंवाली वह राजकुमारी—सभी उस निर्माल्यकूटके पास पहुँचे, जहाँ वह पुरानी घटना घटी थी। राजपुत्र उस स्थानपर पहुँचकर अपने पिताके दोनों चरणोंको पकड़कर कहने लगा—‘महाराज! पूर्वजन्ममें मैं एक नेवला था और यहींसे थोड़ी ही दूरपर एक केलेके वृक्षके नीचे मेरा निवास था। एक दिन कालके चंगुलमें फँसकर मैं इस ‘निर्माल्य-कूट’ पर चला आया, जहाँ सुगन्धित द्रव्यों और विविध पुष्पोंको खाती
२२० संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १२६
हुई एक भयंकर विषवाली सर्पिणी विचर रही थी। उसे देखकर मुझे क्रोध आया और फिर सहसा मैंने उसपर आक्रमण कर दिया। महाराज! इस प्रकार उसके साथ मेरा भयंकर युद्ध आरम्भ हो गया। उस दिन माघमासकी द्वादशी तिथि थी। किसीने भी हमलोगोंको नहीं देखा। उस समय यद्यपि मैं युद्ध करते हुए अपने शरीरकी रक्षापर भी ध्यान रखता था; फिर भी उस सर्पिणीने मेरी नाकके छिद्रमें डँस लिया। इस प्रकार विषदिग्ध होनेपर भी मैंने उस सर्पिणीको मार ही डाला। अन्ततः हम दोनोंकी मृत्यु हो गयी। इसके बाद मैं आप (कोसलदेश राजा)-के घरमें एक राजपुत्रके रूपमें उत्पन्न हुआ। राजन्! यही कारण है कि क्रोधवश मैंने उस सर्पिणीको मार डाला था।'
राजकुमारकी बात समाप्त होते ही राजकुमारी भी कहने लगी—'महाराज! मैं ही पूर्वजन्ममें इस 'निर्माल्यकूट'-क्षेत्रमें रहनेवाली वह सर्पिणी थी। उस लड़ाईमें मरकर मैं प्राग्ज्योतिषनरेशके यहाँ कन्याके रूपमें उत्पन्न होकर आपकी पुत्रवधू हुई। राजन्! मेरी मृत्युके कारणभूत प्राक्तन तमोमय संस्कारोंकी स्मृति मेरे जीवात्मापर बनी थी, अतः मैंने भी उस नेवलेको मार डाला। प्रभो! यही वह गोपनीय रहस्य है।'
वसुंधरे! इस प्रकार पुत्रवधू और पुत्रकी बात सुनकर राजा सर्वथा निर्विण्ण हो गये और वे वहाँसे पुनः 'माया-तीर्थ' में चले गये और वहीं उनके जीवनका अन्त हुआ। उस राजकुमारी तथा राजकुमारने भी 'पुण्डरीक-तीर्थ' में पहुँचकर मनका निग्रहकर प्राणोंका त्याग किया और वे उस श्रेष्ठ स्थानपर पहुँच गये, जहाँ भगवान् जनार्दन सदा विराजमान रहते हैं। इस प्रकार राजा, राजकुमार और यशस्विनी राजकुमारी कठिन तपके द्वारा कर्मबन्धनको विच्छिन्न कर श्वेतद्वीपमें पहुँचे और उनका सारा परिवार भी महान् पुण्यके द्वारा परम सिद्धिको प्राप्तकर श्वेतद्वीप पहुँच गया।
देवि! यह मैंने तुमसे 'कुब्जाम्रक'-तीर्थकी महिमा बतलायी। इसका वर्णन मैंने उन ब्राह्मण-श्रेष्ठ रैभ्यसे भी किया था। यह बहुत पवित्र प्रसङ्ग है। चारों वर्णोंका कर्तव्य है कि वे इसका पठन एवं चिन्तन करें। इसे मूर्ख, गोहत्या करनेवाले, वेद-वेदाङ्गके निन्दक, गुरुसे द्वेष करनेवाले और शास्त्रोंमें दोष देखनेवाले व्यक्तिके सामने कभी नहीं कहना चाहिये। इसे भगवान्के भक्तों तथा वैष्णव-दीक्षा-सम्पन्न पुरुषोंके सामने ही कहना चाहिये। पृथ्वि! जो प्रातःकाल उठकर इसका पाठ करता है, वह अपने कुलके आगे-पीछेकी दस-दस पीढ़ियोंको तार देता है। देवि! अपने भक्तोंकी सुख-प्राप्तिके लिये मैंने 'कुब्जाम्रक-तीर्थ' के अन्तर्वर्ती स्थानोंका वर्णन किया, अब तुम दूसरी कौन-सी बात पूछना चाहती हो, वह कहो।
