वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२३-सप्तमी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें आदित्योंकी उत्पत्तिकी कथा
| ६० | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय २२ |
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'यह उपहासकी परम्परा आगे न बढ़े'—ऐसा सोचकर कुछ लज्जित-सी हुई पार्वती कहने लगीं—'देवाधिदेव! महेश्वर! आप तीनों लोकोंके स्वामी हैं। आपको पानेके लिये मेरा यह प्रयत्न है। पूर्वजन्ममें भी आप ही मेरे पतिदेव थे। इस जन्ममें भी आप ही मेरे पति होंगे, कोई दूसरा नहीं। किंतु अभी मेरे संरक्षक पिता पर्वतराज हिमालय हैं, अब मैं उनके पास जाती हूँ। उन्हें जताकर आप विधिपूर्वक मेरा पाणिग्रहण करें।'
इस प्रकार कहकर परम सुन्दरी भगवती उमा अपने पिता हिमालयके पास गयीं और हाथ जोड़कर उनसे कहा—'पिताजी! मुझे अनेक लक्षणोंसे प्रतीत होता है कि पूर्वजन्ममें भगवान् रुद्र ही मेरे पति रहे हैं। उन्होंने ही दक्षके यज्ञका विध्वंस किया था। वे ही संसारके संरक्षक रुद्र ब्राह्मणका वेष धारण कर तपोवनमें मेरे पास आये और मुझसे भोजनकी याचना की। 'आप स्नान कर आइये'—मेरी इस प्रेरणापर वे वृद्ध ब्राह्मणका वेष बनाये हुए गङ्गामें गये। फिर वहाँ मकरद्वारा ग्रस्त हो जानेपर उन्होंने मुझे सहायताके लिये पुकारा। परंतु पिताजी! मुझे ब्रह्महत्या न लग जाय, इस भयसे मैंने अपने हाथसे उन्हें पकड़ लिया। मेरे पकड़ते ही वे अपने वास्तविक रूपमें प्रकट हो गये और कहने लगे—'देवि! यह तो पाणिग्रहण है। तपोधने! इसमें तुम्हें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये।' उनके ऐसा कहनेपर उनसे स्वीकृति लेकर मैं आपसे पूछने आयी हूँ। अतः इस अवसरपर मेरा जो कर्तव्य हो, उसे आप शीघ्र बतानेकी कृपा कीजिये।'
पार्वतीकी ऐसी बात सुनकर हिमालय बड़े प्रसन्न हुए और अपनी पुत्रीसे कहने लगे—'सुमुखि! मैं आज संसारमें अत्यन्त धन्य हूँ, जो स्वयं भगवान् शंकर मेरे जामाता होनेवाले हैं। तुम्हारे द्वारा मैं सचमुच संततिवान् बन गया। पुत्रि! तुमने मुझको देवताओंका सिरमौर बना दिया है; पर क्षणभर रुकना। मेरे आनेतक थोड़ी प्रतीक्षा करना।'
इस प्रकार कहकर पर्वतराज हिमालय सम्पूर्ण देवताओंके पितामह ब्रह्माजीके पास गये। वहाँ उनका दर्शनकर गिरिराजने नम्रतापूर्वक कहा—'भगवन्! उमा मेरी पुत्री है। आज मैं उसे भगवान् रुद्रको देना चाहता हूँ।' इसपर श्रीब्रह्माजीने भी उन्हें 'दे दो' कहकर अनुमति दे दी।
ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर पर्वतराज हिमालय अपने घरपर गये और तुरंत ही तुम्बुरु, नारद, हाहा और हूहूको बुलाया। फिर किन्नरों, असुरों और राक्षसोंको भी सूचना दी। अनेक पर्वत, नदियाँ, वृक्ष, ओषधिवर्ग तथा छोटे-बड़े अन्य पाषाण भी मूर्ति धारणकर भगवान् शंकरके साथ होनेवाले पार्वतीके विवाहको देखनेके लिये वहाँ आये। उस विवाहमें पृथिवी ही वेदी बनी और सातों समुद्र ही कलश। सूर्य एवं चन्द्रमा उस शुभ अवसरपर दीपकका कार्य कर रहे थे तथा नदियाँ जल ढोने-परसनेका काम कर रही थीं। जब इस प्रकार सारी व्यवस्था हो गयी, तब गिरिराज हिमालयने मन्दराचलको भगवान् शंकरके पास भेजा। भगवान् शंकरकी स्वीकृतिसे मन्दराचल तत्काल वापस आ गये। फिर तो भगवान् शंकरने विधिपूर्वक उमाका पाणिग्रहण किया। उस विवाहके उत्सवपर पर्वत और नारद—ये दोनों गान कर रहे थे। सिद्धोंने नाचनेका काम पूरा किया था। वनस्पतियाँ अनेक प्रकारके पुष्पोंकी वर्षा कर रही थीं तथा सुन्दर रूपवती अप्सराएँ उच्च स्वरसे गा-गाकर नृत्य करनेमें संलग्न थीं। उस विवाह-महोत्सवमें लोकपितामह चतुर्मुख ब्रह्माजी स्वयं ब्रह्माके स्थानपर विराजमान थे। उन्होंने प्रसन्न
२४-अष्टमी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें मातृकाओंकी उत्पत्तिकी कथा
अध्याय २३ ] गणेशजीकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग और चतुर्थी तिथिका माहात्म्य ६१
होकर उमासे कहा—'पुत्रि! संसारमें तुम-जैसी पत्नी और शंकर-सरीखे पति सबको सुलभ हों।' भगवान् शंकर और भगवती उमा—दोनों एक साथ बैठे थे। उनसे इस प्रकार कहकर ब्रह्माजी अपने धामको लौट आये।
भगवान् वराह कहते हैं—पृथ्वि! रुद्रका प्राकट्य, गौरीका जन्म तथा विवाह—यह सारा प्रसङ्ग राजा प्रजापालके पूछनेपर परम तपस्वी महातपा ऋषिने उन्हें जैसे सुनाया था, वह सम्पूर्ण वृत्तान्त मैंने तुम्हें बता दिया। देवी गौरीके जन्म, विवाहादि—सभी कार्य तृतीया तिथिको ही सम्पन्न हुए थे, अतएव तृतीया उनकी तिथि मानी जाती है। उस तिथिको नमक खाना सर्वथा निषिद्ध है। जो स्त्री उस दिन उपवास करती है, उसे अचल सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। दुर्भाग्यग्रस्त स्त्री या पुरुष तृतीया तिथिको लवणके परित्यागपूर्वक इस प्रसङ्गका श्रवण करे तो उसको सौभाग्य, धन-सम्पत्ति और मनोवाञ्छित पदार्थोंकी प्राप्ति होती है, उसे जगत्में उत्तम स्वास्थ्य, कान्ति और पुष्टिका भी लाभ होता है। [अध्याय २२]
गणेशजीकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग और चतुर्थी तिथिका माहात्म्य
राजा प्रजापालने पूछा—महामुने! गणपतिका जन्म कैसे हुआ, उन्होंने सगुणरूप कैसे धारण किया? यह संशय मेरे हृदयके लिये कष्टप्रद बन गया है। अतः आप इसे दूर करनेकी कृपा कीजिये।
महातपा बोले—पूर्व समयकी बात है—सम्पूर्ण देवता और तपको ही धन माननेवाले ऋषिगण कार्य आरम्भ करते थे और उसमें उन्हें निश्चय ही सिद्धि प्राप्त हो जाती थी। फिर ऐसी स्थिति आ गयी कि अच्छे मार्गपर चलनेवाले लोग विघ्नका सामना करते हुए किसी प्रकार कार्यमें सफलता पाने लगे, पर निकृष्ट कार्यशील व्यक्तिकी कार्य-सिद्धिमें कोई विघ्न नहीं आता। तब पितरोंसहित सम्पूर्ण देवताओंके मनमें यह चिन्ता उत्पन्न हुई कि विघ्न तो असत् कार्योंमें होना चाहिये। अतः इस विषयपर वे परस्पर विचार करने लगे। इस प्रकार मन्त्रणा करते-करते उन देवताओंके मनमें भगवान् शंकरके पास चलकर इस गुत्थीको सुलझानेकी इच्छा हुई। अतएव कैलास पहुँचकर उन्होंने परम गुरु शंकरको प्रणामकर विनयपूर्वक इस प्रकार प्रार्थना की।
देवता बोले—देवाधिदेव! महादेव! शूलपाणि! त्रिलोचन! भगवन्! हम देवताओंसे भिन्न असुरोंके कार्यमें ही विघ्न उपस्थित करना आपके लिये उचित है, हमारे कार्योंमें नहीं। देवताओंके इस प्रकार कहनेपर भगवान् शंकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और वे निर्निमेष दृष्टिसे भगवती उमाको देखने लगे। देवता भी वहीं थे। पार्वतीकी ओर देखते हुए वे मन-ही-मन सोचने लगे—'अरे, इस आकाशका कोई स्वरूप क्यों नहीं दीखता? पृथ्वी, जल, तेज और वायुकी मूर्ति तो चक्षुगोचर होती है; किंतु आकाशकी मूर्ति क्यों नहीं दीखती?' ऐसा सोचकर ज्ञानशक्तिके भण्डार परम पुरुष भगवान् रुद्र हँस पड़े। आकाशकी मूर्ति न देखकर शम्भुने जो हँस दिया, इसका अभिप्राय था—'बहुत पहले ब्रह्माजीके मुखसे वे सुन चुके थे कि शरीरधारी व्यक्तियोंकी ही मूर्ति होती है। आकाशके शरीरधारी न होनेके कारण इसकी मूर्ति असम्भव है। फिर तो उन परब्रह्म रुद्रके द्वारा पृथ्वी, जल, तेज और वायु—इन चारोंके सहयोगसे यह एक अद्भुत कार्य सम्भव हो गया। अभी हँसी बंद भी नहीं हुई थी, इतनेमें एक परम तेजस्वी कुमार प्रकट हो गया। उसका
६२ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय २३
मुख तेजसे चमक रहा था। उस तेजसे दिशाएँ चमकने लगीं। भगवान् शिवके सभी गुण उसमें संनिहित थे। ऐसा जान पड़ता था, मानो साक्षात् दूसरे रुद्र ही हों। वह कुमार एक महान् आत्मा था। वह प्रकट होकर अपनी सस्मित दृष्टि, अद्भुत कान्ति, दीप्त मूर्ति तथा रूपके कारण देवताओंके मनको मोहित कर रहा था। उसका रूप बड़ा ही आकर्षक था। भगवती उमा उसे निर्निमेष दृष्टिसे देखने लगीं। यह अद्भुत कार्य देखकर तथा 'स्त्रीका स्वभाव चञ्चल होता है, सम्भवतः उमाकी आँखें भी इस अनुपम सुन्दर बालकपर मुग्ध हो गयी हैं' यह मानकर भगवान् रुद्रके मनमें क्रोधका आविर्भाव हो गया। अतः उन परम प्रभुने गणेशजीको शाप दे दिया—'कुमार! तुम्हारा मुख हाथीके मुख-जैसा और पेट लम्बा होगा। सर्प ही तुम्हारे यज्ञोपवीतका काम देंगे—यह नितान्त सत्य है।'
इस प्रकार गणेशजीको शाप देनेपर भी भगवान् शंकरका रोष शान्त नहीं हुआ। उनका शरीर क्रोधसे काँप रहा था। वे उठकर खड़े हो गये। त्रिशूलधारी रुद्रका शरीर जैसे-जैसे हिलता, वैसे-वैसे उनके श्रीविग्रहके रोमकूपोंसे तेजोमय जल निकलकर बाहर गिरने लगा। उससे दूसरे अनेक विनायक उत्पन्न हो गये। उन सभीके मुख हाथीके मुख-जैसे थे तथा उनके शरीरकी आभा काले खैर-वृक्ष या अञ्जनके समान थी। वे हाथोंमें अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये हुए थे। अब देवता व्यग्र मनसे सोचने लगे—'अरे, यह क्या हो गया? एक ही बालक ऐसा अतुलित महान् कार्य कर रहा है। हम देवताओंकी अभिलाषा अनायास ही पूरी हो गयी। पर इसके चारों ओर ये वैसे ही गण कहाँसे आ पहुँचे?'
