वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१८-गौरीकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग, द्वितीया तिथि एवं रुद्रद्वारा जलमें तपस्या, दक्षके यज्ञमें रुद्र और विष्णुका संघर्ष
| ४६ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १४ |
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ब्राह्मणोंकी आज्ञासे जल एवं यवसे देवताओंको अर्घ्य देना चाहिये। फिर श्राद्धविधिको जाननेवाला श्राद्धकर्ता विधिपूर्वक उत्तम चन्दन, धूप और दीप उन विश्वेदेव आदि देवताओंको अर्पण करे। पितरोंके निमित्त इन सभी उपचारोंका अपसव्य¹-भावसे निवेदन करे। फिर ब्राह्मणकी अनुमतिसे दो भाग किये हुए कुश पितरोंके लिये दे। विवेकी पुरुषको चाहिये, मन्त्रका उच्चारण करके पितरोंका आवाहन करे। अपसव्य होकर तिल और जलसे अर्घ्य देना उचित है।
श्राद्ध करते समय अतिथिके आ जानेपर कर्तव्यका विधान
मार्कण्डेयजी कहते हैं—द्विजवर! श्राद्ध करते समय यदि कोई भोजन करनेकी इच्छासे भूखा पथिक अतिथिरूपमें आ जाय तो ब्राह्मणोंसे आज्ञा लेकर उसे भी यथेच्छ भोजन कराना चाहिये। अनेक अज्ञातस्वरूप योगिगण मनुष्योंका उपकार करनेके लिये नाना रूप धारणकर इस धराधामपर विचरण करते रहते हैं। इसलिये विज्ञ पुरुष श्राद्धके समय आये हुए अतिथिका सत्कार अवश्य करे। विप्रवर! यदि उस समय वह अतिथि सम्मानित नहीं हुआ तो श्राद्ध करनेसे प्राप्त होनेवाले फलको नष्ट कर देता है।
श्राद्धके समय हवन करनेकी विधि
(मार्कण्डेयजी कहते हैं)—पुरुषप्रवर! श्राद्धके अवसरपर ब्राह्मणको भोजन करानेके पहले उनसे आज्ञा पाकर शाक और लवणहीन अन्नसे अग्निमें तीन बार हवन करना चाहिये। उनमें 'अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा' इस मन्त्रसे पहली आहुति, 'सोमाय पितृमते स्वाहा'—इससे दूसरी एवं 'वैवस्वताय स्वाहा' कहकर तीसरी आहुति देनेका समुचित विधान है। तत्पश्चात् हवन करनेसे बचे हुए अन्नको थोड़ा-थोड़ा सभी ब्राह्मणोंके पात्रोंमें दे।
श्राद्धमें भोजन करानेका नियम
भोजनके लिये उपस्थित अन्न अत्यन्त मधुर, भोजनकर्ताकी इच्छाके अनुसार तथा अच्छी प्रकार सिद्ध किया हुआ हो। पात्रोंमें भोजन रखकर श्राद्धकर्ता अत्यन्त सुन्दर एवं मधुर वचन कहे—'महानुभावो! अब आप लोग अपनी इच्छाके अनुसार भोजन करें।' ब्राह्मणोंको भी तद्गतचित्त और मौन होकर प्रसन्नमुखसे सुखपूर्वक भोजन करना चाहिये। यजमानको क्रोध तथा उतावलेपनको छोड़कर भक्तिपूर्वक भोजन परोसते रहना चाहिये।
अभिश्रवण (वैदिक श्राद्धमन्त्रका पाठ)
श्राद्धमें ब्राह्मणोंके भोजन करते समय रक्षोघ्न मन्त्र²का पाठ करके भूमिपर तिल बिखेर दे तथा अपने पितृरूपमें उन द्विजश्रेष्ठोंका ही चिन्तन करे। साथ ही यह भी भावना करे—'इन ब्राह्मणोंके शरीरमें स्थित मेरे पिता, पितामह और प्रपितामह आदि आज भोजनसे तृप्त हो जायँ।' भूमिपर पिण्ड देते समय प्रार्थना करे—'मेरे पिता, पितामह और प्रपितामह इस पिण्डदानसे तृप्ति-लाभ करें। होमद्वारा सबल होकर मेरे पिता, पितामह और प्रपितामह आज तृप्ति-लाभ करें।' सबके बाद फिर प्रार्थना करनी चाहिये—'मेरे पिता, पितामह और प्रपितामह—ये महानुभाव मैंने भक्तिपूर्वक उनके लिये जो कुछ किया या कहा है—उससे तृप्त होनेकी कृपा करें। मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामह और विश्वेदेव तृप्त हो जायँ एवं
१. यज्ञोपवीतको दायें कंधेपर रखना।
२. रक्षोघ्न मन्त्र—यज्ञेश्वरो यज्ञसमस्तनेता भोक्ताऽव्ययात्मा हरिरीश्वरोऽत्र।
तत्संनिधानादपयान्तु सद्यो रक्षांस्यशेषाण्यसुराश्च सर्वे॥ (अ० १४।३२)
अध्याय १४ ] श्राद्ध-कल्प [ ४७
समस्त राक्षसगण नष्ट हों। यहाँ सम्पूर्ण हव्य-कव्यके भोक्ता यज्ञेश्वर भगवान् श्रीहरि विराजमान हैं। अतः उनकी संनिधिके कारण समस्त राक्षस और असुरगण यहाँसे तुरंत भाग जायँ।'
अन्न आदिके विकिरणका नियम
जब निमन्त्रित ब्राह्मण भोजनसे तृप्त हो जायँ, तो भूमिपर थोड़ा-सा अन्न डाल देना चाहिये। आचमनके लिये उन्हें एक-एक बार शुद्ध जल देना आवश्यक है। तदनन्तर भलीभाँति तृप्त हुए ब्राह्मणोंसे आज्ञा लेकर भूमिपर सभी उपस्थित अन्नोंसे पिण्डदान करनेका विधान है।
पिण्डदानका नियम
श्राद्धकालमें भलीभाँति सावधान होकर तिलके साथ उन्हें पिण्ड अर्पण करे। पितृतीर्थसे तिलयुक्त जलाञ्जलि दे तथा मातामह आदिके लिये भी पितृतीर्थसे ही पिण्डदान करना चाहिये। फिर ब्राह्मणोंके उच्छिष्टके निकट ही दक्षिण दिशामें अग्रभाग करके बिछाये हुए कुशाओंपर पहले अपने पिताके लिये पुष्प और धूप आदिसे पूजित पिण्ड दान करे। फिर पितामह और प्रपितामहके लिये एक-एक पिण्ड अर्पण करना चाहिये। तदनन्तर ‘लेपभागभुजस्तृप्यन्ताम्’—ऐसा उच्चारण करते हुए लेपभागभोजी (पिण्डसे बचे अन्न पानेवाले) पितरोंके निमित्त कुशाके मूलसे अपने हाथमें लगे अन्नको गिरावे। विवेकी पुरुषको चाहिये कि इसी प्रकार गन्ध और मालादियुक्त पिण्डोंसे मातामह आदिका पूजन करके फिर द्विजश्रेष्ठोंको आचमन करावे। द्विजवर! पितरोंका चिन्तन करते हुए भक्तिके साथ पहले पिता प्रभृतिको पिण्ड देना आवश्यक है। फिर स्वस्ति-वाचन करनेवाले ब्राह्मणोंको अपनी शक्तिके अनुसार दक्षिणा देनेके पश्चात् विश्वेदेवके निमित्त प्रार्थनाके मन्त्रोंका पाठ होना चाहिये। जो विश्वेदेव यहाँ पधारे हैं, वे प्रसन्न हो जायँ—यों श्राद्धकर्ता प्रार्थना करे। वहाँ उपस्थित ब्राह्मण उसका अनुमोदन कर दें। फिर आशीर्वादके लिये प्रार्थना करना समुचित है। महामते! पहले पितृपक्षके ब्राह्मणोंका विसर्जन करे। तत्पश्चात् देवपक्षके ब्राह्मण बिदा किये जायँ। विश्वेदेवगणके सहित मातामह आदिमें भी ब्राह्मण-भोजन, दान और विसर्जन आदिकी यही विधि बतलायी गयी है। पितृ और मातामह—दोनों ही पक्षोंके श्राद्धोंमें पाद-शौच आदि सभी कर्म पहले देवपक्षके ब्राह्मणोंका करे। परंतु बिदा पहले पितृपक्षीय अथवा मातृपक्षीय ब्राह्मणोंको ही करे। मातामह आदि तीन पितरोंके श्राद्धमें ज्ञानी ब्राह्मण प्रथम स्थान पानेका अधिकारी है। ब्राह्मणोंको प्रीतिवचन और सम्मानपूर्वक बिदा करे। उनके जानेके समय द्वारतक पीछे-पीछे जाय। जब वे आज्ञा दें, तब लौट आवे।
श्राद्धके अन्तमें बलिवैश्वदेवका विधान
श्राद्ध करनेके पश्चात् वैश्वदेव नामक नित्य-क्रिया करनी चाहिये। इस प्रकार सबका सत्कार करके अपने घरके बड़े लोगों तथा बन्धु-बान्धवों एवं सेवकोंसहित स्वयं भोजन करना चाहिये। विवेकी पुरुषका कर्तव्य है कि इसी प्रकार पिता, पितामह, प्रपितामह तथा मातामह, प्रमातामह एवं वृद्धप्रमातामहका श्राद्ध सम्पन्न करे। श्राद्धद्वारा अत्यन्त तृप्त होकर ये पितर सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण कर देते हैं। काला तिल, कुतप मुहूर्त* और दौहित्र—ये तीन श्राद्धमें परम पवित्र माने जाते हैं। चाँदीका दान तथा उसका दर्शन भी श्रेष्ठ है। श्राद्धकर्ताके लिये क्रोध करना, उतावलापना तथा उस दिन कहीं जाना मना है। ये तीनों बातें श्राद्धमें भोजन करनेवालेके लिये भी वर्ज्य हैं। द्विजवर! विधिपूर्वक श्राद्ध करनेवाले पुरुषोंसे विश्वेदेवगण, पितृगण, मातामह एवं कुटुम्बीजन सभी संतुष्ट रहते हैं। द्विजवर! पितृगणोंका आधार
१. दिनके ८वें मुहूर्तको 'कुतप' कहते हैं, यह प्रायः साढ़े बारह बजेके आस-पास आता है।
| ४८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १५ |
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चन्द्रमा है और चन्द्रमाका आधार योग है। अतः श्राद्धमें योगिजनको नियुक्त करना अति उत्तम है। विप्रवर! श्राद्धभोजी एक सहस्र ब्राह्मणोंके सम्मुख यदि एक भी योगी उपस्थित हो जाय तो वह यजमानके सहित उन सबका उद्धार कर देता है। सामान्यरूपसे सभी पुराणोंमें इस पितृक्रियाका वर्णन किया गया है। इस क्रमसे कर्मकाण्ड होना चाहिये।
यह जानकर भी मनुष्य संसारके बन्धनसे छूट जाता है। गौरमुख! श्रेष्ठ व्रतवाले बहुतसे ऋषि श्राद्धका आश्रय लेकर मुक्त हो चुके हैं। अतएव तुम भी इसके अनुष्ठानमें यथाशीघ्र तत्पर हो जाओ।
द्विजवर! तुमने भक्तिपूर्वक इस प्रसङ्गको पूछा है, अतः तुम्हारे सामने मैं इसका वर्णन कर चुका। जो पितृयज्ञ करके भगवान् श्रीहरिका ध्यान करता है, उससे बढ़कर कोई कार्य नहीं है और उस यज्ञसे बढ़कर दूसरा कोई पितृतन्त्र भी नहीं है—इसमें कोई संदेह नहीं। [अध्याय १४]
गौरमुखके द्वारा दस अवतारोंका स्तवन तथा उनका ब्रह्ममें लीन होना
पृथ्वीने पूछा—भगवन्! मुनिवर गौरमुखने मार्कण्डेयजीके मुखसे श्राद्धसम्बन्धी ऐसी विधि सुनकर फिर क्या किया?
भगवान् वराह बोले—वसुंधरे! मार्कण्डेयजीकी बुद्धि अपरिमित थी। उनके द्वारा इस प्रकार पितृकल्प सुनते ही मुनिवरकी कृपासे गौरमुखको सौ जन्मोंकी बातें याद आ गयीं।
पृथ्वीने पूछा—भगवन्! गौरमुख पूर्वजन्ममें कौन थे, उनका क्या नाम था, बातें याद आनेकी शक्ति उनमें कैसे आयी और उन महाभागने उन्हें जानकर फिर क्या किया?
भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! ये गौरमुख पूर्वके एक-दूसरे कल्पमें स्वयं भृगु मुनि थे। श्रीब्रह्माजीने अपने पुत्रोंको जो यह शाप दिया था कि पुत्रोंद्वारा ही उपदेश प्राप्त करके तुमलोग सद्गति प्राप्त करोगे। इसीलिये श्रीमार्कण्डेयजीने भी इन्हें ज्ञान प्रदान किया। मुनिवर मार्कण्डेयजी भी उन्हींके वंशमें उत्पन्न हुए थे। श्रेष्ठ अङ्गोंसे शोभा पानेवाली पृथ्वी! इस प्रकार उपदिष्ट होनेपर उन्हें सम्पूर्ण जन्मोंकी बातें याद हो आयीं। फिर पूर्वजन्मकी बातको स्मरण करके उन्होंने जो कुछ किया है, वह संक्षेपमें कहता हूँ, सुनो। उस समय गौरमुख पूर्व-कथनानुसार पितरोंके लिये बारह वर्षोंतक श्राद्ध करते रहे। तत्पश्चात् श्रीहरिकी आराधनाके लिये वे उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे। तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध जो प्रभासतीर्थ है, वहीं जाकर गौरमुखने दैत्यदलन परमप्रभुकी स्तुति आरम्भ कर दी।
दशावतारस्तोत्र
गौरमुख बोले—जो शत्रुओंका दर्प दूर करनेवाले, ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, सूर्य, चन्द्रमा, अश्विनीकुमाररूपमें प्रतिष्ठित, युगमें स्थित, परमपुराण, आदिपुरुष, सदा विराजमान तथा देवाधिदेव भगवान् नारायण नामसे विख्यात हैं, उन मङ्गलमय श्रीहरिकी अब मैं स्तुति करता हूँ। प्राचीन समयमें जब वेद नष्ट हो चुके थे, उस अवसरपर इस विशाल वसुंधराका भरण-पोषण करनेवाले जिन आदिपुरुषने पर्वतके समान विशाल मत्स्यका शरीर धारण किया था तथा जिनके पुच्छके अग्रभागसे चमचमाती हुई तेज-छटा विकीर्ण हो रही थी, उन शत्रुसूदन भगवान् श्रीहरिकी मैं स्तुति करता हूँ। समुद्र-मन्थनके निमित्त सबका हित करनेके विचारसे कच्छपका रूप धारणकर जिन्होंने महान् पर्वत मन्दराचलको आश्रय दिया था, वे दैत्योंके संहार करनेवाले पुराण-पुरुष देवेश्वर भगवान् श्रीहरि मेरी सभी प्रकार रक्षा करें। जिन महापुरुषने महावराहका रूप धारणकर रसातलमें प्रवेश किया और वहाँसे पृथ्वीको ले आये तथा देवताओं एवं सिद्धोंने
अध्याय १५ ] गौरमुखके द्वारा दस अवतारोंका स्तवन ४९
जिनकी 'यज्ञपुरुष' संज्ञा दी है, वे असुरसंहर्ता, सनातन श्रीहरि मेरी रक्षा करें। जो प्रत्येक युगमें भयंकर नृसिंहरूपसे विराजते हैं, जिनका मुख अत्यन्त भयावह है, कान्ति सुवर्णके समान है तथा जिनका दैत्योंका दलन करना स्वाभाविक गुण है, वे योगिराज जगत्के परम आश्रय भगवान् श्रीहरि हमारी रक्षा करें। जिनका कोई माप नहीं है, फिर भी बलिके यज्ञ नष्ट करनेके लिये जिन योगात्माने योगके बलसे दण्ड और मृगचर्मसे सुशोभित वामन-रूपसे बढ़ते हुए त्रिलोकीतक नाप ली, वे परम प्रभु हमारी रक्षा करें। जिन्होंने परमपराक्रमी परशुरामजीका रूप धारण करके इक्कीस बार सम्पूर्ण भूमण्डलपर विजय प्राप्त की और उसे कश्यपजीको सौंप दिया तथा जो सज्जनोंके रक्षक एवं असुरोंके संहारक हैं, वे हिरण्यगर्भ भगवान् श्रीहरि हमारी रक्षा करें। हिरण्यगर्भ जिनकी संज्ञा है, सर्वसाधारण जन जिन्हें देख नहीं सकते तथा जो राम आदि रूपोंसे चार प्रकारके शरीर धारण कर चुके हैं एवं अनेक प्रकारके रूपोंसे राक्षसोंका विनाश करते हैं, वे आदिपुरुष भगवान् श्रीहरि हमारी रक्षा करें। चाणूर और कंस नामधारी दानव दर्पसे भर गये थे। उनके भयसे देवताओंके हृदयमें आतङ्क छा गया था। अतः उन्हें निर्भय करनेके लिये जो प्रत्येक युग एवं कल्पमें वसुदेवके पुत्र श्रीकृष्णरूपसे विराजते हैं, वे प्रभु हमारी रक्षा करें। जो सनातन, ब्रह्ममय एवं महान् पुरुष होकर भी वर्णकी व्यवस्था करनेके लिये प्रत्येक युगमें कल्कि के नामसे विख्यात हैं, देवता, सिद्ध और दैत्योंकी आँखें जिनके रूपको देख नहीं सकतीं एवं जो विज्ञानमार्गका त्याग करके यम-नियम आदिके प्रवर्तक बुद्धरूपसे सुपूजित होते हैं और मत्स्य आदि अनेक रूपोंमें विचरते हैं, वे भगवान् श्रीहरि हमारी रक्षा करें। भगवन्! आप पुरुषोत्तम हैं तथा समस्त कारणोंके भी कारण हैं। आपको मेरा अनेकशः प्रणाम है। प्रभो! अब आप मुझे मुक्ति-पद प्रदान करनेकी कृपा कीजिये।*
इस प्रकार महर्षि गौरमुखके द्वारा भक्तिभावसे संस्तुत एवं नमस्कृत होते-होते चक्र एवं गदाधारी श्रीहरि स्वयं उनके सामने प्रत्यक्षरूपसे प्रकट हो गये। उस समय गौरमुखने देखा कि प्रभुके विग्रहसे दिव्य विज्ञान भी प्रकट हो रहा है। उसे पाकर मुनिकी अन्तरात्मा पूर्ण शान्त हो गयी। गौरमुखके शरीरसे विज्ञानात्मा निकली और श्रीहरिको पाकर उनके मुक्तिसंज्ञक सनातन श्रीविग्रहमें सदाके लिये शान्त हो गयी। [अध्याय १५]
* स्तोष्ये महेन्द्रं रिपुदर्पहं शिवं नारायणं ब्रह्मविदां वरिष्ठम्। आदित्यचन्द्राश्वियुगस्थमाद्यं पुरातनं दैत्यहरं सदा हरिम्॥
चकार मात्स्यं वपुरात्मनो यः पुरातनं वेदविनाशकाले। महामहीभृद्वपुरुग्रपुच्छच्छटाहवार्त्तिचः सुरशत्रुहाद्यः॥
तथाब्धिमन्थानकृते गिरीन्द्रं दधार यः कौर्मवपुः पुराणम्। हितेच्छयाप्तः पुरुषः पुराणः प्रपातु मां दैत्यहरः सुरेशः॥
महावराहः सततं पृथिव्यास्तलात्तलं प्राविशद् यो महात्मा। यज्ञाङ्गसंज्ञः सुरसिद्धसङ्घैः स पातु मां दैत्यहरः पुराणः॥
नृसिंहरूपी च बभूव योऽसौ युगे युगे योगिवरोऽथ भीमः। करालवक्त्रः कनकाग्रवर्चा वराशयोऽस्मानसुरान्तकोऽव्यात्॥
बलेर्मखध्वंसकृदप्रमेयो योगात्मको योगवपुःस्वरूपः। स दण्डकाष्ठाजिनलक्षणः क्षितिं योऽसौ महान् क्रान्तवान् नः पुनातु॥
त्रिःसप्तकृत्वो जगतीं जिगाय कृत्वा ददौ कश्यपाय प्रचण्डः। स जामदग्न्योऽभिजनस्य गोप्ता हिरण्यगर्भोऽसुरहा प्रपातु॥
चतुष्प्रकारं च वपुर्य आद्यं हैरण्यगर्भंप्रतिमानलक्ष्यम्। रामादिरूपैर्बहुरूपभेदं चकार सोऽस्मानसुरान्तकोऽव्यात्॥
चाणूरकंसासुरदर्पभीतैर्भीतामराणामभयाय वेदः। युगे युगे वासुदेवो बभूव कल्पे भवत्यद्भुतरूपकारी॥
युगे युगे कल्किनाम्ना महात्मा वर्णस्थितिं कर्तुमनेकरूपः। सनातनो ब्रह्ममयः पुरातनो गूढाशयोऽस्मानसुरान्तकोऽव्यात्॥
न यस्य रूपं सुरसिद्धदैत्याः पश्यन्ति विज्ञानगतिं विहाय। अतो यमेनापि समर्चयन्ति मत्स्यादिरूपाणि चराणि सोऽव्यात्॥
नमो नमस्ते पुरुषोत्तमाय पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते। नमो नमः कारणकारणाय नयस्व मां मुक्तिपदं नमस्ते॥
(अध्याय १५।९—२०)
१९-तृतीया तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें हिमालयकी पुत्रीरूपमें गौरीकी उत्पत्तिका वर्णन और भगवान् शंकरके साथ उनके विवाहकी कथा
५० संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १७-१८
महातपाका उपाख्यान
पृथ्वीने पूछा— भगवान्! मणिसे जो प्रधान पुरुष निकले थे तथा जिन्हें भगवान् श्रीहरिने वर दिया था—‘तुम सभी त्रेतायुगमें राजा बनोगे’, उनकी उत्पत्ति कैसे हुई? उनके नाम क्या हुए तथा उन्होंने कौन-कौनसे काम किये? आप मुझे यह प्रसङ्ग बतानेकी कृपा करें।
भगवान् वराह कहते हैं— प्राणियोंको प्रश्रय देनेवाली पृथ्वी देवि! मणिसे प्रकट जो सुप्रभ नामका प्रधान पुरुष था, वह त्रेतायुगमें एक महान् उदार राजा हुआ। उसके प्रादुर्भावका प्रसङ्ग सुनो। प्रथम सत्ययुगमें महाबाहु नामसे एक प्रसिद्ध राजा हो चुके हैं। वे ही पुनः त्रेतायुगमें राजा श्रुतकीर्ति हुए। उस समय त्रिलोकीमें महान् पराक्रमियोंमें उनकी गणना थी। मणिसे उत्पन्न हुआ सुप्रभ उन्हींके घर पुत्ररूपसे उत्पन्न हुआ। उस समय प्रजापाल नामसे जगत्में उसकी ख्याति हुई। एक दिनकी बात है—राजा प्रजापाल शिकारके लिये किसी ऐसे सघन वनमें गया, जहाँ बहुत-से हिंस्र जन्तु निवास करते थे। वहाँ उसे एक सुन्दर आश्रम दिखायी पड़ा, जहाँ परम धार्मिक महातपा ऋषि निवास करते थे। वे निराहार रहकर सदा परब्रह्म परमात्माका ध्यान करते थे। तप करना ही उनका मुख्य काम था। वहाँ जाकर राजाको आश्रममें प्रवेश करनेकी इच्छा हुई, अतः वह आश्रमके भीतर गया। जंगली वृक्षोंसे उस आश्रमके प्रवेश-मार्गकी बड़ी आकर्षक शोभा हो रही थी। सघन लताएँ गृहके रूपमें परिणत होकर ऐसी चमक रही थीं, मानो चन्द्रमा चाँदनी बिखेरता हो। वहाँ भ्रमरोंको बिना प्रयास ही परितृप्ति प्राप्त होती थी। लाल कमलकी पंखुड़ियोंके समान कोमल नखवाली वराङ्गनाएँ वहाँ यत्र-तत्र सुन्दर राग आलाप रही थीं, मानो इन्द्रकी अप्सराएँ स्वर्गलोक छोड़कर पृथ्वीपर आ गयी हों। वहीं पासमें ही अनेक प्रकारके मत्त पक्षी आनन्दमें भरकर चीं-चीं-चूँ-चूँ शब्द कर रहे थे तथा भौरें भी गूँज रहे थे। भाँति-भाँतिके प्रामाणिक (आकार-प्रकारवाले) कदम्ब, नीप, अर्जुन और साखू नामके वृक्ष शाखाओं तथा सामयिक सुन्दर फूलोंसे सम्पन्न होकर उस आश्रमकी शोभा बढ़ाते थे। आश्रमके ऊपर बैठे हुए पक्षियोंकी मधुर ध्वनिसे उसकी शोभा अनुपम हो रही थी। वहाँ रहकर सुचारु रूपसे काम करनेवाले सज्जन पुरुष धैर्यपूर्वक अपने कार्यमें तत्पर थे। प्रायः सर्वत्र यज्ञकुण्डोंसे यज्ञके धुएँ उठ रहे थे। हवन करनेसे आगकी प्रचण्ड लपटें निकल रही थीं तथा गृहस्थ ब्राह्मणोंद्वारा यज्ञ आरम्भ था। अतः ऐसा जान पड़ता था, मानो पापरूपी हाथीको शान्त करनेके विचारसे अत्यन्त तीखे दाँतवाले मतवाले सिंह ही यहाँ आ गये हों।
