वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २९० | संक्षिप्त श्रीवराहपुराण | [ अध्याय १५६-१५७ |
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वध किया था। उस ‘केशीतीर्थ’ में पिण्डदान करनेसे गयामें पिण्ड देनेके समान ही फल मिलता है। यहाँ स्नान-दान और हवन करनेसे ‘अग्निष्टोम’-यज्ञका फल मिलता है। यहाँ द्वादशादित्यतीर्थपर यमुना लहराती है, जहाँ कालियनाग आनन्दपूर्वक निवास करता था। यहीं (कालियह्रदमें) मैंने उसका दमन और द्वादश आदित्योंकी स्थापना की थी। इस तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है और जो व्यक्ति यहाँ प्राणोंका परित्याग करता है, वह मेरे धाममें आ जाता है। इस स्थानका नाम ‘हरिदेव’ क्षेत्र और ‘कालियह्रद’ है। इस ‘हरिदेव’ क्षेत्रके उत्तर और ‘कालियह्रद’ के दक्षिण भागमें जिनका पाञ्चभौतिक शरीर छूटता है, उनका संसारमें पुनरावर्तन नहीं होता*।
भगवान् वराह कहते हैं— देवि! यमुनाके उस पार ‘यमळार्जुन’ नामक तीर्थ है, जहाँ शकट (भाण्डोंसे भरी हुई गाड़ी)-भग्न और भाण्ड छिन्न-भिन्न हुए थे। वहाँ स्नान और उपवास करनेका फल अनन्त है। वसुंधरे! ज्येष्ठमासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिके दिन उस तीर्थमें स्नान और दान करनेसे महान् पातकी मनुष्यको भी परम गति प्राप्त होती है। इन्द्रियनिग्रही मनुष्य यमुनाके जलमें स्नान करनेपर पवित्र हो जाता है और सम्यक् प्रकारसे श्रीहरिकी अर्चना करके वह परम गति प्राप्त कर सकता है। देवि! स्वर्गमें गये हुए पितृगण यह गाते हैं—‘हमारे कुलमें उत्पन्न जो पुरुष मथुरामें निवास करके कालिन्दीमें स्नान करेगा और भगवान् गोविन्दकी पूजा करेगा तथा ज्येष्ठमासके शुक्ल पक्षकी द्वादशी तिथिके अवसरपर यमुनाके किनारे पिण्डदान करेगा, वह परम कल्याणका भाजन होगा।’
देवि! मथुरातीर्थ महान् है। अनेक नामोंवाले बहुत-से वन उसकी शोभा बढ़ाते हैं। वहाँ स्नान करनेवाला मनुष्य भगवान् रुद्रके लोकमें प्रतिष्ठा पाता है। चैत्रमासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिके पुण्य अवसरपर यहाँ अवगाहन करनेवाला मानव मेरे लोकमें निश्चय ही चला जाता है। यमुनाके दूसरे पारमें ‘भाण्डह्रद’ नामसे विख्यात एक दुर्लभ तीर्थ है। विश्वके अलौकिक कार्यको सम्पन्न करनेवाले आदित्यगण वहाँ प्रतिदिन दृष्टिगोचर होते हैं। वहाँ जो मनुष्य स्नान करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर सूर्यलोकको प्राप्त होता है। वहीं स्वच्छ जलसे भरा ‘सप्तसामुद्रिक’ नामक एक कूप है। वसुधे! वहाँ स्नान करनेसे मानव सभी लोकोंमें स्वच्छन्दताके साथ विचरण कर सकता है। यहीं वीरस्थल नामसे प्रसिद्ध मेरा एक और परम गुह्य क्षेत्र है, जहाँ खिले हुए कमल जलकी निरन्तर शोभा बढ़ाते हैं। सुमध्यमे! जो मनुष्य एक रात यहाँ निवास करके स्नान करता है, वह मेरी कृपासे वीरलोकमें आदर पाता है।
इसी मथुरामण्डलमें ‘गोपीश्वर’ नामसे विख्यात एक तीर्थ है, जहाँ हजारों गोपियाँ सुन्दर रूप धारण करके भगवान् श्रीकृष्णको आनन्दित करनेके लिये पधारी थीं और मैंने (श्रीकृष्णरूपमें) उनके साथ रासलीला की थी एवं बाल्यकालमें यमलार्जुन नामक दो वृक्षोंको भी तोड़ा था। यहीं इन्द्रने एक कूपके पास रत्न और ओषधियोंसे सम्पन्न
* ग्रीक-ग्रन्थोंमें 'वृन्दावन' का नाम भी Kliso boras या 'कालिकावर्त' अर्थात् कालियनागका स्थान है। १८वीं शतीमें काशीके राजा चेतसिंहने दोनों नगरोंके पूरे दूधसे यहाँ अर्चना की थी। (Cunningham's Anc. Geog. P. 316) वृन्दावनके विशेष वर्णनके लिये 'भागवत', 'कल्याण', 'तीर्थाङ्क', पद्म० पाताल खण्ड ७० से ८२ तथा रघुवंश ६।५० आदि देखना चाहिये। 'दे' के अनुसार आजका वृन्दावन चैतन्य महाप्रभुके अनुयायी गोस्वामी बन्धुओंकी खोज है, प्राचीन वृन्दावन मथुरासे कुछ अधिक दूर होना चाहिये।