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वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

१३६- अन्नकूट (गोवर्धन) पर्वतकी परिक्रमाका प्रभाव

२९२ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १५८–१६०

पहुँचकर मेरी (श्रीकृष्णके विग्रहकी) विधिवत् पूजाकर प्रदक्षिणा कर ली, उसने मानो सात द्वीपोंवाली पृथ्वीकी प्रदक्षिणा कर ली।

धरणीने पूछा— भगवन्! प्रायः सभी तीर्थ-क्षेत्र पशु, भूत, पिशाच और विनायक—इन उपद्रव करनेवाले प्राणियोंसे बाधित होते रहते हैं। फिर यह मथुरापुरी किस देवताके द्वारा सुरक्षित रहकर अनन्त फल प्रदान करनेमें समर्थ है?

भगवान् वराह कहते हैं— देवि! मेरे प्रभावसे विघ्नकारी शक्तियाँ मेरे इस क्षेत्रपर या भक्तोंपर कभी दृष्टि नहीं डाल पातीं। इसकी रक्षाके लिये मैंने दस दिक्पालों और चार लोकपालोंको नियुक्त कर रखा है, जो निरन्तर इस पुरीकी रक्षामें तत्पर रहते हैं। इसके पूर्वमें इन्द्र, दक्षिणमें यम, पश्चिममें वरुण, उत्तरमें कुबेर तथा मध्यभागमें उमापति महादेवजी रक्षा करते हैं। जो मनुष्य मथुरामें कोठेदार मकान बनवाता है, उस जीवन्मुक्त पुरुषको चार भुजाओंवाले विष्णुका ही रूप समझना चाहिये।

अब यहाँके निर्मल जलवाले 'मथुराकुण्ड' की एक आश्चर्यकी बात कहता हूँ, सुनो। हेमन्त-ऋतुमें इसका जल गर्म रहता है और ग्रीष्म-ऋतुमें बर्फके समान शीतल। साथ ही वर्षा-ऋतुमें वहाँका पानी न बढ़ता है और न ग्रीष्म-ऋतुमें सूखता ही है। वसुंधरे! मथुरामें पग-पगपर तीर्थ हैं, जिनमें स्नानकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है।

'मुचुकुन्दतीर्थ' नामक यहाँ एक दिव्य क्षेत्र है, जहाँ देवासुरसंग्रामके बाद राजा मुचुकुन्दने शयन किया था। वहाँ स्नान करनेवालेको अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है तथा मरनेवालोंको मेरे लोककी।

देवि! भगवान् केशवके नाम-संकीर्तनमें ऐसी शक्ति है कि वह इस जन्मके तथा पूर्वजन्मोंमें किये हुए सभी पापोंको उसी क्षण नष्ट कर डालता है। अतः कार्तिक शुक्लकी अक्षय-नवमीको भगवन्नाम-कीर्तन करते हुए मथुराकी प्रदक्षिणा करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। इसकी विधि यह है कि कार्तिक शुक्ला अष्टमीको मथुरामें जाकर ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए निवास करे तथा रात्रिमें ही प्रदक्षिणाका संकल्प कर ले। प्रातःकाल दन्तधावनकर स्नान करके धौतवस्त्र पहन ले और मौन होकर इसकी प्रदक्षिणा प्रारम्भ करे। इससे मनुष्यके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। प्रदक्षिणा करते समय मनुष्यको यदि कोई दूसरा व्यक्ति स्पर्श करता है तो उसके भी सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं, इसमें कुछ विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। प्रदक्षिणा करनेपर जो पुण्य मिलता है, वही पुण्य मथुरामें जाकर स्वयं प्रकट होनेवाले भगवान् श्रीहरिके दर्शनसे सुलभ हो जाता है।

भूमिकी परिक्रमाकी गणना भी योजनोंके प्रमाणमें की गयी है। पृथ्वीमें स्थित साठ हजार करोड़ और साठ सौ करोड़ तीर्थ हैं। देवताओं और आकाशमें स्थित तारागणोंकी संख्या भी इतनी है। यह गणना विश्वके आयुस्वरूप वायु, ब्रह्मा, लोमश, नारद, ध्रुव, जाम्बवान्, बलि और हनूमान्ने की है। इन लोगोंने वन, पर्वत-समुद्रसहित इस भूमिकी बाहरी रेखासे अनेक बार परिक्रमाएँ की थीं। सुग्रीव, पाँचों पाण्डव और मार्कण्डेय-प्रभृति कुछ योगसिद्धलोगोंने पृथ्वीके भीतर भ्रमण कर भी तीर्थोंकी गणना की। पर अन्य जो थोड़े ओज-बल अथवा बुद्धिवाले हैं, वे मनसे भी इन सबोंके परिभ्रमणमें असमर्थ हैं, प्रत्यक्ष गमनकी तो बात ही क्या? किंतु इन सातों द्वीपों और तीर्थोंमें घूमनेसे जो फल होता है, उससे भी अधिक फल मथुराकी परिक्रमामें मिल जाता है। जो मथुराकी

अध्याय १५८—१६०] मथुरा-तीर्थका प्रादुर्भाव, इसकी प्रदक्षिणाकी विधि एवं माहात्म्य २९३

प्रदक्षिणा करता है, वह मानो सात द्वीपोंवाली पृथ्वीकी प्रदक्षिणा कर लेता है। सभी मनोरथको चाहनेवाले मनुष्योंको सब प्रकारसे प्रयत्नकर मथुरा जाकर इसकी विधिपूर्वक प्रदक्षिणा करनी चाहिये। एक बार सप्तर्षियोंके पूछनेपर ब्रह्माजीने कहा था—'समस्त वेदोंके अध्ययन, सभी तीर्थोंमें स्नान, अनेक प्रकारके दान और यज्ञ-यागादि एवं कुआँ-तालाब, धर्मशाला बनवानेसे जो पुण्य होता है और उनका जो फल मिलता है, उससे सौ गुना अधिक फल मथुराकी परिक्रमासे प्राप्त होता है।' ब्रह्माजीसे यह बात सुनकर सातों ऋषियोंने उन्हें प्रणाम किया और वहाँसे मथुरा आकर वहाँ आश्रम बनाये। उनके साथ ध्रुव भी थे। फिर उन सबोंने अपनी कामनाकी पूर्तिके लिये कार्तिकमासके शुक्लपक्षकी नवमी तिथिको मथुराकी विधिवत् परिक्रमा की। इससे वे सभी मुक्त हो गये।

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! कार्तिक मासके शुक्लपक्षकी अष्टमी तिथिको व्रती साधक मथुरामें उपस्थित होकर 'विश्रान्तितीर्थ' में स्नान करे और देवताओं तथा पितरोंके पूजनमें संलग्न हो जाय। फिर विश्रान्तिके दर्शन करनेके पश्चात् दीर्घविष्णु और भगवान् केशवदेवका दर्शन करना चाहिये। उस रात ब्रह्मचर्यपूर्वक उपवास या अल्पाहार करे, साथ ही अपने अन्तःकरणको शुद्ध करनेके लिये अपवादभूत सायंकाल भी दन्तधावन करे। फिर स्नान करके धौतवस्त्र पहने और मौनव्रत धारणकर हाथमें तिल, चावल और कुशा लेकर पितरों एवं देवताओंकी पूजा करे।

फिर नवमीको प्रातःकाल ब्राह्ममुहूर्तमें संयमपूर्वक पवित्र होकर सूर्योदयके पूर्व ही प्रदक्षिणार्थ यात्राका कार्य आरम्भ कर देना चाहिये। प्रातःकालका स्नान 'दक्षिणकोटि' नामक तीर्थमें करनेकी विधि है। सर्वप्रथम दोनों पैरोंको धोकर आचमन करके मङ्गलोंके स्वरूप तथा बालब्रह्मचारी हनुमान्‌जीको प्रसन्न करनेकी चेष्टा करे, जिनके स्मरणसे समस्त उपद्रव शान्त हो जाते हैं। फिर प्रार्थना करे—'भगवन्! आपने जिस प्रकार भगवान् श्रीरामकी यात्रामें सिद्धि प्रदान की थी, उसी प्रकार मेरी इस परिक्रमा-यात्रामें सफलता प्रदान करें।' फिर गणेश्वर, भगवान् विष्णु, हनुमान्‌जी तथा कार्तिकेयकी विधिपूर्वक फल, माला तथा दीप आदिके द्वारा पूजनकर यात्रा आरम्भ करे। यात्रामें 'वसुमती' देवीका दर्शन बहुत आवश्यक है। वहीं राजाओंके आयुध रखनेके स्थानमें सम्पूर्ण भयको भगानेवाली भगवती 'अपराजिता' का भी दर्शन करे। देवि! फिर 'कंसवासनिका', 'औग्रसेना', 'चर्चिका' तथा 'वधूटी' देवियोंका दर्शन करे। ये देवियाँ दानवोंको पराजय और देवताओंको विजय प्रदान करानेवाली हैं। पुनः देवताओंसे सुपूजित आठ माताओं, गृहदेवियों और वास्तुदेवियोंका दर्शनकर तथा उनसे आज्ञा लेकर यात्रा आरम्भ करे। जबतक परिक्रमामें 'दक्षिणकोटि' तीर्थ न मिले, तबतक मौन होकर यात्रा करनी चाहिये। 'दक्षिणकोटि' तीर्थमें स्नान, पितृतर्पण, देवदर्शन और प्रणामकर भगवान् श्रीकृष्णद्वारा पूजित भगवती 'इक्षुवासा' को प्रणाम करे। इसके बाद 'वासपुत्र', 'अर्कस्थल', 'वीरस्थल', 'कुशस्थल', 'पुण्यस्थल' और प्रचुर पापोंके नाशक 'महास्थल' पर जाय। ये सभी तीर्थ सम्पूर्ण पापोंको दूर भगा देते हैं। फिर 'हयमुक्ति', 'सिन्दूर' और 'सहायक' नामके प्रसिद्ध स्थानोंपर जाय।

इस विषयमें ऋषियोंकी कही हुई एक प्राचीन गाथा सुनी जाती है—कहते हैं, कभी कोई राजकुमार घोड़ेपर सवार होकर मथुराकी सुखपूर्वक परिक्रमा कर रहा था। पर बीचमें ही नौकरसहित घोड़ेकी तो मुक्ति हो गयी, पर वह राजकुमार इस

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संसारमें ही पड़ा रह गया। अतएव जिसे श्रेष्ठ फलकी इच्छा हो, उसे सवारीपर चढ़कर मथुराकी कदापि परिक्रमा नहीं करनी चाहिये, क्योंकि इससे मुक्ति नहीं मिलती।

उस ‘हयमुक्ति’ तीर्थका दर्शन एवं स्पर्श करनेसे पापोंसे मुक्ति मिल जाती है। बीचमें ‘शिवकुण्ड’ नामसे प्रसिद्ध एक महान् तीर्थ है। भगवान् कृष्णको विजयी बनानेवाली ‘मल्लिका’ देवीका भी दर्शन करना चाहिये। फिर ‘कदम्बखण्ड’ की यात्राकर सपरिवार ‘चर्चिका’ योगिनीका दर्शन करे। फिर पापोंके हरण करनेवाले ‘वर्षखात’ नामक श्रेष्ठ कुण्डपर जाकर स्नान और तर्पण करना चाहिये।

देवि! यहाँ भूतोंके अध्यक्ष भगवान् महादेवका दिव्य विग्रह है। इसके आगे ‘कृष्णक्रीडा-सेतुबन्ध’ तथा ‘बलिह्रद’ कुण्ड है, जहाँ श्रीकृष्णने जलविहार किया था। इसके दर्शनमात्रसे मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे छूट जाता है। यहीं कुछ आगे गंधोंसे सुवासित रहनेवाला ‘स्तम्भोच्चय’ नामक एक शिखर है, जिसे भगवान् श्रीकृष्णने सजाया और पूजित किया था। इसकी भी यत्नके साथ प्रदक्षिणा तथा पूजा करनी चाहिये, इससे प्राणी सभी पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकको जाता है। इसके पश्चात् ‘नारायणस्थान’ तीर्थपर जाकर फिर ‘कुब्जिका’ तथा ‘वामनस्थान’ पर जाये। यहीं ‘विद्येश्वरी’ देवीका भी स्थान है, जो श्रीकृष्णकी रक्षा करनेके लिये यहाँ सदा तत्पर रहती हैं। कंसको मारनेकी अभिलाषा रखनेवाले श्रीकृष्ण, बलभद्र और गोपोंने देवीके संकेतसे यहाँ मन्त्रणा की थी। तबसे इन्हें ‘सिद्धिदा’, ‘भोगदा’ और ‘सिद्धेश्वरी’ भी कहा जाता है और कुछ व्यक्ति इन्हें ‘संकेतकेश्वरी’ भी कहते हैं। इनका दर्शन करनेसे अवश्य सिद्धि प्राप्त होती है। यहाँके कुण्डका स्वच्छ जल सब पापोंको नष्ट कर देता है। इसके बाद ‘गोकर्णेश्वरी’-देवीका दर्शनकर सरस्वती नदी और विघ्नराज गणेशके दर्शन करनेसे मनुष्य श्रेयको प्राप्त करता है।

