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वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

१४४- साम्बको शाप लगना और उनका सूर्याराधन व्रत

अध्याय १७२-१७३ ] गोकर्णका दिव्य देवियोंसे वार्तालाप तथा मथुरामें जाना ३११


पहुँचा सकता हूँ।' गोकर्णने कहा—'पुत्र! ठीक है, यही करो तुम मथुरा जाओ और मेरी अवस्था पिताजीसे बता दो तथा वहाँसे फिर शीघ्र वापस आ जाओ।'

अब वह सुग्गा मथुरा पहुँचा और गोकर्णकी सारी स्थिति उसके पितासे बता दी। इस विषम परिस्थितिको सुनकर माता-पिताको दारुण दुःख हुआ और बहुत देरतक उनकी आँखोंसे अश्रुधारा गिरती रही। फिर उस सुग्गेके प्रति उनके मनमें बड़ा स्नेह हुआ। उन्होंने कहा—'विहंगम ! तुमने धर्मके अनुकूल (नीतिपूर्ण) वृत्तान्त कहकर हमारे जीवन-रक्षाके लिये यह बड़ा उत्तम कार्य किया है।' वसुंधरे! इस प्रकार उस पक्षीने अपनी बुद्धि एवं विद्याके बलसे पुत्र-शोकके कारण अत्यन्त दुःखी गोकर्णके वृद्ध माता-पिताको पूर्ण शान्ति प्रदान की। इधर गोकर्णके बीसों साथी भी वसुकर्णके पास प्रभूत रत्न लेकर आये। उनके पास अतुल रत्न-राशि थी, अतः वसुकर्णके प्रति उन सबने पुत्र-जैसा ही व्यवहार किया और फिर उसकी आज्ञा लेकर वे अपने-अपने घर गये। [अध्याय १७१]


गोकर्णका दिव्य देवियोंसे वार्तालाप तथा मथुरामें जाना

भगवान् वराह कहते हैं—शुभे! गोकर्णने दिव्य देवियोंके आदेशसे उस मन्दिरमें तेरह दिनोंकी आराधना आरम्भ की। इस बीच वे देवियाँ भी यथासमय आकर नृत्य करतीं! इसी बीच एक दिन गोकर्णने उन सभी देवियोंको अत्यन्त म्लान, निस्तेज और दुःखी देखा। वह सोचने लगा कि शास्त्रोंमें ठीक ही कहा गया है कि पुत्रहीन पुरुषकी सद्गति नहीं होती। अहो! मुझ पापात्माके दोषसे ये देवियाँ भी इस स्थितिमें आ गयी हैं, मानो इन्हें बुढ़ापेने घेर लिया है।' फिर साहसकर उसने उनसे उदास होनेका कारण पूछा। इसपर उन देवियोंने कहा—'महाभाग! यह बात पूछने योग्य नहीं है। सभी कार्योंमें कालात्मा उस दैवका ही हाथ है। पर गोकर्ण बार-बार आग्रहपूर्वक उन्हें प्रणाम कर इस प्रश्नको पूछता ही रहा और उनके न बतलानेपर उसने समुद्रमें डूबकर अपने प्राणत्याग करनेकी बात भी कही।

उसके ऐसा कहनेपर उन देवियोंमेंसे ज्येष्ठादेवीने कहा—'दुःख तो उसी व्यक्तिके सामने कहना चाहिये, जो उसे दूर कर सके, फिर भी बताती हूँ। मथुरा नामसे प्रसिद्ध एक दिव्य पुरी है, जिसके प्रभावसे मनुष्य मुक्ति पानेका अधिकारी बन जाता है। इस समय अयोध्यानरेश चातुर्मास्यव्रत करनेके विचारसे अपनी चतुरङ्गिणी सेनाके साथ वहीं गये हैं। वहाँ विष्णुके पाँच मन्दिर तथा अनेक फुलवारियाँ हैं, पर उनके सेवकोंने उन बगीचोंको नष्ट-भ्रष्ट कर दिया है।'

इतना कहकर वह तथा सभी देवियाँ एक साथ रोने लगीं। इससे गोकर्ण अत्यन्त दुःखी हो गया। फिर उसने उन्हें प्रणाम कर और हाथ जोड़कर सबको सान्त्वना देते हुए मधुर वाणीमें उनसे कहा—'देवियो! यदि मैं अयोध्याके राजासे मिला तो यह दुर्व्यवहार अवश्य बन्द करा दूँगा, परंतु इस समय प्रतिकूल प्रारब्धने मुझे सर्वथा वञ्चित कर रखा है।' गोकर्णके इस प्रकार कहनेपर देवियोंने उस वैश्यसे पूछा—'तुम कौन हो और कहाँसे आये हो?'

गोकर्णने अपना नाम-पता बताकर फिर उनका परिचय पूछा तो उन्होंने अपनेको 'उद्यानाधिष्ठात्री देवी' बतलाया। इसपर गोकर्णने

३१२संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १७२-१७३

उनसे पूछा—'देवियो! संसारमें बगीचा लगानेवालेको क्या फल मिलता है तथा जो कुआँ तथा देवमन्दिरका निर्माण करता है, उसे कौन-सा पुण्यफल प्राप्त होता है? आप यह सब हमें बतानेकी कृपा करें।' इसपर वे बोलीं—'आर्य! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इन द्विजाति वर्णोंके लिये धर्मका पहला साधन है—'इष्टापूर्त'का पालन करना। 'इष्ट'के प्रभावसे स्वर्ग मिलता है और 'पूर्त'से मोक्ष¹। जो पुरुष बिगड़ते हुए वापी, कुआँ, तालाब अथवा देवमन्दिरोंका जीर्णोद्धार कराता है, वह पूर्तके पुण्य-फलका भागी होता है। भूमि-दान और गोदान करनेसे पुरुषोंके लिये जो पुण्य बताया गया है, वैसा ही फल वृक्षोंके लगानेसे मानव प्राप्त कर लेते हैं। एक पीपल अथवा एक पिचुमन्द (निम्ब), एक बड़, दस फूलवाले वृक्ष, दो अनार, दो नारङ्गी और पाँच आम्रके वृक्षोंका जो आरोपण करता है, वह नरकमें नहीं जाता।² जिस प्रकार सुपुत्र कुलका उद्धार कर देता है तथा प्रयत्नपूर्वक नियमसे किया गया 'अतिकृच्छ्र' व्रत उद्धारक होता है, वैसे ही फलों और फूलोंसे सम्पन्न वृक्ष अपने स्वामीका नरकसे उद्धार कर देते हैं।'

**भगवान् वराह कहते हैं—**पृथ्वि! मालती प्रभृति पुष्प-जाति तथा वृक्षोंकी यज्ञाङ्ग-साधनभूता, फलप्रदाता छाया एवं गृहोपयोग आदिसे सम्बद्ध ज्येष्ठादेवीके साथ इस प्रकार वार्तालाप करनेके बाद गोकर्ण कहने लगा—'अहो! महान् दुःखकी बात है कि मैं अपने माता-पिताको भूल गया?' और उसे मूर्च्छा आ गयी। फिर उन देवियोंने गोकर्णके मुखपर जल छिड़के, जिससे उसकी चेतना लौटी। फिर देवियोंने उसे आश्वासन दिया और पूछा—आर्य! जहाँसे तुम आये हो, वहाँकी बातें बताओ।'

गोकर्णने कहा—'देवियो! मेरा निवास मथुरामें है, वहाँ मेरे वृद्ध माता-पिता और मेरी चार पतिव्रता पत्नियाँ भी हैं। वहाँ मेरा एक उद्यान और देवताका मन्दिर भी है।

इसपर ज्येष्ठादेवीने कहा—'अनघ! यदि तुम्हें मथुरा जानेकी उत्कट अभिलाषा है तो मैं तुम्हें वहाँ आज ही पहुँचा सकती हूँ। इससे हमें भी मथुरापुरीका दर्शन सुलभ हो जायगा। तुम इस सुन्दर विमानपर अभी बैठो और इन दिव्य रत्न, आभूषण तथा फलोंको भी साथ ले लो।' अब गोकर्ण विमानपर बैठा और भगवान् श्रीहरिको नमस्कार तथा देवियोंका अभिवादन कर मथुराके लिये प्रस्थित हुआ एवं वहाँ पहुँचकर उसने अयोध्याके राजाको वे रत्न, फल-फूल समर्पण किये। वहाँ गोकर्णको आया देखकर राजाके मनमें अपार आनन्द हुआ। उसने उसे अपने आसनपर ऐसे बैठाया, मानो किसी रत्नदाता धनी व्यक्तिको आसन दे रहा हो और बड़ा प्यार किया। अब गोकर्णने राजासे कहा—'थोड़ी देरके लिये आप इस स्थानसे बाहर चलें। अभी मैं एक आश्चर्यमय दृश्य दिखाऊँगा और आपसे कुछ निवेदन भी करूँगा।' इसका प्रबन्ध हो जानेपर वे सभी देवियाँ भी विमानसे वहाँ आ गयीं। सभी बात ज्ञात होनेपर राजाने अपनी सेना मथुरासे अयोध्या वापस कर और गोकर्णको बारंबार धन्यवाद देकर उसकी प्रशंसा कर उसे इच्छानुसार


१. देखिये पृष्ठ १८५ की टिप्पणी।
२. अश्वत्थमेकं पिचुमन्दमेकं न्यग्रोधमेकं दश पुष्पजाती:। द्वे द्वे तथा दाडिममातुलुङ्गे पञ्चाम्ररोपी नरकं न याति॥
(वराहपुराण ७२। ३९)-का यह श्लोक स्कन्दपुराण चातुर्मा० माहा० २०। ४९, भविष्यपु० पृ० ७९२ (वें०सं०), बृहत्पाराशरस्मृ० १०। ३७९ तथा पाद्मीय माघमाहात्म्य आदिमें भी प्राप्त होता है। वहाँ भी वृक्षारोपणका अतुलित माहात्म्य है।

१४५- शत्रुघ्नका चरित्र, सेवापराध एवं मथुरा माहात्म्य

अध्याय १७४ ] ब्राह्मण-प्रेत-संवाद, सङ्गम-महिमा तथा वामन-पूजाकी विधि ३१३

वर दिया। देवियाँ भी गोकर्णसे—'तुम्हारा कल्याण हो'—यों कहकर दिव्य लोकमें चली गयीं। अयोध्या-नरेशने गोकर्णको बहुत-से गाँव, अमूल्य वस्त्र, हाथी, घोड़े तथा अन्य अपार धन भी दिये। 'बाग-बगीचे लगाना परम धर्म है। इससे आश्चर्यमय महान् फलकी प्राप्ति होती है'—यह सुनकर उस नरेशने अन्य उद्यानोंके आरोपणकी भी व्यवस्था कर दी।

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! गोकर्ण न्यायका पालन करते हुए अब मथुरामें निवास करने लगा। उसने घर पहुँचकर अपने माता और पिताके चरणकमलोंमें सिर झुकाकर प्रणाम किया। उस तोतेने भी गोकर्णके माता-पिता और चारों सहधर्मिणियोंका अपने वैभव एवं शक्तिके अनुसार सम्मान करके उनकी पूजा की। मथुरामें निवास करनेवाली प्रजाको बाग लगानेकी प्रेरणा दी। फिर गोकर्णने एक यज्ञ आरम्भ किया और ब्राह्मणोंको उत्तम भोज्य एवं अन्य बहुत-से दान दिये। तोतेको हृदयसे लगाकर भली प्रकार उसने देखा और गद्गद होकर कहने लगा—'यह ऐसा जीव है, जिसकी कृपासे मुझे जीवन, सद्धर्म तथा उत्तम गतिकी प्राप्ति हुई है।'

गोकर्णने मथुरामें एक मन्दिर बनवाया और उसका नाम 'शुकेश्वर' मन्दिर रखा। उसमें 'शुकेश्वर'के नामसे एक प्रतिमा भी स्थापित की और एक अन्न-वितरण करनेकी संस्था भी खोल दी। उसमें दो सौ ब्राह्मणोंको भोजनके लिये प्रतिदिन अन्न बाँटने लगा। गोकर्णने उस संस्थाका नाम 'शुकसत्र' रख दिया। उस स्थानपर जिसकी मृत्यु होती है, वह मुक्त हो जाता है। अन्तमें वह सुग्गा भी विचित्र विमानपर चढ़कर स्वर्गलोकमें चला गया। जिस शबरकी कृपासे गोकर्णको वह तोता प्राप्त हुआ था, उसका उद्धार होनेके लिये गोकर्णने त्रिवेणी-स्नानका फल अर्पण कर दिया। अतः वह शबर अपनी पत्नीसहित स्वर्ग गया। शुकोदरके साथ ही वे सभी दिव्य विमानपर विराजमान होकर स्वर्ग गये।

वसुंधरे! इस प्रकार मैंने तुमसे मथुराके सरस्वती-सङ्गममें स्नानका, गोकर्णेश्वर शिवके दर्शनका, गोकर्ण नामक वैश्यकी अविनाशी संतानका तथा उसके सुख-सुखोपभोग और मुक्तिलाभका वर्णन कर दिया। [अध्याय १७२-१७३]


ब्राह्मण-प्रेत-संवाद*, सङ्गम-महिमा तथा वामन-पूजाकी विधि

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! त्रिवेणी-सङ्गमसे सम्बन्धित एक दूसरा प्रसङ्ग सुनो। पूर्व समयमें यहीं महानाम वनमें उत्तम व्रतका पालन करनेवाला एक 'महानाम' संज्ञक योगाभ्यासी ब्राह्मण भी रहता था। एक बार तीर्थयात्राके विचारसे उसने मथुराकी यात्रा की, मार्गमें उसे पाँच विकराल प्रेत मिले। उनसे ब्राह्मणने पूछा—'अत्यन्त भयंकर रूपवाले आपलोग कौन हैं? तथा आपलोगोंका ऐसा बीभत्स रूप किस कर्मसे हुआ है?'