उस समय उन विनायकोंके कारण देवताओंकी चिन्ता अत्यधिक बढ़ गयी। पृथ्वीमें क्षोभ उत्पन्न हो गया। तब चार मुखोंसे शोभा पानेवाले ब्रह्माजी अनुपम विमानपर विराजमान होकर आकाशमें आये और यों कहा—'देवताओ! तुम लोग धन्य हो। यों तुम सभी तीन नेत्रवाले अद्भुत रूपधारी भगवान् रुद्रके कृपापात्र हो। साथ ही तुमने असुरोंके कार्यमें विघ्न उत्पन्न करनेवाले गणेशजीको प्रणाम करनेका सौभाग्य प्राप्त किया है।' उनसे इस प्रकार कहनेके पश्चात् ब्रह्माजीने भगवान् रुद्रसे कहा—'विभो! आपके मुखसे प्रकट हुआ जो यह बालक है, इसे ही आप इन विनायकोंका स्वामी बना दें। ये शेष दूसरे विनायक इनके अनुगामी—अनुचर बनकर रहें। प्रभो! साथ ही मेरी प्रार्थना है कि आपके वरप्रभावसे आकाशको भी शरीरधारी बनकर पृथ्वी आदि चारों महाभूतोंमें रहनेका सुअवसर मिल जाय। इससे एक ही आकाश अनेक प्रकारसे व्यवस्थित हो सकता है।'
इस प्रकार भगवान् रुद्र और ब्रह्माजी बातें कर ही रहे थे कि विनायक वहाँसे चले गये। फिर पितामहने शम्भुसे कहा—'देव! आपके हाथमें अनेक समुचित अस्त्र हैं। आप ये अस्त्र तथा वर अब इस बालकको प्रदान करें, यह मेरी प्रार्थना है।' ऐसा कहकर ब्रह्माजी वहाँसे चले गये। तब भगवान् शंकरने अपने सुपुत्र गणेशजीसे कहा—'पुत्र! विनायक, विघ्नहर, गजास्य और भवपुत्र—इन नामोंसे तुम प्रसिद्ध होगे। क्रूर-दृष्टिवाले ये विनायक बड़े उग्र स्वभावके हैं। पर ये सब तुम्हारी सेवा करेंगे। प्रकृष्ट यज्ञ, दान आदि शुभ कर्मके प्रभावसे शक्तिशाली बनकर ये कार्योंमें सिद्धि प्रदान करेंगे। देवताओं, यज्ञों तथा अन्य कार्योंमें भी सबसे श्रेष्ठ स्थान तुम्हें प्राप्त होगा। सर्वप्रथम पूजा पानेका अधिकार तुम्हारा है। यदि ऐसा न हुआ तो तुम्हारे द्वारा उस कार्यकी सफलता बाधित होगी।'
महाराज! जब ये बातें समाप्त हो गयीं तो
२५-नवमी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें दुर्गादेवीकी उत्पत्ति-कथा
अध्याय २४ ] सर्पोंकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग और पञ्चमी तिथिकी महिमा ६३
भगवान् शंकरने देवताओंके साथ जलपूर्ण सुवर्ण-कलशोंके विभिन्न तीर्थोंके जलसे उन गणेशजीका अभिषेक किया। राजन्! इस प्रकार जलसे अभिषिक्त होकर विनायकोंके स्वामी भगवान् गणेशकी अद्भुत शोभा होने लगी। उन्हें अभिषिक्त देखकर सभी देवता भगवान् शंकरके सामने ही उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे।
देवता बोले— गजानन! आप गणोंके स्वामी हैं। आपका एक नाम विनायक है। आप प्रचण्ड पराक्रमी हैं। आपको हमारा निरन्तर नमस्कार है। भगवन्! विघ्न दूर करना आपका स्वभाव है। आप सर्पकी मेखला पहनते हैं। भगवान् शंकरके मुखसे आपका प्रादुर्भाव हुआ है। लम्बे पेटसे आपकी आकृति उद्भासित होती है। हम सम्पूर्ण देवता आपको प्रणाम करते हैं। आप हमारे सभी विघ्न सदाके लिये शान्त कर दें।*
राजन्! जब इस प्रकार भगवान् रुद्रने महान् पुरुष श्रीगणेशजीका अभिषेक कर दिया और देवताओंद्वारा उनकी स्तुति सम्पन्न हो गयी, तब वे भगवती पार्वतीके पुत्रके रूपमें शोभा पाने लगे। गणाध्यक्ष गणेशजीकी (जन्म एवं अभिषेक आदि) सारी क्रियाएँ चतुर्थी तिथिके दिन ही सम्पन्न हुई थीं। अतएव तभीसे यह तिथि समस्त तिथियोंमें परम श्रेष्ठ स्थानको प्राप्त हुई। राजन्! जो भाग्यशाली मानव इस तिथिको तिलोंका आहारकर भक्तिपूर्वक गणपतिकी आराधना करता है, उसपर वे अत्यन्त शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं— इसमें कोई संशय नहीं है। महाराज! जो व्यक्ति इस स्तोत्रका पठन अथवा श्रवण करता है, उसके पास विघ्न कभी नहीं फटकते और न उसके पास लेशमात्र पाप ही शेष रह जाता है।
[ अध्याय २३]
सर्पोंकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग और पञ्चमी तिथिकी महिमा
पृथ्वीने पूछा— मेरा उद्धार करनेवाले भगवन्! आपके श्रीविग्रहका स्पर्श पाकर महान् विक्रमशाली सर्प कैसे मूर्तिमान् बन गये तथा उन्हें आपने क्यों बनाया?
भगवान् वराह बोले— वसुंधरे! गणपतिके जन्मका वृत्तान्त सुननेके पश्चात् राजा प्रजापालने यही प्रसङ्ग बड़ी मीठी वाणीमें उत्तमव्रती महातपासे पूछा था।
राजा प्रजापालने पूछा— भगवन्! कश्यपजीके वंशसे सम्बन्धित नाग तो बड़े ही दुष्ट प्रकृतिके थे। फिर उन्हें विशाल शरीर धारण करनेका अवसर कैसे मिल गया? यह प्रसङ्ग आप मुझे बतानेकी कृपा कीजिये।
मुनिवर महातपाजी कहते हैं— राजन्! मरीचि ब्रह्माजीके प्रथम मानस पुत्र थे। उनके पुत्र कश्यपजी हुए। मन्द मुसकानवाली दक्षकी पुत्री कद्रू उनकी भार्या हुई। उससे कश्यपजीके अनन्त, वासुकि, महाबली कम्बल, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शङ्ख, कुलिक और पापराजिल आदि नामोंसे विख्यात अनेक पुत्र हुए। राजेन्द्र! ये प्रधान सर्प कश्यपजीके पुत्र हैं। बादमें इन सर्पोंकी संतानोंसे यह सारा संसार ही भर गया। वे बड़े कुटिल और नीच कर्ममें रत थे। उनके मुँहमें अत्यन्त तीखा विष भरा था। वे मनुष्योंको अपनी दृष्टिमात्रसे
* नमस्ते गजवक्त्राय नमस्ते गणनायक। विनायक नमस्तेऽस्तु नमस्ते चण्डविक्रम॥
नमोऽस्तु ते विघ्नहर्त्रे नमस्ते सर्पमेखल। नमस्ते रुद्रवक्त्रोत्थ प्रलम्बजठराश्रित॥
सर्वदेवनमस्काराद्विघ्नं कुरु सर्वदा। (अध्याय २३। ३३-३४)
६४ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय २४
या काटकर भी भस्म कर सकते थे। राजन्! उनका दंश शब्दकी ही तरह तीव्रगामी था। उससे भी मनुष्योंकी मृत्यु हो जाती। इस प्रकार प्रजाका प्रतिदिन दारुण संहार होने लगा। यों अपना भीषण संहार देखकर प्रजावर्ग एकत्र होकर सबको शरण देनेमें समर्थ परम प्रभु भगवान् ब्रह्माजीकी शरणमें गये। राजन्! इसी उद्देश्यको सामने रखकर प्रजाओंने कमलपर प्रकट होनेवाले ब्रह्माजीसे कहा—'भगवन्! आपमें असीम शक्ति है। इन तीखे दाँतोंवाले सर्पोंसे आप हमारी रक्षा करें। इनकी दृष्टि पड़ते ही मनुष्य तथा पशुसमूह भस्म हो जाते हैं—यह प्रतिदिनकी बात हो गयी है। भगवन्! इन सर्पोंद्वारा आपकी सृष्टिका संहार हो रहा है। महामते! आप इसकी जानकारी प्राप्तकर ऐसा प्रयत्न करें कि यह दुःखद परिस्थिति शीघ्र दूर हो जाय।'
ब्रह्माजी बोले—प्रजापालो! तुम भयसे घबड़ा गये हो। मैं तुम्हारी रक्षा अवश्य करूँगा। पर अब तुम सभी अपने-अपने स्थानपर चलो।
अव्यक्तमूर्ति ब्रह्माजीके इस प्रकार कहनेपर वे प्रजाएँ वापस आ गयीं। उस समय ब्रह्माजीके मनमें असीम क्रोध उत्पन्न हो गया। उन्होंने वासुकि प्रभृति प्रमुख सर्पोंको बुलाया और उन्हें शाप दे दिया।
ब्रह्माजीने कहा—नागो! तुम मेरे द्वारा उत्पन्न किये हुए मनुष्योंकी मृत्युके कारण बन गये हो। अतः आगे स्वायम्भुव मन्वन्तरमें तुम्हारा अपनी ही माताके शापद्वारा घोर संहार होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।
जब ब्रह्माजीने इस प्रकार उन श्रेष्ठ सर्पोंसे कहा तब सर्पोंके शरीरमें भयसे कँपकँपी मच गयी। वे उन प्रभुके पैरोंपर गिर पड़े और ये वचन कहे।
नाग बोले—भगवन्! आपने ही तो कुटिल जातिमें हमारा जन्म दिया है। विष उगलना, दुष्टता करना, किसी वस्तुको देखकर उसे नष्ट कर देना—यह हमारा अमिट स्वभाव आपके द्वारा ही निर्मित है। अब आप ही उसे शान्त करनेकी कृपा करें।
ब्रह्माजीने कहा—मैं मानता हूँ, तुम्हें मैंने उत्पन्न किया है और तुममें कुटिलता भी भर दी है, पर इसका अभिप्राय यह नहीं है कि तुम निर्दय होकर नित्य मनुष्योंको खाया करो।
सर्पोंने कहा—भगवन्! आप हमें अलग-अलग रहनेके लिये कोई सुनिश्चित स्थानकी व्यवस्था कर दीजिये और हमारे द्वारा डँसे जानेकी स्थिति एवं नियम भी बता दें।
राजन्! नागोंकी यह बात सुनकर ब्रह्माजीने कहा—सर्पो! तुमलोग मनुष्योंके साथ भी रह सको—इसके लिये मैं स्थानका निर्णय कर देता हूँ। तुम सबलोग मनको एकाग्रकर मेरी आज्ञा सुनो—'सुतल, वितल और पाताल—ये तीन लोक कहे गये हैं। तुम्हें रहनेकी इच्छा हो तो वहीं निवास करो। वहाँ मेरी आज्ञा तथा व्यवस्थासे अनेक प्रकारके भोग तुम्हें भोगनेके लिये प्राप्त होंगे। रातके सातवें पहरतक तुम्हें वहाँ रहना है। फिर वैवस्वत मन्वन्तरके आरम्भमें कश्यपजीके यहाँ तुम्हारा जन्म होगा। देवतालोग तुम्हारे बन्धु-बान्धव होंगे। बुद्धिमान् गरुडसे तुम्हारा भाईपनेका सम्बन्ध होगा। उस समय कारणवश तुम्हारी सारी संतान (जनमेजयके यज्ञमें) अग्निके द्वारा जलकर स्वाहा हो जायगी। इसमें निश्चय ही तुम्हारा कोई दोष न होगा। जो सर्प अत्यन्त दुष्ट और उच्छृङ्खल होंगे, उन्हींकी उस शापसे जीवनलीला समाप्त होगी। जो ऐसे न होंगे, वे जीवित रहेंगे। हाँ, अपकार करनेपर या जिनका काल ही आ गया
