भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय १५८-१६० ] मथुरा-तीर्थका प्रादुर्भाव, इसकी प्रदक्षिणाकी विधि एवं माहात्म्य २९१

जलपूर्ण कलशोंसे गोप-वेषधारी भगवान् श्रीकृष्णका अभिषेक किया था। तभीसे उस कूपका नाम ‘सप्तसामुद्रिक’ कूप पड़ गया। जो पुरुष इस ‘सप्तसामुद्रिक’ कूपपर जाकर पितरोंके लिये श्राद्ध करता है, वह अपने कुलकी सतहत्तर पीढ़ियोंको तार देता है। सोमवती अमावास्याके दिन जो वहाँ पिण्डदान करता है, उसके पितर करोड़ वर्षके लिये तृप्त हो जाते हैं।

वसुंधरे ! यहाँ ‘वसुपत्र’ नामसे विख्यात एक तीर्थ है, जो मेरा परम पवित्र एवं उत्तम स्थान है। मथुराके दक्षिणभागमें ‘फाल्गुनक’ और लगभग आधे योजनकी दूरीपर पश्चिमकी ओर धेनुकासुरका ‘तालवन’ नामका प्रसिद्ध स्थान है। विशालाक्षि ! यहाँ ‘संपीठककुण्ड’ नामका भी मेरा एक श्रेष्ठ तीर्थ है, जिसमें सदा पवित्र एवं स्वच्छ जल भरा रहता है। जो लोग एक रात यहाँ निवास करके स्नान करते हैं, उन्हें ‘अग्निष्टोम’ यज्ञका फल मिलता है—इसमें कोई संशय नहीं।

वसुंधरे ! कृष्णावतारमें मैंने बड़े पवित्र भावसे सूर्यदेवकी आराधना की थी, जिससे मुझे (पीछे साम्ब-जैसे) रूपवान्, गुणवान् एवं ज्ञानी पुत्रकी प्राप्ति हुई थी। यहीं आराधनाके समय मुझे हाथमें कमल लिये हुए भगवान् सूर्यके दर्शन हुए थे। देवि! तबसे भाद्रपदमासके कृष्णपक्षकी सप्तमी तिथिको प्रखर तेजवाले सूर्य वहाँ सदा विराजते हैं। उस कुण्डमें जो मनुष्य सावधान होकर स्नान करता है, उसे संसारमें कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं रहती; क्योंकि सूर्य सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके दाता हैं। देवि! यदि रविवारको सप्तमी तिथि पड़ जाय तो उस शुभ समयमें स्नान करनेवाला पुरुष हो अथवा स्त्री, वह समग्र फल प्राप्त करता है। प्राचीन समयमें राजा शान्तनुने भी इसी स्थानपर तपस्याकर भीष्म नामक परम पराक्रमी पुत्रको प्राप्त किया था और जिसे लेकर वे तुरंत हस्तिनापुरके लिये प्रस्थित हो गये थे। अतएव वहाँ स्नान तथा दान करनेसे निश्चय ही मनोऽभिलषित फल मिलता है।

[ अध्याय १५६-१५७]


मथुरा-तीर्थका प्रादुर्भाव, इसकी प्रदक्षिणाकी विधि एवं माहात्म्य

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे ! मेरे मथुराक्षेत्रकी सीमा बीस योजनमें है*, जिसमें जहाँ-कहीं भी स्नानकर मानव सम्पूर्ण पापोंसे छूट जाता है। वर्षा-ऋतुमें मथुरा विशेष आनन्दप्रद रहती है और हरिशयनीके बाद चार मासके लिये तो मानो सातों द्वीपोंके पुण्यमय तीर्थ और मन्दिर मथुरामें ही पहुँच जाते हैं। जो देवोत्थानके समय मेरे उठनेपर मथुरामें मेरा दर्शन करते हैं, उनके सामने वहाँ मैं सदा उपस्थित रहता हूँ, इसमें कोई संशय नहीं। वसुधे! उस समय मेरे (श्रीकृष्णरूपके) कमल-जैसे मुखको देखकर मनुष्य सात जन्मोंके पापोंसे तत्काल मुक्त हो जाता है। जिसने मथुरामें


* मथुराका माहात्म्य इस वराहपुराणके अतिरिक्त 'नारदपुराण' उत्तरभाग अध्याय ७५—८०; पद्मपुराण, पातालखण्ड, अध्याय ६९ से ८३, उत्तरखण्ड ९५; स्कन्दपु० ४।२० आदिमें भी है। यह सप्तपुरियोंमेंसे एक है। इसका पूर्वनाम मधुरा (वाल्मी० उत्तरकाण्ड ७।१०८), मधुपुरी तथा महोली भी है। यहाँ (वराहपुराणमें) इसकी सीमा बीस योजन कही गयी है। हुएनशांगके समय मथुरामण्डल ८३३ मीलमें एवं मथुरानगर प्रायः चार मीलके घेरेमें था। (Julien's Hiueon Thsang II. 20, Cunningham's Ancient Geography. P. 314). जैन-ग्रन्थोंमें इसका नाम 'सौरिपुर' है। पीछे वीरसिंह, जयसिंह तथा पेशवाओंने यहाँ बार-बार अनेक मन्दिर बनवाये। यहाँके मन्दिरों तथा वनोंके विशेष परिचय एवं आधुनिक निर्देशके लिये "कल्याण" 'तीर्थाङ्क' को देखना चाहिये।