अब प्रथम प्रेत बोला—'हमलोग प्रेत हैं और हमारे नाम क्रमशः 'पर्युषित', 'सूचीमुख', 'शीघ्रग', 'रोधक' और 'लेखक' हैं। इनमेंसे मैं तो स्वयं स्वादिष्ट भोजन करता और बासी अन्न ब्राह्मणको दिया करता था, इसी कारण मेरा नाम 'पर्युषित' पड़ा है। इस दूसरेके पास अन्न पानेकी इच्छासे जो ब्राह्मण आते थे उनको यह मार डालता था, अतः यह 'सूचीमुख' है। इस


* पुराणोंमें यह प्रेत-प्रसङ्ग बहुत प्रसिद्ध है और प्रायः इन्हीं नामोंसे 'वायुपुराणके 'माघमाहात्म्य' तथा स्कन्दादि पुराणोंमें भी प्राप्त होता है।

३१४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १७४

तीसरेके पास देनेकी शक्ति थी, किंतु जब कोई ब्राह्मण इससे याचना करने आता तो यह कहीं अन्यत्र ही चला जाता, अतः लोग इसे ‘शीघ्रग’ कहते हैं। चौथा माँगनेके डरसे ही अकेले सदा उद्विग्न होकर घरमें ही बैठा रहता था, अतः इसे ‘रोधक’ कहा जाता है। जो ब्राह्मणके याचना करनेपर मौन होकर सदा बैठ जाता और पृथ्वीपर रेखा खींचने लगता, वह हम सभीमें अधिक पापी है। उसका अनुगुण-नाम ‘लेखक’ पड़ा है। अभिमान करनेसे ‘लेखक’ तथा नीचे मुख करनेसे ‘रोधक’ की यह दशा हुई है। ‘शीघ्रग’ अब पङ्गुत्वका कष्ट भोगता है। ‘सूचीमुख’ इस समय उपवास करता है। उसकी गर्दन छोटी, ओठ लम्बे और पेट बहुत बड़ा है। पापसे ही हमारी ऐसी स्थिति है। विप्र! यदि तुम्हें हमारी इस स्थितिके अतिरिक्त अन्य भी कुछ सुननेकी इच्छा हो या पूछना चाहते हो तो पूछो ?

ब्राह्मणने कहा—‘प्रेतो ! पृथ्वीके सभी प्राणियोंका जीवन आहारपर ही अवलम्बित है। अतः मैं जानना चाहता हूँ कि तुम लोगोंके आहार क्या हैं?’

प्रेत बोले—‘दयालु ब्राह्मण! हमारे जो आहार हैं, उन्हें बताता हूँ, सुनो। वे आहार ऐसे हैं, जिन्हें सुनकर तुम्हें अत्यन्त घृणा होगी। जिन घरोंमें सफाई नहीं होती, स्त्रियाँ जहाँ कहीं भी थूक-खखार देती हैं और मल-मूत्र यत्र-तत्र पड़ा रहता है, उन घरोंमें हम निवास एवं भोजन करते हैं। जहाँ पञ्चबलि नहीं होती, मन्त्र नहीं पढ़े जाते, दान-धर्म नहीं होता, गुरुजनोंकी पूजा नहीं होती, भाण्ड इधर-उधर बिखरे रहते हैं, जहाँ-कहीं भी जूठा अन्न पड़ा रहता है, प्रतिदिन परस्पर लड़ाई ठनी रहती है, ऐसे घरोंसे हम प्रेत भोजन प्राप्त करते हैं। विप्रवर! तुम तपस्याके महान् धनी पुरुष हो। हम तुमसे पूछना चाहते हैं, मनुष्यको ऐसा कौन-सा काम करना चाहिये, जिससे उसे प्रेत न होना पड़े, तुम उसे हमें बतानेकी कृपा करो।’

ब्राह्मण बोला—‘एकरात्र, त्रिरात्र, चान्द्रायण, कृच्छ्र, अतिकृच्छ्र आदि व्रत करनेसे पवित्र हुए मनुष्यको प्रेतकी योनि नहीं मिलती। जो श्रद्धापूर्वक मिष्टान्न एवं जल दान करता है, जो संन्यासीका सम्मान करता है, वह प्रेत नहीं होता। पाँच, तीन अथवा एक वृक्षको भी जो नित्य जलसे पोसता है तथा जो सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करता है, वह प्रेत नहीं होता। देवता, अतिथि, गुरु एवं पितरोंकी नित्य पूजा करनेवाला व्यक्ति भी प्रेत नहीं होता। क्रोधपर विजय रखनेवाला, परम उदार, सदा संतुष्ट, आसक्तिशून्य, क्षमाशील और दानी व्यक्ति प्रेत नहीं हो सकता। जो व्यक्ति शुक्ल तथा कृष्णपक्षकी एकादशीका व्रत करता है तथा सप्तमी एवं चतुर्दशी तिथियोंको उपवास करता है, वह भी प्रेत नहीं होता। गौ, ब्राह्मण, तीर्थ, पर्वत, नदियों तथा देवताओंको जो नित्य नमस्कार करता है, उसे प्रेतकी योनि नहीं मिलती। पर जो मनुष्य सदा पाखण्ड करता, मदिरा पीता है और चरित्रहीन तथा मांसाहारी है, उसे प्रेत होना पड़ता है। जो व्यक्ति दूसरेका धन हड़प लेता है तथा शुल्क (धन) लेकर कन्या बेचता है, वह प्रेत होता है। जो अपने निर्दोष माता-पिता, भाई-बहन, स्त्री अथवा पुत्रका परित्याग कर देता है, वह भी प्रेत होता है। इसी प्रकार गो-ब्राह्मण-हत्यारे, कृतघ्न तथा भूमि और कन्यापहारी पापी व्यक्ति भी प्रेत होते हैं।’

१४६- श्राद्धसे अगस्तिका उद्धार, श्राद्ध-विधि तथा 'ध्रुवतीर्थ' की महिमा

अध्याय १७४ ] ब्राह्मण-प्रेत-संवाद, सङ्गम-महिमा तथा वामन-पूजाकी विधि [ ३१५

प्रेतोंने पूछा—‘जो मूर्खतावश सदा अधर्म तथा विरुद्ध कर्म करते हैं, ऐसे पापी व्यक्तियोंके प्रेतत्वमुक्तिके क्या उपाय हैं, आप यह बतानेकी कृपा करें।’

ब्राह्मणने कहा—‘महाभागो! बहुत पहले राजा मान्धाताके इसी प्रकार प्रश्न पूछनेपर वसिष्ठजीने उन्हें इसका उपदेश किया था। यह पुण्यमय प्रसङ्ग प्रेतोंको मुक्त कर उन्हें उत्तम गति प्रदान करता है। भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षमें श्रवण नक्षत्रसे युक्त द्वादशीमें किये गये दान, हवन और स्नान—ये सभी लाख गुना फल प्रदान करते हैं। उस दिन सरस्वती-सङ्गममें स्नानकर भगवान् वामनकी पूजाकर विधिपूर्वक कमण्डलुका दान करे। इस वामन-द्वादशीके व्रतसे मनुष्य प्रेत नहीं होता और मन्वन्तरपर्यन्त स्वर्गमें निवास करता है। तत्पश्चात् वह वेदपारगामी ‘जातिस्मर’ ब्राह्मण होता है और फिर निरन्तर ब्रह्मचिन्तन करनेसे वह मुक्त हो जाता है।’

‘‘उस दिन भगवान्के षोडशोपचार-पूजनकी विधि है। इसके लिये वह आवाहन करते हुए कहे—‘श्रीपते! आप अपने अंशसे सब जगह विराजमान रहते हैं। मुझपर कृपा करके यहाँ पधारिये और इस स्थानको सुशोभित कीजिये’। फिर—‘आप श्रवण नक्षत्रके रूपमें साक्षात् भगवान् ही हैं और आज द्वादशीको आकाशमें सुशोभित हैं। अपनी अभिलाषा-सिद्धिके लिये मैं आपको नमस्कार करता हूँ’ ऐसा कहकर श्रवण नक्षत्रका भी पूजन-वन्दन करे। फिर—‘केशव! आपकी नाभिसे कमल निकला है और यह विश्व आपपर ही अवलम्बित है, आपको मेरा प्रणाम है’—यह कहकर भगवान् वामनको स्नान कराये। ‘नारायण! आप निराकाररूपसे सर्वत्र विराजते हैं। जगद्योने! आप सर्वव्यापी, सर्वमय एवं अच्युत हैं। आपको नमस्कार’—यह कहकर चन्दनसे उनकी पूजा करे। ‘केशव! श्रवण नक्षत्र और द्वादशी तिथिसे युक्त इस पुण्यमय अवसरपर मेरी पूजा स्वीकार करनेकी कृपा कीजिये’—यह कहकर पुष्प चढ़ाये। ‘शङ्ख, चक्र एवं गदा धारण करनेवाले भगवन्! आप देवताओंके भी आराध्य हैं। यह धूप सेवामें समर्पित है’—यह कहकर धूप दे। दीपक-समर्पण करनेके लिये कहे—‘अच्युत, अनन्त, गोविन्द तथा वासुदेव आदि नामोंको अलङ्कृत करनेवाले प्रभो! आपके लिये नमस्कार है। आपकी कृपासे इस तेजद्वारा यह विस्तृत अखिल विश्व नष्ट न होकर सदा प्रकाश प्राप्त करता रहे।’ नैवेद्य-अर्पण करते हुए कहे—‘भक्तोंकी याचना पूर्ण करनेवाले भगवन्! आप तेजका रूप धारण करके सर्वत्र व्याप्त हैं। आपके लिये नमस्कार है। प्रभो! आप अदितिके गर्भमें आकर भूमण्डलपर पधार चुके हैं। आपने अपने तीन पगोंसे अखिल लोकको नाप लिया और बलिका शासन समाप्त किया था। आपको मेरा नमस्कार है।’ ‘भगवन्! आप अन्न, सूर्य, चन्द्रमा, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, यम और अग्नि आदिका रूप धारण करके सदा विराजते हैं’—यह कहकर कमण्डलु प्रदान करे। फिर ‘इस कपिला गौके अङ्गोंमें चौदह भुवन स्थित हैं। इसके दानसे मेरी मनःकामना पूर्ण हो’—यह कहकर कपिला दान करे। अन्तमें इस प्रकार कहकर विसर्जन करे—‘भगवन्! आपको देवगर्भ कहा जाता है। मैं भलीभाँति आपका पूजन कर

३१६संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १७५-१७६

चुका। प्रभो! आपको नमस्कार है।' जो विज्ञ मनुष्य श्रद्धासे सम्पन्न होकर जिस-किसी भी भाद्रपद मासमें भगवान् वामनकी इस प्रकार आराधना करेगा, उसे सफलता अवश्य प्राप्त होगी।''

