भारतकोश
संग्रह पर लौटें

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

१३३- मथुरा-तीर्थका प्रादुर्भाव, इसकी प्रदक्षिणाकी विधि एवं माहात्म्य

अध्याय १५२ ] मथुरातीर्थकी प्रशंसा [ २८३

देवि! इस ‘लोहार्गल’क्षेत्रमें मेरा एक पञ्चकुण्ड नामक प्रधान तीर्थ है, जहाँ हिमालयसे निकलकर जलकी पाँच धाराएँ गिरती हैं। वहाँ पाँच दिनोंतक निवास एवं स्नानकर मनुष्य ‘पञ्चशिख’ स्थानपर निवास करता है। यदि इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर वह मेरा भक्त वहाँ प्राण त्यागता है तो वह मेरे लोकको प्राप्त कर लेता है।

इसी ‘लोहार्गल’ क्षेत्रमें ‘सप्तर्षिकुण्ड’ संज्ञक एक अन्य तीर्थ है। वहाँके स्नानके पुण्यसे पुरुष ऋषियोंके लोकोंमें जाकर हर्षपूर्वक निवास करता है। देवि! वहीं ‘अग्निसर’ नामसे विख्यात एक कुण्ड है, जहाँ आठ रातोंतक रहकर तथा उस कुण्डमें स्नानकर प्राणी सभी सुखोंका उपभोगकर अङ्गिरामुनिके लोकको प्राप्त होता है, इसमें कोई संशय नहीं। यदि मुझसे सम्बन्धित कर्ममें तत्पर वह पुरुष वहाँ प्राण छोड़ता है तो अग्निके लोकका त्यागकर मेरे धामको प्राप्त होता है।

देवि! उसी ‘लोहार्गल’क्षेत्रमें ‘उमाकुण्ड’ नामसे एक प्रसिद्ध स्थान है। यह वह स्थान है, जहाँ भगवान् शंकरकी परमसुन्दरी पत्नी गौरीका प्राकट्य हुआ था। वहाँ दस रातोंतक रहकर मनुष्यको स्नान करना चाहिये। इससे उसे गौरीका दर्शन सुलभ होता है और उनके लोकमें वह सानन्द निवास करता है। यदि आयु क्षीण होनेपर वह मनुष्य उस स्थानपर प्राणका त्याग करता है तो उस लोकसे हटकर मेरे धाममें शोभा पाता है। भगवान् शंकरके साथ उमादेवीका यहीं विवाह हुआ था। इसमें हंस, कारण्डव, चक्रवाक, सारस आदि पक्षी सदा निवास करते हैं। हिमालय-पर्वतसे होकर यहाँ निर्मल जलकी तीन धाराएँ गिरती हैं। मनुष्य बारह दिनोंतक यहाँ निवास और स्नान करे तो वह रुद्रलोकमें आनन्द करता है। यदि वहाँ वह अत्यन्त कठिन कर्म करके प्राणोंको छोड़ता है तो रुद्रलोकसे पृथक् होकर मेरे स्थानकी यात्रा करता है। वहीं ‘ब्रह्मकुण्ड’ नामक स्थानमें चारों वेदोंकी उत्पत्ति हुई थी। इसीके उत्तर-पार्श्वमें सुवर्णके समान रंगवाली एक स्वच्छ जलकी धारा गिरती है, जहाँ ऋग्वेदकी ध्वनि हुई थी। यहीं पश्चिमभागमें यजुर्वेदसे युक्त धारा तथा दक्षिण-पार्श्वमें अथर्ववेदसे समन्वित धारा गिरती है। सात रातोंतक रहकर जो मनुष्य वहाँ स्नान करता है, वह ब्रह्माके लोकको प्राप्त करता है। यदि अहंकारशून्य होकर वह व्यक्ति वहाँ प्राण त्यागता है तो उस लोकका परित्याग करके मेरे लोकमें आ जाता है। महाभागे! मेरे इस ‘लोहार्गल’क्षेत्रकी कथा बड़ी ही रहस्यात्मक है। सिद्धि चाहनेवाले मनुष्यको वहाँ अवश्य जाना चाहिये। वरानने! वह क्षेत्र पचीस योजनकी दूरीमें चारों ओर फैला है और स्वयं ही प्रकट हुआ है। यह विषय आख्यानोंमें परम आख्यान, धर्मोंमें सर्वोत्कृष्ट धर्म तथा पवित्रोंमें परम पवित्र है। जो श्रद्धालु पुरुष इसका पाठ करते हैं अथवा सुनते हैं, उनके माता एवं पिता—इन दोनों कुलोंके दस-दस पूर्वपुरुषोंका संसार-सागरसे उद्धार हो जाता है।

[ अध्याय १५१ ]


मथुरातीर्थकी प्रशंसा

**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! भगवान् श्रीहरिके द्वारा ‘लोहार्गल’क्षेत्रकी महिमा सुनकर पृथ्वीको बड़ा आश्चर्य हुआ और वे बोलीं—

प्रभो! आपकी कृपासे मैंने ‘लोहार्गल’क्षेत्रका माहात्म्य सुना। यदि इससे भी श्रेष्ठ तीर्थोंमें सर्वोत्तम एवं सबके लिये कल्याणकारी कोई तीर्थ हो तो उसे बतानेकी कृपा कीजिये।

**भगवान् वराह कहते हैं—**वसुंधरे! मथुराके समान मेरे लिये दूसरा कोई भी तीर्थ आकाश, पाताल एवं मर्त्य—इन तीनों लोकोंमें कहीं प्रिय

२८४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १५२

प्रतीत नहीं होता। इसी पुरीमें मेरा श्रीकृष्णावतार हुआ, अतः यह पुष्कर, प्रयाग, उज्जैन, काशी एवं नैमिषारण्यसे भी बढ़कर है। यहाँ विधिपूर्वक निवास करनेवाला मानव निःसंदेह आवागमनसे मुक्त हो जाता है। माघमासके उत्तम पर्वपर प्रयागमें निवास करनेसे मनुष्यको जो पुण्य-फल प्राप्त होता है, वह मथुरामें एक दिन रहनेपर ही मिल जाता है। इसी प्रकार वाराणसीमें हजार वर्षोंतक निवास करनेसे जिस फलकी प्राप्ति होती है, वह मथुरामें एक क्षण निवास करनेपर सुलभ हो जाता है। वसुंधरे! कार्तिक मासमें पुष्करक्षेत्रके निवासका जो सुविख्यात पुण्य (फल) है, वही पुण्य मथुरामें निवास करनेवाले जितेन्द्रिय पुरुषको सहज प्राप्त हो जाता है। यदि कोई 'मथुरामण्डल' का नाम भी उच्चारण करता है और उसे दूसरा कोई सुन लेता है तो सुननेवाला भी सब पापोंसे छूट जाता है। भूमण्डलपर समुद्रपर्यन्त जितने तीर्थ एवं सरोवर हैं, वे सभी मथुराके अन्तर्गत स्थित हैं, क्योंकि साक्षात् भगवान् श्रीहरि ही गुप्तरूपसे वहाँ निरन्तर निवास करते हैं। कुब्जाम्रक, सौकरव और मथुरा —ये परम विशिष्ट तीर्थ हैं, जहाँ योग-तपकी साधना न रहनेपर भी इन स्थानोंके निवासी सिद्धि पा जाते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है।

देवि! द्वापरयुग आनेपर मैं वहाँ राजा ययातिके वंशमें अवतार ग्रहण करूँगा और मेरी क्षत्रिय जाति होगी। उस समय मैं चार मूर्ति—कृष्ण, बलराम, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध बनकर चतुर्व्यूहके रूपमें सौ वर्षोंतक वहाँ निवास करूँगा। मेरे ये चारों विग्रह क्रमशः चन्दन, सुवर्ण, अशोक एवं कमलके सदृश रूपवाले होंगे। उस समय धर्मसे द्वेष करनेवाले कंस आदि महान् भयंकर बत्तीस दैत्य उत्पन्न होंगे, जिनका मैं संहार करूँगा, वहाँ सूर्यकी पुत्री यमुनाका सुन्दर प्रवाह सदा संनिकट शोभा पाता है। मथुरामें मेरे और बहुत-से गुप्त तीर्थ हैं। देवि! उन तीर्थोंमें स्नान करनेपर मनुष्य मेरे लोकमें प्रतिष्ठित होता है और वहाँ मरनेपर वह चार भुजाओंसे युक्त होकर मेरा स्वरूप बन जाता है।

देवि! मथुरामण्डलमें 'विश्रान्ति' नामका एक तीर्थ है, जो तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। वहाँ स्नान करनेवाला मानव मेरे लोकमें रहनेका स्थान पाता है और वहाँ मेरी प्रतिमाका दर्शनकर सम्पूर्ण तीर्थोंके अवगाहनका फल प्राप्त करता है। जो दो बार उसकी प्रदक्षिणा कर लेता है, वह विष्णुलोकका भागी होता है। इसी प्रकार एक कनखल नामक अत्यन्त गुह्य स्थान है, जहाँ केवल स्नान करनेसे ही मनुष्य स्वर्ग-सुखका अधिकारी हो जाता है। ऐसे ही 'विन्दुक' नामसे विख्यात मेरा एक परम गोप्य क्षेत्र है। देवि! उस क्षेत्रमें स्नान करनेवाला व्यक्ति मेरे लोकमें प्रतिष्ठा पाता है।

वसुंधरे! अब उस तीर्थमें घटित एक प्राचीन इतिहास सुनो। पाञ्चालदेशमें प्रसिद्ध काम्पिल्य* नगरमें राजा ब्रह्मदत्त रहते थे। वहीं तिन्दुक नामक एक नाई रहता था। बहुत दिनोंतक यहाँ निवास करनेके बाद उसका पूरा परिवार क्षीण हो गया और वह पीड़ित होकर वहाँसे मथुरा चला आया और एक ब्राह्मणके घर रहने लगा। वहाँ वह ब्राह्मणके सैकड़ों कार्य करते हुए प्रतिदिन यमुना-स्नान भी करता। इस प्रकार दीर्घकाल व्यतीत होनेपर उसकी इसी तीर्थमें मृत्यु हुई, जिससे दूसरे जन्ममें वह जातिस्मर ब्राह्मण हुआ।

इसी मथुरामें एक 'सूर्यतीर्थ' है, जो सब पापोंसे मुक्त करनेवाला है, जहाँ विरोचनपुत्र