अध्याय २५ ] षष्ठी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें स्वामी कार्तिकेयके जन्मकी कथा [ ६५
हो, उन मनुष्योंको समयानुसार निगलने या काटनेके लिये तुम स्वतन्त्र हो। गरुडसम्बन्धी मन्त्र, औषध और बद्ध गारुडमण्डलद्वारा दाँत कुण्ठित करनेकी कलाएँ जिन्हें ज्ञात होंगी, उनसे निश्चय ही तुम्हें डरकर रहना चाहिये, अन्यथा तुम लोगोंका विनाश निश्चित है।'
ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर वे सम्पूर्ण सर्प पृथ्वीके नीचे पाताललोकमें चले गये। इस प्रकार ब्रह्माजीसे शाप एवं वरदान पाकर वे पातालमें आनन्दपूर्वक निवास करने लगे। ये सारी बातें उन नाग महानुभावोंके साथ पञ्चमी तिथिके दिन ही घटित हुई थीं। अतः यह तिथि धन्य, प्रिय, पवित्र और सम्पूर्ण पापोंका संहारक सिद्ध हो गयी। इस तिथिमें जो खट्टे पदार्थके भोजनका परित्याग करेगा और दूधसे नागोंको स्नान करायेगा, सर्प उसके मित्र बन जायेंगे। [अध्याय २४]
षष्ठी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें स्वामी कार्तिकेयके जन्मकी कथा
राजा प्रजापालने कहा— द्विजवर! मेरा एक प्रश्न यह भी है कि अहंकारसे कार्तिकेयकी उत्पत्ति कैसे हुई? महामते! आप मेरे संदेहको दूर करनेकी कृपा कीजिये।
मुनिवर महातपा बोले— राजन्! सम्पूर्ण तत्त्वोंमें जिन्हें प्रधान स्थान प्राप्त है, उन्हें परम पुरुष परमात्मा कहा जाता है। सबके आरम्भमें उन्हींसे अव्यक्ततत्त्वकी उत्पत्ति हुई। ये तत्त्व तीन प्रकारके हैं। परम पुरुष और अव्यक्तके योगसे महत्तत्त्वका प्रादुर्भाव हुआ। इसी महत्तत्त्वको अहंकार भी कहते हैं। इनमें जो पुंस्तत्त्व है, वह भगवान् विष्णु अथवा शिव नामसे प्रसिद्ध है। अव्यक्तप्रकृति भगवती उमादेवी या कमलनयना लक्ष्मी हैं। उन्हीं भगवान् शंकर और उमाके संयोगसे अहंकारकी उत्पत्ति हुई। वे ही सेनापति कार्तिकेय हैं। महामते राजन्! मैं अब उन कार्तिकेयकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग कहता हूँ, तुम उसे सुनो।
सर्वप्रथम एकमात्र भगवान् नारायण ही विराजमान थे, फिर उनसे ब्रह्माजीकी उत्पत्ति हुई। तत्पश्चात् स्वायम्भुव मनु तथा मरीचि और सूर्य आदि प्रकट हुए। फिर इन देवताओं, दानवों, गन्धर्वों, मनुष्यों, पशुओं और पक्षियोंकी सृष्टि हुई। यही सम्पूर्ण प्राणियोंकी सृष्टि कही गयी है।
सृष्टिका विस्तार हो जानेपर देवताओं और दानवोंमें एक-दूसरेको परास्त करनेकी इच्छासे सदा युद्ध होने लगा; क्योंकि उन दोनों दलोंमें अपार बल था और उनमें सदा वैरकी भावना बनी रहती थी। दैत्योंके सेनाध्यक्ष बड़े बलवान् थे, जिन्हें युद्धमें कोई हरा नहीं सकता था। उनके नाम इस प्रकार हैं—हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, महासुर विप्रचित्ति, विचित्र, भीमाक्ष और क्रौञ्च। इन सभी वीरोंके बलकी सीमा न थी। उस घोर संग्रामके अवसरपर देवसेनामें उपस्थित देवता दानवोंके तीक्ष्ण बाणोंसे प्रतिदिन हार रहे थे। उनकी पराजय देखकर बृहस्पतिजीने कहा—'देवताओ! तुम्हारी सेनामें कोई सेनाध्यक्ष नहीं है। केवल एक इन्द्रसे इस सेनाकी रक्षा हो सके—यह नितान्त असम्भव है। अतः तुमलोग अपने लिये किसी सेनाध्यक्षका अन्वेषण करो। अब इसमें देर करना ठीक नहीं है।'
बृहस्पतिजीके ऐसा कहनेपर देवता ब्रह्माजीके पास गये। उन्होंने व्याकुल होकर उनसे कहा—'भगवन्! हमें आप कोई सेनाध्यक्ष देनेकी कृपा करें।' इसपर ब्रह्माजीने ध्यान लगाकर देखा—'इन देवताओंके लिये मुझे क्या करना चाहिये?' इतनेमें उनका ध्यान भगवान् शंकरकी ओर गया और फिर सभी देवता, गन्धर्व, ऋषि, सिद्ध एवं
२६-दशमी तिथिके माहात्म्यके प्रसङ्गमें दिशाओंकी उत्पत्तिकी कथा
| ६६ | संक्षिप्त श्रीवराहपुराण | [ अध्याय २५ |
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चारण ब्रह्माजीको आगे करके कैलास पर्वतको चले। वहाँ पशुपति भगवान् शंकरका दर्शनकर अनेक प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा सभीने उनकी स्तुति आरम्भ कर दी।
देवता बोले—महेश्वर! हम समस्त देवता आपकी शरणमें आये हैं। भूतभावन! आप त्रिनेत्र, भगवान् शंकर, उमापति, विश्वपति, मरुत्पति और जगत्पति नामसे विख्यात हैं! आपको हमारा प्रणाम है। प्रभो! आप हमारी रक्षा करें। भगवन्! आपके जटापुञ्जके अग्रभागपर बैठे हुए चन्द्रमाकी किरणोंके प्रकाशसे तीनों जगत् स्वच्छ हो रहे हैं! आप ही अच्युत, त्रिशूलपाणि और पुरुषोत्तम कहलाते हैं। दैत्योंद्वारा उत्पन्न भय हमारे ऊपर आ गया है। आप उससे हमारी रक्षा करनेकी कृपा कीजिये। श्रेष्ठ देवताओंमें भी परम श्रेष्ठ प्रभो! आदिदेव, पुरुषोत्तम, हर, भव, महेश, त्रिपुरान्तक, विभु, भगदेवताके नेत्र हरनेवाले, दैत्यरिपु, पुरातन और वृषभध्वज—इस प्रकार आपके अनन्त नाम हैं। भगवन्! हमारी रक्षामें आप ही सक्षम हैं। गिरिजापति प्रभो! पर्वतपत्नी मैनाके आप वात्सल्य-भाजन हैं! देवेश्वर! अच्युत, गणेश, भूतेश, शिव, अक्षय, अयन और दैत्यवरान्तक आपकी संज्ञाएँ हैं। भगवन्! आप हमारी रक्षा करें। पृथ्वी आदि पाँच तत्त्वोंमें आप प्रतिष्ठित हैं। आपके प्रधान गुण भी पाँच हैं। विशेषता यह है कि आप आकाशमें तो केवल ध्वनिरूपसे लीन रहते हैं, अग्निमें शब्द एवं रूप—इन दो गुणोंसे, वायुमें तीन रूपोंसे, जलमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस—इन चार रूपोंसे और पृथ्वीमें गन्धसहित पाँच रूपोंसे विराजते हैं। भगवन्! अग्नि आपका स्वरूप है। वृक्ष, पत्थर और तिल आदिमें आप साररूपसे स्थित हैं। भगवन्! आप महान् शक्तिशाली पुरुष हैं। इस समय दैत्योंद्वारा हमें अत्यन्त दुःख भोगना पड़ रहा है। अतः आप हमारी रक्षा करें। त्रिलोचन! जिस समय यह सारा विश्व सृष्टिशून्य था तथा ये सूर्य, चन्द्रमा, इन्द्र आदि भी नहीं थे, उस समय त्रिनेत्र! सभी प्रमाणोंसे परे, समस्त बाधाओंसे वर्जित केवल आपकी ही सत्ता विराजित थी। भगवन्! आप कपालकी माला पहनते हैं। द्वितीयाके चन्द्रमा आपके मस्तककी शोभा बढ़ाते हैं। श्मशानभूमिमें आप निवास करते हैं। भस्मसे आपकी अनुपम शोभा होती है। आप शेषनागका यज्ञोपवीत पहनते हैं। देवेश्वर! मृत्युञ्जय! आप अपनी तीव्र बुद्धिके सहारे हमारी रक्षा करें। भगवन्! आप पुरुष हैं और ये श्रीगिरिजा अर्द्ध-देहरूपमें आपकी शक्ति हैं। आपमें ही यह जगत् स्थित है। आहवनीय आदि अग्नियोंने आपके तीनों नेत्रोंमें स्थान पाया है। समस्त सागर तथा पर्वतोंसे निकलकर समुद्रतक जानेवाली नदियाँ आपकी जटाएँ हैं। आप विशुद्ध ज्ञानघन हैं। जिनकी दृष्टि दूषित है, वे ही आपको भौतिकरूपमें देखते हैं। जगत्के उत्पत्तिकर्ता भगवान् नारायण तथा चार मुखोंसे शोभा पानेवाले ब्रह्मा भी आप ही हैं। सत्त्व आदि तीनों गुणों, आहवनीय, आवसथ्य आदि तीनों अग्नियों तथा कृत-त्रेता आदि युगोंके भेदसे आप त्रिमूर्ति बन जाते हैं। प्रभो! ये प्रधान देवता आपकी सहायता चाहते हैं। ये आपको अपना तोषक एवं रक्षक कहते हैं। क्योंकि रुद्र! विश्वका भरण-पोषण करना आपका स्वभाव है। अतः भस्मको भूषणरूपमें धारण करनेवाले प्रभो! आप हमारी रक्षा करें।
मुनिवर महातपा कहते हैं—राजन्! देवताओंके इस प्रकार स्तुति करनेपर पशुपति भगवान् शंकर स्थिर होकर बोले—‘देवताओ! आपका क्या कार्य है? शीघ्र बतलाएँ।’
देवगण बोले—देवेश! दानवोंके वधके लिये
२८-द्वादशी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें उसके अधिष्ठाता श्रीभगवान् विष्णुकी उत्पत्ति-कथा
अध्याय २५ ] षष्ठी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें स्वामी कार्तिकेयके जन्मकी कथा ६७
आप हमें एक सेनापति प्रदान करनेकी कृपा कीजिये। ब्रह्माजीकी अध्यक्षतामें रहनेवाले हम सभी देवताओंका इस समय इसीमें कल्याण है।
भगवान् रुद्रने कहा—देवगण! आपलोग स्वस्थ एवं निश्चिन्त हो जायँ। अभी थोड़ी देरमें मैं आपलोगोंको सेनापति देता हूँ।