ब्राह्मणने पुनः कहा—“जहाँ यमुना और सरस्वती नदीका सङ्गम हुआ है, उस 'सारस्वत' तीर्थपर जो इस विधिके साथ श्रद्धापूर्वक यह व्रत करता है, उसे सौ गुना फल प्राप्त होता है। मैंने भी श्रद्धाके साथ उस तीर्थका सेवन किया है और क्षेत्रसंन्यासीके रूपमें वहाँ बहुत दिनोंतक निवास किया है, जिससे तुमलोग मुझे अभिभूत नहीं कर पाये। इस तीर्थकी महिमा तथा इस व्रतका माहात्म्य सुननेसे तुमलोगोंका भी कल्याण होगा।''

**भगवान् वराह कहते हैं—**वसुंधरे! वह ब्राह्मण इस प्रकार कह ही रहा था कि आकाशमें दुन्दुभियाँ बज उठीं और पुष्प-वृष्टि होने लगी, साथ ही उन प्रेतोंको लेनेके लिये चारों ओर विमान आकर खड़े हो गये। देवदूतने प्रेतोंसे कहा—'इस ब्राह्मणके साथ वार्तालाप करने, पुण्यमय चरित्र सुनने तथा तीर्थकी महिमाका श्रवण करनेसे अब तुमलोग प्रेतयोनिसे मुक्त हो गये। अतः प्रयत्नपूर्वक संत-पुरुषके साथ सम्भाषण करना चाहिये।'

इस प्रकार देवतीर्थमें अभिषेक करने तथा सरस्वती-सङ्गमके पुण्यसम्पर्कमात्रसे उन दुरात्मा प्रेतोंको अक्षय स्वर्ग प्राप्त हो गया और उस तीर्थकी महिमाके श्रवणमात्रसे वे मुक्तिके भागी हो गये। तबसे यह स्थान 'पिशाचतीर्थ'के नामसे विख्यात हुआ। उन पाँचों प्रेतोंको मुक्ति देनेवाला यह प्रसङ्ग सम्पूर्ण धर्मोंका तिलक है। जो परम भक्तिके साथ तत्परतापूर्वक इस चरित्रको पढ़ता अथवा सुनता है तथा इसपर श्रद्धा करता है, वह भी प्रेत नहीं होता।

[ अध्याय १७४]


ब्राह्मण-कुमारीकी मुक्ति

**भगवान् वराह कहते हैं—**देवि! अब कृष्ण (मानसी)-गङ्गासे* सम्बन्धित एक दूसरा प्रसङ्ग सुनो। एक समय श्रीकृष्णद्वैपायनमुनिने मथुरामें एक दिव्य आश्रम बनाकर बारह वर्षोंतक यमुनाकी धारामें नियमपूर्वक अवगाहनका नियम बनाया। अतः वहाँ चातुर्मास्यके लिये अनेक वेद-तत्त्वज्ञ एवं उत्तम व्रतोंके पालन करनेवाले मुनियोंका आना-जाना बना रहता। वे उनसे श्रौत, स्मार्त-पुराणादिकी अनेक शङ्काएँ पूछते और मुनि उनकी शङ्काका निराकरण करते। वहीं 'कालञ्जर' नामसे प्रसिद्ध तीर्थ है, जिसके प्रधान देवता शिव हैं। उनका दर्शन करनेसे ही 'कृष्णगङ्गा' में स्नान करनेका फल प्राप्त होता है।

इसी बीच ध्यानयोगमें सदा संलग्न रहनेवाले मुनिवर व्यास एक बार हिमालय पर्वतपर गये और बदरिकाश्रममें वे कुछ समयके लिये ठहर गये। उन त्रिकालदर्शी सिद्ध मुनिने अपने ज्ञाननेत्रसे 'कृष्णगङ्गा'के तटका एक बड़ा आश्चर्यजनक दिव्य दृश्य देखा, जो इस प्रकार है। नदीके उस तटपर 'पाञ्चाल'कुलका 'वसु' नामक एक ब्राह्मण रहता था। दुर्भिक्षसे पीड़ित होनेके कारण वह अपनी स्त्रीको साथ लेकर दक्षिणा-पथको गया


* 'सोमतीर्थ' और 'वैकुण्ठतीर्थ' के बीच 'कृष्ण-गङ्गा' स्थान है।

अध्याय १७५-१७६ ] ब्राह्मण-कुमारीकी मुक्ति ३१७


और शिवनदीके दक्षिणतटवर्ती एक नगरमें ब्राह्मणी-वृत्तिसे रहने लगा। वहाँ उसके पाँच पुत्र और एक तिलोत्तमा नामकी कन्या उत्पन्न हुई। कन्याका विवाह उसने किसी ब्राह्मणके साथ कर दिया। फिर वह ब्राह्मण सपत्नीक कालधर्मको प्राप्त हो गया। उस समय वह 'तिलोत्तमा' कन्या ही माता-पिताकी हड्डियाँ लेकर तीर्थयात्रियोंके साथ मथुरा आयी; क्योंकि उसने पुराणोंमें सुना था कि जिसकी हड्डी मथुराके 'अर्द्धचन्द्र'तीर्थमें गिरती है, वह सदा स्वर्गमें निवास करता है।' यह पुत्री उस ब्राह्मणकी सबसे छोटी संतान थी, जो विवाहके कुछ ही काल बाद विधवा हो गयी थी।

उन्हीं दिनों 'कान्यकुब्ज'के राजाने मथुराके गर्तैश्वर महादेवके लिये एक 'अन्न-सत्र' खोल रखा था, जहाँ निरन्तर भोजन-वितरण होता रहता था। उस नरेशके यहाँ नृत्य-गान भी होता था। यहाँ गणिकाओंके दुश्चक्रमें पड़कर वह कन्या भी उसी कर्ममें लग गयी और थोड़े ही दिनोंके बाद वह भी उस राजाकी परिजन बन गयी।

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे ! उस 'वसु' ब्राह्मणके कनिष्ठ पुत्रका नाम पाञ्चाल था, जो बड़ा रूपवान् था। वह कुछ व्यापारियोंके साथ अनेक देशों, राज्यों, पर्वतों और नदियोंको पारकर यात्रा करते हुए मथुरा पहुँचा तथा वहीं रहने लगा। एक दिन प्रातःकाल कुछ पुरुषोंके साथ स्नान करनेके लिये वहाँके उत्तम 'कालञ्जर' तीर्थमें गया और स्नानकर श्रेष्ठ वस्त्र एवं अलङ्कारोंसे अलङ्कृत होकर धनके गर्वमें एक यानपर बैठकर देवताका दर्शन करनेके लिये 'त्रिगर्तेश्वर' महादेवके स्थानपर पहुँचा। वहाँ उसकी दृष्टि 'तिलोत्तमा' पर पड़ी, जिसे देखकर वह सर्वथा मुग्ध हो गया। फिर उसने उस कन्याकी धाईके द्वारा उसे कपड़ोंकी गाँठ, सैकड़ों सुवर्णके आभूषण तथा रत्नोंके हार भेंट किये। अब वह आसक्तिके कारण प्रायः उसीके घर रहता और जब आधा पहर दिन चढ़ जाता तब अपनी छावनीपर जाता तथा समीपके 'कृष्णगङ्गोद्भव' तीर्थमें स्नान करता, इस प्रकार छः महीने बीत गये। एक बार जब वह सुमन्तुमुनिके आश्रमके पास स्नान कर रहा था तो मुनिकी दृष्टि उसपर पड़ गयी। उसके शरीरमें कीड़े पड़ गये थे, जो रोम-कूपोंसे निकलकर जलमें गिर रहे थे। पर स्नान कर लेनेके बाद वह सर्वथा नीरोग हो गया। जब मुनिने इस प्रकारका दृश्य देखा तो उससे पूछा—'सौम्य ! तुम कौन हो, तुम्हारे पिता कौन हैं? कहाँके रहनेवाले हो, तुम्हारी कौन-सी जाति है तथा तुम दिन-रात किस काममें व्यस्त रहते हो? यह सब तुम मुझे बताओ।'

पाञ्चालने कहा—'मैं एक ब्राह्मणका बालक हूँ और मेरा नाम 'पाञ्चाल' है। इस समय मैं व्यापार-कार्यसे दक्षिण भारतसे यहाँ आया हूँ और प्रातःकाल यहाँ स्नानकर 'त्रिगर्तेश्वर 'महादेवका दर्शन करता हूँ। फिर कालञ्जर-क्षेत्रमें आकर आपके चरणोंका दर्शन करता हूँ। तत्पश्चात् छावनीमें लौट जाता हूँ।'

मुनिने कहा—'ब्राह्मण ! तुम्हारे शरीरमें मैं प्रतिदिन एक महान् आश्चर्यकी बात देखता हूँ। तुम्हारा शरीर स्नानके पहले कृमिपूर्ण और स्नान कर लेनेपर स्वच्छ एवं प्रकाशमय बन जाता है। तुम किसी पाप-प्रपञ्चमें पड़े हो, जो इस तीर्थमें स्नान करनेके प्रभावसे दूर हो जाता है। अब तुम सोच-विचारकर उसका पता लगाकर मुझे बताओ।'

इसपर पाञ्चालने उस कन्याके घर जाकर उससे एकान्तमें आदरपूर्वक पूछा—'सुभगे ! तुम किसकी पुत्री हो और तुम्हारा कौन-सा देश है?

३१८संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १७५-१७६

एवं यहाँ कैसे आयी तथा रहती हो ?

उस समय पाञ्चालके अनुरोधपूर्वक पूछनेपर भी उस कन्याने उसका कुछ उत्तर नहीं दिया। कुछ समय बाद पाञ्चालने कहा—‘देखो, अब तुम यदि सच्ची बात नहीं कहोगी तो मैं अपने प्राणोंका त्याग कर दूँगा।’ उसके इस निश्चयको देख उस कन्याने अपने माता-पिता, भाई, देश, जाति और कुल सबका यथावत् परिचय देते हुए बतलाया कि ‘मेरे पिताके पाँच पुत्र और मैं—ये छः संतानें हुई थीं, जिनमें सबसे छोटी संतान मैं ही हूँ। विवाहके बाद मेरे पतिदेवका शीघ्र ही देहान्त हो गया। पाँचों भाइयोंमें जो सबसे छोटा था, वह धनकी तृष्णासे बचपनमें ही व्यापारियोंके साथ विदेश चला गया। उसके चले जानेपर मेरे माता-पिता मर गये। अतएव कुछ सहायकोंका साथ पाकर मैं इस तीर्थमें उनके अस्थिप्रवाहके लिये चली आयी। यहाँ कुछ गणिकाओंके कुचक्रमें पड़कर मेरी यह दशा हुई। मैंने कुलटा स्त्रियोंका धर्म अपनाकर अपने कुलको नष्ट कर दिया। यही नहीं, मातृ-पितृ और पति—इन तीनों कुलोंके इक्कीस पीढ़ियोंको घोर नरकमें गिरा दिया।’

इस प्रसङ्गको सुनकर पाञ्चालको तो मूर्च्छा आ गयी और वह भूमिपर गिर पड़ा। वहाँ उपस्थित स्त्रियाँ दीनवदना उस ब्राह्मणकुमारीको समझा-बुझाकर पाञ्चालके चारों ओर खड़ी हो गयीं और फिर अनेक प्रकारके उपायोंका प्रयोग कर उन सबोंने उसकी मूर्च्छाको दूर किया। जब उसके शरीरमें चेतना आयी तो उन्होंने उससे बेहोशीका कारण पूछा। इसपर उस ब्राह्मणकुमारने अपना सारा वृत्तान्त कह सुनाया। फिर इस पापसे उसके मनमें घोर चिन्ता व्याप्त हो गयी और वह प्रायश्चित्तकी बात सोचने लगा। उसने कहा—

‘मुनियोंने विचार करके यह आदेश दिया है कि यदि कोई द्विजाति ब्राह्मणकी हत्या कर दे अथवा मदिरा पी ले तो उसका प्रायश्चित्त शरीरका परित्याग ही है। माता, गुरुकी पत्नी, बहन, पुत्री, और पुत्रवधूसे अवैध सम्बन्ध रखनेवालेको जलती अग्निमें प्रवेश कर जाना चाहिये। इसके अतिरिक्त उसकी शुद्धिके लिये दूसरा कोई उपाय नहीं है।’