इस प्रकार सर्वत्र दृष्टि डालते हुए राजा प्रजापालने अनेक उपायोंका आश्रय लेकर उस उत्तम आश्रमके भीतर प्रवेश किया। वहाँ चले जानेपर सामने अत्यन्त तेजस्वी मुनिवर महातपा दिखायी पड़े। उस समय पुण्यात्माओं एवं ब्रह्मवेत्ताओंमें शिरोमणि वे ऋषि कुशाके आसनपर बैठे थे। उनका तेज ऐसा था, मानो अनन्त सूर्योंने एक रूप धारण कर लिया हो। महातपाका दर्शन पाकर प्रजापालको मृगकी बात ही भूल गयी। ऋषिके सत्सङ्गसे उसके विचार शुद्ध हो गये थे। धर्मके प्रति उसकी दृढ़ एवं अद्भुत आस्था हो गयी। ऐसे पवित्र अन्तःकरणवाले राजा प्रजापालको देखकर महातपामुनिने उसका आसन एवं पाद्य आदिसे आतिथ्य-सत्कार किया और उस नरेशने भी मुनिको प्रणाम किया। वसुधे! साथ ही मुनिसे
अध्याय १९ ] प्रतिपदा तिथि एवं अग्निकी महिमाका वर्णन ५१
उसने यह पवित्र प्रश्न किया—'भगवन्! दुःखरूपी संसार-सागरमें डूबते हुए मनुष्योंके मनमें यदि दुस्तर संसारके तरने (विजय पाने)-की इच्छा हो तो उन्हें जो कार्य करना उचित हो, वह आप मुझ शरणागतको बतानेकी कृपा करें।'
महातपाजी बोले—राजन्! संसाररूपी समुद्रमें डूबनेवाले मनुष्योंके लिये कर्तव्य यह है कि वे पूजा, होम, दान, ध्यान एवं अनेक यज्ञ आदि उपकरणरूपी दृढ़ नौकाका आश्रय लें। नाव बनानेमें कीलोंकी आवश्यकता होती है। ये उपर्युक्त पूजा आदि, जिनसे मोक्ष मिलना निर्विवाद है, कीलोंका काम देती हैं। देवसमाजसे बड़ी रस्सियोंकी आवश्यकता पूरी हो जाती है। अतः अब तुम प्राण आदिके सहयोगसे त्रिलोकेश्वररूपी नौका तैयार कर लो। भगवान् नारायण ही त्रिलोकेश्वर हैं। उनकी कृपासे नरकमें नहीं जाना पड़ता। राजन्! जो बड़भागीजन उन देवेश्वरको भक्तिपूर्वक प्रणाम करते हैं, उनकी चिन्ताएँ शान्त हो जाती हैं और वे उनके उस परम पदको पा लेते हैं, जो कभी नष्ट नहीं होता।
राजा प्रजापालने पूछा—भगवन्! आप सम्पूर्ण धर्मोंको भलीभाँति जानते हैं। मोक्षकी इच्छा करनेवाले पुरुषको सनातन श्रीहरिकी विभूतियोंका किस प्रकार चिन्तन करना चाहिये? इसे बतानेकी कृपा करें।
मुनिवर महातपाने कहा—राजन्! तुम बड़े विज्ञ पुरुष हो। सम्पूर्ण योगियोंके स्वामी श्रीविष्णु स्त्रियों एवं पुरुषोंपर जिस प्रकार प्रसन्न होते हैं, उसे सुनो। पितरोंके सहित सभी देवता तथा ब्राह्मणके भीतर विचरनेवाले ब्रह्मा प्रभृति—ये सब-के-सब श्रीविष्णुसे ही उत्पन्न हुए हैं—ऐसी वेदकी श्रुति प्रसिद्ध है। अग्नि, अश्विनीकुमार, गौरी, गजानन, शेषनाग, कार्तिकेय, आदित्यगण, दुर्गासहित चौंसठ मातृकाएँ, दस दिशाएँ, कुबेर, वायु, यम, रुद्र, चन्द्रमा और पितृगण—इन सबकी उत्पत्तिमें जगत्प्रभु श्रीहरिकी ही प्रधानता है। हिरण्यगर्भ श्रीहरिके श्रीविग्रहमें इनका स्थान बना रहता है और वहींसे निकलकर ये चारों ओर पृथक्-पृथक् परिलक्षित होते हैं, पर अहंता (मैं हूँ)-का अभिमान उनका साथ नहीं छोड़ता। [ अध्याय १७-१८ ]
प्रतिपदा तिथि एवं अग्निकी महिमाका वर्णन
महातपा बोले—राजन्! प्रसङ्गवश भगवान् विष्णुकी विभूतिका वर्णन कर दिया। अब तिथियोंका माहात्म्य कहता हूँ, सुनो। जब ब्रह्माके क्रोधसे अग्निका प्राकट्य हुआ तो उन्होंने ब्रह्माजीसे कहा—'विभो! मेरे लिये तिथि निश्चय करनेकी कृपा कीजिये, जिसमें पूजित होकर सम्पूर्ण जगत्के समक्ष मैं प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकूँ।'
ब्रह्माजी बोले—परम श्रेष्ठ अग्निदेव! देवताओं, यक्षों और गन्धर्वोंके भी पूर्व तुम सर्वप्रथम प्रतिपदाको उत्पन्न हुए हो और तुम्हारे पश्चात् इन सबका यहाँ प्राकट्य हुआ है। अतः प्रतिपद् नामकी यह तिथि तुम्हारे लिये विहित होगी। इस तिथिमें प्रजापतिकी मूर्तिभूत हविष्यसे जो तुममें हवन करेंगे, उन्हें सम्पूर्ण देवताओं और पितरोंकी प्रसन्नता प्राप्त होगी। चार प्रकारके प्राणी—अण्डज, पिण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज तथा देवता, दानव, मानव, पशु एवं गन्धर्व—ये सभी तुममें हवन करनेपर तृप्त हो सकते हैं। तुम्हारे प्रति श्रद्धा रखनेवाला जो पुरुष प्रतिपदा तिथिके दिन उपवास करेगा अथवा केवल दूधके आहारपर ही रहेगा, उसके महान् फलका वर्णन सुनो—'छब्बीस चतुर्युगीतक वह स्वर्गलोकमें सम्मानपूर्वक
५२ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय २०
पूजित होगा। इस जन्ममें वह पुरुष प्रतापी, धनवान् एवं सुन्दर रूपवाला राजा होता है और मरनेपर स्वर्गमें उसे परम प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।'
इस प्रकार ब्रह्माजीके बतानेपर अग्निदेव मौन हो गये और उनकी आज्ञाके अनुसार दिये हुए लोक (अग्निलोक)-को पधारे। जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर अग्निके जन्मसे सम्बन्धित इस प्रसङ्गको सुनेगा, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूट जायगा—इसमें कोई संशय नहीं।
[अध्याय १९]
अश्विनीकुमारोंकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग और उनके द्वारा भगवत्स्तुति
राजा प्रजापालने पूछा— ब्रह्मन्! इस प्रकार महात्मा अग्निदेवका जन्म तो हो गया; किंतु विराट् पुरुषके प्राण-अपानरूप अश्विनीकुमारोंकी उत्पत्ति कैसे हुई ?
मुनिवर महातपाने कहा— राजन्! मरीचि मुनि ब्रह्माजीके पुत्र हैं। स्वयं ब्रह्माजीने ही (अपने पुत्रोंके रूपमें) चौदह स्वरूप धारण किये थे। उनमें मरीचि सबसे बड़े थे। उन मरीचिके पुत्र महान् तेजस्वी कश्यप मुनि हुए। ये प्रजापतियोंमें सबसे अधिक श्रीसम्पन्न थे; क्योंकि ये देवताओंके पिता थे। राजन्! बारहौं आदित्य उन्हींके पुत्र हैं। ये बारह आदित्य भगवान् नारायणके ही तेजोरूप हैं—ऐसा कहा गया है। इस प्रकार ये बारह आदित्य बारह मासके प्रतीक हैं और संवत्सर भगवान् श्रीहरिका रूप है। द्वादश आदित्योंमें मार्तण्ड महान् प्रतापशाली हैं। देवशिल्पी विश्वकर्माने अपनी परम तेजोमयी कन्या संज्ञाका विवाह मार्तण्डसे कर दिया। उससे इनकी दो संतानें उत्पन्न हुईं, जिनमें पुत्रका नाम यम और कन्याका नाम यमुना हुआ। संज्ञासे सूर्यका तेज सहा नहीं जा रहा था, अतः उसने मनके समान गतिवाली वडबा (घोड़ी)-का रूप धारण किया और अपनी छायाको सूर्यके घरमें स्थापितकर उत्तर-कुरुमें चली गयी। अब उसकी प्रतिच्छाया वहाँ रहने लगी और सूर्यदेवकी उससे भी दो संतानें हुईं, जिनमें पुत्र शनि नामसे विख्यात हुआ और कन्या तपती नामसे प्रसिद्ध हुई। जब छाया संतानोंके प्रति विषमताका व्यवहार करने लगी तो सूर्यदेवकी आँखें क्रोधसे लाल हो उठीं। उन्होंने छायासे कहा—'भामिनि! तुम्हारा अपनी इन संतानोंके प्रति विषमताका व्यवहार करना उचित नहीं है।' सूर्यके ऐसा कहनेपर भी जब छायाके विचारमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ तो एक दिन अत्यन्त दुःखित होकर यमराजने अपने पितासे कहा—'तात! यह हमलोगोंकी माता नहीं है; क्योंकि अपनी दोनों संतानों—शनि और तपतीसे तो यह प्यार करती है और हमलोगोंके प्रति शत्रुता रखती है। यह विमाताके समान हमलोगोंसे विषमतापूर्ण व्यवहार करती है।'
उस समय यमकी ऐसी बात सुनकर छाया क्रोधसे भर उठी और उसने यमको शाप दे दिया—'तुम शीघ्र ही प्रेतोंके राजा होओगे।' जब छायाके ऐसे कटु वचन सूर्यने सुने तो पुत्रके कल्याणकी कामनासे वे बोल उठे—'बेटा! चिन्ताकी कोई बात नहीं—तुम वहाँ मनुष्योंके धर्म और पापका निर्णय करोगे और लोकपालके रूपमें स्वर्गमें भी तुम्हारी प्रतिष्ठा होगी।' उस अवसरपर छायाके प्रति क्रोध हो जानेके कारण सूर्यका चित्त चञ्चल हो उठा था। अतः उन्होंने बदलेमें शनिको शाप दे डाला—'पुत्र! माताके दोषसे तुम्हारी दृष्टिमें भी क्रूरता भरी रहेगी।'
ऐसा कहकर भगवान् सूर्य उठे और संज्ञाको
२०-गणेशजीकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग और चतुर्थी तिथिका माहात्म्य
अध्याय २० ] अश्विनीकुमारोंकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग और उनके द्वारा भगवत्स्तुति ५३
ढूँढ़नेके लिये चल पड़े। उन्होंने देखा, उत्तर-कुरुदेशमें संज्ञा घोड़ीका वेष बनाकर विचर रही है। तत्पश्चात् वे भी अश्वका रूप धारण करके वहाँ पहुँच गये। वहाँ जाकर उन्होंने अपनी आत्मरूपा संज्ञासे सृष्टिरचनाके उद्देश्यसे समागम किया। जब प्रचण्ड तेजसे उद्दीप्त सूर्यने वडबारूपिणी संज्ञामें गर्भाधान किया तो उनका तेज अत्यन्त प्रज्वलित हो दो भागोंमें विभक्त होकर गिर पड़ा। आत्मविजयी प्राण और अपान पहलेसे ही संज्ञाकी योनिमें अव्यक्तरूपसे स्थित थे। सूर्यदेवके तेजके सम्बन्धसे वे दोनों मूर्तिमान् हो गये। इस प्रकार घोड़ीका रूप धारण करनेवाली विश्वकर्माकी पुत्री संज्ञासे इन दोनों पुरुषरत्नोंका जन्म हुआ। इसी कारण ये दोनों देवता सूर्यपुत्र अश्विनीकुमारोंके नामसे प्रसिद्ध हुए। सूर्य स्वयं प्रजापति कश्यपके पुत्र हैं और विश्वकर्माकी पुत्री संज्ञा उनकी पराशक्ति है। संज्ञाके शरीरमें ये दोनों पहले अमूर्त थे। अब सूर्यका अंश मिल जानेसे मूर्तिमान् हो गये। उत्पन्न होनेके बाद वे दोनों अश्विनीकुमार सूर्यके निकट गये और उन्होंने अपने मनकी अभिलाषा व्यक्त की—‘भगवन्! हम दोनोंके लिये आपकी क्या आज्ञा है?’