फिर प्रचुर पुण्यवाले ‘गार्ग्यतीर्थ’, ‘भद्रेश्वरतीर्थ’ तथा ‘सोमेश्वर’ तीर्थमें जाना चाहिये। ‘सोमेश्वर’ तीर्थमें स्नान करके भगवान् सोमेश्वरका दर्शन फिर ‘घण्टाभरणक’, ‘गरुडकेशव’, ‘धारालोपनक’, ‘वैकुण्ठ’, ‘खण्डवेलक’, ‘मन्दाकिनी’, ‘संयमन’, ‘असिकुण्ड’, ‘गोपतीर्थ’, ‘मुक्तिकेश्वर’, ‘वैलक्षगरुड़’ और ‘महापातक-नाशन’ तीर्थोंमें भी जाना चाहिये।

तत्पश्चात् भगवान् शिवसे यों प्रार्थना करे—‘देवेश! आप मुक्ति देनेवाले प्रधान देवता हैं। सप्तर्षियोंने भी पृथ्वीकी परिक्रमाके समय आपकी स्तुति की थी। इसी प्रकार मैं भी आपसे प्रार्थना करता हूँ। आपकी आज्ञासे मथुराकी प्रदक्षिणामें मुझे सफलता प्राप्त हो जाय।’ इस भाँति उस क्षेत्रके स्वामी देवाधिदेव शिवकी प्रार्थना कर ‘विश्रान्तिसंज्ञक’ तीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ जाकर स्नान, तर्पण एवं प्रणाम करना चाहिये।

तदनन्तर श्रीकृष्णकी बहन आर्तिहरा भगवती ‘सुमङ्गला’ देवीके मन्दिरमें जाकर उनसे मथुरा-यात्राकी सिद्धिके लिये इस प्रकार प्रार्थना करे—‘शिवे! आप सम्पूर्ण मङ्गलपूर्ण कार्योंको सम्पन्न करनेमें कुशल हैं। आपकी कृपासे प्राणीके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। आप प्रसन्न हो जायँ, जिससे मुझे भी इस यात्रामें सफलता प्राप्त हो।’ इसके उपरान्त ‘पिप्पलेश्वर’ महादेवके स्थानपर जाय। पिप्पलादमुनिने यहाँ उनकी अर्चना की थी। वे महान् तपस्वी मुनि परिक्रमा करनेसे थक गये थे। इस स्थानपर भगवान् शिवने उनकी थकावट दूर की थी। उस समय पिप्पलादमुनिने वहाँकी भूमिका उपलेपन किया और उसके ऊपर

१३७- असिकुण्ड-तीर्थ तथा विश्रान्तिका माहात्म्य

अध्याय १६१-१६२] देववन और 'चक्रतीर्थ' का प्रभाव २९५

अपने नामसे अङ्कित भगवान् शंकरकी प्रतिमा स्थापित कर दी। इससे उन्हें यात्रामें सफलता मिली। अतः इनका दर्शन शुभका सूचक है। मन्दिरमें प्रवेश करते समय दक्षिण-भागका सुशब्द कार्यकी अनुकूलता सूचित करता है। स्वयं श्रीकृष्णको कंसवधकी सफलताके लिये प्रार्थना करनेपर इन देवीका शुभसूचक उत्तम दर्शन पहले और अन्तमें भी प्राप्त हुआ था। अतः इनका दर्शन करनेसे मनुष्यके सभी अभीष्ट कार्य पूर्ण होते हैं। उस समय कंसके बड़े-बड़े पहलवानोंको मारनेके विचारसे श्रीकृष्णने वज्रके समान मुखवाले भगवान् सूर्यका भी ध्यान किया था। जब वे सभी मल्ल कालके ग्रास बन गये, तब उन्होंने वहीं उन वज्रानन सूर्यकी स्थापना कर दी। तबसे मथुरामें निवास करनेवाले व्यक्तियोंने इन वरदाता सूर्यको अपने कुलका प्रधान देवता मान लिया है। अतः 'सूर्य-तीर्थ' पर उनका दर्शन करके प्रदक्षिणाकी यात्रा समाप्त करनी चाहिये। मथुराकी प्रदक्षिणाके समय मनुष्यके जितने पैर पृथ्वीपर पड़ते हैं, उसके कुलके उतने व्यक्ति सनातन सूर्यलोकमें स्थान पाते हैं। मथुराकी परिक्रमा पूर्ण करके आनेवाले मनुष्यको जो कोई भी देख लेता है तो वह भी पापोंसे छूट जाता है और जो परिक्रमाकी बात सुनते हैं, वे भी अपराधोंसे मुक्त होकर परमपद प्राप्त कर लेते हैं।

[अध्याय १५८-१६०]


देववन और 'चक्रतीर्थ' का प्रभाव

भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! अधर्मी एवं दुरात्मा मनुष्य भी मथुराके सेवनसे तथा वहाँके वनोंके दर्शन अथवा उस पुरीकी परिक्रमासे नरकक्लेशसे मुक्त हो जाते हैं तथा स्वर्गभोगके अधिकारी हो जाते हैं।

देवि! इस मथुरामण्डलमें बारह वन हैं, जिनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं—मधुवन, तालवन, कुन्दवन, काम्यकवन, बहुवन, भद्रवन, खदिरवन, महावन, लौहवन, बिल्ववन, भाण्डीर-वन और वृन्दावन। ये सभी परम श्रेष्ठ और मुझे अत्यन्त प्रिय हैं। लौहवनके प्रभावसे प्राणीके समस्त पाप दूर हो जाते हैं तथा बिल्ववन तो देवताओंसे भी प्रशंसित है। जो मानव इन वनोंका दर्शन करते हैं, उन्हें नरक नहीं भोगना पड़ता।

भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! अब मथुराके उत्तर भागमें स्थित 'चक्रतीर्थ' की महिमा कहता हूँ, उसे सुनो। पहले जम्बूद्वीपकी शोभा बढ़ानेवाला 'महागृहोदय' नामसे प्रसिद्ध एक उत्तम नगर था। शुभे! उस दिव्य नगरमें एक वेदोंका पारगामी प्रतिष्ठित ब्राह्मण रहता था। देवि! एक समयकी बात है, वह अपने पुत्रको लेकर शालग्राम (मुक्तिनाथ) तीर्थको गया और वहीं अपना निवास बना लिया। सदा वह नियमतः वहाँ पवित्र नदीमें स्नानकर देवताओंका दर्शन करता, यही उसका नित्यकर्म था। वहीं उसे एक 'कान्यकुब्ज' के सिद्ध पुरुषके दर्शन हुए, जो बहुधा 'कल्पग्राम' में भी जाया करता था। बातचीतके प्रसङ्गमें वह सिद्ध प्रायः प्रतिदिन 'कल्पग्राम' की प्रशंसा करता। उस ग्रामकी विभूति सुनकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मणके मनमें भी विचार उठा कि मैं भी उस 'कल्पग्राम' में चलूँ और उसने सिद्ध पुरुषसे प्रार्थना की—'मित्रवर! आप सिद्ध पुरुष हैं, अतः एक बार मुझे भी आप 'कल्पग्राम' ले चलनेकी कृपा कीजिये।'

पृथ्वि! उस श्रेष्ठ ब्राह्मणकी बात सुनकर सिद्ध पुरुषने कहा—'द्विजवर! वहाँ तो केवल सिद्ध पुरुष ही जा सकते हैं, सामान्य व्यक्तिका वहाँ जाना सम्भव नहीं है।' इसपर उस ब्राह्मणने

२९६संक्षिप्त श्रीवराहपुराण[ अध्याय १६१-१६२

कहा—'मुझे भी आत्मयोगकी शक्ति सुलभ है, अतः उसके सहारे मैं अपने पुत्रके साथ वहाँ चल सकूँगा।' फिर तो उस सिद्ध पुरुषने अपने दाहिने हाथमें उस वेदज्ञ ब्राह्मणको तथा बायें हाथमें उसके परम बुद्धिमान् पुत्रको लेकर ऊपर उड़ा और 'कल्पग्राम' में पहुँच गया। वहाँ पहुँच जानेपर वे पिता-पुत्र अब 'कल्पग्राम' में ही रहने लगे। बहुत समय व्यतीत हो जानेपर उस ब्राह्मणके शरीरमें व्याधि उत्पन्न हो गयी, वृद्धावस्था तो थी ही, अतः मरनेका निश्चयकर उस धर्मात्मा ब्राह्मणने अपने सुयोग्य पुत्रको सामने बुलाया और कहा—'वत्स! मुझे गङ्गाके तटपर ले चलो।' पुत्रने उसे गङ्गाके किनारे पहुँचाया और वह भी अपने पिताके प्रति अपार श्रद्धा-भक्तिके कारण वहीं उसके पास रहने लगा।

भद्रे! एक दिनकी बात है, दैववश कान्यकुब्ज-देशके निवासी उस सिद्ध पुरुषके घर वह ब्राह्मणकुमार भोजनके लिये गया। उस सिद्धने ब्राह्मणकुमारका स्वागत-सत्कार किया और न्यायपूर्वक उसकी अर्चना करनेके पश्चात् उसके साथ अपनी कन्याका विवाह भी कर दिया। तबसे वह ब्राह्मणकुमार प्रतिदिन अपने श्वशुरके ही घर जाकर भोजन करने लगा। अपने पिताकी चिन्तनीय स्थिति देखकर उस ब्राह्मणकुमारने एक दिन अपने उस सिद्ध पुरुष श्वशुरसे पूछा—'स्वामिन्! आप मुझे यह बतानेकी कृपा करें कि पिताजीका यह कष्टजर्जरित शरीर कब शान्त होगा?' इसपर उस सिद्ध पुरुषने मुस्कुराकर कहा—'द्विजवर! तुम्हारे पिताने अपवित्र अन्न खाया था। इसी आहार-दोषने उन्हें इस दुर्गति‌को पहुँचा दिया है। वह अन्न अभी इनके पैरोंमें पड़ा है।

लड़केने किसी दिन यह बात अपने पिताको बतला दी, अतः शरीरकी जर्जरतासे अत्यन्त दुःखी उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने एक दिन गङ्गातटपर पड़े एक पत्थरसे (अन्नदोषयुक्त) अपनी दोनों टाँगें तोड़ दीं, जिससे उसके प्राण निकल गये। उस समय उसका पुत्र अपने श्वशुरके गृह स्नान तथा भोजनादिके लिये गया हुआ था। लौटनेपर उसने जब अपने पिताका शव देखा तो विलाप करने लगा। आपस्तम्बमुनिने ठीक ही कहा है—'सर्पके काटनेसे, सींग एवं दाँतवाले जानवरोंके मारनेसे तथा सहसा अपने प्राणोंके त्यागनेसे अर्थात् आत्महत्या करनेसे जिसके प्राण जाते हैं, वह मनुष्य पापका भागी होता है।'

अब वह ब्राह्मणकुमार जब पुनः अपने श्वशुरके घर गया तो उसे देखते ही श्वशुरने कहा—'अरे! तुम्हें तो ब्रह्महत्या लगी है, तुम यहाँसे चले जाओ।' श्वशुरकी बात सुनकर जामाताने कहा—'महानुभाव! मैंने तो कभी किसी ब्राह्मणकी हत्या नहीं की, फिर आप मुझपर ब्रह्महत्याका दोषारोपण कैसे कर रहे हैं?' श्वशुरने उससे कहा—'पुत्रक! तुम अपने पिताकी ही मृत्युके हेतु बने हो, अतः तुम ब्रह्महत्याके भागी हुए हो। ऐसा नियम है कि 'यदि किसी पतितके साथ संनिकटमें एक वर्षतक शयन, भोजन अथवा वार्तालाप किया जाय तो शुद्ध पुरुष भी पतित हो जाता है। अतएव अब मेरे घरपर तुम्हारे रहनेके लिये कोई स्थान नहीं है।' श्वशुरकी यह बात सुनकर जामाताने कहा—'सुव्रत! जब आपने मेरा त्याग कर ही दिया तो अब मेरे लिये कौन-सा प्रायश्चित्त कर्तव्य है—यह बतानेकी कृपा कीजिये।' इसपर श्वशुर बोला—' 'अब तुम कल्पग्रामका त्यागकर 'मथुरा' जाओ। मथुराको छोड़कर तुम्हारी शुद्धि कहीं भी सम्भव नहीं है।' ' अब वह ब्राह्मण उसी क्षण 'कल्पग्राम' से चलकर 'मथुरा' आया और नगरके बाहर ही