[ अध्याय १२६]
१११- राजाके अन्न-भक्षणका प्रायश्चित्त
अध्याय १२७] 'दीक्षासूत्र' का वर्णन २२१
'दीक्षासूत्र' का* वर्णन
सूतजी कहते हैं—इस प्रकार अनेक धर्मोंको सुनकर बहुतोंको मुक्ति सुलभ हो जाय, इस उद्देश्यसे पृथ्वीने भगवान् जनार्दनसे पूछा— भगवन् ! 'मायातीर्थ'की महिमा बड़ी अद्भुत है। इसके माहात्म्य-श्रवणसे मेरा अन्तःकरण शुद्ध हो गया। अब प्राणियोंके कल्याण तथा विश्वकी रक्षाके लिये आप कृपाकर मुझे अपनी दीक्षाविधिका उपदेश करें।
भगवान् वराह बोले—देवि! तुमने जो भागवती दीक्षाके विषयमें पूछा है, अब उसे बताता हूँ, सुनो। यह दीक्षा कर्ममय संसारसे मुक्त और सर्वसुख प्रदान करनेवाली है। इस दीक्षाका रहस्य योगव्रतमें स्थित रहनेवाले देवतातक भी नहीं जानते। इस मङ्गलमय धर्मका रहस्य केवल मैं ही जानता हूँ। देवि! उत्तम दीक्षा वह है, जिसके प्रभावसे मुझमें मन लगाकर मनुष्य सुखपूर्वक गर्भवासरूप संसार-समुद्रसे पार पा जाता है। इसके लिये साधकको चाहिये कि वह गुरुके समीप जाकर उनसे प्रार्थना करे कि 'गुरुदेव! मैं आपका शिष्य होना चाहता हूँ, आप मुझे दीक्षा देनेकी कृपा कीजिये।' फिर उनकी आज्ञासे दीक्षाके उपयोगी पदार्थों—धानका लावा, मधु, कुश, घृत, चन्दन, पुष्प, दीप-धूप-नैवेद्य, काला मृगचर्म, पलाशका दण्ड, कमण्डलु, कलश, वस्त्र, खड़ाऊँ, स्वच्छ यज्ञोपवीत, अर्घ्यपात्र, चरुस्थाली, दर्वी, तिल-यव, अनेक प्रकारके फल, दीक्षित पुरुषोंके खानेयोग्य अन्न, तथा पीनेयोग्य तीर्थोंके जल आदि वस्तुओंको लाकर एकत्र करे। साथ ही आवश्यक (उपयोगी) विविध प्रकारके बीज, रत्न, एवं काच आदि पदार्थोंको भी एकत्र कर ले।
तदनन्तर माङ्गलिक द्रव्य लगाकर स्नान करे और गुरुके चरणोंको पकड़कर उनसे आज्ञा लेकर एक बड़ी वेदीका निर्माण करे। यदि दीक्षा लेनेवाला व्यक्ति ब्राह्मण हो तो उसे चाहिये कि वह सोलह हाथ लम्बी-चौड़ी चौकोर वेदी बनाकर उसके ऊपर कलशकी स्थापना करे। धान्यके ऊपर नवीन एवं सुदृढ़ कलशकी विधिपूर्वक स्थापना कर वेदमन्त्रोंका उच्चारण करके उसमें जल भर दे और फिर पुष्पों तथा पल्लवोंसे उसे अलंकृत कर दे। तत्पश्चात् उसपर विधिपूर्वक तिलोंसे भरा हुआ एक पात्र स्थापित कर गुरुमें मेरी भावना करके पहलेसे एकत्र किये हुए द्रव्योंके द्वारा उनकी विधिपूर्वक पूजा करे। गुरुके प्रति निश्चितरूपसे धर्मको जानने तथा पालन करनेवाला शिष्य पुरुष उनकी सविधि पूजाकर पूर्वोक्त निर्दिष्ट द्रव्योंको उस वेदीपर स्थापित करे। सुन्दरि! फिर चारों भागोंमें जलसे भरे हुए चार कलशोंको आमके पल्लवोंसे पूर्णकर ब्राह्मणोंको दानार्थ संकल्प कर दे। इसके बाद वेदीको श्वेत सूतोंद्वारा सब ओरसे घेर दे और चारों पार्श्वभागोंमें चार पूर्णपात्र रखे। उस समय दीक्षा देनेवाले गुरुका कर्तव्य है कि उक्त कार्य सम्पन्न करके शिष्यको ऐसा मन्त्र दे, जो रुचि एवं वर्णादिके