जब पाञ्चालीने अपने बड़े भाईके मुखसे ही मुनिकथित यह प्रायश्चित्त सुना तो उसने भी अपने सौभाग्यके सम्पूर्ण आभूषण, रत्न-वस्त्र, धन और धान्य आदि जो कुछ भी वस्तुएँ संचित कर रखी थीं, वह सब-का-सब ब्राह्मणोंमें बाँट दिया। साथ ही बताया कि ‘इस द्रव्यसे कालञ्जरका शृङ्गार तथा एक उद्यानका निर्माण कराया जाय।’ फिर उसने सोचा—‘अपनी आत्म-शुद्धिके लिये ‘कृष्णगङ्गोद्भवतीर्थ’में चलकर विधिपूर्वक चितारोहण करूँ।’

उधर पाञ्चाल भी सुमन्तुमुनिके पास पहुँच कर उन्हें प्रणामकर मृत्युके उपयोगी कर्मोंका सम्पादन कर मथुराके निवासी ब्राह्मणोंको बुलाकर उन्हें भलीभाँति दान देकर अपनी शेष सम्पूर्ण धनराशि सत्र खोलनेके लिये दे दी और विधिके अनुसार अपनी और्ध्वदैहिक संस्कारके लिये भी व्यवस्था कर ली। ‘कृष्णगङ्गा’में स्नानकर उसने इष्टदेवका दर्शनकर, उन्हें प्रणाम किया और सुमन्तुमुनिके चरणोंको पकड़कर प्रार्थना की—‘भगवन्! मैं अगम्या-गमनके दोषसे महान् पापी बन गया हूँ। मुझ कुलनाशकका स्वभगिनीके साथ ही दुर्योगसे अवैध सम्बन्ध हो गया। अब मैं अपने शरीरका त्याग करना चाहता हूँ। आप आज्ञा दें।’

इस प्रकार सुमन्तुमुनिको अपना पाप सुनाकर चितापर घृत छिड़क कर वह अग्निमें प्रवेश

१४७- काष्ठ-पाषाण प्रतिमाके निर्माण, प्रतिष्ठा एवं पूजाकी विधि

अध्याय १७७ ] साम्बको शाप लगना और उनका सूर्याराधन-व्रत ३१९

करना ही चाहता था कि सहसा आकाशवाणी हुई—'ऐसा दुःसाहस मत करो; क्योंकि तुम दोनोंके पाप सर्वथा धुल गये हैं। जहाँ स्वयं भगवान् श्रीकृष्णने सुखपूर्वक लीला की है तथा जो स्थान उनके चरणके चिह्नसे चिह्नित है, वह तो ब्रह्मलोकसे भी श्रेष्ठ है। दूसरी जगहके किये हुए पाप इस तीर्थमें आते ही नष्ट हो जाते हैं। मनुष्य 'गङ्गा-सागर'में एक बार स्नान करनेसे ब्रह्महत्या-जैसे पापसे छूट जाता है। पृथ्वीपर जितने तीर्थ हैं, उन सभी तीर्थोंमें स्नान करनेसे जो फल मिलता है, वैसा ही फल 'पञ्चतीर्थ'में स्नान करनेसे मिल जाता है—इसमें कोई संशय नहीं। शुक्ल और कृष्णपक्षकी एकादशियोंको विश्रान्ति-तीर्थमें, द्वादशीको 'सौकरव' तीर्थमें, त्रयोदशीको नैमिषारण्यमें, चतुर्दशीको प्रयागमें तथा कार्तिकी एकादशीको पुष्करमें स्नान करना चाहिये। इससे सारे पाप दूर हो जाते हैं।'

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! इस प्रकारकी आकाशवाणीको सुनकर पाञ्चालने सुमन्तुसे पूछा—'मुने! आप मुझे यह बतानेकी कृपा करें कि मैं आगमें प्रवेश करूँ या 'त्रिरात्र', 'कृच्छ्र' या 'चान्द्रायण' व्रत करूँ?'

मुनिने आकाशवाणीकी बातोंपर विश्वासकर उसे शुद्ध धर्माचरणका आदेश दिया। देवि! जो मनुष्य श्रद्धासे इस माहात्म्यका श्रवण एवं पठन करेगा, वह कभी भी पापसे लिप्त नहीं हो सकता, साथ ही उसके सात जन्म पहलेके भी किये हुए पाप दूर भाग जाते हैं और वह जरा-मरणसे मुक्त होकर स्वर्गलोकको चला जाता है।

[ अध्याय १७५-१७६ ]

साम्बको शाप लगना और उनका सूर्याराधन-व्रत

भगवान् वराह कहते हैं—शुभाङ्गि! अब मैं श्रीकृष्णकी कथाका वह अद्भुत प्रसङ्ग कहता हूँ, जो द्वारकापुरीमें घटित हुआ था। साथ ही साम्बके शापकी बात भी सुनो। एक बार जब भगवान् सानन्द द्वारकामें विराजमान थे तो नारदमुनि वहाँ पधारे। श्रीभगवान्ने उन्हें आसन, अर्घ्य, पाद्य मधुपर्क एवं गौ समर्पण किये। तदनन्तर मुनिने उन्हें यह सूचना दी—कि 'मैं आपसे एकान्तमें कुछ कहना चाहता हूँ और एकान्तमें उन्होंने कहा—'प्रभो! आपका नवयुवक पुत्र साम्ब बड़ा वाग्मी, रूपवान्, परम सुन्दर तथा देवताओंमें भी आदर पानेवाला है। देवेश्वर! आपकी देवतुल्य हजारों स्त्रियाँ भी उसको देखकर क्षुब्ध हो जाती हैं। आप साम्बको और उन देवियोंको यहाँ बुलाकर परीक्षा करें कि वस्तुतः क्षोभ है या नहीं।'

इसके पश्चात् सभी स्त्रियाँ तथा साम्ब श्रीकृष्णके सामने आये और हाथ जोड़कर बैठ गये। क्षणभरके बाद साम्बने पूछा—'प्रभो! आपकी क्या आज्ञा है?' वस्तुतः साम्बकी सुन्दरताको देखकर श्रीकृष्णके सामने ही उन स्त्रियोंके मनमें क्षोभ उत्पन्न हो गया था।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—'देवियो! अब तुम सभी उठो और अपने स्थानको जाओ।' श्रीकृष्णकी आज्ञा पाकर वे देवियाँ अपने-अपने स्थानको चली गयीं। पर साम्ब वहीं बैठे रहे। उनके शरीरमें कँपकँपी बँध रही थी। श्रीकृष्णने कहा—'नारदजी! स्त्रियोंका स्वभाव बड़ा ही विलक्षण है।'

नारदजीने कहा—'प्रभो! इनकी इस प्रवृत्तिसे सत्यलोकमें भी आपकी निन्दा हो रही है, अतः

३२०संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १७७

अब साम्बका परित्याग करना ही उचित है। भगवन्! संसारमें आपकी तुलना करनेवाला दूसरा कौन पुरुष है? आप ही इसे कर सकते हैं।'

वसुंधरे! नारदके इस कथनपर श्रीकृष्णने साम्बको रूपहीन होनेका शाप दे दिया, जिससे साम्बके शरीरमें कुष्ठ-रोग हो गया और उनके शरीरसे दुर्गन्धयुक्त रक्त गिरने लगा। अब उनका शरीर ऐसा दिखायी पड़ने लगा, मानो कोई छिन्न-भिन्न अङ्गवाला पशु हो। फिर नारदजीने ही साम्बको शापसे छूटनेके लिये सूर्यकी आराधनाका उपदेश दिया और साथ ही कहा—'जाम्बवतीनन्दन! तुम्हें वेद और उपनिषदोंमें कहे हुए मन्त्रोंका उच्चारण करके विधिके अनुसार सूर्य-नमस्कार करना चाहिये। इससे वे संतुष्ट हो जायेंगे।' फिर सूर्यसे तुम्हारा समुचित संवाद होगा, जिस प्रसङ्गको लेकर 'भविष्यपुराण' निर्मित होगा। उसे मैं ब्रह्माजीके लोकमें जाकर उनके सामने सदा पाठ करूँगा। फिर सुमन्तुमुनि मर्त्यलोकमें मनुके सामने उसका कथन करेंगे। इस प्रकार उसका सभी लोकोंमें प्रचार-प्रसार होगा।'

साम्बने कहा—'प्रभो! मेरी स्थिति तो ऐसी है, मानो मांसका एक पिण्ड हो। फिर उदयाचलपर मैं जा ही कैसे सकता हूँ। यह आपकी ही कृपा है कि मुझे यह दुःख भोगना पड़ रहा है, नहीं तो तत्त्वतः मैं बिल्कुल दोषरहित था।'

नारदजी बोले—'साम्ब! उदयाचलपर जाकर सूर्यकी आराधना करनेसे जैसा फल मिलता है, वैसा ही फल मथुराके 'षट्सूर्य-तीर्थ'पर सुलभ हो जाता है। यहाँ भगवान् सूर्यकी प्रतिमाओंका प्रातः, मध्याह्न एवं सायंकालमें जो पूजा करता है, वह तुरंत ही साम्राज्य-जैसा फल प्राप्त कर सकता है। प्रातः, मध्याह्न और सायं—इन तीनों पवित्र समयोंमें सूर्यमन्त्रका जप तथा उच्चस्वरसे उनके स्तोत्रपाठसे सारे पाप धुलकर कुष्ठ आदि रोगोंसे भी मुक्ति मिल जाती है।'

**भगवान् वराह कहते हैं—**वसुंधरे! मुनिवर नारदके ऐसा कहनेपर महाबाहु साम्बने श्रीकृष्णसे आज्ञा प्राप्त करके भुक्तिमुक्ति फल देनेवाली मथुरामें आकर देवर्षि नारदकी बतायी विधिके अनुसार प्रातः, मध्याह्न और सायंकालमें उन षट्सूर्योंकी पूजा एवं दिव्य स्तोत्रद्वारा उपासना आरम्भ कर दी। भगवान् सूर्यने भी योगबलकी सहायतासे एक सुन्दर रूप धारण कर साम्बके सामने आकर कहा—'साम्ब! तुम्हारा कल्याण हो! तुम मुझसे कोई वर माँग लो। मेरे कल्याणकारी व्रत एवं उपासनापद्धतिके प्रचारके लिये भी इसे करना परम आवश्यक है। मुनिवर नारदने तुम्हें जो स्तोत्र बताया है और जिसे तुमने मेरे सामने व्यक्त किया है, उस तुम्हारी 'साम्बपञ्चाशिका'-स्तुतिमें वैदिक अक्षरों एवं पदोंसे सम्बद्ध पचास श्लोक हैं। वीर! नारदजीद्वारा निर्दिष्ट इन श्लोकोंद्वारा तुमने जो मेरी स्तुति की है, इससे मैं तुमपर पूर्ण संतुष्ट हो गया हूँ।'

वसुधे! यह कहकर भगवान् सूर्यने साम्बके सम्पूर्ण शरीरका स्पर्श किया। उनके छूते ही साम्बके सारे अङ्ग सहसा रोगमुक्त होकर चमक उठे। फिर तो वे ऐसे विद्योतित होने लगे, मानो दूसरे सूर्य ही हों। उसी समय याज्ञवल्क्यमुनि माध्यन्दिन-यज्ञ करना चाहते थे। भगवान् सूर्य साम्बको लेकर उनके यज्ञमें पधारे और वहाँ साम्बको 'माध्यन्दिन-संहिता'का अध्ययन कराया। तबसे साम्बका भी एक नाम 'माध्यन्दिन' पड़ गया। 'वैकुण्ठक्षेत्र'के पश्चिमभागमें यह यज्ञ सम्पन्न हुआ था। अतएव इस स्थानको 'माध्यन्दिनीय' तीर्थ कहते हैं। वहाँ स्नान एवं दर्शन करनेके प्रभावसे मानव समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता

अध्याय १७८-१७९ ] शत्रुघ्नका चरित्र, सेवापराध एवं मथुरामाहात्म्य [ ३२१

है। साम्बके प्रश्न करनेपर सूर्यने जो प्रवचन किया, वही प्रसङ्ग 'भविष्यपुराण'के नामसे प्रख्यात पुराण बन गया। यहाँ साम्बने 'कृष्णगङ्गा'के दक्षिण तटपर मध्याह्नके सूर्यकी प्रतिमाकी प्रतिष्ठा की। जो मनुष्य प्रातः, मध्याह्न और अस्त होते समय इन सूर्यदेवका यहाँ दर्शन करता है, वह परम पवित्र होकर ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है।