* फर्रूखाबाद जिलेका 'कम्पिल' नगर।

अध्याय १५३—१५५ ] मथुरा, यमुना और अक्रूरतीर्थोंके माहात्म्य २८५

बलिने पहले सूर्यदेवकी उपासना की थी। उसकी उपासनासे प्रसन्न होकर भगवान् सूर्यदेवने तपका कारण पूछा। इसपर बलिने कहा—‘देवेश्वर! पातालमें मेरा निवास है। इस समय मैं राज्यसे वञ्चित हो गया हूँ एवं धनहीन हूँ।’ इसपर भगवान् सूर्यने बलिको अपने मुकुटसे चिन्तामणि निकालकर दिया, जिसे लेकर बलि पाताललोक चले गये। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्यके समस्त पाप समाप्त हो जाते हैं और वहाँ मरनेपर उस प्राणीको मेरे लोककी प्राप्ति होती है। देवि! प्रत्येक रविवारके दिन, संक्रान्तिके अवसरपर अथवा सूर्य एवं चन्द्रग्रहणमें उस तीर्थमें स्नान करनेसे राजसूय-यज्ञके समान फल मिलता है। ध्रुवने भी यहीं स्नानादिपूर्वक कठोर तपस्या की थी, जिससे वह आज भी ‘ध्रुवलोक’ में प्रतिष्ठा पाता है। वसुंधे! जो पुरुष इस ‘ध्रुवतीर्थ’ में श्रद्धा रखता है, उसके सभी पितर तर जाते हैं। ‘ध्रुवतीर्थ’ के दक्षिणभागमें तीर्थराजका स्थान है। देवि! वहाँ अवगाहन कर मानव मेरा धाम प्राप्त करता है। देवि! मथुरामें ‘कोटितीर्थ’ नामक एक स्थान है, जिसका दर्शन देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। वहाँ स्नान एवं दान करनेसे मेरे धाममें प्रतिष्ठा मिलती है। उस ‘कोटितीर्थ’ में स्नान करके पितरों एवं देवताओंका तर्पण करना चाहिये। इससे पितामह आदि सभी पितर तर जाते हैं। उस तीर्थमें स्नान करनेवाला मनुष्य ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा पाता है। यहीं पितरोंके लिये भी दुर्लभ एक ‘वायुतीर्थ’ है, जहाँ पिण्डदान करनेसे पुरुष पितृलोकमें जाता है। देवि! गयामें पिण्डदान करनेसे मनुष्यको जो फल मिलता है, वही फल यहाँ ज्येष्ठमें पिण्ड देनेसे प्राप्त हो जाता है—इसमें कोई संशय नहीं। इन बारह तीर्थोंका केवल स्मरण करनेसे भी पाप दूर हो जाते हैं और मनुष्यकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। [ अध्याय १५२ ]


मथुरा, यमुना और अक्रूरतीर्थोंके माहात्म्य

**भगवान् वराह कहते हैं—**वसुंधरे! ‘शिवकुण्ड’—के उत्तर ‘नवक’नामक एक पवित्र क्षेत्र है, जहाँ स्नान करनेमात्रसे ही प्राणीको सौभाग्य सुलभ हो जाता है और पापी पुरुष भी मेरे धाममें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।

अब इस तीर्थकी एक पुरानी घटना सुनो। पहले नैमिषारण्यमें एक दुष्ट निषाद रहता था। एक बार वह किसी मासकी चतुर्दशीको मथुरा आया और उसके मनमें यमुनामें तैरनेकी इच्छा उत्पन्न हुई। यद्यपि वह यमुनामें तैरता हुआ ‘संयमन’ तीर्थतक पहुँच गया, फिर भी दैवयोगसे वह उससे बाहर न निकल पाया और वहीं उसका प्राणान्त भी हो गया। दूसरे जन्ममें वही (निषाद) क्षत्रियवंशमें उत्पन्न होकर सम्पूर्ण भूमण्डलका स्वामी बना, जिसकी राजधानी सौराष्ट्रमें थी और कालान्तरमें वही ‘यक्ष्मधनु’ नामसे प्रख्यात हुआ। वह अपने धर्म (क्षात्रधर्म तथा राजधर्म)-का भलीभाँति पालन करता तथा अपने राज्यकी रक्षा और प्रजाका रञ्जन करनेमें समर्थ और सफल था। उसका विवाह काशिराजकी सुन्दरी कन्या पीवरीसे हुआ। यक्ष्मधनुकी और भी रानियाँ थीं, किंतु सभी रानियोंमें पीवरी ही उसे सबसे अधिक प्रिय थी। वह उसके साथ भवनों, उद्यानों, उपवनों और नदी-तटोंपर विहार करता हुआ राज्यसुखका उपभोग करने लगा। कालान्तरमें उसके सात पुत्र और पाँच पुत्रियाँ उत्पन्न हुईं। इस प्रकार यक्ष्मधनुके सतहत्तर वर्ष बीत गये। एक समय जब वह शयन कर रहा था तो अचानक उसे मथुराके संयमन-तीर्थकी स्मृति हो आयी और उसके मुँहसे ‘हा! हा!’ शब्द निकलने लगा। इसपर पासमें सोयी उसकी पटरानी

२८६ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १५३-१५५

पीवरीने कहा—'राजन्! आप यह क्या कह रहे हैं?' राजाने उत्तर दिया—'प्रिये! जो किसी मादक वस्तु आदिके सेवनसे बेसुध रहता है, नींदमें रहता है अथवा जिसका चित्त विक्षिप्त रहता है, उसके मुखसे असम्बद्ध शब्दोंका निकल जाना स्वाभाविक है। मैं नींदमें था, इसीसे ये शब्द निकल गये। अतः इस विषयमें तुम्हें नहीं पूछना चाहिये।' फिर रानीके बार-बार आग्रह करनेपर यक्ष्मधनुने कहा—'शुभानने! यदि मेरी बात तुम्हें सुननी आवश्यक जान पड़ती है तो हम दोनों मथुरापुरी चलें। वहीं मैं तुम्हें यह बात बताऊँगा। ग्राम, रत्न, खजाना और जनताकी सँभालके लिये पुत्रको राज्यपर अभिषिक्त कर देना चाहिये। देवि! विद्याके समान कोई आँख नहीं है, धर्मके समान कोई बल नहीं है, रागके समान कोई दुःख नहीं है और त्यागसे बढ़कर दूसरा कोई सुख नहीं है। संसारका संग्रह करनेवालेकी अपेक्षा त्यागी पुरुष सदैव श्रेष्ठ माना गया है।'

वसुंधरे! राजा यक्ष्मधनुने इस प्रकार अपनी पत्नी पीवरीसे सलाहकर अपने ज्येष्ठ पुत्रका राज्याभिषेक किया और उसके साथ श्रेष्ठ पुरुषों (मन्त्री आदि)-के रहनेकी व्यवस्था कर दी। फिर पुरवासी जनतासे विदा ले हाथी, घोड़ा, कोष और कुछ पैदल चलनेवाले पुरुषोंको साथ लेकर वे दोनों मथुराके लिये चल पड़े और बहुत दिनोंके बाद वे मथुरा पहुँचे। मथुरापुरी उस समय देवताओंकी पुरी 'अमरावती'-जैसी प्रतीत हो रही थी। बारह तीर्थोंसे सम्पन्न उस पुण्यमयी पुरीने मानो पापोंको नष्ट करनेके लिये अपनेको मनोहर बना लिया हो।

वसुंधरे! जब राजा यक्ष्मधनु और पीवरीने मथुरापुरीका दर्शन किया तो उनका हृदय प्रसन्न हो गया। फिर उस रानीने उस रहस्यको पूछा, जिसके लिये वे मथुरा आये थे। इसपर यक्ष्मधनुने कहा—'पहले तुम अपनी रहस्यपूर्ण बात बताओ, तब मैं बताऊँगा।'

पीवरी बोली—पहले मेरा निवास गङ्गाके तटपर था, किंतु वहाँ भी मेरा नाम 'पीवरी' ही था। एक बार मैं कार्तिक द्वादशीके दिन इस मथुरापुरीके दर्शनके लिये यहाँ आयी। उसी समय नावद्वारा यमुनाको पार करते समय मैं अचानक 'धारापतन' तीर्थके गहरे जलमें गिर गयी, जिससे मेरे प्राण निकल गये। इसी तीर्थके प्रभावसे मेरा काशी-नरेशके यहाँ जन्म तथा फिर आपसे विवाह हुआ।

वसुंधरे! इसके बाद राजा यक्ष्मधनुने जिस प्रकार संयमन-तीर्थमें उसकी मृत्यु हुई थी, वह सब कथा पीवरीसे सुनायी। अब वे दोनों मथुरामें ही रहने लगे और यमुनामें स्नान करनेका नियम बना लिये। प्रतिदिन नियमसे वे मेरा दर्शन करते। कालान्तरमें वहीं शरीर त्यागकर सभी बन्धनोंसे मुक्त होकर वे मेरे लोकको प्राप्त हुए।

देवि! उसी मथुरामें 'मधुवन' नामक एक अत्यन्त सुन्दर स्थान है और यहीं एक 'कुन्दवन'के नामसे मेरा प्रसिद्ध स्थान है, जहाँ जानेपर ही व्यक्ति सफल-मनोरथ हो जाता है। यहीं वनोंमें प्रधान एक 'काम्यकवन' है, जहाँ स्नान करनेसे मनुष्य मेरे धामको प्राप्त होता है। यहींके 'विमलकुण्ड' तीर्थमें स्नान करनेसे प्राणीके सम्पूर्ण पाप धुल जाते हैं और जो वहीं प्राणोंका परित्याग करता है, वह मेरे लोकमें प्रतिष्ठा पाता है। पाँचवें वनको 'वकुलवन' कहते हैं। वहाँ स्नान कर मनुष्य 'अग्निलोक' को प्राप्त करता है। यमुनाके उस पार 'भद्रवन' नामका छठा वन है। मेरी भक्तिमें परायण रहनेवाले पुरुष ही वहाँ जा पाते हैं और उन्हें नागलोककी प्राप्ति होती है।

१३४- देववन और 'चक्रतीर्थ' का प्रभाव

अध्याय १५३-१५५ ] मथुरा, यमुना और अक्रूरतीर्थोंके माहात्म्य २८७

'खदिर वन' सातवाँ है और आठवाँ 'महावन'। नवें वनका नाम 'लौहजङ्घवन' है, क्योंकि लौहजङ्घ ही इसकी रक्षा करता था। दसवें वनका नाम 'बिल्ववन' है। वहाँ जाकर प्राणी ब्रह्माजीके लोकमें प्रतिष्ठा पाता है। 'भाण्डीर' वन ग्यारहवाँ है, जिसके दर्शनमात्रसे मनुष्य माताके गर्भमें नहीं आता। बारहवाँ वन 'वृन्दावन' है, जहाँकी अधिष्ठात्री वृन्दादेवी हैं। देवि! समस्त पापोंका संहार करनेवाला यह स्थान मुझे बहुत प्रिय है। वसुंधरे! वृन्दावन जाकर जो गोविन्दका दर्शन करते हैं, उन्हें यमपुरीमें कदापि नहीं जाना पड़ता। उनको पुण्यात्मा पुरुषोंकी गति सहज सुलभ हो जाती है।