* दीक्षाका परम श्रेष्ठ वर्णन 'कुलार्णवतन्त्र' उल्लास १४, 'शारदातिलक' पटल ४-५, 'शिवपुराण' वायवीयसंहिता, नारदपुराण अ० ९० तथा अग्निपुराण अध्याय ८१ से ९० में भी आया है। 'कल्याण' के अग्निपुराणाङ्क पृष्ठ १४३ से १५६ तककी टिप्पणियाँ पर्याप्त उपयोगी हैं।
११३- भगवान्की पूजा करते समय होनेवाले अपराधोंके प्रायश्चित्त
| २२२ | संक्षिप्त श्रीवराहपुराण | [ अध्याय १२७ |
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न्यायके अनुसार हो अथवा जिससे उसकी हार्दिक तुष्टि हो। जिसके मनमें गुरुके प्रति पवित्र भक्ति-भावना हो तथा जिस दीक्षाकी विशेष अभिलाषा हो, वह भगवान् विष्णुके मन्दिरमें जाकर नियमका पालन करते हुए सभी कार्योंको सम्पन्न करे। फिर आचार्य पूर्वाभिमुख बैठकर दीक्षाकी इच्छा रखनेवाले सभी शिष्योंको निम्नलिखित उपदेश सुनाये।
जो व्यक्ति मेरा भक्त होकर भी किन्हीं अन्य भगवद्भक्त सत्पुरुषोंको देखकर उनके लिये आदरपूर्वक उठकर स्वागत-सत्कार आदि कर्म नहीं करता, वह मानो मेरी ही हिंसा करता है। जो कन्याका दान करके अपने कर्मसे उसका उपकार नहीं करता, उसने मानो अपने पूर्वके आठ पितरोंकी हत्या कर दी। जो निष्ठुर व्यक्ति अपनी साध्वी स्त्रीका भी, जो एक प्रिय मित्रका कार्य करती है, वध करता है—वह हिंसक व्यक्ति पुनः स्त्री-योनिमें जन्म पाता है और पूर्वोक्त कर्मके प्रभावसे उसे पुनः दाम्पत्यसुखकी प्राप्ति नहीं होती। ब्राह्मणका वध करनेवाला, कृतघ्न, गोघाती—ये पापी समझे जाते हैं तथा जो अन्य पापी कहे गये हैं, वे यदि शिष्य बनकर दीक्षा लेना चाहें तो उन्हें शिष्य न बनाकर उनका परित्याग ही कर देना चाहिये।
दीक्षित पुरुषको चाहिये कि वह यदि परमसिद्धि या मोक्ष पानेकी इच्छा रखता हो या सनातन धर्मका संग्रह करना चाहता हो तो बेल, गूलर तथा उपयोगी वृक्षोंको कभी न काटे। क्या खाना चाहिये, क्या नहीं खाना चाहिये, इसे आचार्यको भी अपने शिष्यको बता देना चाहिये। गूलरका ताजा फल भक्ष्य है, पर उसका बासी फल सर्वथा अभक्ष्य है। लहसुन, प्याज आदि वस्तुएँ जिनसे दुर्गन्ध निकलती हैं, वे सभी अभक्ष्य मानी जाती हैं।
दीक्षित व्यक्तिके लिये उचित है कि वह सभी प्रकारके मांस-मछलियोंका निश्चयपूर्वक सर्वथा त्याग कर दे। उसे दूसरोंकी निन्दा और प्राणीकी हिंसा भी कभी नहीं करनी चाहिये। वह किसीकी चुगली न करे और चोरी तो सर्वथा त्याग दे। दूरसे आये हुए अतिथिको आदर-सत्कारपूर्वक भोजनादि कराना चाहिये। वह गुरु, राजा तथा ब्राह्मणकी स्त्रीके प्रति मनमें कभी बुरी भावना न करे। सुवर्ण, रत्न और युवती स्त्री—इनकी ओर चित्त न लगाये। दूसरेके उत्तम भाग्य और अपनी विपत्तिको देखकर दुःख न करे, यह सनातन धर्म है।