राजन्! यों कहकर भगवान् रुद्रने देवताओंको जानेकी आज्ञा दे दी और पुत्रोत्पत्तिके निमित्त अपने विग्रहमें रहनेवाली शक्तिको प्रेरित किया। उनके द्वारा शक्तिके क्षुब्ध होते ही एक कुमार प्रकट हो गया। उसकी प्रभा ऐसी थी, मानो तपता हुआ सूर्य ही हो। वह अपनी जन्मजात शक्तिको इस प्रकार प्रकाशित कर रहा था, मानो वह शक्ति ज्ञानमय बनकर एकमात्र उसीके पास पुञ्जीभूत हो गयी है। राजेन्द्र! उस कुमारकी उत्पत्तिसे सम्बन्धित अनेक प्रकारकी कथाएँ हैं। बहुत-से मन्वन्तरों तथा कल्पोंमें देवताओंके सेनापति होनेके विविध प्रसङ्ग हैं। भगवान् शंकरके शरीरमें अहंकाररूपसे जिन देवताओंकी प्रसिद्धि थी, वे सभी देवता प्रयोजनवश देवसेनापति बनकर शोभा पाने लगे। उस कुमारके उत्पन्न हो जानेपर स्वयं ब्रह्माजी देवताओंके साथ आये और उन देवाधिदेव भगवान् शंकरकी पूजा की। समस्त देवताओं, ऋषियों, सिद्धों और भगवान् शंकरने उस सेनापति होनेवाले बालकको पाल-पोसकर बड़ा किया। तब उस बालकने देवताओंसे कहा—'आपलोग मुझे दो सहायक तथा कुछ खिलौने दें।' उस समय भगवान् रुद्रने उस बालककी बात सुनकर यह वचन कहा—'पुत्र! तुम्हें खेलनेके लिये कुक्कुट तथा सेवा-सहयोगके लिये शाख एवं विशाख नामवाले दो अनुचर देता हूँ। कुमार! तुम भूत, ग्रह एवं विनायकोंके नेता बनो और देवताओंकी सेनाके सेनापति हो जाओ।' राजन्! भगवान् शंकरके ऐसा कहनेपर सभी देवगण प्रसन्न हो अभिलषित वाक्योंका उच्चारण करके सेनाध्यक्ष भगवान् स्कन्दकी स्तुति करने लगे।
देवगण बोले—प्रभो! आप भगवान् शंकरके सुपुत्र हैं। आप हमारी सेनाकी अध्यक्षता स्वीकार करनेकी कृपा करें। आप षण्मुख, स्कन्द, विश्वेश, कुक्कुटध्वज, पावकि, शत्रुओंको कम्पित करनेवाले, कुमारेश, बालग्रहानुग, शत्रुओंको परास्त करनेवाले, क्रौञ्चविध्वंसक (क्रौञ्चनामक पर्वतको, जो आसाममें स्थित है, विदीर्ण करनेवाले), कृत्तिकानन्दन, शिवकुमार, भूतों तथा ग्रहोंके स्वामी, अग्निनन्दन तथा भूतभावन भगवान् शंकरकी संतान हैं। त्रिलोचन! आपको हमारा नमस्कार है।
राजन्! देवताओंके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर रुद्रकुमार भगवान् स्कन्दकी आकृति तेजीसे बढ़ने लगी। फिर तो वे बारह आदित्योंके समान तेजस्वी एवं पराक्रमी हो गये और उनके तेजसे तीनों लोकोंमें ताप छा गया।
राजा प्रजापालने पूछा—गुरो! आपने स्कन्दको कृत्तिका-पुत्र कैसे कहा है? अथवा वे कुमार, पावकि और षण्मातृनन्दन क्यों कहे जाते हैं? इसका कारण मुझे बतानेकी कृपा करें।
मुनिवर महातपा कहते हैं—राजन्! मन्वन्तरके प्रारम्भमें कार्तिकेयकी जिस प्रकार उत्पत्ति हुई थी, वह प्रसङ्ग मैंने बताया है। देवतालोग तो भूत और भविष्यकी बातें भी जानते हैं। अतएव उनके द्वारा इन गुणद्योतक नामोंका उच्चारण हुआ है। अग्निके पुत्र होनेसे इनका नाम 'पावकि' हुआ है। यद्यपि इनकी माता गौरी हैं, किंतु जन्ममें कृत्तिकादि छः माताओंने इन्हें दुग्ध-पान कराकर पाला था, अतः ये 'कार्तिकेय' कहलाये। महाराज! तुम्हारे प्रश्नका इस प्रकार समाधान हो गया।
२९-त्रयोदशी तिथि एवं धर्मकी उत्पत्तिका वर्णन
| ६८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय २६ |
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आत्मविद्यारूपी अमृतका यह विषय अत्यन्त गुह्य है। भगवान् शंकरके अहंकारका यह मूर्तरूप है। सम्पूर्ण पापोंके प्रशमन करनेवाले स्वयं भगवान् शंकर ही स्कन्दरूपमें प्रकट हुए थे।
पितामह ब्रह्माजीने इनके अभिषेकके समय इन्हें षष्ठी तिथि प्रदान की थी। अतः जो व्यक्ति इस तिथिमें संयमपूर्वक केवल फलके आहारपर रहकर इनकी पूजा करता है, उसे यदि पुत्र न हो तो पुत्रकी प्राप्ति अथवा निर्धन हो तो धनकी प्राप्ति हो जाती है। इतना ही नहीं, मनुष्य मनसे भी जिन-जिन वस्तुओंकी इच्छा करेगा, वह उसे सुलभ हो जायगी। जो पुरुष स्वामी कार्तिकेयके उपर्युक्त गुणनामपूर्ण स्तोत्रका पाठ करता है, उसके घरमें बच्चोंका सदा कल्याण होता है और वे नीरोग रहते हैं।
[ अध्याय २५]
सप्तमी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें आदित्योंकी उत्पत्तिकी कथा
राजा प्रजापालने पूछा— ब्राह्मणश्रेष्ठ! दिव्य ज्योतिःपुञ्जका शरीर-धारण बड़े आश्चर्यकी बात है। कृपया मुझ शरणागतकी इस शङ्काका आप निराकरण करें।
मुनिवर महातपाजी कहने लगे— राजन्! विज्ञानात्मा, सनातन ज्ञानशक्तिको जब किसी दूसरी शक्तिकी अपेक्षा हुई तो उसके शरीरसे एक प्रकाशमान तेज निकल पड़ा, जो सूर्य कहलाया। यह उन महान् पुरुषका ही एक दूसरा रूप है। फिर उस मूर्तिमें सम्पूर्ण तेज स्थान पा गये। तब उससे तीनों लोकोंमें प्रकाश फैल गया। उस तेजमें अखिल महर्षियोंसहित सम्पूर्ण देवता और सिद्ध अधिष्ठित हैं। इसीलिये उन प्रभुको स्वयम्भू कहा जाता है। उन्हींसे सूर्यका प्राकट्य हुआ। वे ही स्वयं सूर्यरूपसे लक्षित हैं। उस विग्रहमें तुरंत तेजोंका समावेश हो गया। अतः वे परम तेजस्वी शरीरवाले बन गये। वेदवादी मुनिगण इसी तेजको सूर्य आदि नामोंसे व्यवहृत करते हैं। जब वे आकाशमें ऊपर उठकर सभी लोकोंको प्रकाशित करने लगे, तब उनका अनुगुण नाम 'भास्कर' पड़ गया। इसी प्रकार चारों ओर प्रकाश फैलानेके कारण इनकी 'प्रभाकर' नामसे भी प्रसिद्धि हुई। दिवा और दिवस—ये दोनों शब्द एक ही अर्थके बोधक हैं। इनके द्वारा दिवसका निर्माण हुआ, अतः ये दिवाकर कहलाये। सम्पूर्ण संसारके आदिमें ये विराजते थे, अतः इन्हें आदित्य कहते हैं। फिर इन्हीं भगवान् सूर्यके तेजसे भिन्न-भिन्न बारह आदित्य उत्पन्न हुए। वैसे प्रधानतया एक ही रूपमें ये जगत्में घूमते रहते हैं। जब इनके शरीरमें स्थान पाये हुए देवताओंने देखा कि ये ही परब्रह्म परमेश्वर जगत्में व्याप्त होकर तेज फैला रहे हैं, तब वे श्रीविग्रहसे बाहर निकल आये और भगवान्की इस प्रकार स्तुति करने लगे।
देवता बोले— भगवन्! आपसे जगत्की सृष्टि होती है। आपके द्वारा ही इस विश्वका पालन और संहार होता है। आप आकाशमें ऊँचे जाकर निरन्तर विश्वमें चक्कर लगाते हैं। ऐसे प्रभुकी हम सदा उपासना करते हैं। जगत्की रचना हो जानेपर प्रतापी सूर्यका रूप धारणकर आप सर्वत्र तेज भर देते हैं। जिसे सात घोड़े खींचते हैं, जिसकी कालरूपी धुरी है और जो बड़े वेगसे चलता है, ऐसा रथ आपकी सवारी है। प्रभो! आप प्रभाकर और रवि कहलाते हैं। चर और अचर—सम्पूर्ण संसारकी आत्मा आप ही हैं। सिद्ध पुरुष कहते हैं कि ब्रह्मा, वरुण, यम, भूत और भविष्य—सब कुछ आप ही हैं। भगवन्! वेद
अध्याय २७ ] अष्टमी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें मातृकाओंकी उत्पत्तिकी कथा ६९
आपकी मूर्ति हैं। अन्धकार दूर करना आपका स्वभाव है। आप वेदान्त आदि शास्त्रोंकी सहायतासे ही जाने जाते हैं। यज्ञोंमें विष्णुके रूपसे आपके ही निमित्त हवन होता है। हम सभी देवता आपकी शरणमें आये हैं। आप प्रसन्न होकर सदा हमारी रक्षा करें। देवेश्वर! अब हमलोगोंके द्वारा भक्तिपूर्वक की हुई आपकी स्तुति सम्पन्न हो गयी। प्रभो! विशेष आग्रह है कि आप हमारी रक्षाका प्रबन्ध करें।
इस प्रकार देवताओंके स्तुति करनेपर भगवान् सूर्यने तेजोमयी मूर्तिको सौम्य बना लिया और उनके सामने शीघ्र ही साधारण प्रकाश फैलाने लगे। (उस अवसरपर देवताओंने कहा—) 'भगवन्! इस सम्पूर्ण देवगणमें बेचैनी उत्पन्न हो गयी थी। अब आपकी कृपासे सभी शान्तिका अनुभव कर रहे हैं।' (महातपा मुनि कहते हैं—राजन्!) सप्तमी तिथिके दिन भगवान् सूर्यका प्राकट्य हुआ था, अतः इस तिथिको उपवास करके जो पुरुष भक्तिपूर्वक सूर्यकी पूजा करता है, भास्कररूपधारी प्रभु उसकी इच्छाके अनुसार फल प्रदान कर देते हैं। राजन्! सूर्यसे सम्बन्धित यह कथा बहुत पुरानी है, जिसे तुम सुन चुके। अब आदि मन्वन्तरमें हुई (मातृकाओंकी उत्पत्तिसम्बन्धी) एक अन्य आख्यान कहता हूँ, उसे सुनो।' [अध्याय २६]
अष्टमी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें मातृकाओंकी उत्पत्तिकी कथा
मुनिवर महातपा कहते हैं—राजन्! पूर्व समयकी बात है, भूमण्डलपर एक महान् पराक्रमी राक्षस था, जिसकी अन्धक नामसे ख्याति थी। ब्रह्माजीके द्वारा वर प्राप्तकर उसका अहंकार चरम सीमापर पहुँच गया था। सभी देवता उसके अधीन हो गये थे। उसकी सेवा असह्य होनेके कारण देवताओंने सुमेरु पर्वत छोड़ दिया और उस दानवके भयसे दुःखी होकर वे ब्रह्माजीकी शरणमें गये। उस समय वहाँ आये हुए प्रधान देवताओंसे पितामहने कहा—'सुरगणो! कहो, तुम्हारे आनेका क्या प्रयोजन है? तुम क्या चाहते हो?'