१३८- मथुरा तथा उसके अवान्तरके तीर्थोंका माहात्म्य

अध्याय १६३ ] 'कपिल-वराह' का माहात्म्य २९७

अपने रहनेका प्रबन्ध किया। उस समय मथुरामें कान्यकुब्जके महाराज कुशिकका नित्य-सत्र चल रहा था, जिस सत्रमें प्रतिदिन दो हजार ब्राह्मण भोजन करते थे। वहाँ ब्राह्मणोंके खाते समय छूटे हुए जूठे (उच्छिष्ट) अन्नके खानेसे उस ब्राह्मण-कुमारका उद्धार हो गया। वह सदा 'चक्रतीर्थ' में जाकर स्नान करता। न किसीके घर वह भिक्षा माँगता और न कहीं अन्यत्र ही जाता था।

वसुंधरे! बहुत दिनोंके बाद उसके श्वशुरके मनमें उसकी चिन्ता हुई। उसने अपने दिव्य ज्ञानसे जामाताकी स्थिति ज्ञात कर ली और अपनी पुत्रीको आदेश दिया—'तुम भोजन लेकर अब मथुरापुरी जाओ; तुम्हारा पति वहीं है। वह कन्या भी योगसिद्धा एवं दिव्य ज्ञानसे सम्पन्न थी। अतएव अपने स्वामीको भोजन करानेके विचारसे वह प्रतिदिन उसके पास आने-जाने लगी और यह उसका नित्यका एक कार्यक्रम बन गया। सायंकाल भोजन लेकर वह ब्राह्मणपुत्री उस ब्राह्मणके पास जाती। वह ब्राह्मणकुमार पत्नीका दिया हुआ भोजन कर लेता और रात्रिमें उसी सत्रशालामें ही पड़ा रहता। इस प्रकार वहाँ निवास करते ब्राह्मणके छः महीने और व्यतीत हो गये। कुछ समयके पश्चात् वहाँ रहनेवाले ब्राह्मणोंने उससे पूछा—'आप यहाँ कहाँ निवास करते हैं और प्रतिदिन आपको भोजन कहाँसे प्राप्त होता है?'

अब उस ब्राह्मणने उन लोगोंसे अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त स्पष्ट कह दिया। इसे सुनकर वे सभी ब्राह्मण एकत्रित होकर उससे बोले—'द्विजवर ! अब तो आप सर्वथा शुद्ध हो गये हैं। इस 'चक्रतीर्थ' के प्रभावसे आपके सारे पाप दूर हो गये हैं। फिर हमलोगोंके शरीरसे सम्पर्क होनेके कारण आपके बचे-खुचे दूसरे पाप भी समाप्त हो गये हैं।' उन ब्राह्मणोंकी बात सुनकर उस ब्राह्मणका मन प्रसन्नतासे खिल उठा। अब वह स्नानार्थ पुनः 'चक्रतीर्थ' आया। यहाँ उसकी भार्या भोजन लेकर पहलेसे ही उपस्थित थी। उसने हर्षित मनसे अपने पतिसे कहा—'स्वामिन् ! मुझे ऐसा दिखायी पड़ता है कि आप अब ब्रह्महत्यासे सर्वथा मुक्त हो गये हैं।' पत्नीकी बात सुनकर उसने कहा—'प्रिये ! तुमने जो कहा है, उसे पुनः स्पष्ट करनेकी कृपा करो।' यह सुनकर पत्नीने कहा—'इससे पहले आप बात करनेमें भी अयोग्य हो चुके थे। क्योंकि आप उस समय ब्रह्महत्यासे ग्रस्त थे। द्विजवर ! अब आप 'चक्रतीर्थ' के प्रभावसे पापमुक्त हो गये हैं। कान्त ! अब आप उठें और परम पवित्र 'कल्पग्राम' को चलें।' तदनन्तर वह श्रेष्ठ ब्राह्मण अपनी भार्याके साथ 'कल्पग्राम' चला गया। वसुंधरे ! उस परम पवित्र 'चक्रतीर्थ' में भगवान् 'भद्रेश्वर' विराजते हैं, जिनका दर्शन करनेसे तीर्थका फल प्राप्त होता है। वसुंधरे ! 'चक्रतीर्थ' के सेवनसे समग्र 'कल्पग्राम' की अपेक्षा भी सौगुना फल मिलता है। एक दिन-रात वहाँ उपवास करनेपर मनुष्यका ब्रह्महत्यासे भी उद्धार हो जाता है। [अध्याय १६१-१६२]


'कपिल-वराह' का माहात्म्य

भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे ! मिथिला-प्रान्तमें जनकजीकी 'जनकपुरी' नामकी एक प्राचीन एवं परम रमणीय पुरी है, जहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—ये चारों वर्णोंके लोग निवास करते एवं तीर्थयात्रा आदिके लिये बाहरसे भी आते-जाते रहते थे। फिर वहाँके समीपवर्ती 'सौकरव-तीर्थ' में स्नानकर वे 'मथुरापुरी' की यात्रा करते थे; और वहाँ वे कुछ कालके लिये ठहर

२९८संक्षिप्त श्रीवराहपुराण[ अध्याय १६३

जाते। उसी समाजमें एक ऐसा ब्राह्मण था, जिसके शरीरमें ब्रह्महत्याके चिह्न थे। उसके हाथसे सदा रुधिरकी धारा गिरती रहती थी, जिसे प्रायः सभी लोग देखते थे। वह ब्राह्मण उस हत्यासे मुक्त होनेके लिये सभी तीर्थोंमें भ्रमण-स्नान कर चुका था, फिर भी उसकी ब्रह्महत्या दूर न हुई। किंतु इसके बाद जब उसने 'वैकुण्ठ' तीर्थमें स्नान किया तो वह रुधिरधारा स्वतः बंद हो गयी। अब उसके सभी सहवासी आश्चर्यसे कहने लगे—'यह कैसे हो गया, यह कैसे हो गया!' उसी समय ब्राह्मणका रूप धारणकर एक दिव्य पुरुष वहाँ आया और उसने उन सभी उपस्थित लोगोंसे पूछा—'यहाँसे ब्रह्महत्या इस ब्राह्मणको छोड़कर कैसे चली गयी?' इसपर उन लोगोंने उसे उस ब्राह्मणके ब्रह्महत्यासे छूटनेके सारे प्रयत्न और अन्तमें 'वैकुण्ठ-तीर्थ' में स्नानद्वारा हत्यामुक्तिकी बात बतला दी, अतः इस तीर्थकी महिमामें किंचित् भी संदेह नहीं करना चाहिये।

सूतजी कहते हैं— ऋषियो! इसके बाद भगवान् वराहने पुनः पृथ्वीसे कहा—'देवि! यहाँ अमित पुण्य प्रदान करनेवाला 'असिकुण्ड' नामक एक दूसरा क्षेत्र है, अब मैं उसे बताता हूँ। उस क्षेत्रमें एक अन्य कुण्ड भी है, जिसे 'गन्धर्वकुण्ड' कहते हैं। वह सभी तीर्थोंमें प्रमुख है। वहाँ अवगाहन करनेवाला गन्धर्वोंके साथ आनन्द भोगता है और जो उस स्थानपर प्राणोंका त्याग करता है, वह मेरे लोकमें चला जाता है।

देवि! मथुरामण्डलकी सीमा बीस योजनमें है और सभीको मुक्ति देनेमें परम समर्थ उस पुरीकी आकृति कमलके समान है। इसकी कर्णिकाके मध्यभागमें क्लेशोंके नाशक भगवान् केशव विराजते हैं। इस स्थानपर जिनके प्राण प्रस्थान करते हैं, वे मुक्तिके भागी होते हैं। यही क्यों? मथुराके भीतर कहीं भी जिनकी मृत्यु होती है, वे सभी मुक्त हो जाते हैं। इस तीर्थके पश्चिम भागमें 'गोवर्धनपर्वत' है, जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण निवास करते हैं। वहाँ उन देवेश्वरके दर्शन प्राप्त कर लेनेपर मनमें संताप नहीं रह जाता।

पृथ्वि! पूर्वकालमें मान्धाता नामके एक राजा थे। उनकी भक्तिपूर्वक स्तुतिसे प्रसन्न होकर मैंने उन्हें यह प्रतिमा सौंपी थी। राजा मान्धाताके मनमें मुक्ति पानेकी अभिलाषा थी, अतः वे नित्य इस प्रतिमाकी अर्चना करने लगे। जिस समय मथुरामें लवणासुरका वध हुआ था, उसी समय वह प्रतिमा इस तीर्थमें स्थापित की गयी थी। यह विग्रह परम दिव्य, पुण्यस्वरूप एवं तेजसे सम्पन्न है।

इसके मथुरा आनेकी कथा विचित्र है। कपिल नामके मुनिने अपार श्रद्धा और मनोयोगपूर्वक मेरी इस वाराही प्रतिमाका निर्माण किया था। ये विप्रवर कपिल प्रतिदिन इस प्रतिमाका ध्यान एवं पूजन करते थे। देवि! फिर इन्द्रने उन मुनिवर कपिलसे इसके लिये प्रार्थना की। तब कपिलने प्रसन्न होकर यह दिव्य रूपवाली प्रतिमा उन्हें दे दी। जब इन्द्रको यह प्रतिमा प्राप्त हुई तो उनके हृदयमें हर्ष भर गया और नित्यप्रति भक्तिके साथ मेरा पूजन करने लगे। इसके फलस्वरूप शक्रको सर्वोत्कृष्ट दिव्य ज्ञान प्राप्त हो गया। इन्द्रने मेरी इस 'कपिलवराह' नामक प्रतिमाकी बहुत वर्षोंतक पूजा की। इसके बाद रावणनामक दुर्दान्त राक्षस हुआ। वह महान् पराक्रमी निशाचर इन्द्रके लोकमें गया और स्वर्गको जीतनेकी चेष्टा करने लगा और देवराजके साथ युद्ध करने लगा। उसने देवताओंको परास्त कर दिया। परम पराक्रमी इन्द्र भी उससे हार गये और उन्हें बन्दी बनाकर

१३९- गोकर्णतीर्थ और सरस्वतीकी महिमा

अध्याय १६३ ] 'कपिल-वराह' का माहात्म्य २९९


रावण उनके भवनमें घुस गया। जब वह राक्षस रत्नोंसे सुशोभित इन्द्र-भवनमें गया तो उसे इन भगवान् ‘कपिलवराह’ के दर्शन हुए। देखते ही उसने अपना मस्तक जमीनपर टेक दिया और दीर्घकालतक इन श्रीहरिकी स्तुति की। इसपर भगवान् विष्णु सौम्यरूप धारणकर पुष्पक विमानपर आरूढ़ होकर उस राक्षसके पास आये। साथ ही उस विग्रहमें उनका प्रवेश हो गया। रावणने प्रतिमा उठानी चाही, किंतु वह उठा न सका। अब उसके आश्चर्यकी सीमा न रही। उसने कहा—'भगवन्! बहुत पहलेकी बात है, मैंने शंकरसहित कैलासपर्वतको भी अपने हाथोंसे उठा लिया था। आपकी आकृति तो बहुत ही छोटी है, फिर भी उठानेमें मेरी शक्ति कुण्ठित हो गयी है। देवेश्वर! आपको नमस्कार है। मुझपर प्रसन्न होनेकी कृपा करें। प्रभो! मेरी हार्दिक इच्छा है कि मैं आपको अपनी सर्वोत्तम पुरी लङ्कामें ले चलूँ।

भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! उस समय मैंने 'कपिलवराह' के रूपमें रावणसे कहा था—'राक्षस! तुम अवैष्णव व्यक्ति हो। तुम्हें ऐसी भक्ति कहाँसे प्राप्त हो गयी?' तब मुझ 'कपिलवराह' की बात सुनकर रावणने कहा—'महात्मन्! आपके पवित्र दर्शनसे ही मुझे ऐसी अनन्य भक्ति सुलभ हो गयी है। देवेश्वर! आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। आप कृपया मेरी पुरीमें पधारें।' पृथ्वि! तब मेरी यह प्रतिमा हलकी हो गयी और रावण तीनों लोकोंमें विख्यात मेरी उस 'कपिलवराह' की प्रतिमाको पुष्पक विमानपर चढ़ाकर लङ्का ले आया और वहाँ उसे प्रतिष्ठित कर दी। तदनन्तर जब भगवान् रामने राक्षसराज रावणको मारकर लङ्काके राजसिंहासनपर विभीषणका अभिषेक किया तो विभीषणने श्रीरामसे प्रार्थना की—'प्रभो! यह सारा राज्य आपका है। आप इसे स्वीकार करें।'