सूर्यने कहा—पुत्रो! तुम दोनों देवश्रेष्ठ प्रजापति भगवान् नारायणकी भक्तिपूर्वक आराधना करो। वे देवाधिदेव तुम्हें अवश्य वर प्रदान करेंगे।
इस प्रकार भगवान् सूर्यके कहनेपर अश्विनीकुमार अत्यन्त कठिन तप करनेमें तत्पर हो गये। वे चित्तको समाहितकर ‘ब्रह्मपार’ नामक स्तोत्रका निरन्तर जप करने लगे। बहुत समयतक तपस्या करनेपर नारायणस्वरूप ब्रह्मा उनसे संतुष्ट हो गये और बड़े प्रेमसे उन्हें वर दे दिया।
राजा प्रजापालने कहा—ब्रह्मन्! अश्विनीकुमारोंने अव्यक्तजन्मा भगवान् श्रीहरिकी जिस स्तोत्र द्वारा आराधना की थी, उसे मैं सुनना चाहता हूँ। आप उसे बतानेकी कृपा करें।
मुनिवर महातपा कहते हैं—राजन्! अश्विनीकुमारोंने जिस प्रकार अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीकी स्तुति की और जिस स्तोत्रके परिणामस्वरूप उन्हें ऐसा फल प्राप्त हुआ, वह मुझसे सुनो। वह स्तुति इस प्रकार है—‘भगवन्! आप निष्क्रिय, निष्प्रपञ्च और निराश्रय हैं। आपको किसीकी अपेक्षा एवं अवलम्ब नहीं है। आप गुणातीत, स्वप्रकाश, सर्वाधार, ममताशून्य और किसी दूसरे आलम्बकी अपेक्षासे रहित हैं। ऐसे ॐकारस्वरूप आप प्रभुको मेरा नमस्कार है। भगवन्! आप ब्रह्मा, महाब्रह्मा, ब्राह्मणोंके प्रेमी तथा पुरुष, महापुरुष एवं पुरुषोत्तम हैं। महादेव! देवोत्तम, स्थाणु—ये आपकी संज्ञाएँ हैं। सबका पालन करना आपका स्वभाव है। भूत, महाभूत, भूताधिपति; यज्ञ, महायज्ञ, यज्ञाधिपति; गुह्य, महागुह्य, गुह्याधिपति तथा सौम्य, महासौम्य और सौम्याधिपति—ये सभी शब्द आपमें ही सार्थक होते हैं। पक्षी, महापक्षी और पक्षिपति; दैत्य, महादैत्य एवं दैत्यपति तथा विष्णु, महाविष्णु और विष्णुपति—ये सभी आपके नाम हैं। आप प्रजाओंके एकमात्र अधिपति हैं। ऐसे परमेश्वर भगवान् नारायणको हमारा नमस्कार है।’
इस प्रकार अश्विनीकुमारोंके स्तुति करनेपर प्रजापति ब्रह्मा संतुष्ट हो गये। उन्होंने अत्यन्त प्रेमके साथ कहा—‘वर माँगो। तुम लोगोंको मैं अभी वह वर देता हूँ, जो देवताओंके लिये भी परम दुर्लभ है तथा जिसके प्रभावसे तीनों लोकोंमें सुखपूर्वक विचरण कर सकोगे।’
अश्विनीकुमार बोले—भगवन्! हमें यज्ञोंमें देवभाग देनेकी कृपा करें। प्रजापते! हम चाहते हैं कि देवताओंके समान सदा सोमपान करनेका अधिकार हमें प्राप्त हो। इसके अतिरिक्त देवताओंके रूपमें हमलोगोंकी शाश्वत प्रतिष्ठा हो।
ब्रह्माजीने कहा—रूप, कान्ति, अनुपम आयुर्वेदशास्त्रका ज्ञान तथा सोमरस पीनेका
| ५४ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय २१ |
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अधिकार—ये सब तुम्हें सभी लोकोंमें सुलभ होंगे।
मुनिवर महातपा कहते हैं—राजन्! ब्रह्माजीने अश्विनीकुमारोंको ये सब वरदान द्वितीया तिथिको दिये थे, इसलिये यह परम श्रेष्ठ तिथि उनकी मानी गयी है। सुन्दर रूपकी अभिलाषा रखनेवाले मनुष्यको इस तिथिमें व्रत करना चाहिये। यह व्रत एक वर्षमें पूरा होता है। इसमें सदा पवित्र रहकर पुष्पोंका आहार करनेकी विधि है। इससे व्रतीको सुन्दरता प्राप्त होती है। साथ ही अश्विनीकुमारोंके जो गुण कहे गये हैं, वे भी उसे सुलभ हो जाते हैं। अश्विनीकुमारोंके जन्मके इस उत्तम प्रसङ्गको सदा श्रवण करनेवाला मनुष्य पुत्रवान् होता है तथा वह सभी पापोंसे मुक्त भी हो जाता है। [अध्याय २०]
गौरीकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग, द्वितीया तिथि एवं रुद्रद्वारा जलमें तपस्या, दक्षके यज्ञमें रुद्र और विष्णुका संघर्ष
राजा प्रजापालने पूछा—महाप्राज्ञ! परम पुरुष परमात्माकी शक्तिरूपा गौरीने, जिनका सभी देव-दानव स्तवन करते रहते हैं, किस वरदानके प्रभावसे सगुण विग्रह धारण किया?
मुनिवर महातपाने कहा—जब अनेक रूपोंवाले रुद्रकी उत्पत्ति हो गयी तो उनके पिता प्रजापति ब्रह्माने स्वयं भगवान् नारायणके श्रीविग्रहसे प्रकटित हुई परममङ्गलमयी गौरीको भार्यारूपमें वरण करनेके लिये दे दिया। इन गौरीदेवीको 'भारती' भी कहा जाता है। परम सुन्दरी गौरीको पाकर रुद्रकी प्रसन्नताकी सीमा न रही। तदनन्तर ब्रह्माजीने कहा—'रुद्र! तुम तपके प्रभावसे प्रजाओंकी सृष्टि करो।' इसपर रुद्र मौन हो गये। फिर ब्रह्माने जब बार-बार प्रेरणा की तो रुद्रने उत्तर दिया—'इस कार्यमें मैं असमर्थ हूँ।' इसपर ब्रह्माजीने कहा—'तब तुम तपरूपी धनका संचय करो। क्योंकि कोई भी तपोहीन पुरुष प्रजाओंकी सृष्टि नहीं कर सकता।' यह सुनकर परम शक्तिशाली रुद्र जलमें निमग्न हो गये।
जब देवाधिदेव रुद्र जलमें प्रविष्ट हो गये तो ब्रह्माजीने उस परम सुन्दरी कन्या गौरीको पुनः अपने शरीरके भीतर अन्तर्हित कर लिया। तत्पश्चात् उनके मनमें पुनः सृष्टिका संकल्प होनेपर सात मानस पुत्रोंकी उत्पत्ति हुई। प्रजापति दक्ष भी उनके साथ प्रकट हुए। इसके बाद प्रजाओंकी सृष्टि सम्यक् प्रकारसे बढ़ने लगी। इन्द्रसहित समस्त देवता, आठ वसु, रुद्र, आदित्य और मरुद्गण—ये सभी प्रजापति दक्षकी कन्याओंके वंशज विख्यात हुए। इन गौरीके विषयमें पहले भी कहा जा चुका है। कालान्तरमें ब्रह्माजीने उन्हें दक्षप्रजापतिको पुत्रीके रूपमें प्रदान किया। ब्रह्माजीने पूर्व कालमें इन्हीं गौरीका विवाह महात्मा रुद्रके साथ किया था। नृपवर! भगवान् श्रीहरिके विग्रहसे प्रकट हुई वही गौरी दक्षकी पुत्री होकर 'दाक्षायणी' कहलायीं। दक्षप्रजापतिने जब अपनी कन्याओंसे उत्पन्न हुए दौहित्रों—देवताओंके समाजको देखा तो उनका अन्तःकरण प्रसन्नतासे भर उठा। साथ ही अपने कुलकी समृद्धि-कामनासे प्रजापति ब्रह्माको प्रसन्न करनेके लिये उन्होंने यज्ञ आरम्भ कर दिया।
उस यज्ञमें मरीचि आदि सभी ब्रह्माके पुत्र अपने-अपने विभागमें व्यवस्थित होकर ऋत्विजोंका कार्य करने लगे। स्वयं मुनिवर मरीचि ब्रह्मा बने। दूसरे ब्रह्मपुत्र अन्य-अन्य स्थानोंपर नियुक्त हुए। अत्रि ऋषिको यज्ञमें अन्य स्थान प्राप्त हुआ। अङ्गिरा मुनि इस यज्ञमें आग्नीध्र बने, पुलस्त्य होता हुए
२१-सर्पोंकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग और पञ्चमी तिथिकी महिमा
अध्याय २१ ] गौरीकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग, दक्षके यज्ञमें रुद्र और विष्णुका संघर्ष ५५
और पुलह उद्गाता। उस यज्ञमें महान् तपस्वी क्रतु प्रस्तोता बने। प्रचेतामुनि प्रतिहर्ताका स्थान सुशोभित कर रहे थे। महर्षि वसिष्ठ उस यज्ञमें सुब्रह्मण्य-पदपर अधिष्ठित थे। चारों सनत्कुमार यज्ञके सभासद थे।
इस प्रकार ब्रह्माजीसे सभी लोकोंकी सृष्टि हुई है। अतएव वे सभीके द्वारा यजन करने योग्य हैं। इसी कारण यज्ञके आराध्य ब्रह्माजी स्वयं उस यज्ञमें उपस्थित थे। पितृगण भी प्रत्यक्ष रूप धारण करके वहाँ पधारे थे। उन लोगोंकी प्रसन्नतासे जगत्में प्रसन्नता छा जाती है। वहाँ अपना भाग चाहनेवाले सभी देवता, आदित्य, वसुगण, विश्वेदेव, पितर, गन्धर्व और मरुद्गण—सबको निर्दिष्ट यथोचित भाग प्राप्त हो गये। ठीक उसी समय वे रुद्र, जो बहुत पहले ब्रह्माजीके कोपसे प्रकट हुए थे और जिन्होंने अगाध जलमें मग्न होकर तप आरम्भ कर दिया था—पुनः जलसे बाहर निकल पड़े। उस समय उनका श्रीविग्रह ऐसा उद्दीप्त हो रहा था, मानो हजारों सूर्य प्रकाशित हो उठे हों। वे भगवान् रुद्र सम्पूर्ण ज्ञानके निधान हैं। समस्त देवता उनके अङ्गभूत हैं। वे परम विशुद्ध प्रभु तपोबलके प्रभावसे सारे सृष्टि-प्रपञ्चको प्रत्यक्ष देखनेकी सामर्थ्यसे युक्त थे।