देवताओंने कहा—जगत्पते! आप चतुर्मुख एवं जगत्-पितामह हैं। भगवन्! आपको हमारा नमस्कार है। अन्धकासुरके द्वारा हम सभी देवता महान् दुःखी हैं। आप हम सबकी रक्षा करें।
ब्रह्माजी बोले—श्रेष्ठ देवताओ! अन्धकासुरसे रक्षा करना मेरे वशकी बात नहीं है। हाँ, महाभाग शंकरजी अवश्य सर्वसमर्थ हैं। हम सभी उनकी ही शरणमें चलें; क्योंकि मैंने ही उसे वर दिया था कि तुम्हें कोई भी मार न सकेगा और तुम्हारा शरीर भी पृथ्वीका स्पर्श नहीं करेगा। फिर भी उस परम पराक्रमी असुरको शत्रुओंके संहार करनेवाले भगवान् शंकर मार सकते हैं; अतः हम सबलोग उन्हीं कैलासवासी प्रभुके पास चलें।
राजन्! इस प्रकार कहकर ब्रह्माजी सभी देवताओंके साथ भगवान् शंकरके पास गये। उन्हें देखकर भगवान् शंकरने प्रत्युत्थानादिद्वारा स्वागत-कर उनसे कहा—'आप सभी देवता किस कारणसे यहाँ पधारे हैं? आप शीघ्र आज्ञा दें, जिससे मैं आपलोगोंका कार्य तुरंत सम्पन्न कर दूँ।'
इसपर देवताओंने कहा—'भगवन्! दुष्टचित्त, महाबली अन्धकासुरसे आप हमारी रक्षा करें' अभी वे ऐसा कह ही रहे थे कि विशाल सेना लिये अन्धकासुर वहीं आ धमका। उस समय वह दानव पूरे साधनोंके साथ आया था। उसकी इच्छा थी कि वह युद्धमें चतुरङ्गिणी सेनाके सहारे शंकरजीको मारकर उनकी पत्नी पार्वतीका अपहरण कर ले। उसे सहसा इस प्रकार प्रहारके लिये
| ७० | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय २७ |
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उद्यत देखकर रुद्र भी युद्धके लिये उद्यत हो गये। सभी देवता भी उनका साथ देनेको तैयार हुए। फिर उन प्रभुने वासुकि, तक्षक और धनञ्जयको स्मरण किया और उन्हें क्रमसे अपना कङ्कण और करधनी बनाया। इतनेमें नील नामसे प्रसिद्ध एक प्रधान दैत्य हाथीका रूप धारणकर भगवान् शंकरके पास आया। नन्दी उसकी माया जान गये और वीरभद्रको बतलाया। बस! क्या था, वीरभद्रने भी सिंहका रूप धारणकर उसे तत्काल मार डाला। उस हाथीका चर्म अञ्जनके समान काला था। वीरभद्रने उसकी चमड़ी उधेड़कर उसे भगवान् शंकरको समर्पित कर दिया। तब रुद्रने उसे वस्त्रके स्थानपर पहन लिया। तभीसे वे गजाजिनधारी हुए। इस प्रकार गजचर्म पहनकर उन्होंने श्वेत सर्पका भूषण भी धारण कर लिया। फिर हाथमें त्रिशूल लेकर अपने गणोंके साथ उन्होंने अन्धकासुरपर धावा बोल दिया। अब देवता एवं दानवोंमें भीषण संग्राम प्रारम्भ हो गया। उस अवसरपर इन्द्र आदि सभी लोकपाल, सेनापति स्कन्द एवं अन्य सभी देवता भी समराङ्गणमें उतर आये। यह स्थिति देखकर नारदजी तुरंत भगवान् नारायणके पास गये और बोले—‘भगवन्! कैलासपर देवताओंका दानवोंके साथ घोर युद्ध हो रहा है।’
यह सुनना था कि भगवान् जनार्दन भी हाथमें चक्र लेकर गरुडपर बैठे और युद्ध-स्थलमें पहुँचकर दानवोंके साथ युद्ध करने लगे। उनके वहाँ आ जानेपर देवताओंका उत्साह कुछ बढ़ा अवश्य, किंतु उस समरमें उनका मन एक प्रकारसे म्लान हो चुका था, अतः वे सभी भाग चले। जब देवताओंकी शक्ति समाप्त हो गयी तो स्वयं भगवान् रुद्र अन्धकासुरके सामने गये। उसके साथ उनका रोमाञ्चकारी युद्ध आरम्भ हो गया। उस समय उन प्रभुने उस दानवपर त्रिशूलसे भीषण प्रहार किया। फिर तो घायल हो जानेपर अन्धकासुरके शरीरसे जो रक्त जमीनपर गिरा, उससे उसी क्षण दूसरे असंख्य अन्धकासुर उत्पन्न हो गये। युद्धभूमिमें ऐसा अत्यन्त आश्चर्यपूर्ण दृश्य देखकर परम प्रभु भगवान् रुद्रने प्रधान अन्धकासुरको त्रिशूलके अग्रभागसे बींध दिया और उसे लिये हुए नाचने लगे। शेष मायामय अन्धकासुरोंको भगवान् विष्णुने अपने चक्रसे काट डाला। शूल-प्रोत प्रधान अन्धकासुरके शरीरसे रक्तकी धाराएँ अब भी निरन्तर प्रवाहित हो रही थीं; अतः रुद्रके मनमें भीषण क्रोधाग्नि भड़क उठी, जिससे उनके मुखसे अग्निकी ज्वाला बाहर निकलने लगी। उस ज्वालाने एक देवीका रूप धारण कर लिया, जिसे लोग योगेश्वरी कहने लगे।
इसी प्रकार भगवान् विष्णुने भी अपने रूपके सदृश (ज्वालाद्वारा) अन्य शक्तिका निर्माण किया। ऐसे ही ब्रह्मा, कार्तिकेय, इन्द्र, यम, वराह, महादेव, विष्णु और नारायण—इनके प्रभावसे आठ मातृकाएँ प्रकट हो गयीं। जब श्रीहरिने पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये वराहका रूप धारण किया था, उस समय जिन्हें अपनाया वे वाराही हैं। इस प्रकार ब्राह्मी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, यमी, योगेश्वरी, माहेश्वरी और माहेन्द्री—ये आठ मातृकाएँ हैं। क्षेत्रज्ञ श्रीहरिने जिनका जिस कारणसे निर्माण हुआ था, उसपर विचार करके उनका वही नाम रख दिया। ऐसे ही काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, मात्सर्य, पैशुन्य और असूया—इनकी आठ शक्तियाँ मातृका नामसे प्रसिद्ध हुईं। काम ‘योगेश्वरी’, क्रोध ‘माहेश्वरी’, लोभ ‘वैष्णवी’, मद ‘ब्रह्माणी’, मोह ‘कौमारी’, मात्सर्य ‘इन्द्राणी’, पैशुन्य ‘यमदण्डधरा’ और असूया ‘वाराही’ नामसे कही गयी हैं—ऐसा जानना चाहिये। ये कामादिगण
अध्याय २८ ] नवमी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें दुर्गादेवीकी उत्पत्ति-कथा ७१
भी भगवान् नारायणके शरीर कहे जाते हैं। उन प्रभुने जैसी मूर्ति धारण की, उनका वैसा नाम तुम्हें बता दिया।
तदनन्तर इन मातृ-देवियोंके प्रयाससे अन्धकासुरकी रक्तधाराका प्रवाह सूख गया। उसकी आसुरी माया समाप्त हो गयी। फिर अन्धकासुर भी सिद्ध हो गया। राजन्! मैंने तुमसे यह आत्मविद्यामृत-तत्त्वका वर्णन किया है। मातृकाओंकी उत्पत्तिका यह कल्याणकारी प्रसङ्ग जो सदा सुनता है, ये माताएँ उसकी प्रतिदिन सभी प्रकार रक्षा करती हैं। राजेन्द्र! जो मुखसे इन मातृकाओंके जन्मचरित्रका पाठ करता है, वह इस लोकमें सर्वथा धन्यवादका पात्र माना जाता है। अन्तमें उसको भगवान् शिवके लोककी प्राप्ति सुलभ हो जाती है। महाभाग ब्रह्माने उन मातृकाओंके लिये उत्तम अष्टमी तिथि प्रदान की है। मनुष्यको चाहिये कि इस तिथिमें बिल्वके आहारपर रहकर भक्तिपूर्वक सदा इनकी पूजा करे। इससे परम संतुष्ट होकर ये मातृकाएँ उसको कल्याण एवं आरोग्य प्रदान करती हैं। [अध्याय २७]
नवमी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें दुर्गादेवीकी उत्पत्ति-कथा
राजा प्रजापालने पूछा— मुने! सृष्टिके आदिमें सूक्ष्म रूपमें स्थित निर्गुणा एवं अव्यक्त-ब्रह्मस्वरूपा कल्याणी भगवती महामाया, दुर्गा भगवती सगुण स्वरूप धारणकर पृथक् रूपमें कैसे प्रकट हुईं?
महातपाजी कहते हैं— राजन्! प्राचीन समयकी बात है। वरुणके अंशसे उत्पन्न सिन्धुद्वीप नामका एक प्रबल प्रतापी नरेश था। वह इन्द्रको मारनेवाले पुत्रकी कामनासे जंगलमें जाकर तप करने लगा। सुव्रत! इस प्रकार एक ही आसनसे भीषण तप करते हुए उसने अपने शरीरको सुखा दिया।
राजा प्रजापालने पूछा— द्विजवर! उसका इन्द्रने कौन-सा अपकार किया था, जिससे वह उनके मारनेवाले पुत्रकी इच्छासे तपमें लग गया?
महातपाजी बोले— राजन्! सिन्धुद्वीप पिछले जन्ममें विश्वकर्माका पुत्र नमुचि नामक दैत्य था, जो वीरोंमें प्रधान था। वह सम्पूर्ण शस्त्रोंद्वारा अवध्य था। अतः इन्द्रद्वारा जलके फेनसे उसकी मृत्यु हुई थी (युद्धके अन्तमें इन्द्रने उसे जलके फेनसे मारा था)। वही पुनः ब्रह्माजीके वंशमें सिन्धुद्वीपके नामसे उत्पन्न हुआ। इन्द्रके उसी वैरको स्मरणकर वह अत्यन्त कठिन तपस्या करनेके लिये बैठ गया था।
इस प्रकार बहुत समय बीत जानेपर पवित्र नदी वेत्रवती (मध्यप्रदेशकी बेतवा नदी)-ने अत्यन्त सुन्दर मानुषी स्त्रीका रूप धारणकर एवं अनेक अलंकारोंसे सज-धजकर सिन्धुद्वीप जहाँ बैठकर महान् तप कर रहा था, वहाँ पहुँची। उस सुन्दरी स्त्रीको देखकर राजाका मन क्षुब्ध हो उठा, अतः उसने पूछा—'सुन्दर कटिभागवाली भामिनि! तुम कौन हो? सब सच्ची बात बतानेकी कृपा करो।'
नदीने उत्तर दिया— मेरा नाम वेत्रवती है। मेरे मनमें आपको प्राप्त करनेकी इच्छा हो गयी है। अतः मैं यहाँ आ गयी हूँ। महाराज! इस बातपर तथा मेरे भावोंका विचारकर आप मुझ दासीको स्वीकार करनेकी कृपा करें।
राजन्! वेत्रवतीके इस प्रकार कहनेपर राजा सिन्धुद्वीपने भी उसे स्वीकार कर लिया। समय पाकर शीघ्र ही उससे पुत्रकी उत्पत्ति हुई। उस बालकमें बारह सूर्यों-जैसा तेज था। वेत्रवतीके उदरसे जन्म होनेके कारण वह वेत्रासुरके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसमें पर्याप्त बल था। उसके तेजकी
७२ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय २८
सीमा न थी। धीरे-धीरे वह प्राग्ज्योतिषपुर (कामरूप—आसाम)-का नरेश बन गया और युवा होनेपर तो उसके बल-विक्रम बहुत बढ़ गये। उसने अब महायोगशक्तिद्वारा सात द्वीपोंवाली इस सम्पूर्ण पृथ्वीको जीत लिया। बादमें कालकेयोंको जीतनेके लिये उसने मेरु-पर्वतपर चढ़ाई की। जब वह असुर इन्द्रके पास गया तो वे भयसे वहाँसे भाग चले। अग्निने तो उसे देखते ही अपना स्थान छोड़ दिया। ऐसे ही यम, निर्ऋति और वरुण—ये सब-के-सब उसके आनेपर अपने स्थानसे हटते गये। अन्तमें इन्द्र-प्रभृतिको साथ लेकर वरुणदेवता वायुदेवताके संनिकट गये। फिर पवनदेव भी इन्द्र आदि समस्त देवताओंके सहित धनाध्यक्ष कुबेरके पास पहुँचे। शंकरजी कुबेरके मित्र हैं; अतः धनाध्यक्ष कुबेर देवताओंको साथ लेकर शंकरजीके पास पधारे। राजन्! इतनेमें बलाभिमानी वेत्रासुर भी गदा लिये हुए कैलासपर जा पहुँचा। इधर भगवान् शिव उसे अवध्य समझकर देवताओंके साथ ब्रह्मलोक पहुँचे थे। वहाँ पुण्यकर्म करनेवाले बहुत-से देवता और सिद्धोंका समाज उनकी स्तुति कर रहा था। उस समय जगत्की रचना करनेमें कुशल ब्रह्माजी भगवान् विष्णुके चरणसे प्रकट हुई गङ्गाके पावन जलमें प्रविष्ट होकर क्षेत्रज्ञ परमात्माकी माया गायत्रीका नियमपूर्वक जप कर रहे थे। अब देवता बड़े जोरसे चिल्लाकर कहने लगे—'प्रजाओंकी रक्षा करनेवाले भगवन्! हमें बचाइये। वेत्रासुरसे हम समस्त देवता और ऋषि अत्यन्त भयभीत हो गये हैं। आप हमारी रक्षा करें! रक्षा करें!'
