वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९२ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १५८–१६०
पहुँचकर मेरी (श्रीकृष्णके विग्रहकी) विधिवत् पूजाकर प्रदक्षिणा कर ली, उसने मानो सात द्वीपोंवाली पृथ्वीकी प्रदक्षिणा कर ली।
धरणीने पूछा— भगवन्! प्रायः सभी तीर्थ-क्षेत्र पशु, भूत, पिशाच और विनायक—इन उपद्रव करनेवाले प्राणियोंसे बाधित होते रहते हैं। फिर यह मथुरापुरी किस देवताके द्वारा सुरक्षित रहकर अनन्त फल प्रदान करनेमें समर्थ है?
भगवान् वराह कहते हैं— देवि! मेरे प्रभावसे विघ्नकारी शक्तियाँ मेरे इस क्षेत्रपर या भक्तोंपर कभी दृष्टि नहीं डाल पातीं। इसकी रक्षाके लिये मैंने दस दिक्पालों और चार लोकपालोंको नियुक्त कर रखा है, जो निरन्तर इस पुरीकी रक्षामें तत्पर रहते हैं। इसके पूर्वमें इन्द्र, दक्षिणमें यम, पश्चिममें वरुण, उत्तरमें कुबेर तथा मध्यभागमें उमापति महादेवजी रक्षा करते हैं। जो मनुष्य मथुरामें कोठेदार मकान बनवाता है, उस जीवन्मुक्त पुरुषको चार भुजाओंवाले विष्णुका ही रूप समझना चाहिये।
अब यहाँके निर्मल जलवाले 'मथुराकुण्ड' की एक आश्चर्यकी बात कहता हूँ, सुनो। हेमन्त-ऋतुमें इसका जल गर्म रहता है और ग्रीष्म-ऋतुमें बर्फके समान शीतल। साथ ही वर्षा-ऋतुमें वहाँका पानी न बढ़ता है और न ग्रीष्म-ऋतुमें सूखता ही है। वसुंधरे! मथुरामें पग-पगपर तीर्थ हैं, जिनमें स्नानकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है।
'मुचुकुन्दतीर्थ' नामक यहाँ एक दिव्य क्षेत्र है, जहाँ देवासुरसंग्रामके बाद राजा मुचुकुन्दने शयन किया था। वहाँ स्नान करनेवालेको अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है तथा मरनेवालोंको मेरे लोककी।
देवि! भगवान् केशवके नाम-संकीर्तनमें ऐसी शक्ति है कि वह इस जन्मके तथा पूर्वजन्मोंमें किये हुए सभी पापोंको उसी क्षण नष्ट कर डालता है। अतः कार्तिक शुक्लकी अक्षय-नवमीको भगवन्नाम-कीर्तन करते हुए मथुराकी प्रदक्षिणा करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। इसकी विधि यह है कि कार्तिक शुक्ला अष्टमीको मथुरामें जाकर ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए निवास करे तथा रात्रिमें ही प्रदक्षिणाका संकल्प कर ले। प्रातःकाल दन्तधावनकर स्नान करके धौतवस्त्र पहन ले और मौन होकर इसकी प्रदक्षिणा प्रारम्भ करे। इससे मनुष्यके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। प्रदक्षिणा करते समय मनुष्यको यदि कोई दूसरा व्यक्ति स्पर्श करता है तो उसके भी सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं, इसमें कुछ विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। प्रदक्षिणा करनेपर जो पुण्य मिलता है, वही पुण्य मथुरामें जाकर स्वयं प्रकट होनेवाले भगवान् श्रीहरिके दर्शनसे सुलभ हो जाता है।
भूमिकी परिक्रमाकी गणना भी योजनोंके प्रमाणमें की गयी है। पृथ्वीमें स्थित साठ हजार करोड़ और साठ सौ करोड़ तीर्थ हैं। देवताओं और आकाशमें स्थित तारागणोंकी संख्या भी इतनी है। यह गणना विश्वके आयुस्वरूप वायु, ब्रह्मा, लोमश, नारद, ध्रुव, जाम्बवान्, बलि और हनूमान्ने की है। इन लोगोंने वन, पर्वत-समुद्रसहित इस भूमिकी बाहरी रेखासे अनेक बार परिक्रमाएँ की थीं। सुग्रीव, पाँचों पाण्डव और मार्कण्डेय-प्रभृति कुछ योगसिद्धलोगोंने पृथ्वीके भीतर भ्रमण कर भी तीर्थोंकी गणना की। पर अन्य जो थोड़े ओज-बल अथवा बुद्धिवाले हैं, वे मनसे भी इन सबोंके परिभ्रमणमें असमर्थ हैं, प्रत्यक्ष गमनकी तो बात ही क्या? किंतु इन सातों द्वीपों और तीर्थोंमें घूमनेसे जो फल होता है, उससे भी अधिक फल मथुराकी परिक्रमामें मिल जाता है। जो मथुराकी