श्रीरामजीने कहा—'राक्षसराज विभीषण! यह सब कुछ तुम्हारा है, इससे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। पर राक्षसेश्वर! इन्द्रके लोकसे रावणद्वारा जो 'कपिलवराह' की प्रतिमा यहाँ लायी गयी है, केवल उसे मुझे दे दो। उन वराहभगवान्की मैं प्रतिदिन पूजा करना चाहता हूँ। दानवेश्वर! मैं उन्हें अयोध्या ले जाऊँगा।' तब विभीषणने उस दिव्य प्रतिमाको श्रीरामको सादर समर्पण कर दिया। श्रीरामने उसे पुष्पक विमानपर रखकर अपनी नगरी अयोध्याके लिये प्रस्थान किया और अयोध्या पहुँचकर उसकी स्थापना की और प्रतिदिन पूजा करनेका नियम बना लिया। इस प्रकार दस वर्ष व्यतीत हो जानेपर श्रीरामने लवणासुरका वध करनेके लिये शत्रुघ्नको आज्ञा दी। उस समय वह राक्षस मथुरामें रहता था। शत्रुघ्नने महात्मा श्रीरामको प्रणाम किया और अपनी चतुरङ्गिणी सेना लेकर मथुराके लिये चल पड़े। लवणासुरका रूप बड़ा भयंकर था। सभी राक्षस उसे अपना नायक मानते थे। फिर भी शत्रुघ्नने उसका वध कर डाला। तत्पश्चात् शत्रुघ्न मथुरा नगरके भीतर गये और वहाँ उन्होंने अत्यन्त तेजस्वी छब्बीस हजार वेदके पारगामी ब्राह्मणोंको बसाया। जहाँ एक भी निवासी वेद नहीं जानता था, वहाँ चारों वेदोंके ज्ञाता पुरुष निवास करने लगे। अब वह स्थान ऐसा पवित्र बन गया, जहाँ एक भी ब्राह्मणको भोजन कराया जाय तो करोड़ ब्राह्मणोंके भोजन करानेके समान फल होने लगा।

पृथ्वि! फिर लौटनेपर जब शत्रुघ्नने लवणासुरके वधका यथावत् समाचार श्रीरामसे कहा, तब उस असुरकी मृत्युका वृत्तान्त सुनकर भगवान् राघवेन्द्रने

३००संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[अध्याय १६४-१६५

प्रसन्न होकर उनसे कहा—'शत्रुघ्न! तुम्हारे मनमें जिस वस्तुकी अभिलाषा हो, वह तुम मुझसे वरके रूपमें माँग लो। उस समय श्रीरामकी बात सुनकर शत्रुघ्नने कहा—'भगवन्! आप मेरे पूज्य हैं। यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और वर देना चाहते हैं तो मुझे यह भगवान् 'कपिलवराह' की प्रतिमा देनेकी कृपा करें।' तब शत्रुघ्नके वचन सुनकर श्रीरामने कहा—'शत्रुघ्न! तुम इन वराह भगवान्‌की प्रतिमा ले जा सकते हो। तुम्हारे अनुगत मण्डलीको धन्यवाद और संसारमें पवित्र उस मथुरापुरीको धन्यवाद! मथुराका वह जनसमाज धन्य है, जो सदा 'श्रीकपिलवराह' का दर्शन करेगा। शत्रुघ्न! जो इन कपिलवराहका दर्शन, स्पर्श एवं ध्यान करता है और इन्हें प्रतिदिन स्नान कराता तथा इनका अनुलेपन करता है, उसके सब पापोंको ये हर लेते हैं। जो इनकी पूजा तथा दर्शन करता है उसके समस्त पापोंका नाश करके ये मोक्षतक दे डालते हैं।'

पृथ्वि! इस प्रकार कहकर श्रीरामने कपिलवराह-की यह प्रतिमा शत्रुघ्नको दे दी। उसे लेकर शत्रुघ्न मथुरापुरी चले गये और वहाँ उन्होंने मेरे पास ही उसकी स्थापना कर दी। मध्यभागमें स्थापित करके उनकी विधिवत् पूजा की। 'गया' में तथा ज्येष्ठ मासमें 'पुष्कर'क्षेत्रमें पिण्डदान करनेसे एवं 'सेतुबन्ध-रामेश्वर' के दर्शन करनेसे मनुष्य जो फल पाता है, वह इनका दर्शन करनेसे पा जाता है। वैसा ही फल विश्रान्तिसंज्ञक, गोविन्द, केशव तथा दीर्घविष्णुके प्रति श्रद्धा होनेपर प्राप्त होता है। मेरा तेज प्रातःकाल 'विश्रान्तिसंज्ञक' में, मध्याह्नके अवसरपर 'दीर्घविष्णु' में तथा दिनके चतुर्थ भाग अर्थात् सायंकालमें 'केशव' में प्रतिष्ठित रहता है। देवि! यह ब्रह्मविद्या (वराहपुराण) परम प्राचीन है। [अध्याय १६३]


अन्नकूट (गोवर्धन)-पर्वतकी परिक्रमाका प्रभाव

भगवान् वराह कहते हैं—देवि! मथुराके पास ही पश्चिम दिशामें दो योजनके विस्तारमें गोवर्धन नामसे प्रसिद्ध एक क्षेत्र है, जहाँ वृक्षों और लताओंसे मण्डित एक सुन्दर सरोवर भी है। मथुराके पूर्व भागमें 'इन्द्र' तीर्थ, दक्षिणमें 'यम' तीर्थ, पश्चिममें 'वरुण' तीर्थ और उत्तरमें 'कुबेर' तीर्थ—ये चार तीर्थ हैं। भद्रे! यहाँ 'अन्नकुण्ड' नामका भी एक क्षेत्र है, इसकी परिक्रमा करनेवाले मानवका संसारमें फिर जन्म नहीं होता। फिर 'मानसी-गङ्गा' में स्नानकर गोवर्धनगिरिपर भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करना चाहिये। जो इस गोवर्धनपर्वतकी प्रदक्षिणा कर लेता है, उसके लिये कोई कर्तव्य शेष नहीं रह जाता। सोमवती अमावास्याके दिन जो यहाँ जाकर पितरोंको पिण्ड प्रदान करता है, उसे राजसूय-यज्ञका फल प्राप्त हो जाता है। गयातीर्थमें जाकर पिण्डदान करनेवाले मनुष्योंको जो फल मिलता है, वही गोवर्धनपर पिण्डदानसे सुलभ हो जाता है, इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं। गोवर्धन-भगवान्‌की परिक्रमा करनेसे राजसूय और अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्राप्त होता है।

गोवर्धनकी परिक्रमाकी विधि यह है कि भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी पुण्यमयी एकादशी तिथिके दिन इस पर्वतके पास उपवास रहकर प्रातःकाल सूर्योदयके समय स्नानकर पर्वतपर स्थित श्रीहरिकी पूजा करनी चाहिये। इसके बाद 'पुण्डरीक' तीर्थपर जाकर वहाँके कुण्डमें स्नानकर देवताओं और पितरोंका सम्यक् प्रकारसे अर्चन करके भगवान् पुण्डरीकका पूजन करे। वहाँ निर्मल जलसे पूर्ण एक 'अप्सरा-

१४०- सुगेका मथुरा जाना और वसुकर्णसे वार्तालाप

अध्याय १६४-१६५] अन्नकूट (गोवर्धन)-पर्वतकी परिक्रमाका प्रभाव ३०१

कुण्ड' है। वहाँ स्नान करनेसे सभी पाप धुल जाते हैं। उस कुण्डपर तर्पण करनेसे राजसूय और अश्वमेध-यज्ञोंका फल निश्चय ही मिल जाता है। मथुरामें 'संकर्षण' नामसे विख्यात एक तीर्थ है, उसके रक्षक बलभद्रजी हैं। वहाँ जाने एवं स्नान करनेसे पहलेसे लगी हुई गोहत्याके पापसे मुक्ति हो जाती है।

पृथ्वि! गोवर्धनके पासमें ही एक 'शक्रतीर्थ' है। यहाँ श्रीकृष्णने इन्द्रकी पूजाके लिये किये जा रहे यज्ञको नष्ट कर दिया था। उस यज्ञके अवसरपर भोज्य आदि पदार्थोंकी बहुत बड़ी ऊँची ढेरी लग गयी थी। उस समय इन्द्रके साथ श्रीकृष्णका विवाद छिड़ गया। इन्द्रने घोर वृष्टि की। वह जल व्रजवासियों तथा गौओंके लिये कष्टप्रद होने लगा। श्रीकृष्णने उनकी रक्षा करनेके निमित्त इस श्रेष्ठ पर्वत (गोवर्धन)-को हाथपर उठा लिया था। तभीसे यह पर्वत 'अन्नकूट-पर्वत' के नामसे विख्यात हो गया। यहीं आगे एक स्वच्छ जलवाला 'कदम्बखण्ड' नामक कुण्ड है। वहाँ स्नान करके पितरोंका तर्पण करनेसे ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है। इसके बाद सौ शिखरवाले देवगिरिपर जाय, जहाँ स्नान एवं दर्शन करनेसे 'वाजपेय' यज्ञका फल मिलता है।

देवि! जब 'मानसीगङ्गा' के उत्तर तटपर चक्र धारण करनेवाले देवेश्वर श्रीहरिका अरिष्टासुरके साथ घोर युद्ध हुआ था, तब उस असुरने अपना वेष बैलका बना लिया था। उसकी जीवनलीला श्रीकृष्णके ही हाथ समाप्त हुई। उसके क्रोधपूर्वक एड़ीके प्रहारसे पृथ्वीपर एक तीर्थ बन गया। यह वृषाभासुरके वधसे निर्मित तीर्थ अत्यन्त अद्भुत है—यह जानने योग्य बात है। उस वृषभरूपी महासुरको मारनेके पश्चात् श्रीकृष्णने उसी तीर्थमें स्नान किया था। यह जानकर श्रीकृष्णके मनमें

चिन्ता उत्पन्न हो गयी कि यह पापी अरिष्टासुर बैलके रूपमें था और मेरे हाथ इसकी हत्या हो गयी है। इतनेहीमें भगवती श्रीराधादेवी श्रीकृष्णके समीप पधारीं। उन्होंने अपने नामसे सम्बद्ध उस स्थानको एक तीर्थरूप कुण्ड बना दिया। तबसे समस्त पापोंको हरनेवाले उस शुभ स्थानकी 'राधाकुण्ड' नामसे प्रसिद्धि हुई। प्रसङ्गतया लोग उसे 'अरिष्टकुण्ड' और 'राधाकुण्ड' भी कहते हैं। वहाँ स्नान करनेसे राजसूय और अश्वमेध-यज्ञोंका फल मिलता है। मथुराके पूर्व दिशामें एक तीर्थ 'इन्द्रध्वज' के नामसे विख्यात है, वहाँ स्नान करनेवाले स्वर्गलोकमें जाते हैं। यहाँ परिक्रमा एवं यात्राका पुण्य भगवान्को समर्पित कर देना चाहिये। मनुष्यका कर्तव्य है कि प्रारम्भ करते समय 'चक्रतीर्थ' में स्नान करे और यात्रा समाप्तिके अवसरपर 'पञ्चतीर्थकुण्ड' में स्नान कर ले। यहाँ रात्रि-जागरणका भी नियम है। इससे मनुष्यके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।

भद्रे! 'अन्नकूटपर्वत' की परिक्रमाका विधान मैंने तुमसे बतला दिया। इसी प्रकार इसी क्रमसे आषाढ़में भी प्रदक्षिणा की जाती है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक भगवान् श्रीहरिके इस तीर्थकी प्रदक्षिणाके प्रसङ्गका तथा गोवर्धनके माहात्म्यको सुनता है, उसे गङ्गामें स्नान करनेका फल मिल जाता है।

**भगवान् वराह कहते हैं—**पृथ्वि! अब एक इतिहासयुक्त दूसरा प्रसङ्ग सुनो। मथुराके दक्षिण किसी नगरमें सुशील नामक एक धनी वैश्य रहता था। उस वैश्यका प्रायः सारा जीवन क्रय-विक्रयमें ही बीत गया। न कभी उसे किसी प्रकारका सत्सङ्ग प्राप्त हुआ और न उसने कोई दान-धर्म आदि सत्कर्म ही किये। इस प्रकार गृह-कुटुम्बमें आसक्त रहते ही वह वैश्य कालवश होकर इस लोकसे चल बसा और उसे प्रेतयोनि