यमुनेश्वर-तीर्थके 'धारापतन' में स्नान करनेपर मनुष्य स्वर्गका आनन्द पाता है और यहाँ प्राण त्यागनेवाला मेरे धामको जाता है। इसके आगे नागतीर्थ एवं 'घण्टाभरणतीर्थ' है, जिसमें स्नानकर मनुष्य सूर्यलोकमें जाता है। वसुधे! यहाँ 'सोमतीर्थ' का वह पवित्र स्थान है, जहाँ द्वापरमें चन्द्रमा मेरा दर्शन करते हैं। इसमें अभिषेककर मनुष्य चन्द्रलोकमें निवास करता है। यहीं जहाँ सरस्वती नदी ऊपरसे उतरी है, वह पवित्र स्थान सम्पूर्ण पापोंको हरनेवाला है।

मथुराके पश्चिममें ऋषिगण निरन्तर मेरी पूजा करते हैं। प्राचीन कालमें सृष्टिके अवसरपर ब्रह्माद्वारा मनसे निर्मित होनेके कारण इसका नाम 'मानसतीर्थ' पड़ गया है। यहाँ जो स्नान करते हैं, उन्हें स्वर्ग मिलता है। यहीं भगवान् श्रीगणेशका एक पुण्यमय तीर्थ है, जिसके प्रभावसे पाप दूरसे ही भाग जाते हैं। यहाँ चतुर्थी, अष्टमी और चतुर्दशीके दिन स्नान करनेसे मनुष्योंके सामने श्रीगणेशजीके प्रभावसे दुःख पासमें नहीं फटकते। विद्या आरम्भ की जाय अथवा यज्ञ एवं दान आदिकी क्रियाएँ सम्पन्न करनी हों तो सभी समयोंमें गौरीनन्दन गणेशजी धर्मकर्ता पुरुषके कार्यको सदा निर्विघ्न पूर्ण कर देते हैं। यहीं आधा कोसके परिमाणवाला परम दुष्कर 'शिवक्षेत्र' है, जहाँ रहकर भगवान् शंकर इस मथुरापुरीकी निरन्तर रक्षा करते हैं। उसके जलमें स्नान और उस जलका पान कर मनुष्य मथुरावासका फल प्राप्त करता है।

भगवान् वराह कहते हैं— देवि! अब मैं एक दूसरे दुर्लभ 'अक्रूर 'तीर्थका वर्णन करता हूँ। अयन* विषुव† तथा विष्णुपदीके‡ शुभ अवसरपर मैं श्रीकृष्णरूपमें वहाँ स्थित रहता हूँ। यहाँ सूर्यग्रहणके समय स्नान करनेसे मनुष्य 'राजसूय' एवं 'अश्वमेध' यज्ञोंका फल प्राप्त करता है। अब इस तीर्थके एक बहुत पुराने इतिहासको सुनो। पहले यहाँ सुधन नामका एक धनी एवं भक्त वैश्य रहता था। वह स्त्री-पुत्र और अपने बन्धुओंके साथ सदा मेरी उपासनामें लगा रहता तथा गन्ध, पुष्प, धूप तथा दीप अर्पण करके नित्य नियमानुसार मुझ श्रीहरिकी पूजा करता था। वह प्रायः एकादशीको इसी अक्रूरतीर्थमें आकर मेरे सामने नृत्य करता।

एक बार वह रात्रिजागरण, नृत्य तथा कीर्तन आदि करनेके उद्देश्यसे मेरे पास आ रहा था कि किसी भयंकर ब्रह्मराक्षसने उसके पैर पकड़ लिये। उसकी आकृति बड़ी डरावनी थी तथा बाल ऊपरको उठे हुए थे। उसने सुधनसे कहा—


* सूर्यके कर्कराशिमें आनेपर दक्षिणायन एवं मकर-राशिमें आनेपर उत्तरायण होता है। सूर्यकी इस षाण्मासिक गति एवं स्थितिको 'अयन' कहते हैं।
† जिस समय दिन और रातका मान बराबर होता है—उसका नाम 'विषुव' है। यह स्थिति प्रायः २१ मार्च और २३ सितम्बरको होती है।
‡ वृष, सिंह, वृश्चिक और कुम्भ राशियोंकी सूर्य-संक्रान्तियोंका नाम 'विष्णुपदी' है।

२८८संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १५३-१५५

‘वैश्य ! आज मैं तुम्हें खाकर तृप्ति प्राप्त करूँगा।’ इसपर सुधन बोला—‘राक्षस ! बस, तुम थोड़ी देर प्रतीक्षा करो, मैं तुम्हें पर्याप्त भोजन दूँगा और बादमें तुम मेरे इस शरीरको भी भक्षण कर लेना। पर इस समय मैं देवेश्वर श्रीहरिके सामने नृत्य एवं रात्रि-जागरण करनेके लिये जा रहा हूँ। मैं अपना यह व्रत पूरा कर प्रातः सूर्यके उदय होते ही तुम्हारे पास वापस आ जाऊँगा तब तुम मेरे इस शरीरको अवश्य खा लेना। भगवान् नारायणकी प्रसन्नताके लिये किये जानेवाले मेरे इस व्रतको भङ्ग करना तुम्हारे लिये उचित नहीं है।’ इसपर ब्रह्मराक्षस आदरपूर्वक मधुर वाणीसे बोला—‘साधो ! तुम यह असत्य बात क्यों कह रहे हो? भला, ऐसा कौन मूर्ख होगा, जो राक्षसके मुखसे छूटकर पुनः स्वेच्छासे उसके पास लौट आये।’

इसपर वैश्यवर बोला—‘सम्पूर्ण संसारकी जड़ सत्य है। सत्यपर ही अखिल जगत् प्रतिष्ठित है। वेदके पारगामी ऋषिलोग सत्यके बलपर ही सिद्धि प्राप्त करते हैं। यद्यपि पूर्वजन्मके कर्मवश मेरी उत्पत्ति धनी वैश्यकुलमें हुई है, फिर भी मैं निर्दोष हूँ। ब्रह्मराक्षस ! मैं प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि वहाँ जागरण और नृत्य करके सुखपूर्वक मैं अवश्य लौट आऊँगा। सत्यसे ही कन्याका दान होता है और ब्राह्मण सदा सत्य बोलते हैं। सत्यसे ही राजाओंका राज्य चलता है। सत्यसे ही पृथ्वी सुरक्षित है। सत्यसे ही स्वर्ग सुलभ होता है और सत्यसे ही मोक्ष मिलता है। अतः यदि मैं तुम्हारे सामने न आऊँ तो पृथ्वीका दान करके पुनः उसका उपभोग करनेसे जो पाप होता है, मैं उसका भागी बनूँ। अथवा क्रोध या द्वेषवश जो पत्नीका त्याग करता है, वह पाप मुझे लगे। यदि मैं पुनः तुम्हारे पास न आऊँ तो एक साथ बैठकर भोजन करनेवाले व्यक्तियोंमें जो पङ्क्तिभेदका पाप करता है, मुझे वह पाप लगे। अथवा यदि मैं फिर तुम्हारे पास पुनः न आऊँ तो एक बार कन्यादान करके फिर दूसरेको दान करने अथवा ब्राह्मणकी हत्या करने, मदिरा पीने, चोरी करने या व्रत भङ्ग करनेपर जो बुरी गति मिलती है, वह गति मुझे प्राप्त हो।

भगवान् वराह कहते हैं—देवि ! सुधनकी बात सुनकर वह ब्रह्मराक्षस संतुष्ट हो गया। उसने कहा—‘भाई ! तुम वन्दनीय हो और अब जा सकते हो।’ इसपर वह कलामर्मज्ञ वैश्य मेरे सामने आकर नृत्यगान करने लगा और प्रातःकालतक नृत्य करता रहा। दूसरे दिन उसने प्रातःकाल ‘ॐ नमो नारायणाय’ का उच्चारण कर यमुनामें गोता लगाया और मथुरा पहुँचकर मेरे दिव्य रूपका दर्शन किया। देवि ! उसी समय मैं एक दूसरा रूप धारणकर उसके सामने प्रकट हुआ और उससे मैंने पूछा—‘आप ! इतनी शीघ्रतासे कहाँ जा रहे हैं?’ इसपर सुधनने कहा—‘मैं अपनी प्रतिज्ञानुसार ब्रह्मराक्षसके पास जा रहा हूँ।’ उस समय मैंने उसे मना किया और कहा—‘अनघ ! तुम्हें वहाँ नहीं जाना चाहिये। जीवन रहनेपर ही धर्मानुष्ठान सम्भव है। इसपर उस वैश्यने उत्तर दिया—‘महाभाग ! मैं ब्रह्मराक्षसके पास अवश्य जाऊँगा, जिससे मेरी (सत्यकी) प्रतिज्ञा सुरक्षित हो। जगत्प्रभु भगवान् विष्णुके निमित्त जागरण और नृत्य करनेका मेरा व्रत था। वह नियम सुखपूर्वक सम्पन्न हो गया।’ इस प्रकार कहकर वह वहाँसे चला गया और ब्रह्मराक्षससे कहा—‘राक्षस ! तुम अब इच्छानुसार मेरे इस शरीरको खा जाओ।’

इसपर ब्रह्मराक्षसने कहा—‘वैश्यवर ! तुम वस्तुतः सत्य एवं धर्मका पालन करनेवाले साधु पुरुष हो, तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुम्हारे व्यवहारसे संतुष्ट हूँ। महाभाग ! अब तुम अपने नृत्य एवं जागरणके पूरे पुण्यको मुझे देनेकी कृपा करो। तुम्हारे प्रभावसे मेरा भी उद्धार हो जायगा।’

१३५- 'कपिल-वराह' का माहात्म्य

अध्याय १५६-१५७] मथुरामण्डलके 'वृन्दावन' आदि तीर्थ और उनमें स्नान-दानादिका महत्त्व २८९

‘राक्षस! मैं तुम्हें अपने रात्रिजागरण एवं नृत्यका पुण्य नहीं दे सकता। आधी रात, एक प्रहर तथा आधे प्रहरके भी जागरणका पुण्य मैं तुम्हें नहीं दे सकता'—वैश्यने कहा।

'तब बस एक नृत्यका ही पुण्य मुझे देनेकी दया करो।'—राक्षस बोला।

'मैं तुम्हें पुण्य तो यह भी नहीं दे सकता। पर जो बात कह चुका हूँ, उसके लिये आ गया हूँ। साथ ही मैं यह भी जानना चाहता हूँ कि तुम किस कर्मके दोषसे ब्रह्मराक्षस हुए? यदि यह बहुत गोप्य न हो तो मुझे बता दो।'—वैश्यने कहा।