नरश्रेष्ठ! तत्काल ही उनसे पाँच दिव्य सर्ग उत्पन्न हुए। इसके अतिरिक्त चार भौम सर्गोंकी भी उनसे उत्पत्ति हुई, जिनमें मरणधर्मा जीव भी थे। राजन्! अब तुम इस रुद्र-सृष्टिका प्रसङ्ग सुनो। जब एकादश रुद्रोंके अधिपति भगवान् महारुद्र दस हजार वर्षोंतक तप करके उस अगाध जलके ऊपर आये तो उन्होंने देखा—वन-उपवनोंसे युक्त सस्यश्यामला पृथ्वी परम रमणीय प्रतीत हो रही है। उसपर मनुष्यों और पशुओंकी भरमार हो रही है। उन्हें दक्षप्रजापतिके भवनमें गूँजते हुए ऋत्विजोंके शब्द भी सुनायी पड़े। साथ ही यज्ञशालामें याज्ञिक पुरुषोंके द्वारा उच्चस्वरसे किया जाता हुआ वेदगान भी सुनायी पड़ा। तत्पश्चात् उन महान् तेजस्वी एवं सर्वज्ञ परम प्रभु रुद्रके मनमें अपार क्रोध उमड़ पड़ा। वे कहने लगे—‘अरे! ब्रह्माजीने सर्वप्रथम अपनी सम्पूर्ण अन्तःशक्तिका प्रयोग करके मेरी सृष्टि की और मुझसे कहा कि तुम प्रजाओंकी सृष्टि करो। फिर वह सृष्टि-कार्य दूसरे किस व्यक्तिने सम्पन्न कर दिया?’ ऐसा कहकर परम प्रभु भगवान् रुद्र क्रोधित होकर बड़े जोरसे गरज उठे। उस समय उनके कानोंसे तीव्र ज्वालाएँ निकल पड़ीं। उन ज्वालाओंसे भूत, वेताल, अग्निमय प्रेत एवं पूतनाएँ करोड़ोंकी संख्यामें प्रकट हो गयीं। वे सभी अपने-अपने हाथोंमें अनेक प्रकारके आयुध लिये हुए थे। जब उन भूतगणोंने भगवान् रुद्रकी ओर दृष्टि डाली तो स्वयं उन परमेश्वरने एक अत्यन्त सुन्दर रथकी भी रचना कर ली। उस रथमें दो सुन्दर मृग अश्वोंके स्थानपर कल्पित हुए थे। तीनों तत्त्व ही रथके तीन दण्डोंका काम कर रहे थे। धर्मराज उस रथके अक्षदण्ड बने तथा पवन उसकी घरघराहट थे। दिन-रात—ये दो उस रथकी पताकाएँ थीं। धर्म और अधर्म उसके ध्वजदण्ड थे। उस वेदविद्यामय रथपर सारथिका कार्य स्वयं ब्रह्माजी कर रहे थे। गायत्री ही धनुष हुई और प्रणवने धनुषकी डोरीका स्थान ग्रहण किया। राजन्! उन देवेश्वरके लिये सातों स्वर सात बाण बन गये थे। इस प्रकार युद्धसामग्री एकत्रित करके परम प्रतापी रुद्र क्रोधयुक्त हो दक्षका यज्ञ विध्वंस करनेके लिये चल पड़े। जब भगवान् शंकर वहाँ पहुँचे तो ऋत्विजोंके मन्त्र विस्मृत हो गये। यज्ञके विपरीत इस अशुभ लक्षणको देखकर उन सभी ऋत्विजोंने कहा—
| ५६ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय २१ |
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'देवतागण! आप लोग शीघ्र सावधान हो जायें। आप सभीके सामने कोई महान् भय उपस्थित होनेवाला है। सम्भवतः ब्रह्माद्वारा निर्मित कोई बलवान् असुर यहाँ आ रहा है। मालूम होता है कि इस परम दुर्लभ यज्ञमें भाग पानेके लिये उसके मनमें विशेष इच्छा जाग्रत् हो गयी है।' इसपर देवतागण अपने मातामह दक्षप्रजापतिसे बोले—'तात! इस अवसरपर हमलोगोंको क्या करना चाहिये? आप जो उचित हो, वह बतानेकी कृपा करें।'
दक्षप्रजापतिने कहा—आप सभी लोग तुरंत शस्त्र उठा लें और युद्ध प्रारम्भ कर दें।
उनके ऐसा कहते ही अनेक प्रकारके आयुध धारण करनेवाले देवताओं एवं रुद्रके अनुचरोंमें घोर संग्राम छिड़ गया। उस युद्धमें वेताल, भूत, कूष्माण्ड, पूतनाएँ और अनेक ग्रह आयुध हाथमें लेकर लोकपालोंके साथ भिड़ गये। रुद्रके अनुचर भूतगण आकाशमें जाकर भयंकर बाण, तलवार और फरसे चलाने लगे। उस समरभूमिमें उन भयंकर भूतोंके पास उल्काएँ, अस्थिसमूह तथा बाण प्रचुरमात्रामें थे। युद्धभूमिमें रुद्रदेवके देखते-देखते वे क्रोधपूर्वक देवताओंपर प्रचण्ड प्रहार करने लगे। तदनन्तर संग्रामका रूप अत्यन्त भयावह हो गया। रुद्रने भगदेवताके दोनों नेत्र एक ही बाणसे छेद दिये। उनके बाणोंसे भग नेत्रहीन हो गये। यह देखकर तेजस्वी पूषाको क्रोध आ गया और वे रुद्रसे जा भिड़े। उस महान् युद्धमें पूषाने बाणोंका जाल-सा बिछा दिया। यह देखकर शत्रुहन्ता रुद्रने पूषाके सभी दाँत तोड़ डाले। रुद्रद्वारा पूषाका दन्तभङ्ग देखकर देवसेनामें सब ओर भगदड़ मच गयी। फिर तो ग्यारहों रुद्र वहाँ आ गये। तदनन्तर आदित्योंमें सबसे कनिष्ठ परम प्रतापी भगवान् विष्णु सहसा वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने देवसेनाको इस प्रकार हतोत्साहित हो दिशा-विदिशाओंमें भागते देखकर कहा—'वीरो! पुरुषार्थका परित्याग करके तुमलोग कहाँ भागे जा रहे हो? तुम वीरोचित दर्प, महिमा, दृढ़निश्चय, कुलमर्यादा और ऐश्वर्यभाव—इतनी जल्दी कैसे भुला बैठे? तुम्हारे भीतर ब्रह्माके सभी गुण विराजमान हैं। तुम्हें दीर्घायु भी प्राप्त हो चुकी है। अतएव भूमिपर गिरकर उन पद्मयोनि प्रजापतिको साष्टाङ्ग प्रणाम करो। यह प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जायगा और युद्धके लिये सन्नद्ध हो जाओ।'
उस समय भगवान् जनार्दनके श्रीअङ्गोंमें पीताम्बर सुशोभित हो रहा था। उनके हाथोंमें शङ्ख, चक्र एवं गदा विद्यमान थे। देवताओंसे ऐसा कहकर भगवान् श्रीहरि गरुड़पर आरूढ़ हो गये। फिर तो भगवान् रुद्रसे उनका रोमाञ्चकारी युद्ध छिड़ गया। रुद्रने पाशुपतास्त्रसे विष्णुको और विष्णुने कुपित होकर रुद्रपर नारायणास्त्रका प्रयोग किया। उनके द्वारा प्रयुक्त नारायणास्त्र और पाशुपतास्त्र—दोनों आकाशमें परस्पर टकराने लगे। एक हजार दिव्य वर्षोंतक उनका यह भीषण युद्ध चलता रहा। उस संग्राममें एकके मस्तकपर मुकुट सुशोभित हो रहा था तो दूसरेका सिर जटाजालसे भूषित था। एक शङ्ख बजा रहे थे तो दूसरेके हाथमें मङ्गलमय डमरूका वादन हो रहा था। एक तलवार लिये हुए थे तो दूसरे दण्ड। एकका सर्वाङ्ग कण्ठहारमें संलग्न कौस्तुभमणिसे उद्भासित हो रहा था तो दूसरेके श्रीअङ्ग भस्मद्वारा भूषित हो रहे थे। एक पीताम्बर धारण किये हुए थे, तो दूसरे सर्पकी मेखला। ऐसे ही उनके रौद्रास्त्र और नारायणास्त्रमें भी परस्पर होड़ मची हुई थी। उन हरि और हर—दोनोंमें बलकी एक-से-एक अधिकता प्रतीत होती थी।
२२-षष्ठी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें स्वामी कार्तिकेयके जन्मकी कथा
अध्याय २१ ] गौरीकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग; दक्षके यज्ञमें रुद्र और विष्णुका संघर्ष ५७
यह देखकर पितामह ब्रह्माजीने उनसे अनुरोध किया—‘आप दोनों उत्तम व्रतोंके पालन करनेवाले हैं; अतएव अपने-अपने स्वभावके अनुसार अस्त्रोंको शान्त कर दें।’
ब्रह्माजीके इस प्रकार कहनेपर विष्णु और शिव—दोनों शान्त हो गये। तत्पश्चात् ब्रह्माजीने उन दोनोंसे कहा—‘आप दोनों महानुभाव हरि और हरके नामसे जगत्में प्रतिष्ठा प्राप्त करेंगे। यद्यपि दक्षका यह यज्ञ विध्वंस हो चुका है, फिर भी यह सम्पूर्णताको प्राप्त होगा। दक्षकी इन देव-संतानोंसे संसार भी यशस्वी होगा।’
लोकपितामह ब्रह्माजी विष्णु और रुद्रसे कहकर वहाँ उपस्थित देवमण्डलीसे इस प्रकार बोले—‘देवताओ! आपलोग इस यज्ञमें भगवान् रुद्रको भाग अवश्य दें; क्योंकि वेदकी ऐसी आज्ञा है कि यज्ञमें रुद्रका भाग परम प्रशस्त है। इन रुद्रदेवका तुम सभी स्तवन करो। जिनके प्रहारसे भग देवताके नेत्र नष्ट हुए हैं तथा जिन्होंने पूषाके दाँत तोड़ डाले हैं, उन भगवान् रुद्रकी इस लीलासे सम्बद्ध नामोंसे स्तुति करनी चाहिये। इसमें विलम्ब करना ठीक नहीं है। इसके फलस्वरूप ये प्रसन्न होकर तुमलोगोंके लिये वरदाता हो जायँगे।’
जब ब्रह्माजीने देवताओंसे इस प्रकार कहा तो वे आत्मयोनि ब्रह्माजीको प्रणाम करके परम अनुरागपूर्वक परमात्मा भगवान् शिवकी स्तुति करने लगे।
देवगण बोले—‘भगवान्! आप विषम नेत्रोंवाले त्र्यम्बकको मेरा निरन्तर नमस्कार है। आपके सहस्र (अनन्त) नेत्र हैं तथा आप हाथमें त्रिशूल धारण करते हैं। आपको बार-बार नमस्कार है। खट्वाङ्ग और दण्ड धारण करनेवाले आप प्रभुको मेरा बारंबार नमस्कार है। भगवन्! आपका रूप अग्निकी प्रचण्ड ज्वालाओं एवं करोड़ों सूर्योंके समान कान्तिमान् है। प्रभो! आपका दर्शन प्राप्त न होनेसे हमलोग जड़ विज्ञानका आश्रय लेकर पशुत्वको प्राप्त हो गये थे। त्रिशूलपाणे! तीन नेत्र आपकी शोभा बढ़ाते हैं। आर्तजनोंका दुःख दूर करना आपका स्वभाव है। आप विकृत मुख एवं आकृति बनाये रहते हैं। सम्पूर्ण देवता आपके शासनवर्ती हैं। आप परम शुद्धस्वरूप, सबके स्रष्टा तथा रुद्र एवं अच्युत नामसे प्रसिद्ध हैं। आप हमपर प्रसन्न हों। इन पूषाके दाँत आपके हाथोंसे भग्न हुए हैं। आपका रूप भयावह है। बृहत्काय वासुकिनागको धारण करनेसे आपका कण्ठदेश अत्यन्त मनोरम प्रतीत हो रहा है। अच्युत! आप विशाल शरीरवाले हैं। हम देवताओंपर अनुग्रह करनेके लिये आपने जो कालकूट विषका पान किया था, उसीसे आपका कण्ठ-भाग नील वर्णका हो गया है। सर्वलोकमहेश्वर! विश्वमूर्ते! आप हमपर प्रसन्न होनेकी कृपा करें। भगके नेत्रको नष्ट करनेमें पटु देवेश्वर! आप इस यज्ञका प्रधान भाग स्वीकार करनेकी कृपा कीजिये। नीलकण्ठ! आप सभी गुणोंसे सम्पन्न हैं। प्रभो! आप प्रसन्न हों और हमारी रक्षा करें। भगवन्! आपका स्वतःसिद्ध स्वरूप गौरवर्णसे शोभा पाता है। कपाली, त्रिपुरारि और उमापति—ये आपके ही नाम हैं। पद्मयोनि ब्रह्मासे प्रकट होनेवाले भगवन्! आप सभी भयोंसे हमारी रक्षा करें। देवेश्वर! आपके श्रीविग्रहके अन्तर्गत हम अनेक सर्ग एवं अङ्गोंसहित सम्पूर्ण वेद, विद्याओं, उपनिषदों तथा सभी अग्नियोंको भी देख रहे हैं। परम प्रभो! भव, शर्व, महादेव, पिनाकी, हर और रुद्र—ये सभी आपके ही नाम हैं। विश्वेश्वर!