३०२ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १६४-१६५

मिली और बिना जलवाले तथा छायारहित जङ्गलोंमें भूख-प्याससे व्याकुल होकर वह इधर-उधर भटकने लगा। यों घूमता हुआ वह भयंकर प्रेत मरुस्थलमें पहुँच गया और बहुत दिनोंतक वहाँ एक वृक्षपर निवास करता रहा।

पृथ्वि! इस प्रकार बहुत समय व्यतीत हो जानेपर दैवयोगसे वहाँ एक खरीद-बिक्री करनेवाला वैश्य आया, जिसे देखकर उस प्रेतको अत्यन्त प्रसन्नता हुई और नाचते हुए वह बोला—'अहो! तुम इस समय मेरा आहार बनकर यहाँ आ गये हो।' अब क्या था, प्रेतकी बात सुनकर वह व्यापारी वैश्य अत्यन्त भयभीत होकर भाग चला। पर प्रेतने दौड़कर उसे पकड़ लिया और कहा—'अब मैं तुम्हें खाऊँगा।' उस प्रेतकी बात सुनकर महाजनने कहा—'राक्षस! मैं अपने परिवारके भरण-पोषणके विचारसे इस घोर वनमें आया हूँ। मेरे घरमें बूढ़े पिता और माता हैं, एक पतिव्रता पत्नी भी है। यदि तुम मुझे खा लोगे तो उन सबकी मृत्यु हो जायगी।' उस वैश्यकी बात सुनकर प्रेतने पूछा—'महामते! तुम किस स्थानसे यहाँ कैसे आये हो? सब सत्य-सत्य बताओ।'

वैश्यने कहा—'प्रेत! मैं गिरिराज गोवर्धन और महानदी यमुना—इन दोनोंके बीच मथुरापुरीमें रहता हूँ। मैंने पहलेसे जो कुछ सम्पत्ति संचित की थी, वह सब चोर उठा ले गये और मैं सर्वथा निर्धन हो गया, अतः थोड़ा धन लेकर व्यापारके लिये इस मरुस्थलकी ओर आया हूँ। ऐसी स्थितिमें अब तुम्हें जो जँचे, वह करो।

प्रेतने कहा—'वैश्य! तुमपर मुझे दया आ गयी है, अतः अब मैं तुम्हें खाना नहीं चाहता। यदि तुम मेरे वचनका पालन कर सको तो एक शर्तपर मैं तुम्हें छोड़ दूँगा। तुम मेरा एक कार्य सिद्ध करनेके लिये यहाँसे लौटकर मथुरा जाओ। वहाँ जाकर तुम 'चातुःसामुद्रिक' नामक कूपपर जाकर सविधि स्नानकर मेरे नामका उच्चारण करके अपने घरके धनसे विधिपूर्वक पिण्डदान करो और उन स्नान-दानादि सभी कर्मोंका फल मुझे दे देना। बस, इतना ही काम है, अब तुम सुखपूर्वक जा सकते हो।' प्रेतकी बात सुनकर वैश्यने उत्तर दिया—'प्रेत! मेरे पास एक मकानको छोड़कर घरपर और कोई धन नहीं है।' इसपर प्रेतने उससे मुसकाकर कहा—'वैश्य! मैंने जो तुमसे कहा है कि तुम्हारे घरमें धन है, उसका अभिप्राय यह है—तुम्हारे घरमें एक गढ़ा है और उसमें सुवर्णकी बहुत बड़ी संचित राशि गड़ी है। मैं तुम्हें मथुराका मार्ग भी दिखला देता हूँ।'

सूतजी कहते हैं—ऋषियो! इसपर उस वैश्यने पुनः पूछा—'प्रेत! इस योनिमें तुम्हें ऐसा दिव्य ज्ञान कैसे प्राप्त है?

प्रेतने कहा—'वैश्य! मैं भी पहले जन्ममें मथुराका निवासी था। जहाँ साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण विराजते हैं। एक दिन प्रातःकाल उन भगवान्‌के मन्दिरपर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रजनोंका समाज जुटा था। वहाँ एक श्रेष्ठ कथावाचक बैठे थे जो पुराणोंकी पवित्र कथा कह रहे थे। मेरा एक मित्र भी प्रतिदिन वहीं जाया करता था। उस दिन मित्रकी प्रेरणासे मैं भी वहाँ पहुँच गया। अत्यन्त आदरके साथ समाजने बार-बार मुझे संतुष्ट करनेका प्रयत्न किया। उसमें मैंने सुना कि वहाँ एक पवित्र कूप है जो पापोंको धो डालता है। इस कूपमें चारों समुद्र आ करके प्रतिष्ठित होते हैं। इस कूपके माहात्म्यको सुननेसे महान् फल मिलता है। उस समय सभी श्रेष्ठ पुरुषोंने कथा-वाचकजीको धन दिया, किंतु मैं मौन रह गया। तब मित्रने मुझसे पुनः कहा—'प्रियवर! अपनी शक्तिके अनुसार कुछ अवश्य

१४१- गोकर्णका दिव्य देवियोंसे वार्तालाप तथा मथुरामें जाना

अध्याय १६६-१६७ ] 'असिकुण्ड'-तीर्थ तथा विश्रान्तिका माहात्म्य ३०३

देना चाहिये।' इसपर मैंने उन कथावाचकको एक 'सुवर्ण' (आठ रत्ती सोनेकी एक मुद्रा) प्रदान कर दिया। इसके बाद जब मेरी मृत्यु हुई तो मेरे पूर्वकर्मोंके अनुसार यमराजकी आज्ञासे मुझे यह दुःखद प्रेतयोनि मिली। मैंने पूर्वजन्ममें कभी तीर्थस्नान, दान-हवन अथवा पितरोंके लिये तर्पण नहीं किये थे, इसी कारण मुझे प्रेत बनना पड़ा।' इसपर उस वैश्यने पुनः पूछा—'तुम इस वृक्षकी जड़में रहकर कैसे प्राण धारण करते हो?'

प्रेत बोला—'पहलेकी बातें मैं तुम्हें बता ही चुका हूँ। मैंने उन कथावाचकको जो सुवर्णमुद्रा दी थी, उसीके प्रभावसे मैं इस वृक्षपर भी प्रायः तृप्त रहता हूँ, यद्यपि उसे भी मैंने दूसरेकी प्रेरणासे ही दी थी। इसीका परिणाम है कि प्रेतयोनिमें भी मेरा दिव्य ज्ञान बना है।

वसुंधरे! प्रेतकी बात सुनकर वह वैश्य मथुरापुरी गया और वहाँ पहुँचकर उसने प्रेतके निर्देशानुसार सब कुछ वैसा ही किया। इससे वह प्रेत मुक्त होकर स्वर्ग गया।

देवि! यह मथुरापुरीका माहात्म्य है। यहाँ 'चतुःसामुद्रिक' कूपपर पिण्डदान करनेसे परम गति प्राप्त होती है। मथुराके किसी स्थानपर, चाहे वह देवालय हो या चौराहा—जहाँ-कहीं भी किसीकी मृत्यु हो, वह मुक्त हो जाता है, इसमें संदेह नहीं। दूसरी जगहके किये हुए पाप तीर्थोंमें जानेपर नष्ट हो जाते हैं, पर जो पाप उन तीर्थस्थानोंमें किये जाते हैं, वे तो वज्रलेप हो जाते हैं। पर यह मथुरापुरीकी ही विशेषता है कि यदि (भूलसे) यहाँ पाप बन भी गया तो वह वहीं नष्ट भी हो जाता है, क्योंकि यह पुरी परम पुण्यमयी है और इसमें कहीं पापके लिये स्थान नहीं है*। यदि कोई एक पुरुष हजार युगोंतक एक पैरपर खड़ा होकर तपस्या करे और एक व्यक्ति मथुरामें निवास करे तो मथुरावासीका पुण्य ही अधिक होता है। मथुरामें जो क्रोधरहित मानव देवताओंकी पूजा तथा तीर्थोंमें स्नान करते हैं, वे देवयोनिमें जाते हैं। दूसरी जगह एक हजार महाभाग ब्राह्मणोंकी पूजा करनेसे जो फल मिलता है, वही फल मथुरामें एक ब्राह्मणकी पूजासे प्राप्त होता है; क्योंकि देवताओंका सिद्ध समाज मथुरामें आकर सामान्य प्राणीके रूपमें स्थित है। देवताओं, सिद्धों और भूतोंका जो समुदाय है, वे सभी यहाँ चार भुजावाले विष्णुस्वरूप मथुरावासी प्राणियोंका दर्शन करने आते हैं; अतः मथुरामें जो मनुष्य हैं, वे विष्णुके ही स्वरूप हैं।

[अध्याय १६४-१६५]


'असिकुण्ड'-तीर्थ तथा विश्रान्तिका माहात्म्य

धरणीने कहा— प्रभो! महादेव! आपके श्रीमुखसे मैं अनेक प्रकारके तीर्थोंका वर्णन सुन चुकी। अब आप मुझे 'असिकुण्ड' के तीर्थका प्रसङ्ग सुनानेकी कृपा करें।

भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! सुमति नामके एक धार्मिक और विख्यात राजा थे, जिनकी किसी तीर्थयात्रा-प्रसङ्गमें मृत्यु हो गयी। अब उनके पुत्र विमतिने राज्य सँभाला। इसी बीच एक दिन वहाँ नारदजी पधारे। उसने उनका पाद्य एवं अर्घ्य आदिसे स्वागत किया। फिर


* अन्यत्र हि कृतं पापं तीर्थमासाद्य गच्छति। तीर्थे तु यत्कृतं पापं वज्रलेपो भविष्यति।
मथुरायां कृतं पापं तत्रैव च विनश्यति। एषा पुरी महापुण्या यस्यां पापं न विद्यते॥ (१६५।५७-५८)

३०४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १६६-१६७

बातोंने प्रसङ्गमें मुनिने उससे कहा—'राजन्! पिताके ऋणको चुका देनेपर ही पुत्र धर्मका भागी हो सकता है।' यों कहकर नारदमुनि वहीं अन्तर्धान हो गये। मुनिके चले जानेपर राजाने अपने मन्त्रियोंसे नारदजीकी बातका अर्थ पूछा। मन्त्रियोंने कहा—'अपनी तीर्थयात्राका फल आप महाराजको समर्पण कर दें तो पिताका ऋण चुक सकता है, क्योंकि उनकी तीर्थयात्रा अधूरी ही रही थी।' नारदजीके कथनका यही आशय था।

देवि! मन्त्रियोंकी बात सुनकर विमतिने मथुरापुरीमें निवासकी बात सोची, क्योंकि वहाँ प्रायः सभी तीर्थ स्थित हैं। विमतिके मथुरा आनेपर वहाँके तीर्थोंने आपसमें कहा—'इसका सामना करनेमें तो हम सभी असमर्थ हैं; अतः उचित है कि जहाँ भगवान् वराह विराजते हैं, हमलोग उस 'कल्पग्राम' में चलें।' वसुंधरे! इस प्रकार परामर्श करके सभी तीर्थ 'कल्पग्राम' में चले गये। देवि! वराहका रूप धारण कर वहाँ मैं आनन्दसे निवास करता हूँ। वे सभी मेरे सामने कल्पग्राममें आये और कहने लगे—भगवान्! आप स्वयं श्रीहरि हैं, आप अचिन्त्य, अच्युत एवं जगत्के शास्ता और स्रष्टा हैं। प्रभो! आपकी जय हो, जय हो!