वसुंधरे! दीक्षाके पहले मन्त्र लेनेवाले शिष्यके प्रति गुरु इन सब बातोंका उपदेश दें। सुन्दरि! साथ ही छुरा तथा जलसे भरा हुआ एक पात्र भी रखना चाहिये, फिर मन्त्रोच्चारणपूर्वक मेरा आवाहन एवं विधिके साथ मेरा पूजन करना चाहिये।
देवि! इस प्रकार अर्घ्य एवं पाद्य देनेके उपरान्त गुरु हाथमें अस्तूरा लेकर शुद्ध भावसे यह मन्त्र पढ़े। मन्त्रका भाव यह है—'शिष्य! विष्णुमय जलकी सहायतासे तुम्हारा क्षौरकर्म किया जा रहा है। इस अवसरपर वरुण देवता तुम्हारे सिरकी रक्षा करें। यह दीक्षा संसारसे उद्धार करनेवाली है।' फिर नाई क्षौरकर्म करे और यजमान उस कलशको उस नाईको ही दे दे। नाई ऐसी सावधानीसे (सिरका) क्षौरकर्म करे कि कहीं त्वचाके कटनेसे एक विन्दु भी रक्त न निकले। इस प्रकार सविधि कृत्य सम्पन्न कर लेना चाहिये। इसके उपरान्त यजमान भगवान्में श्रद्धा रखनेवाले पुरुषोंको प्रणाम करके अग्नि प्रज्वलित करे और फिर वह धानका लावा, काला तिल, घृत और मधु—इन वस्तुओंको मिलाकर उसमें सात आहुतियाँ प्रदान करे। फिर तिल और खीरसे बीस आहुतियाँ देनी
अध्याय १२८ ] क्षत्रियादि दीक्षा, गणान्तिकादीक्षा तथा दीक्षित पुरुषके कर्तव्य २२३
चाहिये। हवनके पश्चात् घुटनोंके बल जमीनपर झुककर इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये। मन्त्रका भाव यह है—'दोनों अश्विनीकुमार, दसों दिशाएँ, सूर्य और चन्द्रमा—ये सभी इस कार्यमें साक्षी हैं। सत्यके बलपर ही पृथ्वी तथा आकाश अवलम्बित हैं। सत्यके बलसे ही सूर्य गतिशील हैं तथा पवनदेव प्रवाहित होते हैं।' तदनन्तर मन्त्रपूर्वक विधिके साथ आचार्यकी पूजा कर उन्हें प्रसन्न करना चाहिये। गुरुको भगवान्में भक्ति रखनेवाला एवं दिव्य पुरुष होना चाहिये। फिर तीन बार गुरुकी प्रदक्षिणा कर उनके चरणोंको श्रद्धापूर्वक पकड़ ले और कहे—'गुरुदेव! मैं आपकी कृपा तथा इच्छाके अनुसार 'दीक्षा-ग्रहण-कर्म' में उद्यत हुआ हूँ। मुझसे कुछ अनुचित हुआ हो तो आप उसे क्षमा करनेकी कृपा करें। फिर स्वयं वह पूरब दिशाकी ओर मुख करके बैठ जाय। इस समय गुरुकी दृष्टि केवल शिष्यपर ही रहनी चाहिये। गुरुका कर्तव्य है कि हाथमें कमण्डलु एवं यज्ञोपवीत लेकर कहे—'शिष्य! भगवान् विष्णुकी कृपासे तुम्हें यह सुअवसर प्राप्त हुआ है। साथ ही सिद्धदीक्षा और कमण्डलु—ये वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं। कर्मके प्रभावसे दीक्षासम्बन्धी इस शुभ अवसरपर तुम अपने हाथोंमें कमण्डलु ले लो। इसके बाद गुरु उसे मन्त्रकी दीक्षा दें।