इसके अतिरिक्त सूर्यकी एक दूसरी उत्तम प्रातःकालीन विख्यात प्रतिमा भगवान् 'कालप्रिय' नामसे प्रतिष्ठित हुई। तदनन्तर पश्चिमभागमें 'मूलस्थान'में अस्ताचलके पास 'मूलस्थान'नामक प्रतिमाकी प्रतिष्ठा हुई। इस प्रकार साम्बने सूर्यकी तीन प्रतिमाएँ स्थापित कर उनकी प्रातः, मध्याह्न एवं संध्या—तीनों कालोंमें उपासनाकी भी व्यवस्था की*। देवि! साम्बने 'भविष्यपुराण'में निर्दिष्ट विधिके अनुसार भी अपने नामसे प्रसिद्ध एक मूर्तिकी यहाँ स्थापना करायी। मथुराका वह श्रेष्ठ स्थान 'साम्बपुर'के नामसे प्रसिद्ध है। सूर्यकी आज्ञाके अनुसार वहाँ रथ-यात्राका प्रबन्ध हुआ। माघ मासकी सप्तमी तिथिके दिन जो सम्पूर्ण राग-द्वेषादि द्वन्द्वोंसे मुक्त मानव उस दिव्य स्थानमें रथ-यात्राकी व्यवस्था करते हैं, वे सूर्यमण्डलका भेदन कर परमपद प्राप्त करते हैं। देवि! साम्बके शापका यह प्रसङ्ग मैंने तुम्हें बतलाया। इसके श्रवणसे सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।

[ अध्याय १७७]


शत्रुघ्नका चरित्र, सेवापराध एवं मथुरामाहात्म्य

भगवान् वराह कहते हैं—देवि! प्राचीन समयकी बात है—मथुरामें लवण नामक एक राक्षस था। ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये महात्मा शत्रुघ्नने उसका वध किया था। उस स्थानकी बड़ी महिमा है। मार्गशीर्षकी द्वादशी तिथिके अवसरपर वहाँ संयमपूर्वक पवित्र रहकर स्नान करना और शत्रुघ्नके चरित्रका वर्णन करना चाहिये। लवणासुरके वध करनेसे शत्रुघ्नको अपने शरीरमें पापकी आशङ्का हो गयी थी। उसे दूर करनेके लिये उन्होंने सुस्वादु अन्नोंसे ब्राह्मणोंको तृप्त किया था। इस समाचारसे भगवान् श्रीरामको अत्यन्त आनन्द मिला था। अतः अपनी सेनाके साथ अयोध्यासे यहाँ आकर उन्होंने इसके उपलक्ष्यमें महान् उत्सव किया। अगहन मासके शुक्ल पक्षकी दशमी तिथिके दिन भगवान् राम मथुरा पहुँचे थे और वहाँ एकादशी तिथिके पुण्य-अवसरपर उपवास करके 'विश्रान्ति-तीर्थ'में सपरिवार स्नान कर महान् उत्सव मनाया। फिर ब्राह्मणोंको तृप्त करके स्वयं भोजन किया। उस दिन जो वहाँ उत्सव मनाता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पितरोंके साथ दीर्घ कालतक अर्थात् प्रलयपर्यन्त स्वर्गलोकमें निवास करता है।


* 'वराहपुराण'का यह साम्बोपाख्यान या 'सूर्योपासनाध्याय' बड़े महत्त्वका है। इसमें सूर्यभगवान्‌के अत्यन्त दिव्य स्तोत्र 'साम्बपञ्चाशिका'-स्तुति तथा कोणार्क, उज्जयिनी एवं मुल्तानके प्राचीन भव्य सूर्य-मन्दिरोंका भी संकेत है, जिनकी प्रतिनिधिभूत अर्चाएँ मथुरामें प्रतिष्ठित थीं। इस विषयमें अल्बरूनीके 'Indica' p. 298 का—'Multān was originally called Kāśyapapura, then Hamsapur, then Bagpur, then Sambapur and then Mulsthān' यह कथन बड़े महत्त्वका है, जिसमें मुल्तान नगरके पूर्वनाम 'काश्यपपुर' या सूर्यपुर, फिर साम्बपुर तथा मूलस्थान आदि निर्दिष्ट हैं। इसीके खण्ड १ पृष्ठ ११६-७ पर अल्बरूनीने इसके मन्दिर तथा प्रतिमाध्वंसकी कथाका—'Jalam Iben shaiban, the userper, broke the idol into pieces and killed its priests.' आदि शब्दोंमें विस्तृत वर्णन किया है।

१४८- मृन्मयी एवं ताम्र-प्रतिमाओंकी प्रतिष्ठा-विधि

३२२ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १७८-१७१

भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! मन, वाणी अथवा कर्म किसी प्रकारसे भी पाप-कर्ममें रुचि रखना अपराध है। दन्तधावन न करने, राजान्न खाने, शवस्पर्श करने, सूतकवाले व्यक्तिका जल ग्रहण करने एवं उसका स्पर्श तथा मल, मूत्र, आदि क्रियाओंसे भी अपराध बन जाते हैं। अवाच्यवाणी बोलना, अभक्ष्य-भक्षण करना, पिण्याक (हींग)-को भोजनमें सम्मिलित करना, दूसरेके मलिन वस्त्र, नीले रंगवाला वस्त्र धारण करना, गुरुसे असत्य भाषण, पतित व्यक्तिका अन्न खाना तथा भोजन न देनेका भय उत्पन्न करना—ये सब सेवापराध हैं। उत्तम अन्न स्वयं खा लेना, बत्तक आदिका मांस खाना और देव-मन्दिरमें जूता पहनकर जाना भी अपराध है। देवताकी आराधनामें जिस फूलको शास्त्रमें निषिद्ध माना गया है, उसे काममें लेना, निर्माल्यको विग्रह (मूर्ति)-परसे हटाये बिना ही अस्त-व्यस्त होकर अँधेरेमें भगवान्‌की पूजा करना भी अपराध है। मदिरा पीना, अन्धकारमें इष्टदेवताको जगाना, भगवान्‌की पूजा एवं प्रणाम न करके सांसारिक काममें प्रवृत्त हो जाना—ये सभी अपराध हैं। वसुधे! इस प्रकारके तैंतीस अपराधोंको मैंने स्पष्ट कर दिया। इन अपराधोंसे युक्त पुरुष परम प्रभु श्रीहरिका दर्शन नहीं पा सकता। यदि वह दूर रहकर भी पूजा एवं नमस्कार करे तो उसका वह कर्म राक्षसी माना जाता है।

क्रमशः इनकी शुद्धिका प्रकार यह है—मैले वस्त्रसे दूषित व्यक्ति एक रात, दो रात अथवा तीन रातोंतक वस्त्र पहने ही स्नान करे और पञ्चगव्य पिये तो उसकी शुद्धि हो जाती है। नीला वस्त्र पहननेके पापसे बचनेके लिये मानव गोमयद्वारा अपने शरीरको भलीभाँति मले और 'प्राजापत्य' व्रत करे तो वह पवित्र हो जाता है। गुरुके प्रति बने हुए पापसे मुक्तिके लिये दो 'चान्द्रायण' व्रत करनेका विधान है। लोग पतितका अन्न खा लेनेपर 'चान्द्रायण'* और 'पराक' व्रत† करनेसे शुद्ध होते हैं। जूता पहनकर मन्दिरमें जानेवाला मानव 'कृच्छ्रपाद' व्रत और दो दिन उपवास करे। फूल तथा नैवेद्यके अभावमें भी पञ्चामृतसे भगवान्‌का स्नान एवं स्पर्श करके नमस्कार करनेकी विधि है। मदिरा-पानके पापसे शुद्ध होनेके लिये ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यको चाहिये कि चार 'चान्द्रायण' व्रत तथा बारह वर्षोंतक तीन 'प्राजापत्य' व्रत करे।

अथवा 'सौकरवक्षेत्र'में जाकर उपवास एवं गङ्गामें स्नान करे। उसके प्रभावसे प्राणी शुद्ध हो सकता है। ऐसे ही मथुरामें भी स्नान-उपवास करनेसे शुद्धि सम्भव है। जो मनुष्य इन दोनों तीर्थोंका उक्त प्रकारसे एक बार भी सेवन करता है, वह अनेक जन्मोंके किये हुए पापोंसे मुक्त हो जाता है। इन तीर्थोंमें स्नान, जलपान तथा भगवान्‌के ध्यान-धारणा, कीर्तन, मनन-श्रवण एवं दर्शन करनेसे भी पातक पलायन कर जाते हैं।

**पृथ्वीने पूछा—**सुरेश्वर! मथुरा और सूकर—ये दोनों ही तीर्थ आपको अधिक प्रिय हैं। पर यदि इनसे भी बढ़कर कोई अन्य तीर्थ हो तो अब उसे बतानेकी कृपा कीजिये।

**भगवान् वराह कहते हैं—**वसुधे! छोटी-


* चान्द्रायण-व्रतके अनेक भेद हैं, जैसे 'पिपीलिका', 'यवमध्य', 'शिशुचान्द्रायण' आदि। शुक्लपक्षकी प्रतिपदासे ग्रासवृद्धिपूर्वक अमावास्याको सर्वथा उपवास रहना 'यवमध्य' सर्वोत्तम चान्द्रायण है।
† १२ दिनोंका सर्वथा उपवास 'पराकव्रत' है। यतात्मनोऽप्रमत्तस्य द्वादशाहमभोजनम्। पराको नाम कृच्छ्रोऽयं सर्वपापापनोदनः॥ (मनु० ११। २१५)

अध्याय १८० ] श्राद्धसे अगस्तिका उद्धार, श्राद्ध-विधि ३२३

छोटी नदियोंसे लेकर समुद्रपर्यन्त पृथ्वीपर जितने तीर्थ हैं, उन सबमें 'कुब्जाम्रक' तीर्थ श्रेष्ठ माना जाता है। मेरी श्रद्धासे सम्पन्न सत्पुरुष सदा उनकी प्रशंसा करते हैं। कुब्जाम्रकसे भी कोटिगुना अधिक परम गुह्य 'सौकरव' तीर्थ है। एक समयकी बात है—मार्गशीर्षके शुक्ल पक्षकी द्वादशी तिथिको मैं 'सितवैष्णव' तीर्थमें गया। वहाँ पुराणोंमें श्रेष्ठ एक 'गङ्गासागरिक' नामका पुराण देखा है। इसमें मेरे मथुरामण्डलके तीर्थोंकी अत्यन्त गुह्य महिमा वर्णित है। 'सिततीर्थसे' परार्द्धगुना फल यहाँ सुलभ होता है—इसमें कोई संशय नहीं है। 'कुब्जाम्रक' प्रभृति समस्त तीर्थोंमें भ्रमण करनेके पश्चात् मैं मथुरामें आया और एक स्थानपर बैठ गया। मेरे उस स्थानका नाम 'विश्रान्तितीर्थ' पड़ गया। वह स्थान गोपनीयोंमें भी परम गोपनीय है। वहाँ स्नान करनेसे परम उत्तम फल मिलता है। गतिका अन्वेषण करनेवाले व्यक्तियोंके लिये मथुरा परम गति है। मथुरामें विशेष करके 'कुब्जाम्रक' और 'सौकर' क्षेत्रकी महिमा है। सांख्ययोग और कर्मयोगके अनुष्ठानके बिना भी इन तीर्थोंकी कृपासे मानव मुक्त हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं है। योगसे सम्पन्न विद्वान् ब्राह्मणके लिये जो गति निश्चित है, वही गति मथुरामें प्राण-त्याग करनेसे साधारण व्यक्तिको भी प्राप्त हो जाती है। सुव्रते! वस्तुतः मथुरासे उत्तम न कोई दूसरा तीर्थ है और न भगवान् केशवसे श्रेष्ठ कोई देवता है।

[ अध्याय १७८-१७९]


श्राद्धसे अगस्तिका उद्धार, श्राद्ध-विधि तथा 'ध्रुवतीर्थ' की महिमा

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! अब पितरोंसे सम्बद्ध एक दूसरा प्रसङ्ग कहता हूँ, उसे सुनो। मथुरापुरीमें पहले एक धार्मिक एवं शूर-वीर राजा थे, जिनका नाम चन्द्रसेन था। उनकी दो सौ रानियाँ थीं, जिनमें 'चन्द्रप्रभा' सबसे गुणवती थी, उसके सौ दासियाँ थीं, जिनमें एकका नाम 'प्रभावती' था। उस दासीके परिवारके पुरुष सदाचार विहीन थे। सभी मरकर दोषके कारण नरकयातनामें पड़ गये; क्योंकि उनके कुलमें एक वर्णसंकर उत्पन्न हो गया था।