अब ब्रह्मराक्षसके मुखपर हँसी छा गयी। उसने कहा—'वैश्यवर! तुम ऐसी बात क्यों कहते हो। मैं तो तुम्हारे पासका ही रहनेवाला हूँ। मेरा नाम 'अग्निदत्त' है। मैं पूर्वजन्ममें वेदाभ्यासी ब्राह्मण था। किंतु चौर्यदोषसे मुझे ब्रह्मराक्षस होना पड़ा। दैवयोगसे तुमसे भेंट हो गयी है। अब तुम मेरा उपकार करनेकी कृपा करो। वैश्यवर! तुम यदि एक ही 'नृत्य एवं गान' का पुण्य मुझे दे दो तो मेरा उद्धार हो जाय।' वैश्यने कहा—'राक्षस! मैंने एक नृत्यके पुण्यका फल तुम्हें दे दिया।' फिर तो उस एक नृत्यके पुण्यके प्रतापसे उसका तत्काल उद्धार हो गया और ब्रह्मराक्षसकी योनिसे सदाके लिये मुक्ति मिल गयी।

भगवान् वराह कहते हैं—देवि! उसी समय वहाँ ब्रह्मराक्षसकी जगह शङ्ख, चक्र, गदा एवं पद्म धारण किये मैं (भगवान् श्रीहरि) प्रकट हो गया। उस समय मेरे (श्रीविष्णुरूपके अपने) श्रीविग्रहकी आभा परम दिव्य थी। भक्तोंकी याचना पूर्ण करनेवाले (श्रीविष्णुरूपमें) मैंने उस वैश्यसे मधुर वाणीमें कहा—'तुम अब सपरिवार उत्तम विमानपर चढ़कर मेरे दिव्य विष्णुलोकको जाओ।'

वसुंधरे! इस प्रकार कहकर मैं (भगवान् श्रीहरि) वहीं अन्तर्धान हो गया और सुधन भी अपने परिवारके सहित दिव्य विमानद्वारा सशरीर विष्णुलोकमें चला गया। देवि! 'अक्रूर-तीर्थ' की यह महिमा मैंने तुम्हें बतला दी। उस कार्तिकमासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिको जो तीर्थमें स्नान करता है, उसे 'राजसूययज्ञ' का फल प्राप्त होता है और वहाँ श्राद्ध तथा वृषोत्सर्ग करनेवाला पुरुष अपने कुलके सभी पितरोंको तार देता है। [अध्याय १५३-१५५]


मथुरामण्डलके 'वृन्दावन' आदि तीर्थ और उनमें स्नान-दानादिका महत्त्व

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! अब मैं मथुरामण्डलके 'वत्स-क्रीडन' नामक तीर्थका वर्णन करता हूँ। यहाँ लाल रंगकी बहुत-सी शिलाएँ हैं। यहाँ स्नान करनेमात्रसे मनुष्य वायु-देवके लोकको प्राप्त होता है। यहीं दूसरा एक 'भाण्डीर' वन भी है, जिसकी साखू, ताल-तमाल, अर्जुन, इङ्गुदी, पीलुक, करील तथा लाल फूलवाले अनेक वृक्ष शोभा बढ़ाते हैं। यहाँ स्नान करनेसे मनुष्यके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं और वह इन्द्रके लोकको प्राप्त होता है। वल्लरियों तथा लताओंसे आच्छादित यहाँका रमणीय वृन्दावन देवता, दानवों और सिद्धोंके लिये भी दुर्लभ है। गायों और गोपालोंके साथ मैं यहाँ (कृष्णावतारमें) क्रीडा करता हूँ। यहाँ एक रात निवास तथा कालिन्दीमें अवगाहनकर मनुष्य गन्धर्वलोकको प्राप्त होता है और वहाँ प्राणोंका त्याग कर मनुष्य मेरे धामको प्राप्त होता है।

वसुंधरे! यहाँ एक दूसरा तीर्थ 'केशिसथल' है। 'वृन्दावन' के इसी स्थानपर मैंने केशीदैत्यका

२९०संक्षिप्त श्रीवराहपुराण[ अध्याय १५६-१५७

वध किया था। उस ‘केशीतीर्थ’ में पिण्डदान करनेसे गयामें पिण्ड देनेके समान ही फल मिलता है। यहाँ स्नान-दान और हवन करनेसे ‘अग्निष्टोम’-यज्ञका फल मिलता है। यहाँ द्वादशादित्यतीर्थपर यमुना लहराती है, जहाँ कालियनाग आनन्दपूर्वक निवास करता था। यहीं (कालियह्रदमें) मैंने उसका दमन और द्वादश आदित्योंकी स्थापना की थी। इस तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है और जो व्यक्ति यहाँ प्राणोंका परित्याग करता है, वह मेरे धाममें आ जाता है। इस स्थानका नाम ‘हरिदेव’ क्षेत्र और ‘कालियह्रद’ है। इस ‘हरिदेव’ क्षेत्रके उत्तर और ‘कालियह्रद’ के दक्षिण भागमें जिनका पाञ्चभौतिक शरीर छूटता है, उनका संसारमें पुनरावर्तन नहीं होता*।

भगवान् वराह कहते हैं— देवि! यमुनाके उस पार ‘यमळार्जुन’ नामक तीर्थ है, जहाँ शकट (भाण्डोंसे भरी हुई गाड़ी)-भग्न और भाण्ड छिन्न-भिन्न हुए थे। वहाँ स्नान और उपवास करनेका फल अनन्त है। वसुंधरे! ज्येष्ठमासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिके दिन उस तीर्थमें स्नान और दान करनेसे महान् पातकी मनुष्यको भी परम गति प्राप्त होती है। इन्द्रियनिग्रही मनुष्य यमुनाके जलमें स्नान करनेपर पवित्र हो जाता है और सम्यक् प्रकारसे श्रीहरिकी अर्चना करके वह परम गति प्राप्त कर सकता है। देवि! स्वर्गमें गये हुए पितृगण यह गाते हैं—‘हमारे कुलमें उत्पन्न जो पुरुष मथुरामें निवास करके कालिन्दीमें स्नान करेगा और भगवान् गोविन्दकी पूजा करेगा तथा ज्येष्ठमासके शुक्ल पक्षकी द्वादशी तिथिके अवसरपर यमुनाके किनारे पिण्डदान करेगा, वह परम कल्याणका भाजन होगा।’

देवि! मथुरातीर्थ महान् है। अनेक नामोंवाले बहुत-से वन उसकी शोभा बढ़ाते हैं। वहाँ स्नान करनेवाला मनुष्य भगवान् रुद्रके लोकमें प्रतिष्ठा पाता है। चैत्रमासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिके पुण्य अवसरपर यहाँ अवगाहन करनेवाला मानव मेरे लोकमें निश्चय ही चला जाता है। यमुनाके दूसरे पारमें ‘भाण्डह्रद’ नामसे विख्यात एक दुर्लभ तीर्थ है। विश्वके अलौकिक कार्यको सम्पन्न करनेवाले आदित्यगण वहाँ प्रतिदिन दृष्टिगोचर होते हैं। वहाँ जो मनुष्य स्नान करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर सूर्यलोकको प्राप्त होता है। वहीं स्वच्छ जलसे भरा ‘सप्तसामुद्रिक’ नामक एक कूप है। वसुधे! वहाँ स्नान करनेसे मानव सभी लोकोंमें स्वच्छन्दताके साथ विचरण कर सकता है। यहीं वीरस्थल नामसे प्रसिद्ध मेरा एक और परम गुह्य क्षेत्र है, जहाँ खिले हुए कमल जलकी निरन्तर शोभा बढ़ाते हैं। सुमध्यमे! जो मनुष्य एक रात यहाँ निवास करके स्नान करता है, वह मेरी कृपासे वीरलोकमें आदर पाता है।

इसी मथुरामण्डलमें ‘गोपीश्वर’ नामसे विख्यात एक तीर्थ है, जहाँ हजारों गोपियाँ सुन्दर रूप धारण करके भगवान् श्रीकृष्णको आनन्दित करनेके लिये पधारी थीं और मैंने (श्रीकृष्णरूपमें) उनके साथ रासलीला की थी एवं बाल्यकालमें यमलार्जुन नामक दो वृक्षोंको भी तोड़ा था। यहीं इन्द्रने एक कूपके पास रत्न और ओषधियोंसे सम्पन्न


* ग्रीक-ग्रन्थोंमें 'वृन्दावन' का नाम भी Kliso boras या 'कालिकावर्त' अर्थात् कालियनागका स्थान है। १८वीं शतीमें काशीके राजा चेतसिंहने दोनों नगरोंके पूरे दूधसे यहाँ अर्चना की थी। (Cunningham's Anc. Geog. P. 316) वृन्दावनके विशेष वर्णनके लिये 'भागवत', 'कल्याण', 'तीर्थाङ्क', पद्म० पाताल खण्ड ७० से ८२ तथा रघुवंश ६।५० आदि देखना चाहिये। 'दे' के अनुसार आजका वृन्दावन चैतन्य महाप्रभुके अनुयायी गोस्वामी बन्धुओंकी खोज है, प्राचीन वृन्दावन मथुरासे कुछ अधिक दूर होना चाहिये।

अध्याय १५८-१६० ] मथुरा-तीर्थका प्रादुर्भाव, इसकी प्रदक्षिणाकी विधि एवं माहात्म्य २९१

जलपूर्ण कलशोंसे गोप-वेषधारी भगवान् श्रीकृष्णका अभिषेक किया था। तभीसे उस कूपका नाम ‘सप्तसामुद्रिक’ कूप पड़ गया। जो पुरुष इस ‘सप्तसामुद्रिक’ कूपपर जाकर पितरोंके लिये श्राद्ध करता है, वह अपने कुलकी सतहत्तर पीढ़ियोंको तार देता है। सोमवती अमावास्याके दिन जो वहाँ पिण्डदान करता है, उसके पितर करोड़ वर्षके लिये तृप्त हो जाते हैं।

वसुंधरे ! यहाँ ‘वसुपत्र’ नामसे विख्यात एक तीर्थ है, जो मेरा परम पवित्र एवं उत्तम स्थान है। मथुराके दक्षिणभागमें ‘फाल्गुनक’ और लगभग आधे योजनकी दूरीपर पश्चिमकी ओर धेनुकासुरका ‘तालवन’ नामका प्रसिद्ध स्थान है। विशालाक्षि ! यहाँ ‘संपीठककुण्ड’ नामका भी मेरा एक श्रेष्ठ तीर्थ है, जिसमें सदा पवित्र एवं स्वच्छ जल भरा रहता है। जो लोग एक रात यहाँ निवास करके स्नान करते हैं, उन्हें ‘अग्निष्टोम’ यज्ञका फल मिलता है—इसमें कोई संशय नहीं।

