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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 305

२९४ संक्षिप्त श्रीवराहपुराण [ अध्याय १५८—१६०

संसारमें ही पड़ा रह गया। अतएव जिसे श्रेष्ठ फलकी इच्छा हो, उसे सवारीपर चढ़कर मथुराकी कदापि परिक्रमा नहीं करनी चाहिये, क्योंकि इससे मुक्ति नहीं मिलती।

उस ‘हयमुक्ति’ तीर्थका दर्शन एवं स्पर्श करनेसे पापोंसे मुक्ति मिल जाती है। बीचमें ‘शिवकुण्ड’ नामसे प्रसिद्ध एक महान् तीर्थ है। भगवान् कृष्णको विजयी बनानेवाली ‘मल्लिका’ देवीका भी दर्शन करना चाहिये। फिर ‘कदम्बखण्ड’ की यात्राकर सपरिवार ‘चर्चिका’ योगिनीका दर्शन करे। फिर पापोंके हरण करनेवाले ‘वर्षखात’ नामक श्रेष्ठ कुण्डपर जाकर स्नान और तर्पण करना चाहिये।

देवि! यहाँ भूतोंके अध्यक्ष भगवान् महादेवका दिव्य विग्रह है। इसके आगे ‘कृष्णक्रीडा-सेतुबन्ध’ तथा ‘बलिह्रद’ कुण्ड है, जहाँ श्रीकृष्णने जलविहार किया था। इसके दर्शनमात्रसे मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे छूट जाता है। यहीं कुछ आगे गंधोंसे सुवासित रहनेवाला ‘स्तम्भोच्चय’ नामक एक शिखर है, जिसे भगवान् श्रीकृष्णने सजाया और पूजित किया था। इसकी भी यत्नके साथ प्रदक्षिणा तथा पूजा करनी चाहिये, इससे प्राणी सभी पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकको जाता है। इसके पश्चात् ‘नारायणस्थान’ तीर्थपर जाकर फिर ‘कुब्जिका’ तथा ‘वामनस्थान’ पर जाये। यहीं ‘विद्येश्वरी’ देवीका भी स्थान है, जो श्रीकृष्णकी रक्षा करनेके लिये यहाँ सदा तत्पर रहती हैं। कंसको मारनेकी अभिलाषा रखनेवाले श्रीकृष्ण, बलभद्र और गोपोंने देवीके संकेतसे यहाँ मन्त्रणा की थी। तबसे इन्हें ‘सिद्धिदा’, ‘भोगदा’ और ‘सिद्धेश्वरी’ भी कहा जाता है और कुछ व्यक्ति इन्हें ‘संकेतकेश्वरी’ भी कहते हैं। इनका दर्शन करनेसे अवश्य सिद्धि प्राप्त होती है। यहाँके कुण्डका स्वच्छ जल सब पापोंको नष्ट कर देता है। इसके बाद ‘गोकर्णेश्वरी’-देवीका दर्शनकर सरस्वती नदी और विघ्नराज गणेशके दर्शन करनेसे मनुष्य श्रेयको प्राप्त करता है।

फिर प्रचुर पुण्यवाले ‘गार्ग्यतीर्थ’, ‘भद्रेश्वरतीर्थ’ तथा ‘सोमेश्वर’ तीर्थमें जाना चाहिये। ‘सोमेश्वर’ तीर्थमें स्नान करके भगवान् सोमेश्वरका दर्शन फिर ‘घण्टाभरणक’, ‘गरुडकेशव’, ‘धारालोपनक’, ‘वैकुण्ठ’, ‘खण्डवेलक’, ‘मन्दाकिनी’, ‘संयमन’, ‘असिकुण्ड’, ‘गोपतीर्थ’, ‘मुक्तिकेश्वर’, ‘वैलक्षगरुड़’ और ‘महापातक-नाशन’ तीर्थोंमें भी जाना चाहिये।

तत्पश्चात् भगवान् शिवसे यों प्रार्थना करे—‘देवेश! आप मुक्ति देनेवाले प्रधान देवता हैं। सप्तर्षियोंने भी पृथ्वीकी परिक्रमाके समय आपकी स्तुति की थी। इसी प्रकार मैं भी आपसे प्रार्थना करता हूँ। आपकी आज्ञासे मथुराकी प्रदक्षिणामें मुझे सफलता प्राप्त हो जाय।’ इस भाँति उस क्षेत्रके स्वामी देवाधिदेव शिवकी प्रार्थना कर ‘विश्रान्तिसंज्ञक’ तीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ जाकर स्नान, तर्पण एवं प्रणाम करना चाहिये।

तदनन्तर श्रीकृष्णकी बहन आर्तिहरा भगवती ‘सुमङ्गला’ देवीके मन्दिरमें जाकर उनसे मथुरा-यात्राकी सिद्धिके लिये इस प्रकार प्रार्थना करे—‘शिवे! आप सम्पूर्ण मङ्गलपूर्ण कार्योंको सम्पन्न करनेमें कुशल हैं। आपकी कृपासे प्राणीके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। आप प्रसन्न हो जायँ, जिससे मुझे भी इस यात्रामें सफलता प्राप्त हो।’ इसके उपरान्त ‘पिप्पलेश्वर’ महादेवके स्थानपर जाय। पिप्पलादमुनिने यहाँ उनकी अर्चना की थी। वे महान् तपस्वी मुनि परिक्रमा करनेसे थक गये थे। इस स्थानपर भगवान् शिवने उनकी थकावट दूर की थी। उस समय पिप्पलादमुनिने वहाँकी भूमिका उपलेपन किया और उसके ऊपर