| ५८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय २२ |
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हम आपको प्रणाम करते हैं। आप हम सबकी रक्षा कीजिये।'*
इस प्रकार देवताओंके स्तुति करनेपर देवाधिदेव भगवान् रुद्र प्रसन्न होकर उनके प्रति बोले—
भगवान् रुद्रने कहा—देवताओ! भगको नेत्र तथा पूषाको दाँत पुनः प्राप्त हो जायँ। दक्षका यज्ञ पूर्ण हो जाय। देवताओ! तुमलोगोंमें पशुत्व आ गया था, उसे भी मैं दूर कर दूँगा। मेरे दर्शनके प्रभावसे देवता उस पशुत्वसे मुक्त होकर शीघ्र ही पशुपतित्वको प्राप्त होंगे। मैं आदि सनातनकालसे सम्पूर्ण विद्याओंका अधीश्वर हूँ, पशुओं (बद्धजीवों)-में मैं उनके अधीश्वररूपमें था, अतः लोकमें मेरा नाम पशुपति होगा। जो मेरी उपासना करेंगे, वे पाशुपतदीक्षासे युक्त होंगे।
भगवान् रुद्रके ऐसा कहनेपर लोकपितामह ब्रह्माजी अत्यन्त स्नेहपूर्वक हँसते हुए उनसे बोले—'रुद्रदेव! आप निश्चय ही जगत्में पशुपति नामसे प्रसिद्ध होंगे। साथ ही यह दक्ष भी आपके सम्बन्धसे शुद्ध होकर संसारमें ख्याति प्राप्त करेगा। सम्पूर्ण संसारद्वारा इसका सम्मान होगा।
परम मेधावी ब्रह्माजी रुद्रसे ऐसा कहकर दक्षसे बोले—'वत्स! मैंने गौरीको तुम्हें पहलेसे सौंप रखा है। उसे तुम इन रुद्रको दे दो।' परम सुन्दरी गौरीने दक्षके घरमें कन्यारूपसे जन्म ग्रहण किया था। ब्रह्माजीके कहनेपर उन्होंने महाभाग रुद्रके साथ उनका विवाह कर दिया। दक्षकन्या गौरीका रुद्रके पाणिग्रहण कर लेनेपर दक्षका सम्मान उत्तरोत्तर बढ़ता गया। जब ब्रह्माजीने रुद्रको निवासके लिये कैलासपर्वत प्रदान किया, तब रुद्र अपने गणोंके साथ कैलासपर्वतपर चले गये। ब्रह्माजी भी दक्षप्रजापतिको साथ लेकर अपनी पुरीमें पधारे। [अध्याय २१]
तृतीया तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें हिमालयकी पुत्रीरूपमें गौरीकी उत्पत्तिका वर्णन और भगवान् शंकरके साथ उनके विवाहकी कथा
मुनिवर महातपा कहते हैं—राजन्! जब भगवान् रुद्र कैलासपर निवास करने लगे तो कुछ समय बाद अपने पिता दक्षसे प्राणपति महादेवके साथ वैरका प्रसङ्ग गौरीको स्मरण हो आया। अब सहसा उनके मनमें रोषका भाव उत्पन्न हो गया। वे सोचने लगीं—'मेरे पिता दक्षने इन देवाधिदेवको यज्ञमें भाग न देकर कितना बड़ा अपराध किया था, जिसके फलस्वरूप मेरे पिताका यज्ञके निमित्त बनाया हुआ नगर तथा उनके यज्ञका भी विध्वंस करना पड़ा। अतएव शिवके अपराधी पितासे उत्पन्न शरीरका मुझे त्याग कर देना चाहिये और तपस्याद्वारा इन महेश्वरकी आराधना कर
* नमो विषमनेत्राय नमस्ते त्र्यम्बकाय च॥
नमः सहस्रनेत्राय नमस्ते शूलपाणये। नमः खट्वाङ्गहस्ताय नमस्ते दण्डधारिणे॥
त्वं देव हुतभुग्ज्वालाकोटिभानुसमप्रभः। अदर्शने वयं देव मूढविज्ञानतोऽधुना॥
नमस्त्रिनेत्रार्तिहराय शम्भो त्रिशूलपाणे विकृतास्यरूप। समस्तदेवेश्वर शुद्धभाव प्रसीद रुद्राच्युत सर्वभाव॥
पूष्णोऽस्य दन्तान्तक भीमरूप प्रलम्बभोगीन्द्र मनोज्ञकण्ठ। विशालदेहाच्युत नीलकण्ठ प्रसीद विश्वेश्वर विश्वमूर्ते॥
भगाक्षिसंस्फोटनदक्षकर्मन् गृहाण भागं मखतः प्रधानम्। प्रसीद देवेश्वर नीलकण्ठ प्रपाहि नः सर्वगुणोपपन्न॥
सिताङ्गरागाप्रतिपन्नमूर्ते कपालधारिँस्त्रिपुरघ्न देव। प्रसीद नः सर्वभयेषु चैवमुमापते पुष्करनालजन्म॥
पश्यामि ते देहगतान् सुरेश सर्गाद्यनेकान् वेदवराननन्त। साङ्गान् सविद्यान् सपद्क्रमांश्च सर्वान्लांश्च त्वयि देवदेव॥
भव शर्व महादेव पिनाकिन् रुद्र ते हर। नताः स्म सर्वे विश्वेश त्राहि नः परमेश्वर॥
(अध्याय २१।६९-७७)
अध्याय २२] तृतीया तिथिमें गौरीकी उत्पत्ति और भगवान् शंकरके साथ उनका विवाह ५९
दूसरा जन्म ग्रहण कर इनकी अर्धाङ्गिनी बनकर मुझे इन्हें प्राप्त करना चाहिये। पिता दक्षमें तो बान्धवोचित प्रेमका लेश भी नहीं रह गया है। अतएव अब उनके घर मेरा जाना भी नहीं हो सकता।'
इस प्रकार भलीभाँति विचार करके परम सुन्दरी गौरी तप करनेके उद्देश्यसे गिरिराज हिमालयपर चली गयीं। दीर्घकालतक तपस्या करके उन्होंने अपने शरीरको सुखा डाला। फिर योगाग्निके द्वारा अपने शरीरको दग्धकर वे पर्वतराज हिमालयकी पुत्रीके रूपमें प्रकट हुईं और उमा तथा महाकाली आदि उनके नाम हुए। हिमवान्के घरमें परम सुन्दररूपसे सुशोभित होकर वे अवतीर्ण हुईं कि फिर 'भगवान् रुद्र ही मुझे पतिरूपसे प्राप्त हों।' इस संकल्पसे त्रिलोचन भगवान् शंकरका स्मरण करते हुए उन्होंने पुनः कठोर तपस्या आरम्भ कर दी। इस प्रकार जब गिरिराज हिमालयपर दीर्घकालतक तपद्वारा उन्होंने आराधना की तब ब्राह्मणका वेष धारण करके भगवान् शिव वहाँ पधारे। उस समय उनका वृद्ध शरीर था और सभी अङ्ग शिथिल हो रहे थे। साथ ही वे पग-पगपर गिरते-पड़ते चल रहे थे। बड़ी कठिनाईसे वे पार्वतीके पास पहुँचकर बोले—'भद्रे! मैं अत्यन्त भूखा ब्राह्मण हूँ, मुझे कुछ खाने योग्य पदार्थ दो।'
उनके इस प्रकार कहनेपर परम कल्याणमयी शैलेन्द्रनन्दिनी उमाने उन ब्राह्मणसे कहा—'विप्रवर! मैं आपको भोजनार्थ फल आदि पदार्थ दे रही हूँ। आप यथाशीघ्र स्नानकर इच्छानुसार उन्हें ग्रहण करें।' उनके यों कहनेपर वे ब्राह्मणदेवता पासमें ही बहती हुई गङ्गाके जलमें स्नान करनेके लिये उतरे। उन ब्राह्मण-वेषधारी शिवने स्नान करते समय ही स्वयं मायास्वरूप एक भयंकर मकरका रूप धारण कर उन ब्राह्मणका (अपना) पैर पकड़ लिया। फिर पार्वतीको यह सब लीला दिखाते हुए कहने लगे—'दौड़ो-दौड़ो, मैं भारी विपत्तिमें पड़ गया हूँ। इस मकरसे तुम मेरे प्राणोंकी रक्षा करो और जबतक इसके द्वारा मैं नष्ट-भ्रष्ट नहीं कर दिया जाता, तभीतक तुम मुझे बचा लो।'
ब्राह्मणके ऐसा कहनेपर पार्वतीने सोचा—'गिरिराज हिमालय तो मेरे पिता हैं। उनका मैं पितृभावसे स्पर्श करती हूँ और भगवान् शंकरका पति-भावसे! पर मैं तपस्विनी कैसे इन ब्राह्मणदेवताको स्पर्श करूँ? परंतु इस समय जलमें ग्राहद्वारा पकड़े जानेपर भी यदि मैं इन्हें बाहर नहीं खींचती तो निःसंदेह मुझे ब्रह्महत्याका दोष लगेगा। दूसरी बात यह है कि अन्य धर्मजनित त्रुटियों या प्रत्यवायोंका प्रायश्चित्तद्वारा शोधन भी सम्भव है; किंतु इस ब्रह्महत्यादोषका तो शोधक कोई प्रायश्चित्त भी नहीं दीखता।' इस प्रकार मन-ही-मन कह वे तुरंत दौड़कर वहाँ पहुँच गयीं और हाथसे पकड़कर ब्राह्मणको जलसे बाहर खींचने लगीं। इतनेमें वे देखती क्या हैं कि जिन भूतभावन शंकरकी आराधनाके लिये वे तपस्या कर रही थीं, स्वयं वे शंकर ही उनके हाथमें आ गये हैं। इस प्रकार उन्हें देखकर वे लज्जित हो गयीं और पूर्वसमयका त्याग उन्हें स्मरण हो आया। अत्यन्त लज्जाके कारण उन परम सुन्दरी उमाके मुखसे भगवान् शंकरके प्रति कोई वचन नहीं निकल रहा था। वे बिल्कुल मौन हो गयीं। इसपर भगवान् रुद्र मुसकराते हुए कहने लगे—'भद्रे! तुम मेरा हाथ पकड़ चुकी हो, फिर मेरा त्याग करना तुम्हारे लिये उपयुक्त नहीं है। कल्याणि! तुम यदि मेरा पाणिग्रहण निष्फल कर दोगी तो मुझे अब अपने भोजनके लिये ब्रह्मपुत्री सरस्वतीसे कहना पड़ेगा।'
२३-सप्तमी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें आदित्योंकी उत्पत्तिकी कथा
| ६० | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय २२ |
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'यह उपहासकी परम्परा आगे न बढ़े'—ऐसा सोचकर कुछ लज्जित-सी हुई पार्वती कहने लगीं—'देवाधिदेव! महेश्वर! आप तीनों लोकोंके स्वामी हैं। आपको पानेके लिये मेरा यह प्रयत्न है। पूर्वजन्ममें भी आप ही मेरे पतिदेव थे। इस जन्ममें भी आप ही मेरे पति होंगे, कोई दूसरा नहीं। किंतु अभी मेरे संरक्षक पिता पर्वतराज हिमालय हैं, अब मैं उनके पास जाती हूँ। उन्हें जताकर आप विधिपूर्वक मेरा पाणिग्रहण करें।'
इस प्रकार कहकर परम सुन्दरी भगवती उमा अपने पिता हिमालयके पास गयीं और हाथ जोड़कर उनसे कहा—'पिताजी! मुझे अनेक लक्षणोंसे प्रतीत होता है कि पूर्वजन्ममें भगवान् रुद्र ही मेरे पति रहे हैं। उन्होंने ही दक्षके यज्ञका विध्वंस किया था। वे ही संसारके संरक्षक रुद्र ब्राह्मणका वेष धारण कर तपोवनमें मेरे पास आये और मुझसे भोजनकी याचना की। 'आप स्नान कर आइये'—मेरी इस प्रेरणापर वे वृद्ध ब्राह्मणका वेष बनाये हुए गङ्गामें गये। फिर वहाँ मकरद्वारा ग्रस्त हो जानेपर उन्होंने मुझे सहायताके लिये पुकारा। परंतु पिताजी! मुझे ब्रह्महत्या न लग जाय, इस भयसे मैंने अपने हाथसे उन्हें पकड़ लिया। मेरे पकड़ते ही वे अपने वास्तविक रूपमें प्रकट हो गये और कहने लगे—'देवि! यह तो पाणिग्रहण है। तपोधने! इसमें तुम्हें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये।' उनके ऐसा कहनेपर उनसे स्वीकृति लेकर मैं आपसे पूछने आयी हूँ। अतः इस अवसरपर मेरा जो कर्तव्य हो, उसे आप शीघ्र बतानेकी कृपा कीजिये।'
पार्वतीकी ऐसी बात सुनकर हिमालय बड़े प्रसन्न हुए और अपनी पुत्रीसे कहने लगे—'सुमुखि! मैं आज संसारमें अत्यन्त धन्य हूँ, जो स्वयं भगवान् शंकर मेरे जामाता होनेवाले हैं। तुम्हारे द्वारा मैं सचमुच संततिवान् बन गया। पुत्रि! तुमने मुझको देवताओंका सिरमौर बना दिया है; पर क्षणभर रुकना। मेरे आनेतक थोड़ी प्रतीक्षा करना।'
इस प्रकार कहकर पर्वतराज हिमालय सम्पूर्ण देवताओंके पितामह ब्रह्माजीके पास गये। वहाँ उनका दर्शनकर गिरिराजने नम्रतापूर्वक कहा—'भगवन्! उमा मेरी पुत्री है। आज मैं उसे भगवान् रुद्रको देना चाहता हूँ।' इसपर श्रीब्रह्माजीने भी उन्हें 'दे दो' कहकर अनुमति दे दी।
ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर पर्वतराज हिमालय अपने घरपर गये और तुरंत ही तुम्बुरु, नारद, हाहा और हूहूको बुलाया। फिर किन्नरों, असुरों और राक्षसोंको भी सूचना दी। अनेक पर्वत, नदियाँ, वृक्ष, ओषधिवर्ग तथा छोटे-बड़े अन्य पाषाण भी मूर्ति धारणकर भगवान् शंकरके साथ होनेवाले पार्वतीके विवाहको देखनेके लिये वहाँ आये। उस विवाहमें पृथिवी ही वेदी बनी और सातों समुद्र ही कलश। सूर्य एवं चन्द्रमा उस शुभ अवसरपर दीपकका कार्य कर रहे थे तथा नदियाँ जल ढोने-परसनेका काम कर रही थीं। जब इस प्रकार सारी व्यवस्था हो गयी, तब गिरिराज हिमालयने मन्दराचलको भगवान् शंकरके पास भेजा। भगवान् शंकरकी स्वीकृतिसे मन्दराचल तत्काल वापस आ गये। फिर तो भगवान् शंकरने विधिपूर्वक उमाका पाणिग्रहण किया। उस विवाहके उत्सवपर पर्वत और नारद—ये दोनों गान कर रहे थे। सिद्धोंने नाचनेका काम पूरा किया था। वनस्पतियाँ अनेक प्रकारके पुष्पोंकी वर्षा कर रही थीं तथा सुन्दर रूपवती अप्सराएँ उच्च स्वरसे गा-गाकर नृत्य करनेमें संलग्न थीं। उस विवाह-महोत्सवमें लोकपितामह चतुर्मुख ब्रह्माजी स्वयं ब्रह्माके स्थानपर विराजमान थे। उन्होंने प्रसन्न
२४-अष्टमी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें मातृकाओंकी उत्पत्तिकी कथा
अध्याय २३ ] गणेशजीकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग और चतुर्थी तिथिका माहात्म्य ६१
होकर उमासे कहा—'पुत्रि! संसारमें तुम-जैसी पत्नी और शंकर-सरीखे पति सबको सुलभ हों।' भगवान् शंकर और भगवती उमा—दोनों एक साथ बैठे थे। उनसे इस प्रकार कहकर ब्रह्माजी अपने धामको लौट आये।
भगवान् वराह कहते हैं—पृथ्वि! रुद्रका प्राकट्य, गौरीका जन्म तथा विवाह—यह सारा प्रसङ्ग राजा प्रजापालके पूछनेपर परम तपस्वी महातपा ऋषिने उन्हें जैसे सुनाया था, वह सम्पूर्ण वृत्तान्त मैंने तुम्हें बता दिया। देवी गौरीके जन्म, विवाहादि—सभी कार्य तृतीया तिथिको ही सम्पन्न हुए थे, अतएव तृतीया उनकी तिथि मानी जाती है। उस तिथिको नमक खाना सर्वथा निषिद्ध है। जो स्त्री उस दिन उपवास करती है, उसे अचल सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। दुर्भाग्यग्रस्त स्त्री या पुरुष तृतीया तिथिको लवणके परित्यागपूर्वक इस प्रसङ्गका श्रवण करे तो उसको सौभाग्य, धन-सम्पत्ति और मनोवाञ्छित पदार्थोंकी प्राप्ति होती है, उसे जगत्में उत्तम स्वास्थ्य, कान्ति और पुष्टिका भी लाभ होता है। [अध्याय २२]
गणेशजीकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग और चतुर्थी तिथिका माहात्म्य
राजा प्रजापालने पूछा—महामुने! गणपतिका जन्म कैसे हुआ, उन्होंने सगुणरूप कैसे धारण किया? यह संशय मेरे हृदयके लिये कष्टप्रद बन गया है। अतः आप इसे दूर करनेकी कृपा कीजिये।
महातपा बोले—पूर्व समयकी बात है—सम्पूर्ण देवता और तपको ही धन माननेवाले ऋषिगण कार्य आरम्भ करते थे और उसमें उन्हें निश्चय ही सिद्धि प्राप्त हो जाती थी। फिर ऐसी स्थिति आ गयी कि अच्छे मार्गपर चलनेवाले लोग विघ्नका सामना करते हुए किसी प्रकार कार्यमें सफलता पाने लगे, पर निकृष्ट कार्यशील व्यक्तिकी कार्य-सिद्धिमें कोई विघ्न नहीं आता। तब पितरोंसहित सम्पूर्ण देवताओंके मनमें यह चिन्ता उत्पन्न हुई कि विघ्न तो असत् कार्योंमें होना चाहिये। अतः इस विषयपर वे परस्पर विचार करने लगे। इस प्रकार मन्त्रणा करते-करते उन देवताओंके मनमें भगवान् शंकरके पास चलकर इस गुत्थीको सुलझानेकी इच्छा हुई। अतएव कैलास पहुँचकर उन्होंने परम गुरु शंकरको प्रणामकर विनयपूर्वक इस प्रकार प्रार्थना की।
देवता बोले—देवाधिदेव! महादेव! शूलपाणि! त्रिलोचन! भगवन्! हम देवताओंसे भिन्न असुरोंके कार्यमें ही विघ्न उपस्थित करना आपके लिये उचित है, हमारे कार्योंमें नहीं। देवताओंके इस प्रकार कहनेपर भगवान् शंकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और वे निर्निमेष दृष्टिसे भगवती उमाको देखने लगे। देवता भी वहीं थे। पार्वतीकी ओर देखते हुए वे मन-ही-मन सोचने लगे—'अरे, इस आकाशका कोई स्वरूप क्यों नहीं दीखता? पृथ्वी, जल, तेज और वायुकी मूर्ति तो चक्षुगोचर होती है; किंतु आकाशकी मूर्ति क्यों नहीं दीखती?' ऐसा सोचकर ज्ञानशक्तिके भण्डार परम पुरुष भगवान् रुद्र हँस पड़े। आकाशकी मूर्ति न देखकर शम्भुने जो हँस दिया, इसका अभिप्राय था—'बहुत पहले ब्रह्माजीके मुखसे वे सुन चुके थे कि शरीरधारी व्यक्तियोंकी ही मूर्ति होती है। आकाशके शरीरधारी न होनेके कारण इसकी मूर्ति असम्भव है। फिर तो उन परब्रह्म रुद्रके द्वारा पृथ्वी, जल, तेज और वायु—इन चारोंके सहयोगसे यह एक अद्भुत कार्य सम्भव हो गया। अभी हँसी बंद भी नहीं हुई थी, इतनेमें एक परम तेजस्वी कुमार प्रकट हो गया। उसका
६२ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय २३
मुख तेजसे चमक रहा था। उस तेजसे दिशाएँ चमकने लगीं। भगवान् शिवके सभी गुण उसमें संनिहित थे। ऐसा जान पड़ता था, मानो साक्षात् दूसरे रुद्र ही हों। वह कुमार एक महान् आत्मा था। वह प्रकट होकर अपनी सस्मित दृष्टि, अद्भुत कान्ति, दीप्त मूर्ति तथा रूपके कारण देवताओंके मनको मोहित कर रहा था। उसका रूप बड़ा ही आकर्षक था। भगवती उमा उसे निर्निमेष दृष्टिसे देखने लगीं। यह अद्भुत कार्य देखकर तथा 'स्त्रीका स्वभाव चञ्चल होता है, सम्भवतः उमाकी आँखें भी इस अनुपम सुन्दर बालकपर मुग्ध हो गयी हैं' यह मानकर भगवान् रुद्रके मनमें क्रोधका आविर्भाव हो गया। अतः उन परम प्रभुने गणेशजीको शाप दे दिया—'कुमार! तुम्हारा मुख हाथीके मुख-जैसा और पेट लम्बा होगा। सर्प ही तुम्हारे यज्ञोपवीतका काम देंगे—यह नितान्त सत्य है।'
इस प्रकार गणेशजीको शाप देनेपर भी भगवान् शंकरका रोष शान्त नहीं हुआ। उनका शरीर क्रोधसे काँप रहा था। वे उठकर खड़े हो गये। त्रिशूलधारी रुद्रका शरीर जैसे-जैसे हिलता, वैसे-वैसे उनके श्रीविग्रहके रोमकूपोंसे तेजोमय जल निकलकर बाहर गिरने लगा। उससे दूसरे अनेक विनायक उत्पन्न हो गये। उन सभीके मुख हाथीके मुख-जैसे थे तथा उनके शरीरकी आभा काले खैर-वृक्ष या अञ्जनके समान थी। वे हाथोंमें अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये हुए थे। अब देवता व्यग्र मनसे सोचने लगे—'अरे, यह क्या हो गया? एक ही बालक ऐसा अतुलित महान् कार्य कर रहा है। हम देवताओंकी अभिलाषा अनायास ही पूरी हो गयी। पर इसके चारों ओर ये वैसे ही गण कहाँसे आ पहुँचे?'
उस समय उन विनायकोंके कारण देवताओंकी चिन्ता अत्यधिक बढ़ गयी। पृथ्वीमें क्षोभ उत्पन्न हो गया। तब चार मुखोंसे शोभा पानेवाले ब्रह्माजी अनुपम विमानपर विराजमान होकर आकाशमें आये और यों कहा—'देवताओ! तुम लोग धन्य हो। यों तुम सभी तीन नेत्रवाले अद्भुत रूपधारी भगवान् रुद्रके कृपापात्र हो। साथ ही तुमने असुरोंके कार्यमें विघ्न उत्पन्न करनेवाले गणेशजीको प्रणाम करनेका सौभाग्य प्राप्त किया है।' उनसे इस प्रकार कहनेके पश्चात् ब्रह्माजीने भगवान् रुद्रसे कहा—'विभो! आपके मुखसे प्रकट हुआ जो यह बालक है, इसे ही आप इन विनायकोंका स्वामी बना दें। ये शेष दूसरे विनायक इनके अनुगामी—अनुचर बनकर रहें। प्रभो! साथ ही मेरी प्रार्थना है कि आपके वरप्रभावसे आकाशको भी शरीरधारी बनकर पृथ्वी आदि चारों महाभूतोंमें रहनेका सुअवसर मिल जाय। इससे एक ही आकाश अनेक प्रकारसे व्यवस्थित हो सकता है।'
इस प्रकार भगवान् रुद्र और ब्रह्माजी बातें कर ही रहे थे कि विनायक वहाँसे चले गये। फिर पितामहने शम्भुसे कहा—'देव! आपके हाथमें अनेक समुचित अस्त्र हैं। आप ये अस्त्र तथा वर अब इस बालकको प्रदान करें, यह मेरी प्रार्थना है।' ऐसा कहकर ब्रह्माजी वहाँसे चले गये। तब भगवान् शंकरने अपने सुपुत्र गणेशजीसे कहा—'पुत्र! विनायक, विघ्नहर, गजास्य और भवपुत्र—इन नामोंसे तुम प्रसिद्ध होगे। क्रूर-दृष्टिवाले ये विनायक बड़े उग्र स्वभावके हैं। पर ये सब तुम्हारी सेवा करेंगे। प्रकृष्ट यज्ञ, दान आदि शुभ कर्मके प्रभावसे शक्तिशाली बनकर ये कार्योंमें सिद्धि प्रदान करेंगे। देवताओं, यज्ञों तथा अन्य कार्योंमें भी सबसे श्रेष्ठ स्थान तुम्हें प्राप्त होगा। सर्वप्रथम पूजा पानेका अधिकार तुम्हारा है। यदि ऐसा न हुआ तो तुम्हारे द्वारा उस कार्यकी सफलता बाधित होगी।'
महाराज! जब ये बातें समाप्त हो गयीं तो
२५-नवमी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें दुर्गादेवीकी उत्पत्ति-कथा
अध्याय २४ ] सर्पोंकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग और पञ्चमी तिथिकी महिमा ६३
भगवान् शंकरने देवताओंके साथ जलपूर्ण सुवर्ण-कलशोंके विभिन्न तीर्थोंके जलसे उन गणेशजीका अभिषेक किया। राजन्! इस प्रकार जलसे अभिषिक्त होकर विनायकोंके स्वामी भगवान् गणेशकी अद्भुत शोभा होने लगी। उन्हें अभिषिक्त देखकर सभी देवता भगवान् शंकरके सामने ही उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे।
देवता बोले— गजानन! आप गणोंके स्वामी हैं। आपका एक नाम विनायक है। आप प्रचण्ड पराक्रमी हैं। आपको हमारा निरन्तर नमस्कार है। भगवन्! विघ्न दूर करना आपका स्वभाव है। आप सर्पकी मेखला पहनते हैं। भगवान् शंकरके मुखसे आपका प्रादुर्भाव हुआ है। लम्बे पेटसे आपकी आकृति उद्भासित होती है। हम सम्पूर्ण देवता आपको प्रणाम करते हैं। आप हमारे सभी विघ्न सदाके लिये शान्त कर दें।*
राजन्! जब इस प्रकार भगवान् रुद्रने महान् पुरुष श्रीगणेशजीका अभिषेक कर दिया और देवताओंद्वारा उनकी स्तुति सम्पन्न हो गयी, तब वे भगवती पार्वतीके पुत्रके रूपमें शोभा पाने लगे। गणाध्यक्ष गणेशजीकी (जन्म एवं अभिषेक आदि) सारी क्रियाएँ चतुर्थी तिथिके दिन ही सम्पन्न हुई थीं। अतएव तभीसे यह तिथि समस्त तिथियोंमें परम श्रेष्ठ स्थानको प्राप्त हुई। राजन्! जो भाग्यशाली मानव इस तिथिको तिलोंका आहारकर भक्तिपूर्वक गणपतिकी आराधना करता है, उसपर वे अत्यन्त शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं— इसमें कोई संशय नहीं है। महाराज! जो व्यक्ति इस स्तोत्रका पठन अथवा श्रवण करता है, उसके पास विघ्न कभी नहीं फटकते और न उसके पास लेशमात्र पाप ही शेष रह जाता है।
[ अध्याय २३]
सर्पोंकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग और पञ्चमी तिथिकी महिमा
पृथ्वीने पूछा— मेरा उद्धार करनेवाले भगवन्! आपके श्रीविग्रहका स्पर्श पाकर महान् विक्रमशाली सर्प कैसे मूर्तिमान् बन गये तथा उन्हें आपने क्यों बनाया?