दीक्षाप्राप्त पुरुष गुरुके चरणोंपर मस्तक रखकर प्रणाम करे और उनकी प्रदक्षिणा कर इस प्रकार कहे—'गुरुदेव! मैंने अब आपकी शरण प्राप्त की है। आपके द्वारा मुझे 'वैष्णवी दीक्षा' सुलभ हो गयी, यह आपकी कृपाका फल है।' फिर गुरु उसे उठाकर शुद्ध जलसे भरा कमण्डलु तथा दिव्य तन्तुओंद्वारा निर्मित एक वस्त्र शिष्यको दें। उस समय गुरुको कहना चाहिये—'वत्स! तुम यह वस्त्र तथा पवित्र जल-भरा पवित्र कमण्डलु ग्रहण करो। पुनः शिष्य गुरुको चन्दन लगाकर हाथमें मधुपर्क लेकर कहे—'भगवन्! आप पार्थिव शरीरको शुद्ध करनेवाले इस मधुपर्कको ग्रहण कीजिये।'
तत्पश्चात् शिष्यको गुरुके चरणोंको पकड़कर उन्हें यत्नपूर्वक संतुष्ट करना चाहिये। फिर मनपर संयम रखते हुए अञ्जलिको मस्तकसे लगाकर गुरुप्रदत्त मन्त्रको हृदयमें धारण करे और कहे—'भगवान्में भक्ति रखनेवाले सभी पुरुष मेरी बात सुननेकी कृपा करें। गुरुदेवने मेरी सभी कामनाओंको पूर्ण कर दिया। मैं इनका सेवक और शिष्य हो गया और ये देवताके समान मेरे गुरु हो गये।'
वसुंधरे! आगम (वैष्णव) शास्त्रोंमें ब्राह्मणकी दीक्षाकी यही विधि कही गयी है। अब जो अन्य तीन वर्णोंके लिये दीक्षाकी विधि है, वह भी मुझसे सुनो। [अध्याय १२७]
क्षत्रियादि दीक्षा एवं गणान्तिकादीक्षाकी विधि तथा दीक्षित पुरुषके कर्तव्य
भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! मैंने ब्राह्मण-दीक्षाके समय जिन वस्तुओंके संग्रहकी बात कही है, क्षत्रियको भी उन सबको एकत्र करना चाहिये। उसे केवल एक कृष्णसार मृगका चर्म नहीं लाना चाहिये। इसी प्रकार उसे पलाशके स्थानपर पीपल-वृक्षका दण्ड ग्रहण करना चाहिये और काले मृगके चर्मकी जगह काले बकरेका चर्म लेना चाहिये। उसकी दीक्षावेदी भी सोलह हाथकी जगह बारह हाथके प्रमाणकी हो। उसको गोबरसे लीप दे।
तदनन्तर गुरुके पैरोंको पकड़कर वह कहे—'विष्णो! मैंने सम्पूर्ण शस्त्रों एवं क्षत्रियके क्रूर कर्मोंका परित्याग कर दिया है और मैं अब आप विष्णुस्वरूप गुरुदेवकी शरणमें आ गया हूँ। आप जन्म-मरणरूपी संसार-सागरसे मेरा उद्धार कीजिये। इस प्रकार गुरुसे प्रार्थना कर उनमें मेरी भावना
| २२४ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १२८ |
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करते हुए उनके दोनों चरणोंको पकड़कर कहे— 'देवदेव वराह! अब मैं शस्त्रका स्पर्श करना नहीं चाहता और न अब मैं किसीकी निन्दा ही करूँगा। आपने वराहरूप धारण कर संसार-सागरसे मुक्त होनेके लिये जिन कर्मोंको करनेका निर्देश किया है, अब मैं वही करनेके लिये तत्पर हूँ। तत्पश्चात् पूर्वनिर्दिष्ट विधिके अनुसार ही अनेक प्रकारके चन्दन, धूप एवं पत्र आदि उपकरणोंसे सबकी पूजा कर दीक्षा ग्रहण करे। दीक्षा लेनेके बाद, शुद्ध भगवद्भक्त पुरुषोंको भोजन कराना चाहिये। क्षत्रियकी दीक्षाके लिये यह निश्चित विधि है।