देवताओंके इस प्रकार पुकार मचानेपर ब्रह्माजीकी दृष्टि वहाँ आये हुए उन देवताओंकी ओर गयी। वे सोचने लगे—'अहो! भगवान् नारायणकी माया बड़ी विचित्र है। इस विश्वका कोई भी स्थान उससे रिक्त नहीं है। असुरों और राक्षसोंसे भला मेरा क्या सम्बन्ध?' वे इस प्रकार अभी चिन्तन कर ही रहे थे कि तबतक वहाँ एक अयोनिजा कन्या प्रकट हो गयी। उसका शरीर श्वेतवस्त्रोंसे सुशोभित हो रहा था। उसके गलेमें माला तथा मस्तकपर किरीट उद्भासित हो रहा था। उसकी कान्ति अत्यन्त उज्ज्वल थी तथा उसकी आठ भुजाएँ थीं, जिनमें क्रमसे शङ्ख, चक्र, गदा, पाश (शक्ति), तलवार, घण्टा और धनुष—ये दिव्य आयुध सुशोभित हो रहे थे। वह देवी तूणीर आदि अन्य सभी युद्धोपकरणोंसे भी सुसज्जित होकर जलसे बाहर निकल पड़ी। वह महायोगेश्वरी परब्रह्म परमात्माकी शक्ति सिंहपर समासीन थी। अब सहसा वह अनेक रूप धारणकर सभी असुरोंके साथ युद्ध करने लगी। उस देवीमें अपार शक्ति थी। उसके पास बहुत-से दिव्य अस्त्र थे। इस प्रकार देवताओंके वर्षसे यह युद्ध एक हजार वर्षोंतक चलता रहा और अन्तमें इस संग्राममें देवीद्वारा भयंकर वेत्रासुर मार डाला गया। अब देवताओंकी सेनामें बड़े जोरसे आनन्दकी ध्वनि होने लगी। उस दैत्यकी मृत्यु हो जानेपर सभी देवता युद्धभूमिमें ही—'भगवती! आपकी जय हो! जय हो!' कहकर स्तुति-प्रणाम करने लगे। साथ ही भगवान् शंकरने उनकी इस प्रकार स्तुति की—
भगवान् शंकर बोले—महामाये! महाप्रभे! गायत्री देवि! आपकी जय हो! महाभागे! आपके सौभाग्य, बल, आनन्द—सभी असीम हैं। दिव्य गन्ध एवं अनुलेपन आपके श्रीअङ्गोंकी शोभा बढ़ाते हैं। परमानन्दमयी देवि! दिव्य मालाएँ एवं गन्ध आपके श्रीविग्रहकी छवि बढ़ाती हैं। महेश्वरि! आप वेदोंकी माता हैं। आप ही वर्णोंकी मातृका हैं। आप तीनों लोकोंमें व्याप्त हैं। तीनों अग्नियोंमें
३१-अमावास्या तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें पितरोंकी<br>उत्पत्तिका कथन
अध्याय २८ ] नवमी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें दुर्गादेवीकी उत्पत्ति-कथा ७३
जो शक्ति है, वह आपका ही तेज है। त्रिशूल धारण करनेवाली देवि! आपको मेरा नमस्कार है। देवि! आप त्रिनेत्रा, भीमवक्त्रा और भयानका आदि अर्थानुरूप नामोंसे व्यवहृत होती हैं। आप ही गायत्री और सरस्वती हैं। आपके लिये हमारा नमस्कार है। अम्बिके! आपकी आँखें कमलके समान हैं। आप महामाया हैं। आपसे अमृतकी वृष्टि होती रहती है। सर्वगे! आप सम्पूर्ण प्राणियोंकी अधिष्ठात्री हैं। स्वाहा और स्वधा आपकी ही प्रतिकृतियाँ हैं; अतः आपको मेरा नमस्कार है। महान् दैत्योंका दलन करनेवाली देवि! आप सभी प्रकारसे परिपूर्ण हैं। आपके मुखकी आभा पूर्ण चन्द्रके समान है। आपके शरीरसे महान् तेज छिटक रहा है। आपसे ही यह सारा विश्व प्रकट होता है। आप महाविद्या और महावेद्या हैं। आनन्दमयी देवि! विशिष्ट बुद्धिका आपसे ही उदय होता है। आप समयानुसार लघु एवं बृहत् शरीर भी धारण कर लेती हैं। महामाये! आप नीति, सरस्वती, पृथ्वी एवं अक्षरस्वरूपा हैं। देवि! आप श्री, धी तथा ॐकारस्वरूपा हैं। परमेश्वरि! तत्त्वमें विराजमान होकर आप अखिल प्राणियोंका हित करती हैं। आपको मेरा बार-बार नमस्कार है।
राजन्! इस प्रकार परम शक्तिशाली भगवान् शंकरने उन देवीकी स्तुति की और देवतालोग भी बड़े उच्च-स्वरसे उन परमेश्वरीकी जयध्वनि करने लगे। अबतक ब्रह्माजी जलमें जप ही कर रहे थे। अब जब (जयध्वनि उन्हें श्रवणगोचर हुई तो) वे जलसे बाहर निकले और देखा, परम कुशल देवी सम्पूर्ण कार्य सम्पन्न करके सामने विराजमान हैं। अब उन्होंने यह तो भलीभाँति जान लिया कि देवताओंका कार्य सिद्ध हो गया, परंतु भविष्यके कार्यको परिलक्ष्यकर उन्होंने ये वचन कहे—
ब्रह्माजी बोले—देवताओ! अनुपम अङ्गोंसे शोभा पानेवाली ये देवी अब हिमालय पर्वतपर पधारें और आपलोग भी अब तुरंत वहाँ चलकर आनन्दसे रहें। नवमी तिथिके दिन इन देवीकी सदा स्थिरचित्त एवं ध्यान-समाधिद्वारा आराधना करनी चाहिये। ऐसा करनेसे ये सम्पूर्ण प्राणियोंको वर देंगी, इसमें लेशमात्र संदेह नहीं। इस (नवमी) तिथिको जो पुरुष अथवा स्त्री पक्वान्न प्रसादरूपसे भोजन करेंगे, उनके सभी मनोरथ सिद्ध हो जायँगे।
राजन्! फिर ब्रह्माने भगवान् शंकरसे कहा—'देव! स्वयं आपद्वारा कहे गये इस स्तोत्रका जो पुरुष प्रातःकाल नित्य पाठ करेगा, उसे आप भी इस देवीके समान ही वर प्रदान करें और सम्पूर्ण संकटोंसे उसका उद्धार कर दें—यह प्रार्थना है।'
इस प्रकार भगवान् शंकरसे कहकर उन्होंने पुनः देवीसे कहा—'देवि! आपके द्वारा यहाँ कार्य सम्पन्न हुआ। किंतु अभी हमारा एक दूसरा बहुत बड़ा कार्य शेष है। वह यह कि आगे महिषासुर नामका एक राक्षस उत्पन्न होगा, जिसका विनाश भी आपके ही द्वारा सम्भव है।'
राजन्! इस प्रकार कहकर ब्रह्माजी तथा सम्पूर्ण देवता देवीको हिमालय पर्वतपर प्रतिष्ठित-कर यथास्थान प्रस्थित हो गये। हिमवान् पर्वतपर आनन्दसे विराजनेके कारण उनका नाम 'नन्दादेवी' हुआ। जो व्यक्ति भगवतीके इस प्रकट होनेकी कथाको स्वयं पढ़ेगा अथवा सुनेगा, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर कैवल्य-मोक्षका अधिकारी होगा।
[ अध्याय २८]
| ७४ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय ३० |
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दशमी तिथिके माहात्म्यके प्रसङ्गमें दिशाओंकी उत्पत्तिकी कथा
मुनिवर महातपा कहते हैं— राजन्! अब जिस प्रकार भगवान् श्रीहरिके कानोंसे दिशाएँ उत्पन्न हुईं, वह कथा मैं कहता हूँ, तुम उसे ध्यानपूर्वक सुनो। आदिसर्गके आरम्भमें ब्रह्माजीको सृष्टि करते हुए यह चिन्ता हुई कि 'मेरी उत्पन्न प्रजाका आधार क्या होगा?' अतः उन्होंने संकल्प किया कि 'अब आभ्यन्तर-स्थान उत्पन्न हों।' उनके इस प्रकार विचार करते ही उन परम प्रभुके कानोंसे दस तेजस्वी कन्याओंका प्रादुर्भाव हुआ। राजन्! उनमें वे पूर्वा, दक्षिणा, पश्चिमा, उत्तरा, ऊर्ध्वा और अधरा—ये छः कन्याएँ तो मुख्य मानी गयीं। साथ ही उन कन्याओंके मध्यमें और चार कन्याएँ, जो परम सुन्दर रूपवाली गम्भीर भावोंवाली तथा महा-भाग्यशालिनी थीं, उत्पन्न हुईं। उस समय उन सभी कन्याओंने बड़ी नम्रताके साथ शुद्धस्वरूप ब्रह्माजीसे प्रार्थना की—'देवेश्वर! आप प्रजाके पालक हैं। हमें स्थान देनेकी कृपा कीजिये। स्थान ऐसा चाहिये, जहाँ हम सभी अपने पतियोंके साथ सुखपूर्वक निवास कर सकें। अव्यक्तजन्मा प्रभो! हमें आप महान् भाग्यशाली पति प्रदान करनेकी कृपा करें।'
ब्रह्माजी बोले— कमनीय कटिभागसे शोभा पानेवाली दिशाओ! यह ब्रह्माण्ड सौ करोड़का विस्तारवाला है। इसके अन्तर्गत तुम संतुष्ट होकर यथेष्ट स्थानोंपर निवास करो। मैं शीघ्र ही तुम्हारे अनुरूप सुन्दर एवं नवयुवक पतियोंका भी निर्माण करके देता हूँ। तदनन्तर इच्छानुसार तुम सभी अपने-अपने स्थानपर चली जाओ।
राजन्! जब ब्रह्माजीने इस प्रकार कहा तो वे सभी कन्याएँ इच्छित स्थानोंको चल पड़ीं। फिर उन प्रभुने उसी क्षण महान् पराक्रमी लोकपालोंकी रचनाकर एक बार उन कन्याओंको पुनः अपने पास वापस बुलाया। उनके आ जानेपर लोकपितामह ब्रह्माजीने उन कन्याओंका उन लोकपालोंके साथ विवाह कर दिया। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले राजन्! उस अवसरपर उन परम प्रभुने पूर्वा नामवाली कन्याका विवाह इन्द्रके साथ, आग्नेयीदिक्का अग्निदेवके साथ, दक्षिणाका यमके साथ, नैर्ऋतीका निर्ऋतिके साथ, पश्चिमाका वरुणके साथ, वायव्यीदिक्का वायुके साथ, उत्तराका कुबेरके साथ तथा ईशानीदिक्का भगवान् शंकरके साथ विवाहका प्रबन्ध कर दिया। ऊर्ध्व दिशाके अधिष्ठाता वे स्वयं बने और अधोलोककी अध्यक्षता उन्होंने शेषनागको दी। इस प्रकार उन दिशाओंको पति प्रदान करनेके बाद ब्रह्माजीने उनके लिये दशमी तिथि निर्धारित कर दी। वही तिथि उन्हें अत्यन्त प्रिय बन गयी। राजन्! जो उत्तम व्रतका पालक पुरुष दशमी तिथिके दिन केवल दही खाकर व्रत करता है, उसके पापका नाश करनेके लिये वे देवियाँ सदा तत्पर रहती हैं। जो मनुष्य मनको वशमें करके दिशाओंके जन्मादिसे सम्बन्ध रखनेवाले इस प्रसङ्गको सुनता है, वह इस लोकमें प्रतिष्ठा पाता है और अन्तमें ब्रह्माजीका लोक प्राप्त करता है, इसमें कोई संशय नहीं। [ अध्याय २९ ]
एकादशी तिथिके माहात्म्यके प्रसङ्गमें कुबेरकी उत्पत्ति-कथा
मुनिवर महातपा कहते हैं— राजन्! अब एक दूसरी कथा कहता हूँ। इसमें धनके स्वामी कुबेरकी उत्पत्तिका वर्णन है। यह प्रसङ्ग पापका नाश करनेवाला है। पहले कुबेरजी वायुके रूपमें अमूर्त ही थे। पश्चात् वे मूर्तिमान् बनकर उपस्थित हुए। परब्रह्म परमात्माका जो शरीर है, उसीके अन्तर्गत
३३-प्राचीन इतिहासका वर्णन