देवि! एक समय वे पितर 'ध्रुवतीर्थ' में आये, जिनपर एक त्रिकालदर्शी ऋषिकी दृष्टि पड़ गयी। इनमें कुछ दिव्य रूपवाले पितर आकाश-गमनकी शक्तिसे युक्त श्रेष्ठ वाहनोंपर चढ़कर आये और अपने वंशजोंको आशीर्वाद देकर चले गये। कुछ दूसरे पितृगण जो 'ध्रुवतीर्थ' में आये, उनके श्राद्ध न होनेसे पेटमें झुर्रियाँ पड़ गयी थीं। अतः वे पुत्रोंको शाप देकर चले गये। त्रिकालज्ञ मुनि यह सब दृश्य देख रहे थे। जब पितृगण चले गये और वे मुनि अकेले आश्रममें रह गये तो एक सूक्ष्म शरीरधारी पितरने उनसे कहा—'मुने! वर्णसंकरसम्बन्धी दोषके कारण मुझे नरकमें स्थान मिला है। मैं सौ वर्षोंसे आशारूपी रस्सियोंसे बँधा प्रतीक्षा करता रहा; पर अब निराश होकर आपके पास आया हूँ। तीनों तापोंसे अत्यन्त घबराकर और विवश होकर मैं आपकी शरण आया हूँ। जिनके पुत्रोंने पिण्डदान एवं तर्पण किया है, वे पितर हृष्ट-पुष्ट होकर आकाशगमनकी शक्तिसे स्वर्गमें चले गये हैं। किंतु मैं बलहीन व्यक्ति कहीं भी नहीं जा सकता हूँ। जिनकी संतान अपने बाल-बच्चोंके साथ सदा सम्पन्न है, वे उनके द्वारा स्वधासे सुपूजित होकर परम गतिके अधिकारी होते हैं। त्रिकालज्ञ मुनिवर! आपको दिव्य दृष्टि सुलभ है। उसके प्रभावसे

३२४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १८०

आपने जिन पितरोंको स्वर्गमें जाते हुए देखा है, वे सभी आज राजा चन्द्रसेनके द्वारा सत्कृत हुए हैं।'

पितरने कहा—'जो पितरोंके लिये श्राद्ध करता है, उसका उत्तम फल निश्चित है, किंतु न करनेसे विपरीत फल सामने आता है और पितर नरकके भागी हो जाते हैं; इसमें कुछ कारण है, वह भी मैं आपको बताता हूँ; सुनें। श्राद्धसम्बन्धी जो द्रव्य उचित देश, काल और पात्रको नहीं दिया गया, विधिकी रक्षा न हुई, साथमें दक्षिणा न दी गयी तो वह प्रत्यवायका कारण हो जाता है। जो श्राद्ध श्रद्धाके साथ सम्पन्न नहीं हुआ, जिसपर दुष्ट प्राणीकी दृष्टि पड़ गयी, जिसमें तिल और कुशाका अभाव रहा एवं मन्त्र भी नहीं पढ़े गये, उस श्राद्धको असुर ग्रहण कर लेते हैं। प्राचीन समयसे ही भगवान् वामनने ऐसे श्राद्धका अधिकारी बलिको बना रखा है। ऐसे ही दशरथनन्दन भगवान् रामके द्वारा अपने गणोंके साथ क्रूर रावण जब दिवंगत हो गया तो उन त्रिभुवनभर्ता श्रीरामने कुछ ऐसे श्राद्धोंका फल त्रिजटाको भी दे दिया था। भगवान् राम जब भगवती सीताके साथ बैठे थे, सीताने उनसे कहा—'त्रिजटा आपमें भक्ति रखती थी। सीताजीकी बात सुनकर श्रीराम प्रसन्न हो गये।' अतः उन परम प्रभुने उस राक्षसीको यह वर दिया—'त्रिजटे! जिस श्राद्ध करनेवाले व्यक्तिके घर श्राद्धकी उत्तम हविष् पदार्थ आदि सामग्रियाँ न हों, विधि और पात्र उचित रहनेपर भी यदि श्राद्ध करते समय क्रोध आ गया हो तथा पाक्षिक, मासिक श्राद्ध उचित समयपर सम्पन्न न हों एवं दक्षिणा भी न दी जाय तो उसका फल मैं तुम्हें देता हूँ।'

इसी प्रकार एक बार भगवान् शंकरने नागराज वासुकिकी भक्तिसे प्रसन्न होकर उसे वर देते हुए कहा था—'नागराज! जिस मनुष्यने वार्षिक श्राद्ध करनेके पूर्व भगवान् श्रीहरिसे आज्ञा प्राप्त नहीं की और श्राद्ध-क्रिया सम्पन्न कर ली, यज्ञके अवसरपर उचित दक्षिणा न दी, देवता एवं ब्राह्मणके सामने देनेकी प्रतिज्ञा करके उसे पूरा नहीं किया, श्राद्धमें बिना मन्त्र पढ़े ही क्रियाएँ कर दीं—ऐसे यज्ञों एवं श्राद्धोंका सम्पूर्ण फल मैं तुम्हें अर्पित करता हूँ।' मुने! ये सभी बातें पुराणों एवं इतिहासोंमें वर्णित हैं।

'मुने! जिन्हें आपने दयनीय दशामें देखा था, उनके श्राद्ध, अवैध रूपमें ही अनुष्ठित हुए हैं। अतः उसका उत्तम फल इन पितरोंको प्राप्त नहीं हो सका है। यही कारण है कि ये नंग-धड़ंग कालक्षेप कर रहे हैं। इनके पुत्रोंने जो श्राद्ध-क्रिया की थी, उसमें त्रुटि रह गयी थी। इसी लिये पितृगण गाथा गाते हैं कि 'क्या हमारे कुलमें ऐसा कोई व्यक्ति जन्म लेगा, जो प्रभूत जलवाली नदियोंमें 'तृप्यध्वं०, उदीरतां०, आयन्तु०' इत्यादि मन्त्रोंसे हमारा तर्पण एवं उनके तटपर श्राद्ध करेगा। महाप्राज्ञ! आपने मुझसे जो पूछा था, संक्षेपमें उसका यही उत्तर है।'

वसुंधरे! यह सब सुनकर वे ऋषि राजा चन्द्रसेनके पास पहुँचे। उन ऋषिको देखकर राजा सिंहासनसे उठकर पृथ्वीपर खड़े होकर उनके चरणोंमें मस्तक झुकाकर कहा—'मुनिवर! आप मेरे घरपर पधारे, इससे मैं धन्य एवं कृतार्थ हो गया। आपके यहाँ आ जानेसे मेरा जन्म सफल हो गया। मुने! पाद्य, अर्घ्य, मधुपर्क और गौ—ये सभी वस्तुएँ आपकी सेवामें समर्पित हैं। इन्हें आप स्वीकार करें, जिससे मुझे पूर्ण संतोष हो जाय।'

देवि! उस समय राजा चन्द्रसेनके दिये हुए अर्घ्य आदिको स्वीकार करके त्रिकालज्ञ मुनिने

१४९- कांस्य-प्रतिमा-स्थापनकी विधि

अध्याय १८० ] श्राद्धसे अगस्तिका उद्धार, श्राद्ध-विधि [ ३२५

तुरंत उन नरेशसे कहा—‘राजन्! मेरे आनेका एक विशेष कारण भी है, आप उसे सुनें।' इसपर राजर्षि चन्द्रसेनने उन तपोधन ऋषिसे पूछा—'तपोधन! वह कौन-सा कार्य है? आप बतानेकी कृपा कीजिये। मैं वह समुचित कार्य करनेके लिये उद्यत हूँ, जिससे आपका मनोरथ सिद्ध हो सके।'

मुनिने कहा—‘राजन्! आप अपनी पटरानी तथा उनकी दासीको जिसे लोग प्रभावती कहते हैं, यहाँ बुलायें।' इसपर राजाने अपनी रानी तथा दासीको वहाँ बुलवाया। रानी परम साध्वी थीं। वे आकर जमीनपर बैठ गयीं। पर उस समय उनका शरीर भय एवं आशङ्काओंसे काँप रहा था। उन्होंने आते ही विनयपूर्वक ऋषिको प्रणाम किया।

उनके बैठ जानेपर मुनिने कहा—‘'मैंने 'ध्रुवतीर्थ'में जो आश्चर्यकी एक बात देखी है, उसे आप सभीके सामने व्यक्त करना चाहता हूँ। वह बात यह है कि आज प्राणियोंके पितृगण 'ध्रुवतीर्थ'में उपस्थित हुए थे। श्राद्ध करनेमें कुशल पुत्रोंने जिनका विधिवत् श्राद्ध किया है, वे तो तृप्त होकर स्वर्गको गये; किंतु वहीं मुझे एक अत्यन्त दुःखी पितर मिले हैं। उनका शरीर भूख-प्याससे सूख गया है। उनका मुख शुष्क और आँखें बड़ी छोटी हैं। स्वर्गमें जानेकी आशा तो दूर, वे पुनः अपवित्र नरकमें ही जानेके लिये विवश हैं। उन्हें देखकर मेरे हृदयमें बड़ी दया आयी, अतः मैंने उनसे पूछा—‘भाई! तुम कौन हो और क्या चाहते हो? मुझे बतानेकी कृपा करो।' तब उन्होंने अपनी सारी स्थिति बतायी। उस समय उनकी बात सुनते ही करुणासे मैं विवश हो गया हूँ। महारानीजी! बात ऐसी है—आपकी जो यह दासी है, इसकी एक पुत्री है, जो 'विरूपकनिधि' नामसे प्रसिद्ध है। आप उसे भी इस समय यहाँ बुलानेकी कृपा करें।'

वसुंधरे! इस प्रकार मुनिवर त्रिकालज्ञकी बात सुनकर महाराजा चन्द्रसेनकी रानीने उसी क्षण उस दासी-पुत्रीको बुलानेकी आज्ञा दी। उस समय वह मद्यपान कर उन्मत्त हो रही थी। किसी प्रकार राजसेवकोंने उसे सँभालकर हाथसे पकड़े हुए वहाँ लाकर उन मुनिके पास उपस्थित किया। मुनि धर्मके पूर्ण ज्ञाता थे। मदके प्रभावसे विक्षिप्त चित्तवाली उस दासीको देखकर उन्होंने उससे पूछा—‘अरे! तुमने पितरोंके लिये पिण्डदान तथा जलसे 'स्वधा' कहकर 'तर्पण' किया है अथवा नहीं? ऐसा जान पड़ता है कि तुमने पितरोंको मुक्त करनेवाली पिण्ड एवं तर्पणकी विधियाँ सम्पन्न नहीं की है।' वसुधे! इसपर उस दासीने उन मुनिसे कहा—'मैंने ऐसी कोई भी विधि सम्पन्न नहीं की है। मैं तो यह भी नहीं जानती कि कौन मेरे पितर हैं और उनके लिये कौन-सी क्रिया करनी चाहिये।'

पृथ्वि! फिर तो ऐसी बात कहनेवाली उस दासीसे उन त्रिकालज्ञ मुनिने कहा—'आज इस नगरके महाराज, महारानी और यहाँके निवासी—सभी सज्जन पुरुष 'ध्रुवतीर्थ'में पधारें। वहाँ पितरोंके लिये पुत्रोंद्वारा किये गये श्राद्धकी महिमाका फल आपलोगोंके सामने सुस्पष्ट हो जायगा। यह सुनकर सभी नगरनिवासी तथा जिनकी श्राद्ध करनेमें कौतुकवश भी प्रवृत्ति न थी, वे सभी अधिकारी ब्राह्मण भी 'ध्रुवतीर्थ'में गये। वहाँ जानेपर सबकी दृष्टि उस संतानद्वारा असत्कृत एवं अस्त-व्यस्त प्राणीपर पड़ी। बेचारेको क्षुद्र मच्छड़-जैसे जीव चारों ओरसे घेरे हुए थे। साथ ही वह भूखसे भी अत्यन्त व्यथित था। उस समय त्रिकालज्ञने कहा—'देखो, ये स्त्रियाँ तुम्हारी