सुन्दरि! अब वैश्यकी दीक्षाकी विधि बतलाता हूँ, वैश्य (जाति)-का साधक जिस प्रकार सिद्धि प्राप्त कर लेता है, उसे सुनो। वह भी पूर्ववत् सभी सामग्रियोंको एकत्र कर दस हाथकी चौकोर वेदी बनाये और पूर्वोक्त नियमानुसार उसे गायके गोबरसे लीप दे। फिर बकरेके चर्मसे अपने शरीरको वेष्टितकर दाहिने हाथमें गूलरका दातुन लेकर शुद्ध भगवद्भक्त पुरुषोंकी तीन बार प्रदक्षिणा करे। फिर गुरुके सम्मुख घुटनेके बल बैठकर कहे—'भगवन्! मैं वैश्य हूँ। मैं सम्पूर्ण सांसारिक प्रपञ्चोंका परित्याग कर आपकी शरणमें आया हूँ। आप प्रसन्न होकर मुझे संसार-बन्धनसे मुक्त करनेवाला मन्त्र देनेकी कृपा करें।' मेरा भक्तिरूप प्रसाद पानेकी इच्छावाला वह वैश्य इस प्रकार मेरी प्रार्थना कर गुरुके चरणोंका स्पर्श करे। साथ ही कहे—'गुरो! इस समय मैं आपकी कृपासे 'वैष्णवी दीक्षा' प्राप्त करनेके लिये प्रस्तुत हुआ हूँ।' इसके बाद भगवद्भक्त पुरुषोंके सामने उनमें देवताकी भावना करके अभिवादन करे। इसके पश्चात् जिसमें किसी प्रकारके अपराधका भागी न होना पड़े, ऐसा भोजन कराना उचित है।
पृथ्वि! अब द्विजेतरोंकी दीक्षाकी विधि बतलाता हूँ। जो यह दीक्षा लेता है, उसके फलस्वरूप सम्पूर्ण पापोंसे उसकी मुक्ति हो जाती है। दीक्षाकी इच्छा रखनेवालेको चाहिये कि सम्पूर्ण संसारके उपयोगी जिन द्रव्योंको मैं पहले कह चुका हूँ, वह भी उन्हीं सभीका सम्यक् प्रकारसे संग्रह करे और आठ हाथके प्रमाणकी चौकोर वेदी बनाकर उसे गोबरसे लीप दे। उसके लिये नीले बकरेका चर्म एवं बाँसका दण्ड तथा नीला वस्त्र ही उपयुक्त है। इस प्रकार इन वस्तुओंका संग्रह कर पूर्वोक्त विधिसे दीक्षाका कार्य सम्पन्न कर वह मेरी शरणमें आकर कहे—'भगवन्! मैंने अब अपने अपवित्र कर्म तथा अभक्ष्य-भक्षणका परित्याग कर दिया है।' फिर गुरुके चरणोंको पकड़कर कहे—'प्रभो! भगवान् श्रीहरिकी मुझपर कृपा हो गयी है। उनकी प्रसन्नतासे पहलेकी भाँति गोपनीय मन्त्र मुझे प्राप्त होनेका अवसर मिला है। आप मुझपर प्रसन्न हो जायँ।' पश्चात् चार बार गुरुकी प्रदक्षिणा कर उन्हें प्रणाम करे। फिर चन्दन एवं पुष्पसे गुरुकी पूजा कर भक्तोंको नियमके अनुसार भोजन कराये।'
वसुंधरे! दीक्षित हो जानेपर सभी वर्णोंको, जिस प्रकारके छत्र दिये जायें, यहाँ उसका स्पष्टीकरण किया जाता है। ब्राह्मणके लिये श्वेत, क्षत्रियके लिये लाल, वैश्यके लिये पीला तथा द्विजेतरके लिये नीला छत्र (छाता) देनेकी विधि है।
**पृथ्वी बोली—**केशव! सभी वर्णोंकी न्यायानुसार प्राप्त होनेवाली दीक्षा मैं सुन चुकी, अब मैं यह जानना चाहती हूँ कि आपके कर्ममें सदा संलग्न रहनेवाले दीक्षित पुरुषके कर्तव्य क्या हैं?
**भगवान् वराह बोले—**कल्याणि! तुम जो बात पूछती हो, उसका गूढ़तम सार तथा रहस्ययुक्त