अध्याय ३१ ] द्वादशी तिथिकी महिमा, श्रीभगवान् विष्णुकी उत्पत्ति-कथा [ ७५
वह वायु विराजता था। आवश्यकताके अनुसार वह क्षेत्रदेवता बनकर बाहर निकला। उसकी उत्पत्तिकी कथा मैं तुम्हें संक्षेपमें बता चुका हूँ। महाभाग! तुम बड़े पवित्रात्मा पुरुष हो, अतः वही प्रसङ्ग पुनः कुछ विस्तारसे कहता हूँ, सुनो।
एक समयकी बात है—ब्रह्माजीके मनमें सृष्टि रचनेकी इच्छा हुई। तब उनके मुखसे वायु निकला। वह बड़े वेगसे स्थूल बनकर बह चला और उससे धूलकी प्रचण्ड वर्षा होने लगी। फिर ब्रह्माजीने उसे रोका और साथ ही कहा—'वायो! तुम शरीर धारण करो और शान्त हो जाओ।' उनके ऐसा कहनेपर वायु मूर्तिमान् बनकर कुबेरके रूपमें उनके सामने उपस्थित हुए। तब ब्रह्माजीने कहा—'सम्पूर्ण देवताओंके पास जो धन है, वह केवल फलमात्र है। उन सबकी रक्षाका भार तुम्हारे ऊपर है। इस रक्षा-कार्यके कारण जगत्में 'धनपति' नामसे तुम्हारी प्रसिद्धि होगी।' फिर अत्यन्त संतुष्ट होकर ब्रह्माजीने उन्हें एकादशीका अधिष्ठाता बना दिया। राजन्! उस तिथिके अवसरपर जो व्यक्ति बिना अग्निमें पकाये स्वयं पके हुए फल आदिके आहारपर रहकर नियमके साथ व्रत करता रहता है, उसपर कुबेर अत्यन्त प्रसन्न होते हैं और वे उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण कर देते हैं।
धनाध्यक्ष कुबेरके मूर्तिमान् बननेकी यह कथा सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाली है। जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक इसका श्रवण अथवा पठन करता है, उसके सारे मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। अन्तमें वह स्वर्गलोकको प्राप्त करता है।
[अध्याय ३०]
द्वादशी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें उसके अधिष्ठाता श्रीभगवान् विष्णुकी उत्पत्ति-कथा
मुनिवर महातपा कहते हैं—राजन्! यह जो मनुका नाम और मनुत्व (मन्त्र) पढ़ा जाता है तथा उसमें जो मन्त्र-शक्ति है (वह चाहे वैदिक या तान्त्रिक कुछ भी हो) प्रयोजनवश स्वरूपतः मूर्तिमान् विष्णु ही है। राजन्! भगवान् नारायण सर्वश्रेष्ठ परम पुरुष हैं। उन परम प्रभुके मनमें सृष्टि-विषयक संकल्प उत्पन्न हुआ। उन्होंने सोचा—'मैंने जगत्की रचना तो कर दी, फिर पालन भी तो मुझे ही करना है। यह सारा कर्म प्रपञ्च है। सम्यक्-रूपसे स्वरूप धारण किये बिना यह कार्य सम्पन्न नहीं हो सकता है। अतः एक ऐसी सगुण मूर्तिका निर्माण करूँ, जिससे इस जगत्की रक्षा हो सके।'
राजन्! परब्रह्म परमात्माका संकल्प सत्य होकर रहता है। वे प्रभु इस प्रकार विचार कर ही रहे थे, इतनेमें एक प्राक्तनी विशिष्ट स्वरूप-धारिणी सृष्टि उनके सामने प्रकट हो गयी। इसमें स्वयं पुराणपुरुष भगवान् नारायण ही प्रकट हो गये और उन्होंने लोकत्रयको अपने वैष्णव शरीरमें प्रविष्ट होते देखा। फिर वह प्रभुके शरीरसे बाहर आया। उस अवसरपर उन्हें अपने प्राचीन वरदानकी बात याद आयी, जो भगवान्ने संतुष्ट होकर वाणी आदिको दिया था। यह बहुत पुराना प्रसङ्ग है। भगवान् नारायणने वर देते हुए कहा था—'तुम्हें सभी वस्तुएँ विदित होंगी। तुम सबके कर्ता होओगे। सम्पूर्ण प्राणिवर्ग तुम्हें नमस्कार करेगा। तुम्हारे द्वारा तीनों लोकोंकी रक्षा होगी। अतः तुम 'विष्णु' नाम धारण करो। तुम सनातन पुरुष हो। देवताओं और ब्राह्मणोंकी सम्यक् प्रकारसे सदा रक्षा करना तुम्हारा कर्तव्य है। देव! तुम्हें सर्वज्ञता प्राप्त हो जाय—इसमें
३४-आरुणि और व्याधका प्रसङ्ग, नारायण-मन्त्रश्रवणसे<br>बाघका शापसे उद्धार
७६ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय ३२
कोई अन्यथा विचार नहीं है।'
इस प्रकार वर देकर भगवान् नारायण अपने प्राकृत रूपमें स्थित हो गये। फिर अब विष्णुको भी पहलेकी बात ध्यानमें आ गयी। सोचा—'अरे! मैं तो वही शक्तिसम्पन्न पुरुष हूँ।' तब उन महान् तपस्वी प्रभुने ऐश्वर्यके प्रभावसे योगनिद्राका स्मरण किया। वे देवी आ गयीं। स्त्री-पुरुषके संयोगसे उत्पन्न होनेवाली प्रजाओंका भार उनपर सौंप दिया। 'मैं उन परम प्रभु भगवान् नारायणका ही तो रूप हूँ'—ऐसा विचारकर वे फिर सो गये। सो जानेपर उनकी नाभिसे एक बड़ा-सा कमल निकला। सात द्वीपोंवाली पृथ्वी, समुद्र और वन—ये सब-के-सब उस कमलपर विराजमान थे। उस कमलके रूपका विस्तार आकाशसे पातालतक फैला था। उसकी कर्णिकापर सुमेरु-पर्वत सुशोभित हो रहा था। सबके बीचमें ब्रह्माजी थे। अपने ऐसे वैराज रूपको प्रत्यक्ष देखकर परम पुरुष परमात्माको बड़ा हर्ष हुआ। फिर उनके भीतर जो पवनदेव थे, उन्होंने व्यवहारके लिये वायुका सृजन किया। साथ ही कहा—'तुम अज्ञानपर विजय करनेवाले ज्ञानस्वरूप इस शङ्खका रूप धारण करो।' फिर श्रीहरिसे कहा—'अज्ञानका नाश करनेके लिये तुम्हारे हाथमें यह तलवार सदा शोभा पाती रहे। अच्युत! भयंकर काल-चक्रको काटनेके लिये यह चक्र धारण कर लो। केशव! पापराशि नष्ट हो जाय, एतदर्थ यह गदा धारण करना आवश्यक है। समस्त भूतोंको उत्पन्न करनेवाली यह वैजयन्ती माला तुम्हारे कण्ठमें सदा सुशोभित होती रहे। चन्द्रमा और सूर्य—ये दोनों श्रीवत्स और कौस्तुभके स्थानपर शोभा पायें। पवन चलनेमें सबसे पराक्रमी कहा गया है। वह तुम्हारे लिये गरुड बन जाय। तीनों लोकोंमें विचरनेवाली देवी लक्ष्मी सदा आपकी आश्रिता रहें। आपकी तिथि द्वादशी हो और आप अपने अभीष्टरूपसे विराजें। इस द्वादशी तिथिके दिन स्त्री अथवा पुरुष—जो कोई भी आपके प्रति श्रद्धा रखते हुए घृतके आहारपर रहे, वह स्वर्गमें स्थान पानेका अधिकारी हो जाय।'
(मुनिवर महातपा कहते हैं—राजन्!) वही परम पुरुष भगवान् नारायण 'विष्णु' इस नामसे विख्यात हुए। देवता और दानव—ये सब उन्हींकी मूर्तियाँ हैं। स्वयं वे ही अपने-आप विभिन्न रूप धारण करते हैं। उनके द्वारा किसीका संहार होता है तो किसीकी रक्षा होती है। उन्हें 'वेदान्तपुरुष' कहा जाता है। वे ही प्रभु प्रत्येक युगमें सब जगह विचरते हैं। जो उन्हें मनुष्य मानता है, उसे बुद्धिहीन समझना चाहिये। पापोंका नाश करनेवाला यह प्रसङ्ग वैष्णव-सर्ग कहलाता है। जो इसका पठन करता है, वह स्वर्गलोकमें जाकर परम पूज्य बन जाता है। [अध्याय ३१]
त्रयोदशी तिथि एवं धर्मकी उत्पत्तिका वर्णन
महातपाजी कहते हैं— राजन्! धर्म बड़े आदरके पात्र हैं। नरेन्द्र! उनकी उत्पत्ति, महिमा और तिथिका प्रसङ्ग कहता हूँ, सुनो। जिन्हें परब्रह्म परमात्मा कहते हैं तथा जिन शुद्धस्वरूप प्रभुकी सत्ता सदा बनी रहती है, पहले केवल वे ही थे। उनके मनमें प्रजाओंकी रचना करनेका विचार उत्पन्न हुआ। फिर उन प्रजाओंकी रक्षाका उपाय सोचने लगे। वे इस चिन्तामें लगे ही थे कि इतनेमें उनके दक्षिण अङ्गसे एक पुरुष प्रकट हो गया। उसके कानोंमें श्वेत कुण्डल, गलेमें श्वेत माला थी और वह सफेद रङ्गका अनुलेपन लगाये हुए था। उसके चार पैर थे तथा उसकी आकृति
अध्याय ३२ ] त्रयोदशी तिथि एवं धर्मकी उत्पत्तिका वर्णन ७७
बैलकी थी। फिर उस पुरुषको देखकर परम प्रभुने कहा—‘साधो ! तुम इन प्रजाओंकी रक्षा करो। मेरे द्वारा तुम जगत्में प्रधान बना दिये जाते हो।’
भगवान् नारायणकी आज्ञासे वह पुरुष वैसा ही हो गया। सत्ययुगमें उसके सत्य, शौच, तप और दान—ये चार पैर थे, त्रेतामें तीन तथा द्वापरमें दो। कलियुगमें वह दानरूपी एक पैरसे ही प्रजाओंका पालन करने लगा। ब्राह्मणोंके लिये उसने अध्ययन-अध्यापन एवं यजन-याजनादि छः रूप बनाये। क्षत्रियोंके लिये दान, यजन एवं अध्ययन—इन तीन रूपोंसे, वैश्योंके लिये दो रूपोंसे तथा शूद्रोंके लिये केवल एक सेवारूपसे ही सम्पन्न होकर वह सर्वत्र विराजने लगा। यह शक्तिशाली पुरुष सम्पूर्ण द्वीपों तथा तलातलोंमें व्याप्त हो गया। प्रकारान्तरसे द्रव्य, गुण, क्रिया और जाति—ये चार इसके पैर कहे गये हैं। वेदमें कहा गया है—संहिता, पद और क्रम—ये तीन उसके सींग हैं। आदि और अन्तमें स्थान पाये हुए दो सिरोंसे वह शोभा पाता है। उसके सात हाथ हैं। उदात्त, अनुदात्त और स्वरित—इन तीन स्वरोंसे वह सदा बद्ध रहता है। इस प्रकारसे वह धर्म व्यवस्थित हुआ।