३२६ | संक्षिप्त श्रीवराहपुराण | [ अध्याय १८०

संतानोंसे उत्पन्न हैं। तुम परिपुष्ट हो जाओ, एतदर्थ राजाकी कृपासे इनका यहाँ आगमन हुआ है।'

तब वह पितर बोला—'यह दासी इस 'ध्रुवतीर्थ'में पहले स्नान करे, फिर वेदमें निर्दिष्ट क्रमसे तर्पण करे। तदनन्तर प्राचीन ऋषियोंने जो विधि बतायी है, उसके अनुसार यह पिण्ड-दानादि श्राद्धकर्म करे। सभी कर्मपात्र चाँदीके हों। साथमें वस्त्र और चन्दन रहना आवश्यक है। फिर भक्तिपूर्वक पिण्डार्चन करके पितरोंकी पूजा करे। आप सभी सज्जन यहीं रहें और इसका परिणाम तत्काल देख लें—मैं परम सुखसे सम्पन्न हो जाऊँगा। इस विधानसे इस संतानके द्वारा मेरा श्राद्ध कराना आप सभीकी कृपापर निर्भर है।'

वसुंधरे! रानी चन्द्रप्रभा अगस्तिकी बात सुनकर दासीके द्वारा उस प्राणीका श्राद्ध करानेमें तत्पर हो गयीं। उस श्राद्धमें बहुत-सी दक्षिणाएँ दी गयीं। रेशमी वस्त्र, धूप, कर्पूर, अगुरु, चन्दन, तिल और अन्न आदि विविध वस्तुएँ पिण्डदानके अवसरपर काममें लायी गयीं। फलस्वरूप श्राद्ध एवं पिण्डदानका क्रम समाप्त होते ही वह विकृत दशावाला अगस्ति ऐसा बन गया, मानो कोई देवता हो। उसका शरीर परम तेजोमय हो गया। पार्श्ववर्ती जो मशक थे, उनकी आकृतिमें भी वैसा ही परिवर्तन हो गया। अब उनसे घिरा हुआ वह प्राणी ऐसी असीम शोभा पाने लगा, मानो यज्ञमें दीक्षित कोई पुरुष अन्तमें अवभृथ-स्नानसे सम्पन्न हुआ हो। उस समय स्वर्गसे इतने दिव्य विमान आये कि आकाश ढक गया।

अब अगस्ति आदि सभी बोले—'महानुभावो! हम लोग भलीभाँति तृप्त हो गये हैं। अतः अब परमधाममें जाते हैं। ध्रुवतीर्थकी यह महिमा मैंने आपके सामने प्रकट कर दी। महामुने! मेरे कहनेकी बात ही क्या है। आप सबने स्वयं भी इसकी महिमा देख ली। हमारा उद्धार होना नितान्त असम्भव था; किंतु आपकी कृपासे हमने इस दुस्तर पापपुञ्जको पार कर लिया।'

पृथ्वि! अब वह अगस्ति नामका प्राणी, मुनिवर त्रिकालज्ञ, राजा चन्द्रसेन, रानी चन्द्रप्रभा, उपस्थित जनता, दासी प्रभावती तथा उसकी पुत्रीको इस प्रकारकी बातें सुनाकर तथा 'आप सभी लोगोंका कल्याण हो'—इस प्रकार कहता हुआ अपने सहचरोंके साथ उत्तम विमानपर चढ़कर स्वर्गके लिये प्रस्थान कर गया।

भगवान् वराह कहते हैं—भद्रे! इसके पश्चात् महाराज चन्द्रसेन उस तीर्थकी महिमा देखकर महर्षि त्रिकालज्ञको प्रणामकर अपने परिजन, पुरजनसहित नगरको लौट गये।

पृथ्वि! मथुरा-मण्डलके अन्तर्गत तीर्थोंका माहात्म्य मैंने तुम्हें सुनाया। यह तीर्थ ऐसा शक्ति-सम्पन्न है कि जिसका स्मरण करनेसे भी मनुष्यके पूर्व-जन्मके पाप नष्ट हो जाते हैं। जो पुरुष ब्राह्मणोंकी संनिधिमें बैठकर इस प्रसङ्गको पढ़ता है, उसने मानो गयशिरपर (गयाक्षेत्रमें) जाकर अपने पितरोंको तृप्त कर दिया। महाभागे! जिसकी व्रतमें आस्था न हो, इस प्रसङ्गको सुननेमें उदासीन हो तथा भगवान् श्रीहरिकी अर्चासे विमुख हो, उसके सामने इसका वर्णन नहीं करना चाहिये। यह प्रसङ्ग तीर्थोंमें परम तीर्थ, धर्मोंमें श्रेष्ठ धर्म, ज्ञानोंमें सर्वोत्कृष्ट ज्ञान एवं लाभोंमें उत्तम लाभ है। महाभागे! जिनकी भगवान् श्रीहरिमें सदा श्रद्धा रहती है तथा जो पुण्यात्मा पुरुष हैं, उनके सामने ही इसका प्रवचन

१५१- सृष्टि और श्राद्धकी उत्पत्ति-कथा एवं पितृयज्ञका वर्णन

अध्याय १८१-१८२ ] काष्ठ-पाषाण-प्रतिमाके निर्माण, प्रतिष्ठा एवं पूजाकी विधि [ ३२७

करना उचित है।

सूतजी कहते हैं—ऋषियो! भगवान् वराहकी यह वाणी सुनकर देवी धरणीका मन अत्यन्त आश्चर्यसे भर गया। अब उन देवीने प्रसन्नतापूर्वक प्रतिमाकी स्थापनाके विषयमें प्रभुसे पुनः प्रश्न करना आरम्भ किया। [अध्याय १८०]


काष्ठ-पाषाण-प्रतिमाके निर्माण, प्रतिष्ठा एवं पूजाकी विधि

सूतजी कहते हैं—ऋषियो! भगवती वसुन्धराने जब तीर्थोंका महत्त्व सुना तो वे आश्चर्य एवं प्रसन्नतासे भर गयीं और भगवान् वराहसे पुनः बोलीं।

धरणीने पूछा—भगवन्! आपने मथुरा-क्षेत्रकी महत्ताका जो वर्णन किया, उसे सुनकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई; परंतु मेरे हृदयमें एक जिज्ञासा है। विष्णो! उसे सविस्तार बतानेकी कृपा कीजिये। मैं यह जानना चाहती हूँ कि काष्ठ, पाषाण एवं मृत्तिकाके विग्रहमें आप किस प्रकार विराजते हैं? अथवा ताँबा, काँसा, चाँदी और सुवर्ण आदिकी प्रतिमामें आपको कैसे प्रतिष्ठित करना चाहिये, जिससे वे अर्चाएँ आपका स्वरूप बन सकें। माधव! लोग अपने दक्षिण-भागमें दीवालपर अथवा भूमिपर भी आपके श्रीविग्रहकी रचना करते हैं, मैं उसकी विधि भी जानना चाहती हूँ।

भगवान् वराह बोले—वसुंधरे! जिस वस्तु या द्रव्यादिसे प्रतिमा बनवानी हो, पहले उसका शोधन करके उसे लक्षणोंके अनुसार चिह्नित करना चाहिये। फिर उसकी शुद्धि कर सविधि प्रतिष्ठा करानी चाहिये। देवि! इसके पश्चात् जन्म-मरणरूपी भयसे मुक्त होनेके लिये उसकी पूजा करनी चाहिये। वसुंधरे! यदि काष्ठमयी प्रतिमा बनवानी हो तो महुएकी लकड़ी सर्वोत्तम है। प्रतिमा बन जानेपर उसकी सविधि प्रतिष्ठा-पूजा करे। प्रतिष्ठाके समय अर्चनाकी जिन वस्तुओंका मैंने वर्णन किया है, उन गन्ध आदि पदार्थोंको विग्रहपर अर्पित करना चाहिये। कपूर, कुंकुम, दालचीनी, अगुरु, रस, इत्र, चन्दन, सिल्हक तथा उशीर आदि सामानोंसे विवेकशील पुरुष उस प्रतिमाका अनुलेपन एवं पूजन करे। स्वस्तिक वृद्धिका सूचक है। अतः प्रतिमापर उसका, श्रीवत्सका तथा कौस्तुभ मणिका चिह्न रहना आवश्यक है। फिर विधिपूर्वक उसका पूजन कर अर्चाको दूधसे सिद्ध हुए खीरका भोग लगाना चाहिये। यह अत्यन्त मङ्गलप्रद है। तिलके तेल या घीका दीपक पूजाके लिये उत्तम है—इसमें कोई संदेह नहीं।

प्राणायाम करके इस मन्त्रको पढ़ना चाहिये—मन्त्रका भाव इस प्रकार है—'भगवन्! यह सम्पूर्ण विश्व आपका ही स्वरूप है, तथापि आपकी स्पष्ट प्रतीति नहीं होती। प्रभो! अब आप सुस्पष्ट रूपसे भूमण्डलपर पधारकर इस काष्ठमयी प्रतिमामें प्रतिष्ठित होइये। काठकी बनी हुई प्रतिमाओंमें भगवान्की स्थापनाकी यह विधि है। स्थापनाके बाद भगवत्प्रेमी पुरुषोंके साथ प्रदक्षिणा करनी चाहिये। पूजाके बाद भी दीपक प्रज्वलित रहना चाहिये। मन-ही-मन 'ॐ नमो नारायणाय' इस मन्त्रका उच्चारण करे। प्रतिष्ठित मूर्तिकी पूजा नित्य होनी चाहिये। साथ ही इस प्रकार प्रार्थना करे—'भगवन्! आप मेरे एकमात्र आश्रय हैं। वासुदेव! मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप इस स्थानका कभी परित्याग न करें।'

वसुंधरे! फिर उस समय वहाँ अन्य जितने

३२८संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १८१-१८२

भी भगवत्प्रेमी लोग उपस्थित हों, वे सभी इसी विधिसे अर्चाविग्रहकी पूजा करें। फिर सबको चन्दन, पुष्प, अनुलेपन एवं नैवेद्यद्वारा सविधि पूजन करना चाहिये। सुन्दरि! महुएकी लकड़ीसे प्रतिमा बनाने और प्रतिष्ठा करनेका यही विधान है। जो मानव काष्ठकी प्रतिमा स्थापित कर इस विधिके साथ पूजा करता है, वह संसारमें न जाकर मेरे लोकको प्राप्त होता है।

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! अब मैं जिस प्रकार पाषाणकी बनी हुई प्रतिमाओंमें निवास करता हूँ, वह बतलाता हूँ। पाषाणकी अच्छी प्रतिमा बनानेके लिये देखनेमें सुन्दर, शल्यरहित एवं भलीभाँति शुद्ध किसी पत्थरको देखकर उसमें दक्ष कलाकारको नियुक्त करे। सर्वप्रथम उस पत्थरपर एक उजली बातीसे प्रतिमा चिह्नित करके उसकी अक्षत आदिसे पूजा कर, दीपक दिखाये और दही एवं चावलसे बलि देकर प्रदक्षिणा करे। इसके पश्चात्—'ॐ नमो नारायणाय' यह मन्त्र पढ़कर कहे—'भगवन्! आप सम्पूर्ण प्राणियोंमें श्रेष्ठ एवं परम प्रसिद्ध हैं; सूर्य-चन्द्रमा एवं अग्नि आपके ही रूप हैं। आपसे अधिक विज्ञ चराचर विश्वमें अन्य कोई है ही नहीं। भगवान् वासुदेव! इस मन्त्रके प्रभावसे प्रभावित होकर आप इस प्रतिमामें शनैः-शनैः प्रतिष्ठित होकर मेरी कीर्तिको बढ़ायें तथा स्वयं भी वृद्धिको प्राप्त हों। अच्युत वराह! आपकी जय हो, जय हो। आप अपनी अभीष्ट प्रतिमा स्वयं निर्मित करायें।'* फिर ऐसी धारणा करे कि सारा विश्व एक परम प्रभु भगवान् नारायणका ही स्वरूप है। जब मूर्ति बन जाये तो उसे पूर्वाभिमुख रखे। फिर उज्ज्वल वस्त्र धारणकर रातमें उपवास करे। पुनः प्रातः दन्तधावन कर और सफेद यज्ञोपवीत पहनकर हाथमें गन्धादि लेकर कहे—'भगवन्! जिन्हें सर्वरूप एवं 'मायाशबल' कहा जाता है, वही आप अखिल जगत्के रूपमें विराजते हैं। प्रभो! इस प्रतिमामें भी आपका वास है। जगत्के कारण, जगत्के आकार तथा अर्चावतार धारण करके शोभा पानेवाले लोकनाथ! इस प्रकार मैंने आपकी आराधना की है। यह विग्रह भी आपसे रिक्त नहीं है। आदि और अन्तसे रहित प्रभो! इस जगत्की सत्ता स्थिर रहनेमें आप ही निमित्त हैं। आप अपराजेय हैं!' इस प्रकार भगवद्विग्रहकी पूजा कर—'ॐ नमो वासुदेवाय' मन्त्र पढ़कर प्रतिमाके ऊपर जल छिड़कना चाहिये।

