वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १५८—१६०] मथुरा-तीर्थका प्रादुर्भाव, इसकी प्रदक्षिणाकी विधि एवं माहात्म्य २९३
प्रदक्षिणा करता है, वह मानो सात द्वीपोंवाली पृथ्वीकी प्रदक्षिणा कर लेता है। सभी मनोरथको चाहनेवाले मनुष्योंको सब प्रकारसे प्रयत्नकर मथुरा जाकर इसकी विधिपूर्वक प्रदक्षिणा करनी चाहिये। एक बार सप्तर्षियोंके पूछनेपर ब्रह्माजीने कहा था—'समस्त वेदोंके अध्ययन, सभी तीर्थोंमें स्नान, अनेक प्रकारके दान और यज्ञ-यागादि एवं कुआँ-तालाब, धर्मशाला बनवानेसे जो पुण्य होता है और उनका जो फल मिलता है, उससे सौ गुना अधिक फल मथुराकी परिक्रमासे प्राप्त होता है।' ब्रह्माजीसे यह बात सुनकर सातों ऋषियोंने उन्हें प्रणाम किया और वहाँसे मथुरा आकर वहाँ आश्रम बनाये। उनके साथ ध्रुव भी थे। फिर उन सबोंने अपनी कामनाकी पूर्तिके लिये कार्तिकमासके शुक्लपक्षकी नवमी तिथिको मथुराकी विधिवत् परिक्रमा की। इससे वे सभी मुक्त हो गये।
भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! कार्तिक मासके शुक्लपक्षकी अष्टमी तिथिको व्रती साधक मथुरामें उपस्थित होकर 'विश्रान्तितीर्थ' में स्नान करे और देवताओं तथा पितरोंके पूजनमें संलग्न हो जाय। फिर विश्रान्तिके दर्शन करनेके पश्चात् दीर्घविष्णु और भगवान् केशवदेवका दर्शन करना चाहिये। उस रात ब्रह्मचर्यपूर्वक उपवास या अल्पाहार करे, साथ ही अपने अन्तःकरणको शुद्ध करनेके लिये अपवादभूत सायंकाल भी दन्तधावन करे। फिर स्नान करके धौतवस्त्र पहने और मौनव्रत धारणकर हाथमें तिल, चावल और कुशा लेकर पितरों एवं देवताओंकी पूजा करे।
फिर नवमीको प्रातःकाल ब्राह्ममुहूर्तमें संयमपूर्वक पवित्र होकर सूर्योदयके पूर्व ही प्रदक्षिणार्थ यात्राका कार्य आरम्भ कर देना चाहिये। प्रातःकालका स्नान 'दक्षिणकोटि' नामक तीर्थमें करनेकी विधि है। सर्वप्रथम दोनों पैरोंको धोकर आचमन करके मङ्गलोंके स्वरूप तथा बालब्रह्मचारी हनुमान्जीको प्रसन्न करनेकी चेष्टा करे, जिनके स्मरणसे समस्त उपद्रव शान्त हो जाते हैं। फिर प्रार्थना करे—'भगवन्! आपने जिस प्रकार भगवान् श्रीरामकी यात्रामें सिद्धि प्रदान की थी, उसी प्रकार मेरी इस परिक्रमा-यात्रामें सफलता प्रदान करें।' फिर गणेश्वर, भगवान् विष्णु, हनुमान्जी तथा कार्तिकेयकी विधिपूर्वक फल, माला तथा दीप आदिके द्वारा पूजनकर यात्रा आरम्भ करे। यात्रामें 'वसुमती' देवीका दर्शन बहुत आवश्यक है। वहीं राजाओंके आयुध रखनेके स्थानमें सम्पूर्ण भयको भगानेवाली भगवती 'अपराजिता' का भी दर्शन करे। देवि! फिर 'कंसवासनिका', 'औग्रसेना', 'चर्चिका' तथा 'वधूटी' देवियोंका दर्शन करे। ये देवियाँ दानवोंको पराजय और देवताओंको विजय प्रदान करानेवाली हैं। पुनः देवताओंसे सुपूजित आठ माताओं, गृहदेवियों और वास्तुदेवियोंका दर्शनकर तथा उनसे आज्ञा लेकर यात्रा आरम्भ करे। जबतक परिक्रमामें 'दक्षिणकोटि' तीर्थ न मिले, तबतक मौन होकर यात्रा करनी चाहिये। 'दक्षिणकोटि' तीर्थमें स्नान, पितृतर्पण, देवदर्शन और प्रणामकर भगवान् श्रीकृष्णद्वारा पूजित भगवती 'इक्षुवासा' को प्रणाम करे। इसके बाद 'वासपुत्र', 'अर्कस्थल', 'वीरस्थल', 'कुशस्थल', 'पुण्यस्थल' और प्रचुर पापोंके नाशक 'महास्थल' पर जाय। ये सभी तीर्थ सम्पूर्ण पापोंको दूर भगा देते हैं। फिर 'हयमुक्ति', 'सिन्दूर' और 'सहायक' नामके प्रसिद्ध स्थानोंपर जाय।
इस विषयमें ऋषियोंकी कही हुई एक प्राचीन गाथा सुनी जाती है—कहते हैं, कभी कोई राजकुमार घोड़ेपर सवार होकर मथुराकी सुखपूर्वक परिक्रमा कर रहा था। पर बीचमें ही नौकरसहित घोड़ेकी तो मुक्ति हो गयी, पर वह राजकुमार इस