भगवान् वराह कहते हैं—वसुधे! जब तीर्थोंने मेरी इस प्रकार स्तुति की, तब मैंने उनसे कहा—'तीर्थवरो! तुम्हारा कल्याण हो। तुम मुझसे कोई वर माँग लो।'

तीर्थ बोले—'वराहका रूप धारण करनेवाले देवेश्वर! यदि आप प्रसन्न हैं तो हमें विपत्तिसे अभय प्रदान करनेकी कृपा कीजिये।'

इसपर मैं चलकर मथुरापुरी आया और अपने दिव्य 'असि' (तलवार)-से विमतिका शिरश्छेद कर दिया। तलवारकी नोकसे वहाँ पृथ्वीमें एक गड्ढा हो गया, जो एक दिव्य कुण्डके रूपमें परिवर्तित हो गया और वही 'असिकुण्ड' नामसे प्रसिद्ध हुआ। इसके प्रभावसे सुमति और विमति भी मुक्त हो गये।

देवि! दक्षिणसे उत्तरतकके तीर्थोंकी जो संख्या मैं पहले कह चुका हूँ, उनकी गणना इस असिकुण्डसे ही आरम्भ करनी उत्तम है। जो मनुष्य द्वादशीके दिन प्रातःकाल सोनेसे उठते ही असिकुण्डमें स्नान करता है, उसे यहाँ वराह, नारायण, वामन और राघवकी सुवर्ण प्रतिमाओंके दिव्य दर्शन होते हैं। इनका दर्शन करनेवाला फिर संसारमें नहीं आता।

भगवान् वराहने कहा—देवि! अब विश्रान्ति-तीर्थकी महिमा सुनो। पहले उज्जयिनीमें एक दुराचारी ब्राह्मण रहता था। वह न देवताओंकी पूजा करता, न साधु-संतोंको प्रणाम करता और न तीर्थोंमें जाकर कभी स्नान ही करता था। वह मूर्ख प्रातः और सायंकाल इन दोनों संध्याओंमें भी सोया रहता था। ब्रह्माजीने बताया है कि सम्पूर्ण आश्रमोंमें गार्हस्थ्य ही उत्तम है। जैसे सभी जन्तु पृथ्वीके आश्रित हैं और शिशुओंका जीवन मातापर अवलम्बित है। इसी प्रकार सम्पूर्ण प्राणिवर्ग गृहस्थोंपर ही आश्रित है। पर वह अधम ब्राह्मण इस आश्रममें भी रहकर सदा चोरी आदिमें ही लगा रहता।

वसुंधरे! एक बार जब वह रातमें चोरीके लिये इधर-उधर दौड़ रहा था, उसी समय राजाके सैनिकोंने उसे पकड़नेके लिये ललकारा। इसपर वह तेजीसे भागता हुआ एक कुएँमें जा गिरा, जहाँ उसकी जीवनलीला ही समाप्त हो गयी और इस प्रकार वह अगले जन्ममें एक वनमें ब्रह्मराक्षस हुआ।

उसका रूप बड़ा भयंकर था। एक समयकी

१४२- ब्राह्मण-प्रेत-संवाद, सङ्गम-महिमा तथा वामन-पूजाकी विधि

अध्याय १६८-१६९]मथुरा तथा उसके अवान्तरके तीर्थोंका माहात्म्य३०५

बात है कि कार्यवश वहीं एक जनसमाज आ गया। उसीमें एक ऐसा ब्राह्मण भी था, जो रक्षोघ्नमन्त्र पढ़कर सबकी रक्षा करता था। अब वह ब्रह्मराक्षस उस ब्राह्मणसे आकर कहने लगा—'विप्र! तुम्हारे मनमें जिस वस्तुकी इच्छा हो, वह मैं तुम्हें देनेके लिये तत्पर हूँ। बहुत दिनोंके बाद आज मुझे मनचाहा भोजन प्राप्त हुआ है। विप्र! तुम उठो और यहाँसे अन्यत्र जाकर कहीं सो जाओ। जिससे मैं इन सबको खाकर तृप्त हो जाऊँ। इसपर ब्राह्मणने कहा—'राक्षस! मैं इन्हींके साथ यहाँ आया हूँ, ये सभी मेरे परिवार ही हैं। अतः मैं इन्हें छोड़ नहीं सकता। तुम यहाँसे चले जाओ। मेरे मन्त्रमें ऐसी शक्ति है कि उसके प्रभावसे तुम इनपर आँखतक नहीं उठा सकते। अस्तु, अब तुम यह बतलाओ कि तुम्हें यह योनि कैसे मिली?'

इसपर वह राक्षस कहने लगा—'विप्र! केवल अनाचारके कारण मेरी यह दुर्गति हुई है।' इस प्रकार उस राक्षसने अपनी सारी बातें यथावत् ब्राह्मणके सामने स्पष्ट कीं। इसपर उस ब्राह्मणने कहा—'राक्षस! तुम अब मित्रकी श्रेणीमें आ गये हो। बोलो मैं तुम्हें क्या दूँ?'

राक्षस बोला—'विप्र! यदि मेरे मनमें जो बात बसी है, वह तुम देना चाहते हो तो दे दो। तुमने मथुरापुरीमें विश्रान्तितीर्थमें जो स्नान किया है, उसका फल मुझे देनेकी कृपा करो, जिससे मैं मुक्त हो जाऊँ।' अब राक्षसके दुःखसे दुःखी होकर वह कृपालु ब्राह्मण बोला—'राक्षस! विश्रान्ति नामक तीर्थके विषयमें तुम्हें जानकारी कैसे प्राप्त हुई और उसका ऐसा नाम क्यों हुआ? इसे बतानेकी कृपा करो।'

राक्षस बोला—'ब्राह्मण! मैं पहले उज्जयिनीमें निवास करता था। एक समयकी बात है, मैं संयोगवश श्रीविष्णुके मन्दिरमें चला गया। उस मन्दिरके फाटकपर एक कथा कहनेवाले वेदके विद्वान् ब्राह्मण बैठते थे, जिनका विश्रान्तितीर्थकी महिमा सुनाना प्रतिदिनका व्रत था। उस माहात्म्यको सुननेसे ही मेरे हृदयमें भक्ति उदित हुई। अनघ! मुझे वहीं यह सुननेका अवसर मिला कि इस तीर्थका 'विश्रान्ति' नाम कैसे हुआ है? उन्होंने ही स्पष्ट बतलाया था कि इस स्थानपर संसारके शासक श्रीहरि विश्राम करते हैं। उन विशाल भुजावाले प्रभुको वासुदेव भी कहते हैं। इसीलिये यह तीर्थ 'विश्रान्ति' नामसे विख्यात हुआ है।' राक्षसकी यह बात सुनकर उस ब्राह्मणने कहा—'राक्षस! उस तीर्थमें एक बार स्नान करनेका पुण्यफल मैंने तुम्हें दे दिया।' प्रिये! ब्राह्मणके मुखसे यह वचन निकलते ही वह राक्षस उस योनिसे मुक्त हो गया। [अध्याय १६६-१६७]


मथुरा तथा उसके अवान्तरके तीर्थोंका माहात्म्य

भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! भगवान् शिव इस मथुरापुरीकी निरन्तर रक्षा करते हैं। उनके दर्शनमात्रसे मथुराका पुण्य-फल सुलभ हो जाता है। बहुत पहले रुद्रने पूरे एक हजार वर्षतक मेरी कठिन तपस्या की थी। मैंने संतुष्ट होकर कहा—'हर! आपके मनमें जो भी हो, वह वर मुझसे माँग लें।

महादेवजी बोले—'देवेश! आप सर्वत्र विराजमान हैं। आप मुझे मथुरामें रहनेके लिये स्थान देनेकी कृपा करें।' इसपर मैंने कहा—'देव! आप मथुरामें क्षेत्रपालका स्थान ग्रहण करें—मैं यह चाहता हूँ। जो व्यक्ति यहाँ आकर आपका दर्शन नहीं करेगा, उसे कोई सिद्धि प्राप्त न होगी। जिस प्रकार स्वर्गमें इन्द्रकी अमरावतीपुरी है, वैसी ही जम्बूद्वीपमें यह मथुरापुरी है। यद्यपि मथुरामण्डलका विस्तार बीस योजनोंका है, पर वहाँ एक-एक पैर रखनेपर भी अश्वमेध-यज्ञोंका फल मिलता है। इस क्षेत्रमें साठ करोड़, छः

३०६संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १६८-१६९

हजार तीर्थ हैं। गोवर्धन तथा अक्रूरक्षेत्र—ये दो करोड़ तीर्थोंके समान हैं एवं 'प्रस्कन्दन' और 'भाण्डीर'—ये छः कुरुक्षेत्रोंके समान हैं। 'सोमतीर्थ', 'चक्रतीर्थ', 'अविमुक्त', 'यमन', 'तिन्दुक' और 'अक्रूर' नामक तीर्थोंकी 'द्वादशादित्य' संज्ञा है। मथुराके सभी तीर्थ कुरुक्षेत्रसे सौ गुना बढ़कर हैं, इसमें कोई संशय नहीं। जो मथुरापुरीके इस माहात्म्यको समाहित चित्तसे पढ़ता या सुनता है, वह परमपदको प्राप्त होता है और अपने मातृ-पितृ—दोनों पक्षोंके दो सौ बीस पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है।

मथुराके सभी स्थानोंमें भगवान् श्रीकृष्णके चरणके चक्रचिह्न सुशोभित हैं। उन्हींके मध्यमें एक ऐसा भी तीर्थ है, जहाँ चक्रका आधा ही चिह्न दृष्टिगोचर होता है। वहाँके निवासी मुक्ति पानेके अधिकारी हो जाते हैं—इसमें संशय नहीं। श्रीकृष्णकी क्रीडाभूमिके भी दो छोर हैं—एक उत्तर और दूसरा दक्षिण। उन दोनोंके मध्यभागमें वे विराजते हैं। आकारमें वे द्वितीयाके चन्द्रमाके समान हैं। जो मनुष्य वहाँ स्नान और दान करता है, उसे वे दिव्य तीर्थ मथुराक्षेत्रका फल प्रदान करनेके लिये सदा उद्यत रहते हैं। यहाँ नियमके अनुसार रहकर जो शुद्ध भोजन करनेवाले व्यक्ति स्नान करते हैं, उन्हें अक्षय लोकोंकी प्राप्ति होती है—इसमें कोई संशय नहीं। 'दक्षिणकोटि' से आरम्भ करके 'उत्तरकोटि' पर यात्रा समाप्त करनी चाहिये। वहाँ यज्ञोपवीतके प्रमाणभर भूमिपर जो चलते हैं, उनके द्वारा अनेक कुलोंकी रक्षा हो सकती है।

**पृथ्वीने पूछा—**प्रभो! 'यज्ञोपवीत' का क्या माप है, आप यह मुझे स्पष्टतः बतानेकी कृपा करें।

भगवान् वराह कहते हैं— वरवर्णिनि! अब मैं यज्ञोपवीतकी विधि बताता हूँ, सुनो। मेरी क्रीडाभूमिके जो दक्षिणका छोर है, वहाँसे लेकर और उत्तर सिरेतककी जो सीमा है, इसीको 'यज्ञोपवीत' की सीमा कही गयी है। इसी क्रमसे दक्षिणसे आरम्भ करके उत्तरकी सीमापर यात्रा समाप्त करनी चाहिये। घरसे बाहर होनेपर जबतक स्नान न करे, तबतक मौन रहनेका नियम है। वसुंधरे! स्नान करनेके उपरान्त भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा करना परम आवश्यक है। इसके बाद बोला जा सकता है। देवि! स्नान समाप्त होनेपर क्रमशः देवाधिदेव श्रीकृष्णकी पूजा, यज्ञ, पयस्विनी गौका दान, सुवर्ण एवं धनका वितरण कर ब्राह्मणोंको भोजन कराये। इस प्रकार कर्म करनेवाला व्यक्ति पुनः संसारमें लौटकर नहीं आता, वह मेरे धामको प्राप्त होता है। इस 'अर्द्धचन्द्र' तीर्थमें जिनकी मृत्यु होती है या और्ध्वदेहिक क्रिया होती है, वे सभी स्वर्गमें जाते हैं। इस तीर्थमें पुरुषकी हड्डियाँ जबतक रहती हैं, तबतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित रहता है। अधिक क्या? यदि यहाँ गदहेका भी शरीर जला दिया जाय तो वह भी विष्णुका रूप प्राप्त कर सकता है।

मथुराके प्राणी मेरे ही रूप हैं, उनके तृप्त होनेसे मैं तृप्त होता हूँ—इसमें संशय नहीं। देवि! इस विषयमें गरुडका एक आख्यान सुनो। एक बार वे श्रीकृष्ण-दर्शनकी अभिलाषासे मथुरा आये और देखा कि यहाँके सभी निवासी कृष्णके रूप थे। अन्तमें वे जैसे-तैसे भगवान्‌के पास पहुँचे और उनकी बड़ी स्तुति की। उनकी स्तुति सुनकर भगवान्‌ने कहा—'गरुड! तुम किस उद्देश्यसे मथुरा आये हो? और किसलिये यह मेरी स्तुति कर रहे हो? सभी बातें स्पष्ट बताओ।'

**गरुड बोले—**भगवन्! मैं आपके कृष्णरूपके दर्शनकी अभिलाषासे मथुरा आया था। पर यहाँके सभी निवासी मुझे आपके ही स्वरूप दीखे। मेरी दृष्टिमें मथुराकी सारी जनता एक समान प्रतीत होने लगी। सबको एक समान देखकर मैं मोहमें पड़ गया हूँ। गरुडकी यह बात सुनकर श्रीहरि मुसकाये और मधुर वाणीमें इस प्रकार बोले।

श्रीकृष्णने कहा—'गरुड! मथुराके निवासियों- का जो रूप है, वह मेरा ही रूप है। पक्षिराज!