वसुंधरे ! कृष्णावतारमें मैंने बड़े पवित्र भावसे सूर्यदेवकी आराधना की थी, जिससे मुझे (पीछे साम्ब-जैसे) रूपवान्, गुणवान् एवं ज्ञानी पुत्रकी प्राप्ति हुई थी। यहीं आराधनाके समय मुझे हाथमें कमल लिये हुए भगवान् सूर्यके दर्शन हुए थे। देवि! तबसे भाद्रपदमासके कृष्णपक्षकी सप्तमी तिथिको प्रखर तेजवाले सूर्य वहाँ सदा विराजते हैं। उस कुण्डमें जो मनुष्य सावधान होकर स्नान करता है, उसे संसारमें कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं रहती; क्योंकि सूर्य सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके दाता हैं। देवि! यदि रविवारको सप्तमी तिथि पड़ जाय तो उस शुभ समयमें स्नान करनेवाला पुरुष हो अथवा स्त्री, वह समग्र फल प्राप्त करता है। प्राचीन समयमें राजा शान्तनुने भी इसी स्थानपर तपस्याकर भीष्म नामक परम पराक्रमी पुत्रको प्राप्त किया था और जिसे लेकर वे तुरंत हस्तिनापुरके लिये प्रस्थित हो गये थे। अतएव वहाँ स्नान तथा दान करनेसे निश्चय ही मनोऽभिलषित फल मिलता है।

[ अध्याय १५६-१५७]


मथुरा-तीर्थका प्रादुर्भाव, इसकी प्रदक्षिणाकी विधि एवं माहात्म्य

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे ! मेरे मथुराक्षेत्रकी सीमा बीस योजनमें है*, जिसमें जहाँ-कहीं भी स्नानकर मानव सम्पूर्ण पापोंसे छूट जाता है। वर्षा-ऋतुमें मथुरा विशेष आनन्दप्रद रहती है और हरिशयनीके बाद चार मासके लिये तो मानो सातों द्वीपोंके पुण्यमय तीर्थ और मन्दिर मथुरामें ही पहुँच जाते हैं। जो देवोत्थानके समय मेरे उठनेपर मथुरामें मेरा दर्शन करते हैं, उनके सामने वहाँ मैं सदा उपस्थित रहता हूँ, इसमें कोई संशय नहीं। वसुधे! उस समय मेरे (श्रीकृष्णरूपके) कमल-जैसे मुखको देखकर मनुष्य सात जन्मोंके पापोंसे तत्काल मुक्त हो जाता है। जिसने मथुरामें


* मथुराका माहात्म्य इस वराहपुराणके अतिरिक्त 'नारदपुराण' उत्तरभाग अध्याय ७५—८०; पद्मपुराण, पातालखण्ड, अध्याय ६९ से ८३, उत्तरखण्ड ९५; स्कन्दपु० ४।२० आदिमें भी है। यह सप्तपुरियोंमेंसे एक है। इसका पूर्वनाम मधुरा (वाल्मी० उत्तरकाण्ड ७।१०८), मधुपुरी तथा महोली भी है। यहाँ (वराहपुराणमें) इसकी सीमा बीस योजन कही गयी है। हुएनशांगके समय मथुरामण्डल ८३३ मीलमें एवं मथुरानगर प्रायः चार मीलके घेरेमें था। (Julien's Hiueon Thsang II. 20, Cunningham's Ancient Geography. P. 314). जैन-ग्रन्थोंमें इसका नाम 'सौरिपुर' है। पीछे वीरसिंह, जयसिंह तथा पेशवाओंने यहाँ बार-बार अनेक मन्दिर बनवाये। यहाँके मन्दिरों तथा वनोंके विशेष परिचय एवं आधुनिक निर्देशके लिये "कल्याण" 'तीर्थाङ्क' को देखना चाहिये।

१३६- अन्नकूट (गोवर्धन) पर्वतकी परिक्रमाका प्रभाव

२९२ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १५८–१६०

पहुँचकर मेरी (श्रीकृष्णके विग्रहकी) विधिवत् पूजाकर प्रदक्षिणा कर ली, उसने मानो सात द्वीपोंवाली पृथ्वीकी प्रदक्षिणा कर ली।

धरणीने पूछा— भगवन्! प्रायः सभी तीर्थ-क्षेत्र पशु, भूत, पिशाच और विनायक—इन उपद्रव करनेवाले प्राणियोंसे बाधित होते रहते हैं। फिर यह मथुरापुरी किस देवताके द्वारा सुरक्षित रहकर अनन्त फल प्रदान करनेमें समर्थ है?

भगवान् वराह कहते हैं— देवि! मेरे प्रभावसे विघ्नकारी शक्तियाँ मेरे इस क्षेत्रपर या भक्तोंपर कभी दृष्टि नहीं डाल पातीं। इसकी रक्षाके लिये मैंने दस दिक्पालों और चार लोकपालोंको नियुक्त कर रखा है, जो निरन्तर इस पुरीकी रक्षामें तत्पर रहते हैं। इसके पूर्वमें इन्द्र, दक्षिणमें यम, पश्चिममें वरुण, उत्तरमें कुबेर तथा मध्यभागमें उमापति महादेवजी रक्षा करते हैं। जो मनुष्य मथुरामें कोठेदार मकान बनवाता है, उस जीवन्मुक्त पुरुषको चार भुजाओंवाले विष्णुका ही रूप समझना चाहिये।

अब यहाँके निर्मल जलवाले 'मथुराकुण्ड' की एक आश्चर्यकी बात कहता हूँ, सुनो। हेमन्त-ऋतुमें इसका जल गर्म रहता है और ग्रीष्म-ऋतुमें बर्फके समान शीतल। साथ ही वर्षा-ऋतुमें वहाँका पानी न बढ़ता है और न ग्रीष्म-ऋतुमें सूखता ही है। वसुंधरे! मथुरामें पग-पगपर तीर्थ हैं, जिनमें स्नानकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है।

'मुचुकुन्दतीर्थ' नामक यहाँ एक दिव्य क्षेत्र है, जहाँ देवासुरसंग्रामके बाद राजा मुचुकुन्दने शयन किया था। वहाँ स्नान करनेवालेको अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है तथा मरनेवालोंको मेरे लोककी।

देवि! भगवान् केशवके नाम-संकीर्तनमें ऐसी शक्ति है कि वह इस जन्मके तथा पूर्वजन्मोंमें किये हुए सभी पापोंको उसी क्षण नष्ट कर डालता है। अतः कार्तिक शुक्लकी अक्षय-नवमीको भगवन्नाम-कीर्तन करते हुए मथुराकी प्रदक्षिणा करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। इसकी विधि यह है कि कार्तिक शुक्ला अष्टमीको मथुरामें जाकर ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए निवास करे तथा रात्रिमें ही प्रदक्षिणाका संकल्प कर ले। प्रातःकाल दन्तधावनकर स्नान करके धौतवस्त्र पहन ले और मौन होकर इसकी प्रदक्षिणा प्रारम्भ करे। इससे मनुष्यके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। प्रदक्षिणा करते समय मनुष्यको यदि कोई दूसरा व्यक्ति स्पर्श करता है तो उसके भी सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं, इसमें कुछ विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। प्रदक्षिणा करनेपर जो पुण्य मिलता है, वही पुण्य मथुरामें जाकर स्वयं प्रकट होनेवाले भगवान् श्रीहरिके दर्शनसे सुलभ हो जाता है।

भूमिकी परिक्रमाकी गणना भी योजनोंके प्रमाणमें की गयी है। पृथ्वीमें स्थित साठ हजार करोड़ और साठ सौ करोड़ तीर्थ हैं। देवताओं और आकाशमें स्थित तारागणोंकी संख्या भी इतनी है। यह गणना विश्वके आयुस्वरूप वायु, ब्रह्मा, लोमश, नारद, ध्रुव, जाम्बवान्, बलि और हनूमान्ने की है। इन लोगोंने वन, पर्वत-समुद्रसहित इस भूमिकी बाहरी रेखासे अनेक बार परिक्रमाएँ की थीं। सुग्रीव, पाँचों पाण्डव और मार्कण्डेय-प्रभृति कुछ योगसिद्धलोगोंने पृथ्वीके भीतर भ्रमण कर भी तीर्थोंकी गणना की। पर अन्य जो थोड़े ओज-बल अथवा बुद्धिवाले हैं, वे मनसे भी इन सबोंके परिभ्रमणमें असमर्थ हैं, प्रत्यक्ष गमनकी तो बात ही क्या? किंतु इन सातों द्वीपों और तीर्थोंमें घूमनेसे जो फल होता है, उससे भी अधिक फल मथुराकी परिक्रमामें मिल जाता है। जो मथुराकी

अध्याय १५८—१६०] मथुरा-तीर्थका प्रादुर्भाव, इसकी प्रदक्षिणाकी विधि एवं माहात्म्य २९३

प्रदक्षिणा करता है, वह मानो सात द्वीपोंवाली पृथ्वीकी प्रदक्षिणा कर लेता है। सभी मनोरथको चाहनेवाले मनुष्योंको सब प्रकारसे प्रयत्नकर मथुरा जाकर इसकी विधिपूर्वक प्रदक्षिणा करनी चाहिये। एक बार सप्तर्षियोंके पूछनेपर ब्रह्माजीने कहा था—'समस्त वेदोंके अध्ययन, सभी तीर्थोंमें स्नान, अनेक प्रकारके दान और यज्ञ-यागादि एवं कुआँ-तालाब, धर्मशाला बनवानेसे जो पुण्य होता है और उनका जो फल मिलता है, उससे सौ गुना अधिक फल मथुराकी परिक्रमासे प्राप्त होता है।' ब्रह्माजीसे यह बात सुनकर सातों ऋषियोंने उन्हें प्रणाम किया और वहाँसे मथुरा आकर वहाँ आश्रम बनाये। उनके साथ ध्रुव भी थे। फिर उन सबोंने अपनी कामनाकी पूर्तिके लिये कार्तिकमासके शुक्लपक्षकी नवमी तिथिको मथुराकी विधिवत् परिक्रमा की। इससे वे सभी मुक्त हो गये।

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! कार्तिक मासके शुक्लपक्षकी अष्टमी तिथिको व्रती साधक मथुरामें उपस्थित होकर 'विश्रान्तितीर्थ' में स्नान करे और देवताओं तथा पितरोंके पूजनमें संलग्न हो जाय। फिर विश्रान्तिके दर्शन करनेके पश्चात् दीर्घविष्णु और भगवान् केशवदेवका दर्शन करना चाहिये। उस रात ब्रह्मचर्यपूर्वक उपवास या अल्पाहार करे, साथ ही अपने अन्तःकरणको शुद्ध करनेके लिये अपवादभूत सायंकाल भी दन्तधावन करे। फिर स्नान करके धौतवस्त्र पहने और मौनव्रत धारणकर हाथमें तिल, चावल और कुशा लेकर पितरों एवं देवताओंकी पूजा करे।