भगवान् वराह बोले— वसुंधरे! गणपतिके जन्मका वृत्तान्त सुननेके पश्चात् राजा प्रजापालने यही प्रसङ्ग बड़ी मीठी वाणीमें उत्तमव्रती महातपासे पूछा था।
राजा प्रजापालने पूछा— भगवन्! कश्यपजीके वंशसे सम्बन्धित नाग तो बड़े ही दुष्ट प्रकृतिके थे। फिर उन्हें विशाल शरीर धारण करनेका अवसर कैसे मिल गया? यह प्रसङ्ग आप मुझे बतानेकी कृपा कीजिये।
मुनिवर महातपाजी कहते हैं— राजन्! मरीचि ब्रह्माजीके प्रथम मानस पुत्र थे। उनके पुत्र कश्यपजी हुए। मन्द मुसकानवाली दक्षकी पुत्री कद्रू उनकी भार्या हुई। उससे कश्यपजीके अनन्त, वासुकि, महाबली कम्बल, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शङ्ख, कुलिक और पापराजिल आदि नामोंसे विख्यात अनेक पुत्र हुए। राजेन्द्र! ये प्रधान सर्प कश्यपजीके पुत्र हैं। बादमें इन सर्पोंकी संतानोंसे यह सारा संसार ही भर गया। वे बड़े कुटिल और नीच कर्ममें रत थे। उनके मुँहमें अत्यन्त तीखा विष भरा था। वे मनुष्योंको अपनी दृष्टिमात्रसे
* नमस्ते गजवक्त्राय नमस्ते गणनायक। विनायक नमस्तेऽस्तु नमस्ते चण्डविक्रम॥
नमोऽस्तु ते विघ्नहर्त्रे नमस्ते सर्पमेखल। नमस्ते रुद्रवक्त्रोत्थ प्रलम्बजठराश्रित॥
सर्वदेवनमस्काराद्विघ्नं कुरु सर्वदा। (अध्याय २३। ३३-३४)
६४ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय २४
या काटकर भी भस्म कर सकते थे। राजन्! उनका दंश शब्दकी ही तरह तीव्रगामी था। उससे भी मनुष्योंकी मृत्यु हो जाती। इस प्रकार प्रजाका प्रतिदिन दारुण संहार होने लगा। यों अपना भीषण संहार देखकर प्रजावर्ग एकत्र होकर सबको शरण देनेमें समर्थ परम प्रभु भगवान् ब्रह्माजीकी शरणमें गये। राजन्! इसी उद्देश्यको सामने रखकर प्रजाओंने कमलपर प्रकट होनेवाले ब्रह्माजीसे कहा—'भगवन्! आपमें असीम शक्ति है। इन तीखे दाँतोंवाले सर्पोंसे आप हमारी रक्षा करें। इनकी दृष्टि पड़ते ही मनुष्य तथा पशुसमूह भस्म हो जाते हैं—यह प्रतिदिनकी बात हो गयी है। भगवन्! इन सर्पोंद्वारा आपकी सृष्टिका संहार हो रहा है। महामते! आप इसकी जानकारी प्राप्तकर ऐसा प्रयत्न करें कि यह दुःखद परिस्थिति शीघ्र दूर हो जाय।'
ब्रह्माजी बोले—प्रजापालो! तुम भयसे घबड़ा गये हो। मैं तुम्हारी रक्षा अवश्य करूँगा। पर अब तुम सभी अपने-अपने स्थानपर चलो।
अव्यक्तमूर्ति ब्रह्माजीके इस प्रकार कहनेपर वे प्रजाएँ वापस आ गयीं। उस समय ब्रह्माजीके मनमें असीम क्रोध उत्पन्न हो गया। उन्होंने वासुकि प्रभृति प्रमुख सर्पोंको बुलाया और उन्हें शाप दे दिया।
ब्रह्माजीने कहा—नागो! तुम मेरे द्वारा उत्पन्न किये हुए मनुष्योंकी मृत्युके कारण बन गये हो। अतः आगे स्वायम्भुव मन्वन्तरमें तुम्हारा अपनी ही माताके शापद्वारा घोर संहार होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।
जब ब्रह्माजीने इस प्रकार उन श्रेष्ठ सर्पोंसे कहा तब सर्पोंके शरीरमें भयसे कँपकँपी मच गयी। वे उन प्रभुके पैरोंपर गिर पड़े और ये वचन कहे।
नाग बोले—भगवन्! आपने ही तो कुटिल जातिमें हमारा जन्म दिया है। विष उगलना, दुष्टता करना, किसी वस्तुको देखकर उसे नष्ट कर देना—यह हमारा अमिट स्वभाव आपके द्वारा ही निर्मित है। अब आप ही उसे शान्त करनेकी कृपा करें।
ब्रह्माजीने कहा—मैं मानता हूँ, तुम्हें मैंने उत्पन्न किया है और तुममें कुटिलता भी भर दी है, पर इसका अभिप्राय यह नहीं है कि तुम निर्दय होकर नित्य मनुष्योंको खाया करो।
सर्पोंने कहा—भगवन्! आप हमें अलग-अलग रहनेके लिये कोई सुनिश्चित स्थानकी व्यवस्था कर दीजिये और हमारे द्वारा डँसे जानेकी स्थिति एवं नियम भी बता दें।
राजन्! नागोंकी यह बात सुनकर ब्रह्माजीने कहा—सर्पो! तुमलोग मनुष्योंके साथ भी रह सको—इसके लिये मैं स्थानका निर्णय कर देता हूँ। तुम सबलोग मनको एकाग्रकर मेरी आज्ञा सुनो—'सुतल, वितल और पाताल—ये तीन लोक कहे गये हैं। तुम्हें रहनेकी इच्छा हो तो वहीं निवास करो। वहाँ मेरी आज्ञा तथा व्यवस्थासे अनेक प्रकारके भोग तुम्हें भोगनेके लिये प्राप्त होंगे। रातके सातवें पहरतक तुम्हें वहाँ रहना है। फिर वैवस्वत मन्वन्तरके आरम्भमें कश्यपजीके यहाँ तुम्हारा जन्म होगा। देवतालोग तुम्हारे बन्धु-बान्धव होंगे। बुद्धिमान् गरुडसे तुम्हारा भाईपनेका सम्बन्ध होगा। उस समय कारणवश तुम्हारी सारी संतान (जनमेजयके यज्ञमें) अग्निके द्वारा जलकर स्वाहा हो जायगी। इसमें निश्चय ही तुम्हारा कोई दोष न होगा। जो सर्प अत्यन्त दुष्ट और उच्छृङ्खल होंगे, उन्हींकी उस शापसे जीवनलीला समाप्त होगी। जो ऐसे न होंगे, वे जीवित रहेंगे। हाँ, अपकार करनेपर या जिनका काल ही आ गया
अध्याय २५ ] षष्ठी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें स्वामी कार्तिकेयके जन्मकी कथा [ ६५
हो, उन मनुष्योंको समयानुसार निगलने या काटनेके लिये तुम स्वतन्त्र हो। गरुडसम्बन्धी मन्त्र, औषध और बद्ध गारुडमण्डलद्वारा दाँत कुण्ठित करनेकी कलाएँ जिन्हें ज्ञात होंगी, उनसे निश्चय ही तुम्हें डरकर रहना चाहिये, अन्यथा तुम लोगोंका विनाश निश्चित है।'
ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर वे सम्पूर्ण सर्प पृथ्वीके नीचे पाताललोकमें चले गये। इस प्रकार ब्रह्माजीसे शाप एवं वरदान पाकर वे पातालमें आनन्दपूर्वक निवास करने लगे। ये सारी बातें उन नाग महानुभावोंके साथ पञ्चमी तिथिके दिन ही घटित हुई थीं। अतः यह तिथि धन्य, प्रिय, पवित्र और सम्पूर्ण पापोंका संहारक सिद्ध हो गयी। इस तिथिमें जो खट्टे पदार्थके भोजनका परित्याग करेगा और दूधसे नागोंको स्नान करायेगा, सर्प उसके मित्र बन जायेंगे। [अध्याय २४]
षष्ठी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें स्वामी कार्तिकेयके जन्मकी कथा
राजा प्रजापालने कहा— द्विजवर! मेरा एक प्रश्न यह भी है कि अहंकारसे कार्तिकेयकी उत्पत्ति कैसे हुई? महामते! आप मेरे संदेहको दूर करनेकी कृपा कीजिये।
मुनिवर महातपा बोले— राजन्! सम्पूर्ण तत्त्वोंमें जिन्हें प्रधान स्थान प्राप्त है, उन्हें परम पुरुष परमात्मा कहा जाता है। सबके आरम्भमें उन्हींसे अव्यक्ततत्त्वकी उत्पत्ति हुई। ये तत्त्व तीन प्रकारके हैं। परम पुरुष और अव्यक्तके योगसे महत्तत्त्वका प्रादुर्भाव हुआ। इसी महत्तत्त्वको अहंकार भी कहते हैं। इनमें जो पुंस्तत्त्व है, वह भगवान् विष्णु अथवा शिव नामसे प्रसिद्ध है। अव्यक्तप्रकृति भगवती उमादेवी या कमलनयना लक्ष्मी हैं। उन्हीं भगवान् शंकर और उमाके संयोगसे अहंकारकी उत्पत्ति हुई। वे ही सेनापति कार्तिकेय हैं। महामते राजन्! मैं अब उन कार्तिकेयकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग कहता हूँ, तुम उसे सुनो।
सर्वप्रथम एकमात्र भगवान् नारायण ही विराजमान थे, फिर उनसे ब्रह्माजीकी उत्पत्ति हुई। तत्पश्चात् स्वायम्भुव मनु तथा मरीचि और सूर्य आदि प्रकट हुए। फिर इन देवताओं, दानवों, गन्धर्वों, मनुष्यों, पशुओं और पक्षियोंकी सृष्टि हुई। यही सम्पूर्ण प्राणियोंकी सृष्टि कही गयी है।
सृष्टिका विस्तार हो जानेपर देवताओं और दानवोंमें एक-दूसरेको परास्त करनेकी इच्छासे सदा युद्ध होने लगा; क्योंकि उन दोनों दलोंमें अपार बल था और उनमें सदा वैरकी भावना बनी रहती थी। दैत्योंके सेनाध्यक्ष बड़े बलवान् थे, जिन्हें युद्धमें कोई हरा नहीं सकता था। उनके नाम इस प्रकार हैं—हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, महासुर विप्रचित्ति, विचित्र, भीमाक्ष और क्रौञ्च। इन सभी वीरोंके बलकी सीमा न थी। उस घोर संग्रामके अवसरपर देवसेनामें उपस्थित देवता दानवोंके तीक्ष्ण बाणोंसे प्रतिदिन हार रहे थे। उनकी पराजय देखकर बृहस्पतिजीने कहा—'देवताओ! तुम्हारी सेनामें कोई सेनाध्यक्ष नहीं है। केवल एक इन्द्रसे इस सेनाकी रक्षा हो सके—यह नितान्त असम्भव है। अतः तुमलोग अपने लिये किसी सेनाध्यक्षका अन्वेषण करो। अब इसमें देर करना ठीक नहीं है।'
बृहस्पतिजीके ऐसा कहनेपर देवता ब्रह्माजीके पास गये। उन्होंने व्याकुल होकर उनसे कहा—'भगवन्! हमें आप कोई सेनाध्यक्ष देनेकी कृपा करें।' इसपर ब्रह्माजीने ध्यान लगाकर देखा—'इन देवताओंके लिये मुझे क्या करना चाहिये?' इतनेमें उनका ध्यान भगवान् शंकरकी ओर गया और फिर सभी देवता, गन्धर्व, ऋषि, सिद्ध एवं