अध्याय १७० ] गोकर्णतीर्थ और सरस्वतीकी महिमा ३०७

जिनके भीतर पाप भरे हैं, वे ही मथुरावासियोंको मुझसे भिन्न देखते हैं।' इस प्रकार कहकर भगवान् कृष्ण तत्क्षण वहीं अन्तर्धान हो गये और गरुड भी वहाँसे वैकुण्ठ गये। यहाँ मरकर मनुष्य, पशु, पक्षी अथवा तिर्यग्योनिके कीड़े, पतंगेतक भी—सब-के-सब चार भुजावाले विष्णुके रूप बन जाते हैं—

यह नितान्त निश्चित है। देवि! यहाँ आकर श्रीकृष्णकी बहन भगवती एकानंशा, उनकी माता यशोदा-देवकी तथा 'महाविद्येश्वरी' देवियोंका अवश्य दर्शन करना चाहिये। यहाँके विश्रान्तितीर्थ, दीर्घविष्णु और केशवके दर्शन करनेसे सभी देवताओंके दर्शन एवं पूजनका पुण्य-फल प्राप्त होता है। [अध्याय १६८-१६९]


गोकर्णतीर्थ और सरस्वतीकी महिमा

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! अब एक दूसरा प्राचीन इतिहास बताता हूँ उसे सुनो। बहुत पहले मथुरामें वसुकर्ण नामक एक प्रसिद्ध वैश्य रहता था। उसकी स्त्री सुशीला बड़ी सद्गुणवती थी, पर उसे कोई संतान न थी। देवि! एक दिन जब वह वैश्य-पत्नी 'सरस्वती' नदीके तटपर अनेक पुत्रवती स्त्रियोंको देखकर एकान्तमें खिन्न होकर रो रही थी तो एक मुनिके हृदयमें बड़ी दया आयी और उन्होंने उससे पूछा—'सुभगे! तुम कौन हो और क्यों रो रही हो?'

इसपर सुशीलाने कहा—'मैं एक पुत्रहीना स्त्री हूँ, पर मेरी सभी सखियाँ पुत्रवती हैं। यही मेरे खेदका कारण है।' इसपर मुनिने कहा—'देवि! भगवान् गोकर्णकी कृपासे तुम्हें पुत्र मिलेगा। यशस्विनि! तुम अपने पतिके साथ उनकी आराधना करो और स्नान, दीपदान-उपहार तथा अनेक प्रकारके जप और स्तोत्रोंद्वारा उन्हें प्रसन्न करनेका प्रयत्न करो।'

मुनिके इस उपदेशको सुनकर वह स्त्री उन्हें प्रणामकर अपने घर गयी और इससे अपने पतिको अवगत कराया। इसपर वसुकर्णने उससे कहा—'देवि! मुनिने जो बात कही है, यह मुझे भी आशाप्रद और अनुकूल जान पड़ती है।' अब वैश्य-दम्पति प्रतिदिन सरस्वती नदीमें स्नानकर पुष्प-धूप-दीप आदिके द्वारा गोकर्ण-महादेवकी आराधना करने लगे। इस प्रकार दस वर्ष बीत जानेपर भगवान् शंकर उनपर प्रसन्न हुए और उन्हें रूपवान् एवं गुणी पुत्र-प्राप्तिका वर दिया। फिर दसवें महीनेमें सुशीलाके एक सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ। वसुकर्णने पुत्र-जन्मोत्सवके समय हजार गौओं, बहुत-से सुवर्ण तथा वस्त्रोंका दान किया। उसने भगवान् गोकर्णकी कृपासे उत्पन्न होनेके कारण उस बालकका नाम भी 'गोकर्ण' रखा। फिर यथासमय उसके अन्नप्राशन, चूडाकरण तथा यज्ञोपवीत आदि संस्कार कराये और वैवाहिक गोदान कराया। अब वसुकर्णका अधिकांश समय भगवान्‌की पूजा-उपासनादिमें बीतने लगा।

इधर गोकर्ण भी युवावस्थामें पहुँच गया, पर उसे कोई पुत्र न हुआ, अतः पिताने उसके तीन और विवाह कर दिये। इस प्रकार उसकी चार भार्याएँ हो गयीं, जो सभी परम सुन्दरी—वय, रूप और उत्तम गुणोंसे सम्पन्न थीं। फिर भी किसीको संतान-सुख सुलभ न हो सका, अतः गोकर्णने भी पुत्र-प्राप्तिके लिये धर्मकृत्य आरम्भ किये और अनेक वापी, कूप, तालाब, मन्दिर आदि निर्माण कराये। पानीके लिये पौसले तथा भोजनके लिये सदावर्तकी भी व्यवस्था की। उसने 'गोकर्णशिव'के संनिकट ही पश्चिम दिशामें भगवान् चक्रपाणिका एक बहुत बड़ा पञ्चायतन (मन्दिर) बनवाया और एक विशाल उद्यान लगवाया, जिसमें अनेक प्रकारके वृक्ष एवं पुष्प भी लगवाये। वे चारों स्त्रियाँ मन्दिरमें जाकर भगवान्‌की पूजा-अर्चा करतीं। इस प्रकार धर्मनिष्ठामें प्रवृत्त गोकर्णके जब सारे धन-धान्य धीरे-धीरे समाप्त

१४३- ब्राह्मण-कुमारीकी मुक्ति

३०८संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १७०

हो गये तो उसे चिन्ता हुई। यह सोचकर कि 'अब महान् कष्टका समय उपस्थित हो गया; क्योंकि माता-पिता तथा आश्रित परिवारके भोजनकी व्यवस्था मुझपर निर्भर है और धनके बिना यह कार्य सुकर नहीं' उसने पुनः व्यापार करनेके लिये मनमें निश्चय किया और कुछ सहायकोंको साथ लेकर मथुरामण्डलसे बाहर गया और कुछ क्रय-विक्रयकी सामग्री लेकर वह अपने घर आया।

एक दिन वह थोड़े विश्रामकी इच्छासे पासके एक पर्वतकी चोटीपर गया, जहाँ बहुत-सी सुन्दर कन्दराएँ थीं। वहाँ जब वह इधर-उधर घूम रहा था कि उसकी दृष्टि एक अनुपम स्थानपर पड़ी, जो स्वच्छ जलसे सम्पन्न था। वहाँ फलवाले वृक्षों और सुगन्धित लता-पुष्पोंकी भी भरमार थी। एक जगह दो पहाड़ोंकी सन्धिमें मालाकी तरह गोलाकार रिक्त स्थान पड़ा था। वहीं उसे ऐसा शब्द सुनायी पड़ा, मानो कोई अतिथिके स्वागतके लिये बुला रहा हो। इतनेमें उसकी दृष्टि एक तोतेपर पड़ी, जो एक पिंजड़ेमें बैठा था। जब गोकर्ण उसके सामने पहुँचा तो उस सुग्गेने कहा—'पान्थ! कृपया आप अपने साथियोंसहित पधारें, इस उत्तम आसनपर बैठें और पाद्य-अर्घ्य, फल-फूल स्वीकार करें। अभी मेरे माता-पिता यहाँ आकर आप सबका विशेषरूपसे स्वागत करेंगे। कारण, जो गृहस्थ आये हुए अतिथिका स्वागत नहीं करता, उसके पितर निश्चय ही नरकमें गिरते हैं। और जो अतिथियोंका सम्मान करते हैं, उन्हें अनन्त कालतक स्वर्गमें आनन्द भोगनेका अवसर मिलता है। जिस गृहस्थके घर अतिथि आकर निराश लौट जाता है, वह अपना पाप उस गृहस्थको देकर उसका पुण्य लेकर चला जाता है। अतएव गृहाश्रमीको चाहिये कि वह सब प्रकारसे प्रयत्नकर अतिथिका स्वागत करे*। अतिथि समयपर आया हो या असमयमें, वह भगवान् विष्णुके समान ही पूजाका पात्र है।'

इसपर गोकर्णने तोतेसे पूछा—'पुराणके रहस्यको जाननेवाले तुम कौन हो? वह मनुष्य धन्य है, जिसके पास तुम निवास करते हो।' इसपर उस तोतेने अपना पूर्व इतिहास बताना प्रारम्भ किया। वह बोला—‘‘पान्थ! बहुत पहलेकी बात है एक बार सुमेरुगिरिके उत्तर भागमें जहाँ महर्षियोंका निवास है, मुनिवर शुकदेव तपस्या कर रहे थे। वे प्रतिदिन पुराणों एवं इतिहासोंका प्रवचन करते, जिसे सुननेके लिये असित, देवल, मार्कण्डेय, भरद्वाज, यवक्रीत, भृगु, अङ्गिरा, तैत्तिरि, रैभ्य, कण्व, मेधातिथि, कृत, तन्तु, सुमन्तु, वसुमान्, एकत, द्वित, वामदेव, अश्वशिरा, त्रिशीर्ष तथा गोतमोदर एवं अन्य भी अनेक वेदज्ञ ऋषि-महर्षि, सिद्ध देवता, पन्नग और गुह्यक आदि आते तथा धर्मसंहिताके विषयमें शङ्काओंका निराकरण कराते। उस समय मैं वामदेव मुनिका दुराचारी शिष्य 'शुकोदर' था। मेरा बचपनसे ही ऐसा स्वभाव बन गया था कि जहाँ धर्मकथा या नीतियोंपर विचार होता, वहाँ मैं अश्रद्धालु बनकर आगे पहुँच जाता और बारंबार तर्क-वितर्क कर प्रश्न करता रहता। गुरुजी मुझे अन्यायवादी बताकर सदा रोकते रहते, पर मेरी प्रकृति नहीं गयी। वहाँ भी मैंने एक दिन यही किया, यद्यपि मेरे गुरुजीने तथा बहुत-से प्रधान मुनियोंने मुझे बहुत रोका, किंतु मैंने उनके वचनकी अवहेलना कर दी। तब शुकदेवजीने क्रोधके आवेशमें आकर मुझे शाप दे दिया और कहा कि 'यह बड़ा ही बकवादी है, अतः जैसा इसका नाम है, उसीके अनुसार यह शुक (तोता) पक्षी हो जाय'—बस क्या था, मैं तुरंत तोता बन गया। फिर मुनियोंकी प्रार्थनापर उन्होंने कहा कि—इसका रूप तो पक्षीका होगा, परंतु यह पुराणोंका जानकार होगा और सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थ इसे अवगत होंगे और अन्तमें मथुरामें मरकर यह ब्रह्मलोकको प्राप्त होगा।”


* अतिथैर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रव्रजते यदि। आत्मनो दुष्कृतं तस्मै दत्त्वा तत्सुकृतं हरेत् ॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन पूज्यो वै गृहमेधिना। काले प्राप्तस्त्वकाले वा यथा विष्णुस्तथैव सः ॥
(१७०। ५३-५४ तथा तुलनीय 'विष्णुधर्मसूत्र' ६७। ३३, हितोपदेश १। ६२, महाभा० १२। १९९ १२; १३ । १२६ । २६ इत्यादि

अध्याय १७१ ] सुग्गेका मथुरा जाना और वसुकर्णसे वार्तालाप ३०९

‘पान्थ! इसके बाद मैं वहाँसे उड़कर इस हिमालयपर आकर इस गुहामें रहने लगा और सावधानीसे सदा ‘मथुरा'का नाम जपता रहता हूँ। फिर मैं एक बहेलियेके चंगुलमें फँस गया, जिससे इस पिंजड़ेमें रहना पड़ता है।' अब गोकर्ण कहने लगा—‘भद्र! मैं पापनाशिनी मथुरापुरीमें ही रहता हूँ और व्यापारसे थककर विश्रामके विचारसे यहाँ आया हूँ। इधर इन दोनोंमें इस प्रकारकी बात हो ही रही थी कि शबरकी स्त्री, जो उस समय सो रही थी, कुछ आहट पाकर नींदसे जग गयी। तोतेने उससे कहा—‘माँ! ये अतिथिरूपमें यहाँ पधारे हैं, अतः पूज्य हैं। इसपर वह स्वागतका सामान संग्रह करने लगी, इसी बीच शबर भी आ पहुँचा। तोतेने उसे भी अतिथि-सत्कारकी सलाह दी। उसने गोकर्णको प्रणाम किया और उसकी पूजा कर स्वादिष्ट फल तथा सुगन्धपूर्ण पेय पदार्थ समर्पण करके उससे कुछ वार्तालाप किया। फिर पूछा—‘अतिथिदेव! कहिये, मैं आपकी और क्या सेवा करूँ?'