सुन्दरि! इस प्रकार पाषाणमयी प्रतिमामें मेरी प्राण-प्रतिष्ठाकर पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रमें अन्नादिमें अधिवासन करना चाहिये। मेरी उपासनामें उद्यत रहनेवाला जो व्यक्ति मेरी प्रतिमाकी स्थापना करता है, वह मुझ भगवान् श्रीहरिके लोकमें जाता है—यह निश्चित है। स्थापनाके दिनोंमें साधक यव अथवा दूधसे बने आहारपर दिन-रात व्यतीत करे। इष्टदेवकी प्रतिमा प्रतिष्ठित हो जानेपर सायंकालकी संध्याके समय चार दीपक प्रज्वलित करे। भगवान्के आसनके नीचे पञ्चगव्य, चन्दन और जलसे परिपूर्ण चार कलश स्थापित करना चाहिये। इस समय सामवेदके गान करनेवाले ब्राह्मण वेदध्वनि करें। देवि! जो ब्राह्मण वेदके हजारों मन्त्रोंको पढ़ते हैं, उनके मुखसे निकलते हुए इस शुभप्रद सामके


* यहाँ प्रतिमानिर्माणकी विधि अत्यन्त संक्षिप्त है। इसे विस्तारसे जाननेके लिये 'श्रीविष्णुधर्मोत्तरमहापुराण' खण्ड ३, अध्याय ४५ से १२०, 'काश्यपशिल्पम्' पृष्ठ ४९ से ८० तक तथा 'Elements of Hindu Ichonography'-(T.N. Gopinath Rao.) आदि पुस्तकें देखनी चाहिये।

अध्याय १८१-१८२ ] काष्ठ-पाषाण-प्रतिमाके निर्माण, प्रतिष्ठा एवं पूजाकी विधि ३२९

स्वरको सुनकर मैं वहाँ आ जाता हूँ। क्योंकि वेद-मन्त्रका पाठ मुझे परम प्रिय है। किंतु वहाँ अनर्गल प्रलाप नहीं होना चाहिये।

पुण्यव्रती व्यक्ति पूजाके समय इस अर्थवाले मन्त्रको पढ़कर आवाहन करे—‘भगवन्! छः प्रकारके कर्मोंमें आपकी प्रधानता है। आप पाँचों इन्द्रियोंसे सम्पन्न होकर यहाँ पधारनेकी कृपा कीजिये। जगत्प्रभो! आपमें सभी वेदमन्त्र स्थान पाये हुए हैं। समस्त प्राणियोंकी स्थिति भी आपहीमें है। यह अर्चा आपके रहनेका सुरक्षित स्थान है।’ इसी अर्थके मन्त्रका उच्चारण करते हुए तिल, घृत, समिधा और मधुसे एक सौ आठ आहुतियाँ भी देनी चाहिये। देवि! मैं इस विधिके द्वारा प्रतिमामें प्रतिष्ठित हो जाता हूँ*। फिर प्रातःकाल स्वच्छ जलमें स्नान करे और मन्त्र पढ़कर पञ्चगव्यका पान करे। अनेक प्रकारके गन्ध, पुष्प और लाजा आदिका प्रयोग कर फिर माङ्गलिक गीत-वाद्यके साथ प्रतिमाको मध्यभागमें एक ऊँचे स्थानपर स्थापित करे। सब प्रकारके सुगन्धोंको लेकर फिर प्रार्थना करे—‘भगवन्! जिन्हें लक्षणोंसे लक्षित, देवी लक्ष्मीसे सुशोभित तथा सनातन श्रीहरि कहते हैं, वे आप ही तो हैं। प्रभो! हमारी प्रार्थना है कि परम प्रकाशसे सुशोभित होकर आप यहाँ विराजिये। आपको मेरा बारम्बार नमस्कार है।’

इस प्रकार भगवान्‌की शैलार्चाकी स्थापना कर उसका अनुलेपन (उबटन) करना चाहिये। चन्दन-कुंकुमादिसे मिला हुआ ‘यक्षकर्दम’ का उद्वर्तन (उबटन) श्रेष्ठ है। इस प्रकार उद्वर्तन अर्पण करके इस अर्थका मन्त्र पढ़ना चाहिये—‘प्रभो! आप सम्पूर्ण संसारमें प्रधान हैं तथा ब्रह्मा और बृहस्पतिने आपकी भलीभाँति पूजा की है। आप अखिल लोकके कारण एवं मन्त्रयुक्त हैं। भगवन्! मैं आपका इस मन्त्रके द्वारा स्वागत करता हूँ। आप यहाँ विराजनेकी कृपा कीजिये।’ इस विधिसे भलीभाँति स्थापना करके गन्ध एवं फूलोंसे पूजा करनी चाहिये। मेरे विग्रहपर पहले श्वेत वस्त्र चढ़ाना चाहिये। वस्त्र अर्पण करते समय इस अर्थका मन्त्र पढ़े—‘देवेश! भक्तिपूर्वक वस्त्र आपके लिये अर्पित करता हूँ। विश्वमूर्ते! इन वस्त्रोंको आप ग्रहण करके मुझपर प्रसन्न होइये। आपको मेरा बारम्बार नमस्कार है।’

तत्पश्चात् कुंकुम और अगुरुसे मिला हुआ धूप देना चाहिये। धूप देते समय इस अर्थका मन्त्र पढ़ना चाहिये—‘देवेश! जो आदिरहित, पुराणपुरुष तथा सम्पूर्ण संसारमें सर्वोपरि शोभा पाते हैं, वे भगवान् नारायण! आप चन्दन, मालाएँ, धूप और दीप स्वीकार करनेकी कृपा कीजिये। आपको मेरा निरन्तर नमस्कार है।’

इस प्रकार पूजा करनेके पश्चात् भगवत्प्रतिमाके सामने नैवेद्य अर्पण करना चाहिये। प्रापण-अर्पण करनेका मन्त्र पूर्वमें बतला दिया गया है, उसीका उच्चारण करके विज्ञ पुरुष उसे अर्पित करे। शरीरकी शुद्धिके लिये नैवेद्यके बाद आचमन देना आवश्यक है। शान्ति-पाठ करे। क्योंकि शान्तिका पाठ करनेसे सम्पूर्ण कार्योंमें सिद्धि सुलभ हो जाती है। मन्त्रका भाव यह है—‘जगत्प्रभो! ओंकार आपका स्वरूप है। आप ऐसी कृपा करें


* यह प्रतिमा-प्रतिष्ठाकी अत्यन्त संक्षिप्त विधि है। विशेष जानकारीके लिये—‘शारदातिलक’, ‘प्रतिष्ठामयूख’ (भगवन्तभास्कर), ‘प्रतिष्ठा-महोदधि’, ‘कल्याण’-अग्निपुराणाङ्क, अध्याय ९२ से १०३ तक देखना चाहिये। प्रतिमा-निर्माणके बाद कर्मकुटी, जलानाधिवासन, ग्रामादिप्रदक्षिणा, हवन-प्रतिष्ठा, न्यासादि कर्म भी करने आवश्यक होते हैं।

३३०संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १८३-१८४

कि राजा, राष्ट्र, ब्राह्मण, बालक, वृद्ध, गौएँ, कन्याएँ तथा पतिव्रताओंमें भलीभाँति शान्ति रहे। रोग नष्ट हो जायँ, किसानोंके यहाँ सदा अच्छी फसल उत्पन्न हो। दुर्भिक्ष न रहे। समयपर अच्छी वृष्टि हो और विश्वमें शान्ति बनी रहे।*

वसुंधरे! व्रती पुरुष इस प्रकारकी विधिका पालन करते हुए शास्त्रमें निर्दिष्ट विधिके द्वारा देवेश्वर भगवान्‌की भली प्रकारसे आराधना करे। इसके पश्चात् ब्राह्मणोंको निरहंकार-भावसे भोजन कराये। यदि अपनेमें शक्ति हो तो गरीबों एवं अनाथोंको भी तृप्त करनेका प्रयत्न करे। इस विधिसे मेरी अर्चाकी स्थापना करनी चाहिये। इसके परिणामस्वरूप पुरुष मेरे लोकमें प्रतिष्ठा पाता है। फिर तो मेरे अङ्गोंपर जलकी जितनी बूँदें गिरती हैं, उतने हजार वर्षोंतक वह विष्णुलोकमें रहनेका अधिकारी होता है। भूमे! अहंकारसे रहित जो व्यक्ति मेरी स्थापना करता है, वह मानो अपने उनचास पीढ़ीके पुरुषोंका उद्धार कर देता है।
[अध्याय १८१-१८२]


मृण्मयी एवं ताम्रप्रतिमाओंकी प्रतिष्ठाविधि

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! अब मृत्तिकासे बनी अपनी प्रतिमाका स्थापन-विधान कहता हूँ, सुनो। मृण्मयी मूर्ति सुन्दर, स्पष्ट और अखण्डित होनी चाहिये। यदि काष्ठ न मिल सके तो मिट्टीका अथवा पाषाणका विग्रह बनानेका विधान है। कल्याणकी कामनावाले विद्वान् पुरुष ताँबा, काँसा, चाँदी, सोना अथवा शीशा—इन वस्तुओंसे भी मेरी सुन्दर प्रतिमाका निर्माण कराते हैं। यदि कर्मकाण्डके संकोचकी इच्छा हो तो वेदीपर ही मेरी पूजा की जा सकती है। कुछ लोग जगत्‌में यश फैलनेकी कामनासे भी मेरी प्रतिमाओंकी स्थापना करते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो अपना अभीष्ट पूरा होनेके लिये प्रतिमाएँ स्थापित करते हैं, कुछ लोग उत्तम तीर्थको देखकर वहीं मेरा पूजन कर लेते हैं अथवा मेरे तेजसे प्रकट हुए सूर्यमण्डलमें ही मेरी आराधना करते हैं।

देवि! तुम्हें ऐसा समझना चाहिये कि मैं विभिन्न व्यक्तियोंकी भावनाके अनुसार वहीं उपस्थित हो जाता हूँ और पूजा प्राप्त कर मैं उपासकको सम्पूर्ण सम्पत्तियोंसे पूर्ण कर देता हूँ, इसमें कोई संशय नहीं। मनुष्य जिस-जिस फलका उद्देश्य रखकर मन्त्रोंका उच्चारण अथवा विधिपूर्वक कर्मोंके सम्पादनद्वारा मेरी आराधनामें लगा रहता है, उसे वह अभिलषित फल प्राप्त हो जाता है। यही नहीं, मेरी कृपासे उसे सर्वोत्तम गति भी प्राप्त हो जाती है। मेरा भक्त प्रतिदिनके नियमित कार्योंमें सदा व्यस्त रहते हुए मनसे भी मेरी आराधना कर सकता है। मेरे लिये यदि किसीने श्रद्धापूर्वक एक अञ्जलि जल भी अर्पण कर दिया तो मैं उसकी उस भक्तिसे संतुष्ट हो जाता हूँ। उसके लिये बहुतसे फूलों, जपों एवं नियमकी क्या आवश्यकता है। जो अपने अन्तःकरणको स्वच्छ रखकर नित्य मेरा चिन्तन करता है, मैं उसकी भी सम्पूर्ण कामनाएँ पूरी कर देता हूँ और उसे दिव्य एवं मनोरम भोग तथा ज्ञान एवं मोक्ष भी


* तुलनीय यजुर्वेद—'आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतामा राष्ट्रे राजन्यः शूर इषव्यो…………योगक्षेमो नः कल्पताम्॥' (शु० यजुर्वेदसं० २२।२२)