फिर नवमीको प्रातःकाल ब्राह्ममुहूर्तमें संयमपूर्वक पवित्र होकर सूर्योदयके पूर्व ही प्रदक्षिणार्थ यात्राका कार्य आरम्भ कर देना चाहिये। प्रातःकालका स्नान 'दक्षिणकोटि' नामक तीर्थमें करनेकी विधि है। सर्वप्रथम दोनों पैरोंको धोकर आचमन करके मङ्गलोंके स्वरूप तथा बालब्रह्मचारी हनुमान्‌जीको प्रसन्न करनेकी चेष्टा करे, जिनके स्मरणसे समस्त उपद्रव शान्त हो जाते हैं। फिर प्रार्थना करे—'भगवन्! आपने जिस प्रकार भगवान् श्रीरामकी यात्रामें सिद्धि प्रदान की थी, उसी प्रकार मेरी इस परिक्रमा-यात्रामें सफलता प्रदान करें।' फिर गणेश्वर, भगवान् विष्णु, हनुमान्‌जी तथा कार्तिकेयकी विधिपूर्वक फल, माला तथा दीप आदिके द्वारा पूजनकर यात्रा आरम्भ करे। यात्रामें 'वसुमती' देवीका दर्शन बहुत आवश्यक है। वहीं राजाओंके आयुध रखनेके स्थानमें सम्पूर्ण भयको भगानेवाली भगवती 'अपराजिता' का भी दर्शन करे। देवि! फिर 'कंसवासनिका', 'औग्रसेना', 'चर्चिका' तथा 'वधूटी' देवियोंका दर्शन करे। ये देवियाँ दानवोंको पराजय और देवताओंको विजय प्रदान करानेवाली हैं। पुनः देवताओंसे सुपूजित आठ माताओं, गृहदेवियों और वास्तुदेवियोंका दर्शनकर तथा उनसे आज्ञा लेकर यात्रा आरम्भ करे। जबतक परिक्रमामें 'दक्षिणकोटि' तीर्थ न मिले, तबतक मौन होकर यात्रा करनी चाहिये। 'दक्षिणकोटि' तीर्थमें स्नान, पितृतर्पण, देवदर्शन और प्रणामकर भगवान् श्रीकृष्णद्वारा पूजित भगवती 'इक्षुवासा' को प्रणाम करे। इसके बाद 'वासपुत्र', 'अर्कस्थल', 'वीरस्थल', 'कुशस्थल', 'पुण्यस्थल' और प्रचुर पापोंके नाशक 'महास्थल' पर जाय। ये सभी तीर्थ सम्पूर्ण पापोंको दूर भगा देते हैं। फिर 'हयमुक्ति', 'सिन्दूर' और 'सहायक' नामके प्रसिद्ध स्थानोंपर जाय।

इस विषयमें ऋषियोंकी कही हुई एक प्राचीन गाथा सुनी जाती है—कहते हैं, कभी कोई राजकुमार घोड़ेपर सवार होकर मथुराकी सुखपूर्वक परिक्रमा कर रहा था। पर बीचमें ही नौकरसहित घोड़ेकी तो मुक्ति हो गयी, पर वह राजकुमार इस

२९४ संक्षिप्त श्रीवराहपुराण [ अध्याय १५८—१६०

संसारमें ही पड़ा रह गया। अतएव जिसे श्रेष्ठ फलकी इच्छा हो, उसे सवारीपर चढ़कर मथुराकी कदापि परिक्रमा नहीं करनी चाहिये, क्योंकि इससे मुक्ति नहीं मिलती।

उस ‘हयमुक्ति’ तीर्थका दर्शन एवं स्पर्श करनेसे पापोंसे मुक्ति मिल जाती है। बीचमें ‘शिवकुण्ड’ नामसे प्रसिद्ध एक महान् तीर्थ है। भगवान् कृष्णको विजयी बनानेवाली ‘मल्लिका’ देवीका भी दर्शन करना चाहिये। फिर ‘कदम्बखण्ड’ की यात्राकर सपरिवार ‘चर्चिका’ योगिनीका दर्शन करे। फिर पापोंके हरण करनेवाले ‘वर्षखात’ नामक श्रेष्ठ कुण्डपर जाकर स्नान और तर्पण करना चाहिये।

देवि! यहाँ भूतोंके अध्यक्ष भगवान् महादेवका दिव्य विग्रह है। इसके आगे ‘कृष्णक्रीडा-सेतुबन्ध’ तथा ‘बलिह्रद’ कुण्ड है, जहाँ श्रीकृष्णने जलविहार किया था। इसके दर्शनमात्रसे मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे छूट जाता है। यहीं कुछ आगे गंधोंसे सुवासित रहनेवाला ‘स्तम्भोच्चय’ नामक एक शिखर है, जिसे भगवान् श्रीकृष्णने सजाया और पूजित किया था। इसकी भी यत्नके साथ प्रदक्षिणा तथा पूजा करनी चाहिये, इससे प्राणी सभी पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकको जाता है। इसके पश्चात् ‘नारायणस्थान’ तीर्थपर जाकर फिर ‘कुब्जिका’ तथा ‘वामनस्थान’ पर जाये। यहीं ‘विद्येश्वरी’ देवीका भी स्थान है, जो श्रीकृष्णकी रक्षा करनेके लिये यहाँ सदा तत्पर रहती हैं। कंसको मारनेकी अभिलाषा रखनेवाले श्रीकृष्ण, बलभद्र और गोपोंने देवीके संकेतसे यहाँ मन्त्रणा की थी। तबसे इन्हें ‘सिद्धिदा’, ‘भोगदा’ और ‘सिद्धेश्वरी’ भी कहा जाता है और कुछ व्यक्ति इन्हें ‘संकेतकेश्वरी’ भी कहते हैं। इनका दर्शन करनेसे अवश्य सिद्धि प्राप्त होती है। यहाँके कुण्डका स्वच्छ जल सब पापोंको नष्ट कर देता है। इसके बाद ‘गोकर्णेश्वरी’-देवीका दर्शनकर सरस्वती नदी और विघ्नराज गणेशके दर्शन करनेसे मनुष्य श्रेयको प्राप्त करता है।

फिर प्रचुर पुण्यवाले ‘गार्ग्यतीर्थ’, ‘भद्रेश्वरतीर्थ’ तथा ‘सोमेश्वर’ तीर्थमें जाना चाहिये। ‘सोमेश्वर’ तीर्थमें स्नान करके भगवान् सोमेश्वरका दर्शन फिर ‘घण्टाभरणक’, ‘गरुडकेशव’, ‘धारालोपनक’, ‘वैकुण्ठ’, ‘खण्डवेलक’, ‘मन्दाकिनी’, ‘संयमन’, ‘असिकुण्ड’, ‘गोपतीर्थ’, ‘मुक्तिकेश्वर’, ‘वैलक्षगरुड़’ और ‘महापातक-नाशन’ तीर्थोंमें भी जाना चाहिये।

तत्पश्चात् भगवान् शिवसे यों प्रार्थना करे—‘देवेश! आप मुक्ति देनेवाले प्रधान देवता हैं। सप्तर्षियोंने भी पृथ्वीकी परिक्रमाके समय आपकी स्तुति की थी। इसी प्रकार मैं भी आपसे प्रार्थना करता हूँ। आपकी आज्ञासे मथुराकी प्रदक्षिणामें मुझे सफलता प्राप्त हो जाय।’ इस भाँति उस क्षेत्रके स्वामी देवाधिदेव शिवकी प्रार्थना कर ‘विश्रान्तिसंज्ञक’ तीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ जाकर स्नान, तर्पण एवं प्रणाम करना चाहिये।

तदनन्तर श्रीकृष्णकी बहन आर्तिहरा भगवती ‘सुमङ्गला’ देवीके मन्दिरमें जाकर उनसे मथुरा-यात्राकी सिद्धिके लिये इस प्रकार प्रार्थना करे—‘शिवे! आप सम्पूर्ण मङ्गलपूर्ण कार्योंको सम्पन्न करनेमें कुशल हैं। आपकी कृपासे प्राणीके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। आप प्रसन्न हो जायँ, जिससे मुझे भी इस यात्रामें सफलता प्राप्त हो।’ इसके उपरान्त ‘पिप्पलेश्वर’ महादेवके स्थानपर जाय। पिप्पलादमुनिने यहाँ उनकी अर्चना की थी। वे महान् तपस्वी मुनि परिक्रमा करनेसे थक गये थे। इस स्थानपर भगवान् शिवने उनकी थकावट दूर की थी। उस समय पिप्पलादमुनिने वहाँकी भूमिका उपलेपन किया और उसके ऊपर

१३७- असिकुण्ड-तीर्थ तथा विश्रान्तिका माहात्म्य

अध्याय १६१-१६२] देववन और 'चक्रतीर्थ' का प्रभाव २९५

अपने नामसे अङ्कित भगवान् शंकरकी प्रतिमा स्थापित कर दी। इससे उन्हें यात्रामें सफलता मिली। अतः इनका दर्शन शुभका सूचक है। मन्दिरमें प्रवेश करते समय दक्षिण-भागका सुशब्द कार्यकी अनुकूलता सूचित करता है। स्वयं श्रीकृष्णको कंसवधकी सफलताके लिये प्रार्थना करनेपर इन देवीका शुभसूचक उत्तम दर्शन पहले और अन्तमें भी प्राप्त हुआ था। अतः इनका दर्शन करनेसे मनुष्यके सभी अभीष्ट कार्य पूर्ण होते हैं। उस समय कंसके बड़े-बड़े पहलवानोंको मारनेके विचारसे श्रीकृष्णने वज्रके समान मुखवाले भगवान् सूर्यका भी ध्यान किया था। जब वे सभी मल्ल कालके ग्रास बन गये, तब उन्होंने वहीं उन वज्रानन सूर्यकी स्थापना कर दी। तबसे मथुरामें निवास करनेवाले व्यक्तियोंने इन वरदाता सूर्यको अपने कुलका प्रधान देवता मान लिया है। अतः 'सूर्य-तीर्थ' पर उनका दर्शन करके प्रदक्षिणाकी यात्रा समाप्त करनी चाहिये। मथुराकी प्रदक्षिणाके समय मनुष्यके जितने पैर पृथ्वीपर पड़ते हैं, उसके कुलके उतने व्यक्ति सनातन सूर्यलोकमें स्थान पाते हैं। मथुराकी परिक्रमा पूर्ण करके आनेवाले मनुष्यको जो कोई भी देख लेता है तो वह भी पापोंसे छूट जाता है और जो परिक्रमाकी बात सुनते हैं, वे भी अपराधोंसे मुक्त होकर परमपद प्राप्त कर लेते हैं।

[अध्याय १५८-१६०]


देववन और 'चक्रतीर्थ' का प्रभाव

भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! अधर्मी एवं दुरात्मा मनुष्य भी मथुराके सेवनसे तथा वहाँके वनोंके दर्शन अथवा उस पुरीकी परिक्रमासे नरकक्लेशसे मुक्त हो जाते हैं तथा स्वर्गभोगके अधिकारी हो जाते हैं।

देवि! इस मथुरामण्डलमें बारह वन हैं, जिनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं—मधुवन, तालवन, कुन्दवन, काम्यकवन, बहुवन, भद्रवन, खदिरवन, महावन, लौहवन, बिल्ववन, भाण्डीर-वन और वृन्दावन। ये सभी परम श्रेष्ठ और मुझे अत्यन्त प्रिय हैं। लौहवनके प्रभावसे प्राणीके समस्त पाप दूर हो जाते हैं तथा बिल्ववन तो देवताओंसे भी प्रशंसित है। जो मानव इन वनोंका दर्शन करते हैं, उन्हें नरक नहीं भोगना पड़ता।

भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! अब मथुराके उत्तर भागमें स्थित 'चक्रतीर्थ' की महिमा कहता हूँ, उसे सुनो। पहले जम्बूद्वीपकी शोभा बढ़ानेवाला 'महागृहोदय' नामसे प्रसिद्ध एक उत्तम नगर था। शुभे! उस दिव्य नगरमें एक वेदोंका पारगामी प्रतिष्ठित ब्राह्मण रहता था। देवि! एक समयकी बात है, वह अपने पुत्रको लेकर शालग्राम (मुक्तिनाथ) तीर्थको गया और वहीं अपना निवास बना लिया। सदा वह नियमतः वहाँ पवित्र नदीमें स्नानकर देवताओंका दर्शन करता, यही उसका नित्यकर्म था। वहीं उसे एक 'कान्यकुब्ज' के सिद्ध पुरुषके दर्शन हुए, जो बहुधा 'कल्पग्राम' में भी जाया करता था। बातचीतके प्रसङ्गमें वह सिद्ध प्रायः प्रतिदिन 'कल्पग्राम' की प्रशंसा करता। उस ग्रामकी विभूति सुनकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मणके मनमें भी विचार उठा कि मैं भी उस 'कल्पग्राम' में चलूँ और उसने सिद्ध पुरुषसे प्रार्थना की—'मित्रवर! आप सिद्ध पुरुष हैं, अतः एक बार मुझे भी आप 'कल्पग्राम' ले चलनेकी कृपा कीजिये।'

पृथ्वि! उस श्रेष्ठ ब्राह्मणकी बात सुनकर सिद्ध पुरुषने कहा—'द्विजवर! वहाँ तो केवल सिद्ध पुरुष ही जा सकते हैं, सामान्य व्यक्तिका वहाँ जाना सम्भव नहीं है।' इसपर उस ब्राह्मणने

२९६संक्षिप्त श्रीवराहपुराण[ अध्याय १६१-१६२

कहा—'मुझे भी आत्मयोगकी शक्ति सुलभ है, अतः उसके सहारे मैं अपने पुत्रके साथ वहाँ चल सकूँगा।' फिर तो उस सिद्ध पुरुषने अपने दाहिने हाथमें उस वेदज्ञ ब्राह्मणको तथा बायें हाथमें उसके परम बुद्धिमान् पुत्रको लेकर ऊपर उड़ा और 'कल्पग्राम' में पहुँच गया। वहाँ पहुँच जानेपर वे पिता-पुत्र अब 'कल्पग्राम' में ही रहने लगे। बहुत समय व्यतीत हो जानेपर उस ब्राह्मणके शरीरमें व्याधि उत्पन्न हो गयी, वृद्धावस्था तो थी ही, अतः मरनेका निश्चयकर उस धर्मात्मा ब्राह्मणने अपने सुयोग्य पुत्रको सामने बुलाया और कहा—'वत्स! मुझे गङ्गाके तटपर ले चलो।' पुत्रने उसे गङ्गाके किनारे पहुँचाया और वह भी अपने पिताके प्रति अपार श्रद्धा-भक्तिके कारण वहीं उसके पास रहने लगा।

भद्रे! एक दिनकी बात है, दैववश कान्यकुब्ज-देशके निवासी उस सिद्ध पुरुषके घर वह ब्राह्मणकुमार भोजनके लिये गया। उस सिद्धने ब्राह्मणकुमारका स्वागत-सत्कार किया और न्यायपूर्वक उसकी अर्चना करनेके पश्चात् उसके साथ अपनी कन्याका विवाह भी कर दिया। तबसे वह ब्राह्मणकुमार प्रतिदिन अपने श्वशुरके ही घर जाकर भोजन करने लगा। अपने पिताकी चिन्तनीय स्थिति देखकर उस ब्राह्मणकुमारने एक दिन अपने उस सिद्ध पुरुष श्वशुरसे पूछा—'स्वामिन्! आप मुझे यह बतानेकी कृपा करें कि पिताजीका यह कष्टजर्जरित शरीर कब शान्त होगा?' इसपर उस सिद्ध पुरुषने मुस्कुराकर कहा—'द्विजवर! तुम्हारे पिताने अपवित्र अन्न खाया था। इसी आहार-दोषने उन्हें इस दुर्गति‌को पहुँचा दिया है। वह अन्न अभी इनके पैरोंमें पड़ा है।

लड़केने किसी दिन यह बात अपने पिताको बतला दी, अतः शरीरकी जर्जरतासे अत्यन्त दुःखी उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने एक दिन गङ्गातटपर पड़े एक पत्थरसे (अन्नदोषयुक्त) अपनी दोनों टाँगें तोड़ दीं, जिससे उसके प्राण निकल गये। उस समय उसका पुत्र अपने श्वशुरके गृह स्नान तथा भोजनादिके लिये गया हुआ था। लौटनेपर उसने जब अपने पिताका शव देखा तो विलाप करने लगा। आपस्तम्बमुनिने ठीक ही कहा है—'सर्पके काटनेसे, सींग एवं दाँतवाले जानवरोंके मारनेसे तथा सहसा अपने प्राणोंके त्यागनेसे अर्थात् आत्महत्या करनेसे जिसके प्राण जाते हैं, वह मनुष्य पापका भागी होता है।'

अब वह ब्राह्मणकुमार जब पुनः अपने श्वशुरके घर गया तो उसे देखते ही श्वशुरने कहा—'अरे! तुम्हें तो ब्रह्महत्या लगी है, तुम यहाँसे चले जाओ।' श्वशुरकी बात सुनकर जामाताने कहा—'महानुभाव! मैंने तो कभी किसी ब्राह्मणकी हत्या नहीं की, फिर आप मुझपर ब्रह्महत्याका दोषारोपण कैसे कर रहे हैं?' श्वशुरने उससे कहा—'पुत्रक! तुम अपने पिताकी ही मृत्युके हेतु बने हो, अतः तुम ब्रह्महत्याके भागी हुए हो। ऐसा नियम है कि 'यदि किसी पतितके साथ संनिकटमें एक वर्षतक शयन, भोजन अथवा वार्तालाप किया जाय तो शुद्ध पुरुष भी पतित हो जाता है। अतएव अब मेरे घरपर तुम्हारे रहनेके लिये कोई स्थान नहीं है।' श्वशुरकी यह बात सुनकर जामाताने कहा—'सुव्रत! जब आपने मेरा त्याग कर ही दिया तो अब मेरे लिये कौन-सा प्रायश्चित्त कर्तव्य है—यह बतानेकी कृपा कीजिये।' इसपर श्वशुर बोला—' 'अब तुम कल्पग्रामका त्यागकर 'मथुरा' जाओ। मथुराको छोड़कर तुम्हारी शुद्धि कहीं भी सम्भव नहीं है।' ' अब वह ब्राह्मण उसी क्षण 'कल्पग्राम' से चलकर 'मथुरा' आया और नगरके बाहर ही

१३८- मथुरा तथा उसके अवान्तरके तीर्थोंका माहात्म्य

अध्याय १६३ ] 'कपिल-वराह' का माहात्म्य २९७

अपने रहनेका प्रबन्ध किया। उस समय मथुरामें कान्यकुब्जके महाराज कुशिकका नित्य-सत्र चल रहा था, जिस सत्रमें प्रतिदिन दो हजार ब्राह्मण भोजन करते थे। वहाँ ब्राह्मणोंके खाते समय छूटे हुए जूठे (उच्छिष्ट) अन्नके खानेसे उस ब्राह्मण-कुमारका उद्धार हो गया। वह सदा 'चक्रतीर्थ' में जाकर स्नान करता। न किसीके घर वह भिक्षा माँगता और न कहीं अन्यत्र ही जाता था।

वसुंधरे! बहुत दिनोंके बाद उसके श्वशुरके मनमें उसकी चिन्ता हुई। उसने अपने दिव्य ज्ञानसे जामाताकी स्थिति ज्ञात कर ली और अपनी पुत्रीको आदेश दिया—'तुम भोजन लेकर अब मथुरापुरी जाओ; तुम्हारा पति वहीं है। वह कन्या भी योगसिद्धा एवं दिव्य ज्ञानसे सम्पन्न थी। अतएव अपने स्वामीको भोजन करानेके विचारसे वह प्रतिदिन उसके पास आने-जाने लगी और यह उसका नित्यका एक कार्यक्रम बन गया। सायंकाल भोजन लेकर वह ब्राह्मणपुत्री उस ब्राह्मणके पास जाती। वह ब्राह्मणकुमार पत्नीका दिया हुआ भोजन कर लेता और रात्रिमें उसी सत्रशालामें ही पड़ा रहता। इस प्रकार वहाँ निवास करते ब्राह्मणके छः महीने और व्यतीत हो गये। कुछ समयके पश्चात् वहाँ रहनेवाले ब्राह्मणोंने उससे पूछा—'आप यहाँ कहाँ निवास करते हैं और प्रतिदिन आपको भोजन कहाँसे प्राप्त होता है?'

अब उस ब्राह्मणने उन लोगोंसे अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त स्पष्ट कह दिया। इसे सुनकर वे सभी ब्राह्मण एकत्रित होकर उससे बोले—'द्विजवर ! अब तो आप सर्वथा शुद्ध हो गये हैं। इस 'चक्रतीर्थ' के प्रभावसे आपके सारे पाप दूर हो गये हैं। फिर हमलोगोंके शरीरसे सम्पर्क होनेके कारण आपके बचे-खुचे दूसरे पाप भी समाप्त हो गये हैं।' उन ब्राह्मणोंकी बात सुनकर उस ब्राह्मणका मन प्रसन्नतासे खिल उठा। अब वह स्नानार्थ पुनः 'चक्रतीर्थ' आया। यहाँ उसकी भार्या भोजन लेकर पहलेसे ही उपस्थित थी। उसने हर्षित मनसे अपने पतिसे कहा—'स्वामिन् ! मुझे ऐसा दिखायी पड़ता है कि आप अब ब्रह्महत्यासे सर्वथा मुक्त हो गये हैं।' पत्नीकी बात सुनकर उसने कहा—'प्रिये ! तुमने जो कहा है, उसे पुनः स्पष्ट करनेकी कृपा करो।' यह सुनकर पत्नीने कहा—'इससे पहले आप बात करनेमें भी अयोग्य हो चुके थे। क्योंकि आप उस समय ब्रह्महत्यासे ग्रस्त थे। द्विजवर ! अब आप 'चक्रतीर्थ' के प्रभावसे पापमुक्त हो गये हैं। कान्त ! अब आप उठें और परम पवित्र 'कल्पग्राम' को चलें।' तदनन्तर वह श्रेष्ठ ब्राह्मण अपनी भार्याके साथ 'कल्पग्राम' चला गया। वसुंधरे ! उस परम पवित्र 'चक्रतीर्थ' में भगवान् 'भद्रेश्वर' विराजते हैं, जिनका दर्शन करनेसे तीर्थका फल प्राप्त होता है। वसुंधरे ! 'चक्रतीर्थ' के सेवनसे समग्र 'कल्पग्राम' की अपेक्षा भी सौगुना फल मिलता है। एक दिन-रात वहाँ उपवास करनेपर मनुष्यका ब्रह्महत्यासे भी उद्धार हो जाता है। [अध्याय १६१-१६२]