गोकर्णने कहा—‘मित्र! यदि स्वागत-सत्कारके अतिरिक्त तुम मुझे अन्य कुछ भी देना चाहते हो तो मुझे इस तोतेको ही दे दो। मैं इसे मथुरामें ले जाऊँगा और अपने पुत्रके रूपमें रखूँगा। इसपर शबर बोला—‘क्या इसके बदले हमें तुम यमुना-स्नानका फल दे सकते हो? इस तोतेने मुझे बताया है कि कोई नीच योनिमें अथवा जन्मसे राक्षस ही क्यों न हो, यदि वह मथुरावास, सङ्गम-स्नान एवं द्वादशीव्रत करता है तो उसे अभीष्ट गति प्राप्त हो सकती है। जो सङ्गममें स्नान तथा भगवान् गोकर्णेश्वरका दर्शन करता है, वह यमपुरीमें नहीं जाता। उसे भगवान् श्रीहरिके लोककी ही प्राप्ति होती है।' इसपर गोकर्णने स्वीकृति दे दी। [अध्याय १७०]


सुग्गेका मथुरा जाना और वसुकर्णसे वार्तालाप

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! इस प्रकार गोकर्णने शबरसे (मथुरास्नानके बदले) उस सुग्गेको प्राप्तकर मथुरा नगरके लिये प्रस्थान किया और वहाँ पहुँचकर उस तोतेको अपने माता-पिताको सौंप दिया तथा उसका परिचय भी दे दिया। फिर कुछ दिनोंके बाद वह व्यापार करनेके लिये उस तोतेको अपने साथ लेकर अपने सहकर्मियोंके साथ समुद्रमार्गसे चल पड़ा।

इसी बीच एक दिन प्रतिकूल वायु चलनेसे समुद्रमें सहसा भयंकर तूफान आ गया, जिससे सभी पोतयात्री घबड़ा गये और ‘गोकर्ण' को लक्ष्यकर कहने लगे—‘कोई निकृष्ट एवं पापी व्यक्ति इस जहाजपर चढ़ गया है, जिसके कारण हमारी यह दुर्दशा हुई है एवं हम सभी मरे जा रहे हैं। गोकर्णने तोतेके सामने अपनी दयनीय स्थिति रखी और कहा कि ‘पुत्रहीन व्यक्तिकी बड़ी दुर्गति होती है। यहाँ जहाजमें जितने व्यक्ति हैं, उनके बीच मैं ही सबसे बड़ा पापी हूँ। अब क्या करना उचित है—यह तुम्हीं जानते हो।'

तोतेने कहा—‘पिताजी! आप खेद न करें, मैं अभी एक उपाय करता हूँ।' इस प्रकार गोकर्णको आश्वासन देकर वह तोता उड़ा और ध्रुवकी ओर उत्तर दिशामें बढ़ता गया। आगे एक योजनके ऊँचे पर्वतकी एक चोटी पड़ी, जिसे लाँघकर वह भगवान् विष्णुके सुन्दर मन्दिरके पास पहुँचा, जिसके प्रकाशसे सब ओर वहाँ बड़ी शोभा हो रही थी। उसके भीतर प्रवेश कर उसने कहा—‘यहाँ यह कौन देवता विराज रहे हैं? मैं उनसे जानना

३१०संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १७१

चाहता हूँ कि अपार कठिनाईको पार करनेवाले पुण्यात्मा पुरुषकी भाँति मेरे पिताजी इस घोर समुद्रको कब पार कर सकेंगे?'

पृथ्वि! वह सुग्गा इस चिन्तामें ही था कि वहाँ एक देवी आयी, जिसके हाथमें एक सुवर्णपात्र था। उसने विष्णुकी पूजा की और 'नमो नारायणाय' कहकर एक उत्तम आसनपर बैठ गयी। अभी पलमात्र ही समय बीता होगा कि फिर वहाँ वैसी असंख्य रूपवती देवियाँ आ गयीं और वे सभी नृत्य, गान, वाद्यसे देवार्चन करके वापस चली गयीं। वहीं जटायुके वंशके कुछ पक्षी भी थे। उन्होंने उस सुग्गेसे पूछा—'तुम यहाँ कैसे पहुँचे, क्योंकि अगाध जलसे परिपूर्ण समुद्रको पार करना साधारण काम नहीं है।' इसपर तोतेने उत्तर दिया—'मेरे पिताजी वायुकी तेज गतिमें समुद्री जहाजपर बड़ी कठिनाईका अनुभव कर रहे हैं। उनकी रक्षाके लिये ही मैं यहाँ आया हूँ। आपलोग कुछ प्रयत्न करें, जिससे वे सुखी हो सकें।'

पक्षीगण बोले—'जिस मार्गसे हम चलें, तुम उसका अनुसरण करो। हम पादविन्याससे ही समुद्रमें चलकर चोंचोंसे मकर-नक्रादिका संहार कर डालेंगे। इससे तुम्हारे साथ तुम्हारे पिता भी समुद्र तर जायँगे।' अब वह तोता उन पक्षियोंके पीछे-पीछे चलता हुआ गोकर्णके पास पहुँचा और उनके प्रयाससे गोकर्ण समुद्रसे बाहर निकल गया। वहाँ पहुँचकर वह उसी देवमन्दिरके सामने गया; जहाँ कमलोंसे सुशोभित एक सरोवर था, जिसकी सीढ़ियाँ मणियों और रत्नोंसे बनी थीं। गोकर्णने उस सरोवरमें स्नान कर देवताओं तथा पितरोंका तर्पण किया, फिर मन्दिरमें जाकर भगवान् केशवकी आराधना कर वह प्रभूत रत्नोंद्वारा सम्पन्न उस पञ्चायतनमन्दिरमें तोतेके साथ एक ओर छिप गया। इतनेमें ही वे देवियाँ, जिन्होंने पहले उस मन्दिरमें देवार्चन किया था, वहीं पुनः आ गयीं और देवपूजन करने लगीं। फिर उनमेंसे एक प्रधान देवीने कहा—'सखियो! ब्रह्ममें निष्ठा रखनेवाले गोकर्णके खानेके लिये दिव्य फल और पीनेके लिये उत्तम जल प्रदान करो, जिससे तीन महीनोंतक इसकी तृप्ति बनी रहे एवं इसके शोक, मोह तथा पाप भी नष्ट हो जायँ।'

इसपर उन देवियोंने सब कुछ वैसा ही कर गोकर्णसे कहा—'तुम निश्चिन्त एवं निर्भय होकर इस स्वर्गके समान सुखदायी स्थानमें तबतक निवास करो, जबतक तुम्हारा काम सिद्ध न हो जाय,' और फिर वे वहाँसे चली गयीं। अब गोकर्ण वहाँ इस प्रकार रहने लगा मानो मथुरापुरीमें ही हो। कुछ समयके पश्चात् उसका जहाज भी संयोगवश किनारे लग गया। अब इधर जहाजपरके उसके साथी उसे न देखकर परस्पर कहने लगे—'ओह, पता नहीं गोकर्ण कहाँ चला गया? वह मर गया, जलमें डूब गया अथवा किसी जीवने उसे खा लिया? हो सकता है, लज्जाके कारण वह समुद्रमें डूब गया हो। अब हमलोगोंका यही कर्तव्य है कि उसके पिताके सामने हम ही—पुत्ररूपमें रहें। उपार्जित रत्नोंमेंसे जितना भाग गोकर्णका हो, वह उसके पिताको हम सौंप दें।'

उधर गोकर्णका मन बड़ा शोकाकुल था। उसने तोतेसे माता-पिताके हितकी बात पूछी। सुग्गेने कहा—'मैं तुच्छ पक्षी आपको वहाँ ले चलूँ—यह मेरी शक्तिसे बाहर है। हाँ, मैं आपकी आज्ञासे आकाशमार्गसे मथुरा जाकर तथा आपकी बात उनके पास तथा उनका संदेश आपके पास

१४४- साम्बको शाप लगना और उनका सूर्याराधन व्रत

अध्याय १७२-१७३ ] गोकर्णका दिव्य देवियोंसे वार्तालाप तथा मथुरामें जाना ३११


पहुँचा सकता हूँ।' गोकर्णने कहा—'पुत्र! ठीक है, यही करो तुम मथुरा जाओ और मेरी अवस्था पिताजीसे बता दो तथा वहाँसे फिर शीघ्र वापस आ जाओ।'

अब वह सुग्गा मथुरा पहुँचा और गोकर्णकी सारी स्थिति उसके पितासे बता दी। इस विषम परिस्थितिको सुनकर माता-पिताको दारुण दुःख हुआ और बहुत देरतक उनकी आँखोंसे अश्रुधारा गिरती रही। फिर उस सुग्गेके प्रति उनके मनमें बड़ा स्नेह हुआ। उन्होंने कहा—'विहंगम ! तुमने धर्मके अनुकूल (नीतिपूर्ण) वृत्तान्त कहकर हमारे जीवन-रक्षाके लिये यह बड़ा उत्तम कार्य किया है।' वसुंधरे! इस प्रकार उस पक्षीने अपनी बुद्धि एवं विद्याके बलसे पुत्र-शोकके कारण अत्यन्त दुःखी गोकर्णके वृद्ध माता-पिताको पूर्ण शान्ति प्रदान की। इधर गोकर्णके बीसों साथी भी वसुकर्णके पास प्रभूत रत्न लेकर आये। उनके पास अतुल रत्न-राशि थी, अतः वसुकर्णके प्रति उन सबने पुत्र-जैसा ही व्यवहार किया और फिर उसकी आज्ञा लेकर वे अपने-अपने घर गये। [अध्याय १७१]


गोकर्णका दिव्य देवियोंसे वार्तालाप तथा मथुरामें जाना

भगवान् वराह कहते हैं—शुभे! गोकर्णने दिव्य देवियोंके आदेशसे उस मन्दिरमें तेरह दिनोंकी आराधना आरम्भ की। इस बीच वे देवियाँ भी यथासमय आकर नृत्य करतीं! इसी बीच एक दिन गोकर्णने उन सभी देवियोंको अत्यन्त म्लान, निस्तेज और दुःखी देखा। वह सोचने लगा कि शास्त्रोंमें ठीक ही कहा गया है कि पुत्रहीन पुरुषकी सद्गति नहीं होती। अहो! मुझ पापात्माके दोषसे ये देवियाँ भी इस स्थितिमें आ गयी हैं, मानो इन्हें बुढ़ापेने घेर लिया है।' फिर साहसकर उसने उनसे उदास होनेका कारण पूछा। इसपर उन देवियोंने कहा—'महाभाग! यह बात पूछने योग्य नहीं है। सभी कार्योंमें कालात्मा उस दैवका ही हाथ है। पर गोकर्ण बार-बार आग्रहपूर्वक उन्हें प्रणाम कर इस प्रश्नको पूछता ही रहा और उनके न बतलानेपर उसने समुद्रमें डूबकर अपने प्राणत्याग करनेकी बात भी कही।

उसके ऐसा कहनेपर उन देवियोंमेंसे ज्येष्ठादेवीने कहा—'दुःख तो उसी व्यक्तिके सामने कहना चाहिये, जो उसे दूर कर सके, फिर भी बताती हूँ। मथुरा नामसे प्रसिद्ध एक दिव्य पुरी है, जिसके प्रभावसे मनुष्य मुक्ति पानेका अधिकारी बन जाता है। इस समय अयोध्यानरेश चातुर्मास्यव्रत करनेके विचारसे अपनी चतुरङ्गिणी सेनाके साथ वहीं गये हैं। वहाँ विष्णुके पाँच मन्दिर तथा अनेक फुलवारियाँ हैं, पर उनके सेवकोंने उन बगीचोंको नष्ट-भ्रष्ट कर दिया है।'

इतना कहकर वह तथा सभी देवियाँ एक साथ रोने लगीं। इससे गोकर्ण अत्यन्त दुःखी हो गया। फिर उसने उन्हें प्रणाम कर और हाथ जोड़कर सबको सान्त्वना देते हुए मधुर वाणीमें उनसे कहा—'देवियो! यदि मैं अयोध्याके राजासे मिला तो यह दुर्व्यवहार अवश्य बन्द करा दूँगा, परंतु इस समय प्रतिकूल प्रारब्धने मुझे सर्वथा वञ्चित कर रखा है।' गोकर्णके इस प्रकार कहनेपर देवियोंने उस वैश्यसे पूछा—'तुम कौन हो और कहाँसे आये हो?'

गोकर्णने अपना नाम-पता बताकर फिर उनका परिचय पूछा तो उन्होंने अपनेको 'उद्यानाधिष्ठात्री देवी' बतलाया। इसपर गोकर्णने