भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय १५६-१५७] मथुरामण्डलके 'वृन्दावन' आदि तीर्थ और उनमें स्नान-दानादिका महत्त्व २८९

‘राक्षस! मैं तुम्हें अपने रात्रिजागरण एवं नृत्यका पुण्य नहीं दे सकता। आधी रात, एक प्रहर तथा आधे प्रहरके भी जागरणका पुण्य मैं तुम्हें नहीं दे सकता'—वैश्यने कहा।

'तब बस एक नृत्यका ही पुण्य मुझे देनेकी दया करो।'—राक्षस बोला।

'मैं तुम्हें पुण्य तो यह भी नहीं दे सकता। पर जो बात कह चुका हूँ, उसके लिये आ गया हूँ। साथ ही मैं यह भी जानना चाहता हूँ कि तुम किस कर्मके दोषसे ब्रह्मराक्षस हुए? यदि यह बहुत गोप्य न हो तो मुझे बता दो।'—वैश्यने कहा।

अब ब्रह्मराक्षसके मुखपर हँसी छा गयी। उसने कहा—'वैश्यवर! तुम ऐसी बात क्यों कहते हो। मैं तो तुम्हारे पासका ही रहनेवाला हूँ। मेरा नाम 'अग्निदत्त' है। मैं पूर्वजन्ममें वेदाभ्यासी ब्राह्मण था। किंतु चौर्यदोषसे मुझे ब्रह्मराक्षस होना पड़ा। दैवयोगसे तुमसे भेंट हो गयी है। अब तुम मेरा उपकार करनेकी कृपा करो। वैश्यवर! तुम यदि एक ही 'नृत्य एवं गान' का पुण्य मुझे दे दो तो मेरा उद्धार हो जाय।' वैश्यने कहा—'राक्षस! मैंने एक नृत्यके पुण्यका फल तुम्हें दे दिया।' फिर तो उस एक नृत्यके पुण्यके प्रतापसे उसका तत्काल उद्धार हो गया और ब्रह्मराक्षसकी योनिसे सदाके लिये मुक्ति मिल गयी।

भगवान् वराह कहते हैं—देवि! उसी समय वहाँ ब्रह्मराक्षसकी जगह शङ्ख, चक्र, गदा एवं पद्म धारण किये मैं (भगवान् श्रीहरि) प्रकट हो गया। उस समय मेरे (श्रीविष्णुरूपके अपने) श्रीविग्रहकी आभा परम दिव्य थी। भक्तोंकी याचना पूर्ण करनेवाले (श्रीविष्णुरूपमें) मैंने उस वैश्यसे मधुर वाणीमें कहा—'तुम अब सपरिवार उत्तम विमानपर चढ़कर मेरे दिव्य विष्णुलोकको जाओ।'

वसुंधरे! इस प्रकार कहकर मैं (भगवान् श्रीहरि) वहीं अन्तर्धान हो गया और सुधन भी अपने परिवारके सहित दिव्य विमानद्वारा सशरीर विष्णुलोकमें चला गया। देवि! 'अक्रूर-तीर्थ' की यह महिमा मैंने तुम्हें बतला दी। उस कार्तिकमासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिको जो तीर्थमें स्नान करता है, उसे 'राजसूययज्ञ' का फल प्राप्त होता है और वहाँ श्राद्ध तथा वृषोत्सर्ग करनेवाला पुरुष अपने कुलके सभी पितरोंको तार देता है। [अध्याय १५३-१५५]


मथुरामण्डलके 'वृन्दावन' आदि तीर्थ और उनमें स्नान-दानादिका महत्त्व

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! अब मैं मथुरामण्डलके 'वत्स-क्रीडन' नामक तीर्थका वर्णन करता हूँ। यहाँ लाल रंगकी बहुत-सी शिलाएँ हैं। यहाँ स्नान करनेमात्रसे मनुष्य वायु-देवके लोकको प्राप्त होता है। यहीं दूसरा एक 'भाण्डीर' वन भी है, जिसकी साखू, ताल-तमाल, अर्जुन, इङ्गुदी, पीलुक, करील तथा लाल फूलवाले अनेक वृक्ष शोभा बढ़ाते हैं। यहाँ स्नान करनेसे मनुष्यके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं और वह इन्द्रके लोकको प्राप्त होता है। वल्लरियों तथा लताओंसे आच्छादित यहाँका रमणीय वृन्दावन देवता, दानवों और सिद्धोंके लिये भी दुर्लभ है। गायों और गोपालोंके साथ मैं यहाँ (कृष्णावतारमें) क्रीडा करता हूँ। यहाँ एक रात निवास तथा कालिन्दीमें अवगाहनकर मनुष्य गन्धर्वलोकको प्राप्त होता है और वहाँ प्राणोंका त्याग कर मनुष्य मेरे धामको प्राप्त होता है।

वसुंधरे! यहाँ एक दूसरा तीर्थ 'केशिसथल' है। 'वृन्दावन' के इसी स्थानपर मैंने केशीदैत्यका