राजन् ! कुछ समयके बाद उस धर्मको विचित्र कर्म करनेवाले चन्द्रमाके कारण महान् दुःख हुआ। बृहस्पति चन्द्रमाके भाई हैं। चन्द्रमाके मनमें बृहस्पतिकी स्त्री ताराको ग्रहण करनेकी इच्छा जग उठी। इस निन्दित कर्मसे धर्मका मन उद्विग्न हो गया। अतः वह वहाँसे चला और एक गहन वनमें पहुँचकर वहीं रहने लगा। धर्मके वनमें चले जानेपर सम्पूर्ण देवता तथा दानवोंके सैनिक धर्महीन हो गये। फिर देवता दानवोंको मारनेके लिये घूमने लगे तथा वैसे ही दानवोंका भी देवताओंके घरपर चक्कर लगाना आरम्भ हो गया। राजन् ! उस समय धर्मके न रहनेसे सभी मर्यादाएँ छिन्न-भिन्न हो गयीं। महाभाग ! चन्द्रमाके दोषसे देवता और दानव—सभी परस्पर द्वेषके भाजन बन गये। उन्होंने अनेक प्रकारके आयुधोंको हाथमें ले लिया और वे परस्पर युद्ध करने लगे। उस संग्रामका कारण केवल स्त्री थी। नारदजी बड़े विनोदी हैं। दानवोंके साथ लड़ते हुए क्रोधी देवताओंको देखकर वे तुरंत अपने पिता ब्रह्माजीके पास गये और इसकी सूचना दी। ब्रह्माजी सम्पूर्ण प्राणियोंके पितामह हैं। अतः हंसपर आरूढ़ हो युद्धस्थलमें जाकर उन्होंने सबको मना किया। फिर उन्होंने उनसे पूछा—‘इस समय तुमलोगोंका यह युद्ध किसलिये हो रहा है ?’ तब उन सबने उत्तर दिया—‘भगवन् ! यह चन्द्रमा ही सभी अनर्थोंका कारण है। यह अपनी बुद्धिसे इस लड़केको अपना बताता है। इस दूषित कर्मसे दुःखी होनेके कारण धर्म गहन वनमें जाकर निवास कर रहे हैं।’ तब ब्रह्माजीने उसी क्षण देवताओं और दानवोंको साथ लिया तथा वनकी ओर चल पड़े। वहाँ जाकर देखा कि धर्म वृषभका वेष बनाकर चार पैरोंसे विराजमान हैं। चन्द्रमाके समान सफेद उनके सींग हैं और वे इधर-उधर विचर रहे हैं। फिर ब्रह्माजीने उपस्थित देवताओंसे कहा—
ब्रह्माजी बोले— ‘देवताओ ! यह मेरा प्रथम पुत्र है। इस महामुनिको लोग धर्म कहते हैं। भाईकी भार्यासे अवैध राग करनेवाले चन्द्रमाके व्यवहारसे इसे अत्यन्त व्यथा हो रही है। अतः तुम सभी देवता और दानव अब इसे संतुष्ट करनेका प्रयत्न करो, जिसके फलस्वरूप पुनः सम्पूर्ण सुरों एवं असुरोंकी सम स्थिति हो जाय।’ राजन् ! उस समय ब्रह्माजीके वचनसे देवताओं और दानवोंको धर्मकी बातें विदित हो गयीं। उन्हें बड़ा हर्ष हुआ। अतएव सबलोग चन्द्रमाके समान स्वच्छ वर्णवाले धर्मकी स्तुति करनेमें तत्पर हो गये।
| ७८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय ३३ |
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देवताओंने कहा— जगत्की रक्षा करनेवाले महाभाग ! तुम्हारा वर्ण चन्द्रमाके समान उज्ज्वल है। तुम्हें बार-बार नमस्कार है। देवरूप धारण करनेवाले प्रभो ! तुम्हारी कृपासे स्वर्गका मार्ग दीख जाता है। तुम कर्ममार्गके स्वरूप हो तथा सब जगह विराजते हो। तुम्हें बार-बार नमस्कार है। पृथ्वीके पालक तथा तीनों लोकोंके रक्षक एकमात्र तुम्हीं हो। जनलोक, तपोलोक तथा सत्यलोक सभी तुमसे सुरक्षित रहते हैं। स्थावर एवं जङ्गम—कोई भी प्राणी ऐसा नहीं है, जो तुम्हारे बिना स्थित रह सके। तुम्हारे अभावमें तो यह जगत् तुरंत ही नष्ट हो सकता है। तुम सम्पूर्ण प्राणियोंकी आत्मा हो। सज्जन पुरुषोंके हृदयमें सत्त्वस्वरूप धारणकर तुम शोभा पाते हो। राजस पुरुषोंमें राजस और तामस पुरुषोंमें तामसरूप तुम्हारा ही है। तुम्हारे चार चरण हैं। चारों वेद तुम्हारे सींग हैं। तीन नेत्र तुम्हारी शोभा बढ़ाते हैं। हाथोंकी संख्या सात है। तुम तीन बन्धवाले हो। ऐसे वृषभरूपी प्रभो ! तुम्हें नमस्कार है।* देव ! तुम्हारी अनुपस्थितिमें हम विपथगामी एवं मूर्ख बन गये हैं। तुम हमारे परम आश्रय हो। अतः हमें सन्मार्ग बतानेकी कृपा करो।
जब इस प्रकार देवताओंने स्तुति की तो प्रजापालक धर्म, जो वृषभके रूपसे पधारे थे, संतुष्ट हो गये। उनका मन प्रसन्न हो गया। फिर तो उनके शान्तस्वरूप नेत्रने ही उन्हें सन्मार्ग बता दिया। उनकी केवल दृष्टि पड़नेसे ही वे देवता धार्मिक नेत्रसे देखने लगे। एक क्षणमें ही उनका अज्ञान नष्ट हो गया। वे सम्यक् प्रकारसे सद्धर्म-सम्पन्न हो गये। असुरोंकी स्थिति भी वैसी ही हो गयी। तब ब्रह्माजीने धर्मसे कहा—'धर्म ! आजसे तुम्हारे लिये त्रयोदशी तिथि निश्चित कर देता हूँ। जो पुरुष इस तिथिके दिन उपवास करके तुम्हारी पूजा करेगा, वह पापी होनेपर भी पापमुक्त हो जायगा। धर्म ! तुममें प्रभूत सामर्थ्य है। तुम इस अरण्यमें बहुत समयतक निवास कर चुके हो, इसलिये यह वन 'धर्मारण्य' नामसे विख्यात होगा। प्रभो ! चार, तीन, दो और एक चरणसे युक्त होकर तुम कृत, त्रेता आदि युगमें जिस प्रकार लक्षित होते हो, उसी प्रकार पृथ्वी और आकाशमें रहकर विश्वको अपना घर मानते हुए उसकी रक्षा करो।'
राजन् ! इतनी बातें कहकर लोकपितामह ब्रह्माजी देवताओं और दानवोंके देखते-देखते अन्तर्धान हो गये। देवताओंका शोक दूर हो गया। वे वृषभका वेष धारण करनेवाले धर्मके साथ अपने लोकको चले गये। जो पुरुष त्रयोदशीके दिन श्राद्ध करते समय धर्मकी उत्पत्तिका यह प्रसङ्ग पितरोंको सुनायेगा एवं भक्तिके साथ दूधसे तर्पण करेगा, वह स्वर्गमें जाकर देवताओंके साथ सुखपूर्वक निवास करनेका अधिकारी होगा।
[अध्याय ३२]
चतुर्दशी तिथिके माहात्म्यके प्रसङ्गमें रुद्रकी उत्पत्तिका वर्णन
महातपा मुनि कहते हैं— राजन् ! इसके अतिरिक्त सृष्टिके आरम्भमें रुद्रके उत्पन्न होनेकी एक कथा और है। अब वह प्रसङ्ग कहता हूँ, यत्नपूर्वक सुनो—
जब तपोरूप धर्ममय वृक्ष नष्टप्राय हो गया था, उस समय प्रचण्ड तेजस्वी ब्रह्माजी क्षमारूपी अस्त्र धारण किये प्रकट हुए। उन परम प्रतापी प्रभुके आनेका प्रयोजन था परम ज्ञान और
* 'चत्वारि शृङ्गा त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य। त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मर्त्यान् आ विवेश।' (ऋग्वेद ४।५८।३) इस वेदमन्त्रमें भी यही भाव व्यक्त हुआ है।
३५-सत्यतपाका प्राचीन प्रसङ्ग
अध्याय ३३ ] चतुर्दशी तिथिके माहात्म्यके प्रसङ्गमें रुद्रकी उत्पत्तिका वर्णन ७९
तत्त्वको जानकर प्रजाओंकी रक्षा करना। सृष्टि करनेकी इच्छावाले उन महाप्रभुने चाहा—'प्रजाएँ उत्पन्न हों और इच्छानुसार जगत्की वृद्धि हो।' किंतु इसमें प्रतिबन्ध पड़ गया। अतः क्रोधसे उनका मन क्षुब्ध हो उठा। फिर वे समाधिस्थ हो गये। अब उनके सामने एक ऐसा श्रेष्ठ पुरुष प्रकट हुआ, जिसका अन्तःकरण अत्यन्त पवित्र था। उसके रजोगुण और तमोगुण सर्वथा नष्ट हो चुके थे। उसकी कीर्ति अचल थी। उस पुरुषमें वर देनेकी पूर्ण शक्ति थी एवं अपार बल था। उसके शरीरकी कान्ति काले और लाल रंगसे सम्पन्न थी तथा नेत्र पीले रंगके थे। वह उत्पन्न होते ही रोने लगा। तब ब्रह्माजीने कहा—'त्वं मा रुद'—तुम रोओ मत। इस कारण उस पुराणपुरुषका नाम रुद्र हो गया। पुनः ब्रह्माजी बोले—'तुम एक महान् पुरुष हो ! तुममें सब कुछ करनेकी शक्ति है। तुम मेरी ऐसी सृष्टिका विस्तार करो, जिसका रूप तुम्हारे ही अनुरूप हो।'
ब्रह्माजीके इतना कहते ही वे तप करनेके विचारसे जलके भीतर चले गये। फिर उन देवेश्वर रुद्रके जलमें चले जानेपर ब्रह्माजीने दक्षप्रजापतिकी सृष्टि की। ब्रह्माजीके अन्य मानस पुत्रोंने भी प्रजाओंका सृजन किया। सृष्टि पर्याप्त रूपसे फैल गयी। फिर देवेश्वरकी अध्यक्षतामें दक्षप्रजापतिका ब्रह्मयज्ञ आरम्भ हो गया।
राजन् ! इतनेमें रुद्रदेव, जो तप करनेके लिये जलके भीतर गये थे, संसार और सुरगणकी सृष्टि करनेके विचारसे जलसे बाहर निकले। उन्होंने सुना—'यज्ञ हो रहा है और उसमें देवता, सिद्ध एवं यक्ष आये हुए हैं।' फिर तो उन्हें क्रोध हो आया। अतः सोचा और कहा—'अरे, तेजस्विनी अपनी कन्या तथा मेरा तिरस्कार करके मूर्खता-वश इसने किस प्रकार जगत्की सृष्टि कर ली ? हा, हा—इसे ऐसा नहीं करना चाहिये' यों कहते-कहते रोषसे उनका शरीर चतुर्दिक् उद्दीप्त हो उठा। साथ ही उनके मुँहसे ज्वालाएँ निकलने लगीं। वे ही अनेक भूत, पिशाच, वेताल एवं योगियोंके झुंड बनकर विचरने लगीं। जब समस्त आकाश, पृथ्वी, सारी दिशाएँ तथा लोक आदि उन भूतोंसे भर गये तो उन रुद्रने सर्वज्ञताके प्रभावसे चौबीस हाथ लम्बा एक धनुष बनाया। तेहरी बटी रस्सीसे उसकी प्रत्यञ्चा बनायी और क्रोधके कारण दो दिव्य तरकस तथा बाणोंको ले लिया और उससे उन्होंने पूषाके दाँत तोड़ डाले, भग नामक मुनिकी आँखें निकाल लीं और क्रतु देवताके अण्डकोष काटकर गिरा दिये। बाणविद्ध होकर क्रतु देवता यज्ञवाट्से (यज्ञशालासे) भाग चले। वायुने उनका मार्ग रोक दिया। यज्ञ नष्ट-भ्रष्ट हो गया। देवता यज्ञके पशु-से बन गये। तब सबने भगवान् रुद्रकी शरण ली। ब्रह्माजीने वहाँ पहुँचकर रुद्रको गलेसे लगाया। वहाँ वे देवता भी उन्हें दिखायी पड़े, जिनका रुद्रने अपकार किया था और जो भक्तिके साथ उनकी शरणमें पहुँचे थे। बातें विदित हो जानेपर देवाधिदेव ब्रह्माजी रुद्रकी ओर देखते हुए बोले—'तात! अब क्रोध करना ठीक नहीं है; क्योंकि क्रतु—यज्ञदेवता तो यहाँसे भाग गये हैं।' ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर रुद्र क्रोधसे भर गये और कहने लगे—'देवेश्वर ! आपने सर्वप्रथम मुझे बनाया है; किंतु ये लोग इस यज्ञमें मुझे भाग नहीं दे रहे हैं; इसीलिये मैंने इन्हें विकृत कर दिया तथा इनका ज्ञान हर लिया है।'
ब्रह्माजीने कहा—'देवताओ ! तुमलोग तथा समस्त असुर ज्ञान प्राप्त करनेके लिये उच्च स्वरसे स्तोत्रोंको पढ़कर इन महाभाग शम्भुकी ऐसी आराधना करो, जिसके फलस्वरूप