'कपिल-वराह' का माहात्म्य

भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे ! मिथिला-प्रान्तमें जनकजीकी 'जनकपुरी' नामकी एक प्राचीन एवं परम रमणीय पुरी है, जहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—ये चारों वर्णोंके लोग निवास करते एवं तीर्थयात्रा आदिके लिये बाहरसे भी आते-जाते रहते थे। फिर वहाँके समीपवर्ती 'सौकरव-तीर्थ' में स्नानकर वे 'मथुरापुरी' की यात्रा करते थे; और वहाँ वे कुछ कालके लिये ठहर

२९८संक्षिप्त श्रीवराहपुराण[ अध्याय १६३

जाते। उसी समाजमें एक ऐसा ब्राह्मण था, जिसके शरीरमें ब्रह्महत्याके चिह्न थे। उसके हाथसे सदा रुधिरकी धारा गिरती रहती थी, जिसे प्रायः सभी लोग देखते थे। वह ब्राह्मण उस हत्यासे मुक्त होनेके लिये सभी तीर्थोंमें भ्रमण-स्नान कर चुका था, फिर भी उसकी ब्रह्महत्या दूर न हुई। किंतु इसके बाद जब उसने 'वैकुण्ठ' तीर्थमें स्नान किया तो वह रुधिरधारा स्वतः बंद हो गयी। अब उसके सभी सहवासी आश्चर्यसे कहने लगे—'यह कैसे हो गया, यह कैसे हो गया!' उसी समय ब्राह्मणका रूप धारणकर एक दिव्य पुरुष वहाँ आया और उसने उन सभी उपस्थित लोगोंसे पूछा—'यहाँसे ब्रह्महत्या इस ब्राह्मणको छोड़कर कैसे चली गयी?' इसपर उन लोगोंने उसे उस ब्राह्मणके ब्रह्महत्यासे छूटनेके सारे प्रयत्न और अन्तमें 'वैकुण्ठ-तीर्थ' में स्नानद्वारा हत्यामुक्तिकी बात बतला दी, अतः इस तीर्थकी महिमामें किंचित् भी संदेह नहीं करना चाहिये।

सूतजी कहते हैं— ऋषियो! इसके बाद भगवान् वराहने पुनः पृथ्वीसे कहा—'देवि! यहाँ अमित पुण्य प्रदान करनेवाला 'असिकुण्ड' नामक एक दूसरा क्षेत्र है, अब मैं उसे बताता हूँ। उस क्षेत्रमें एक अन्य कुण्ड भी है, जिसे 'गन्धर्वकुण्ड' कहते हैं। वह सभी तीर्थोंमें प्रमुख है। वहाँ अवगाहन करनेवाला गन्धर्वोंके साथ आनन्द भोगता है और जो उस स्थानपर प्राणोंका त्याग करता है, वह मेरे लोकमें चला जाता है।

देवि! मथुरामण्डलकी सीमा बीस योजनमें है और सभीको मुक्ति देनेमें परम समर्थ उस पुरीकी आकृति कमलके समान है। इसकी कर्णिकाके मध्यभागमें क्लेशोंके नाशक भगवान् केशव विराजते हैं। इस स्थानपर जिनके प्राण प्रस्थान करते हैं, वे मुक्तिके भागी होते हैं। यही क्यों? मथुराके भीतर कहीं भी जिनकी मृत्यु होती है, वे सभी मुक्त हो जाते हैं। इस तीर्थके पश्चिम भागमें 'गोवर्धनपर्वत' है, जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण निवास करते हैं। वहाँ उन देवेश्वरके दर्शन प्राप्त कर लेनेपर मनमें संताप नहीं रह जाता।

पृथ्वि! पूर्वकालमें मान्धाता नामके एक राजा थे। उनकी भक्तिपूर्वक स्तुतिसे प्रसन्न होकर मैंने उन्हें यह प्रतिमा सौंपी थी। राजा मान्धाताके मनमें मुक्ति पानेकी अभिलाषा थी, अतः वे नित्य इस प्रतिमाकी अर्चना करने लगे। जिस समय मथुरामें लवणासुरका वध हुआ था, उसी समय वह प्रतिमा इस तीर्थमें स्थापित की गयी थी। यह विग्रह परम दिव्य, पुण्यस्वरूप एवं तेजसे सम्पन्न है।

इसके मथुरा आनेकी कथा विचित्र है। कपिल नामके मुनिने अपार श्रद्धा और मनोयोगपूर्वक मेरी इस वाराही प्रतिमाका निर्माण किया था। ये विप्रवर कपिल प्रतिदिन इस प्रतिमाका ध्यान एवं पूजन करते थे। देवि! फिर इन्द्रने उन मुनिवर कपिलसे इसके लिये प्रार्थना की। तब कपिलने प्रसन्न होकर यह दिव्य रूपवाली प्रतिमा उन्हें दे दी। जब इन्द्रको यह प्रतिमा प्राप्त हुई तो उनके हृदयमें हर्ष भर गया और नित्यप्रति भक्तिके साथ मेरा पूजन करने लगे। इसके फलस्वरूप शक्रको सर्वोत्कृष्ट दिव्य ज्ञान प्राप्त हो गया। इन्द्रने मेरी इस 'कपिलवराह' नामक प्रतिमाकी बहुत वर्षोंतक पूजा की। इसके बाद रावणनामक दुर्दान्त राक्षस हुआ। वह महान् पराक्रमी निशाचर इन्द्रके लोकमें गया और स्वर्गको जीतनेकी चेष्टा करने लगा और देवराजके साथ युद्ध करने लगा। उसने देवताओंको परास्त कर दिया। परम पराक्रमी इन्द्र भी उससे हार गये और उन्हें बन्दी बनाकर

१३९- गोकर्णतीर्थ और सरस्वतीकी महिमा

अध्याय १६३ ] 'कपिल-वराह' का माहात्म्य २९९


रावण उनके भवनमें घुस गया। जब वह राक्षस रत्नोंसे सुशोभित इन्द्र-भवनमें गया तो उसे इन भगवान् ‘कपिलवराह’ के दर्शन हुए। देखते ही उसने अपना मस्तक जमीनपर टेक दिया और दीर्घकालतक इन श्रीहरिकी स्तुति की। इसपर भगवान् विष्णु सौम्यरूप धारणकर पुष्पक विमानपर आरूढ़ होकर उस राक्षसके पास आये। साथ ही उस विग्रहमें उनका प्रवेश हो गया। रावणने प्रतिमा उठानी चाही, किंतु वह उठा न सका। अब उसके आश्चर्यकी सीमा न रही। उसने कहा—'भगवन्! बहुत पहलेकी बात है, मैंने शंकरसहित कैलासपर्वतको भी अपने हाथोंसे उठा लिया था। आपकी आकृति तो बहुत ही छोटी है, फिर भी उठानेमें मेरी शक्ति कुण्ठित हो गयी है। देवेश्वर! आपको नमस्कार है। मुझपर प्रसन्न होनेकी कृपा करें। प्रभो! मेरी हार्दिक इच्छा है कि मैं आपको अपनी सर्वोत्तम पुरी लङ्कामें ले चलूँ।

भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! उस समय मैंने 'कपिलवराह' के रूपमें रावणसे कहा था—'राक्षस! तुम अवैष्णव व्यक्ति हो। तुम्हें ऐसी भक्ति कहाँसे प्राप्त हो गयी?' तब मुझ 'कपिलवराह' की बात सुनकर रावणने कहा—'महात्मन्! आपके पवित्र दर्शनसे ही मुझे ऐसी अनन्य भक्ति सुलभ हो गयी है। देवेश्वर! आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। आप कृपया मेरी पुरीमें पधारें।' पृथ्वि! तब मेरी यह प्रतिमा हलकी हो गयी और रावण तीनों लोकोंमें विख्यात मेरी उस 'कपिलवराह' की प्रतिमाको पुष्पक विमानपर चढ़ाकर लङ्का ले आया और वहाँ उसे प्रतिष्ठित कर दी। तदनन्तर जब भगवान् रामने राक्षसराज रावणको मारकर लङ्काके राजसिंहासनपर विभीषणका अभिषेक किया तो विभीषणने श्रीरामसे प्रार्थना की—'प्रभो! यह सारा राज्य आपका है। आप इसे स्वीकार करें।'

श्रीरामजीने कहा—'राक्षसराज विभीषण! यह सब कुछ तुम्हारा है, इससे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। पर राक्षसेश्वर! इन्द्रके लोकसे रावणद्वारा जो 'कपिलवराह' की प्रतिमा यहाँ लायी गयी है, केवल उसे मुझे दे दो। उन वराहभगवान्की मैं प्रतिदिन पूजा करना चाहता हूँ। दानवेश्वर! मैं उन्हें अयोध्या ले जाऊँगा।' तब विभीषणने उस दिव्य प्रतिमाको श्रीरामको सादर समर्पण कर दिया। श्रीरामने उसे पुष्पक विमानपर रखकर अपनी नगरी अयोध्याके लिये प्रस्थान किया और अयोध्या पहुँचकर उसकी स्थापना की और प्रतिदिन पूजा करनेका नियम बना लिया। इस प्रकार दस वर्ष व्यतीत हो जानेपर श्रीरामने लवणासुरका वध करनेके लिये शत्रुघ्नको आज्ञा दी। उस समय वह राक्षस मथुरामें रहता था। शत्रुघ्नने महात्मा श्रीरामको प्रणाम किया और अपनी चतुरङ्गिणी सेना लेकर मथुराके लिये चल पड़े। लवणासुरका रूप बड़ा भयंकर था। सभी राक्षस उसे अपना नायक मानते थे। फिर भी शत्रुघ्नने उसका वध कर डाला। तत्पश्चात् शत्रुघ्न मथुरा नगरके भीतर गये और वहाँ उन्होंने अत्यन्त तेजस्वी छब्बीस हजार वेदके पारगामी ब्राह्मणोंको बसाया। जहाँ एक भी निवासी वेद नहीं जानता था, वहाँ चारों वेदोंके ज्ञाता पुरुष निवास करने लगे। अब वह स्थान ऐसा पवित्र बन गया, जहाँ एक भी ब्राह्मणको भोजन कराया जाय तो करोड़ ब्राह्मणोंके भोजन करानेके समान फल होने लगा।

पृथ्वि! फिर लौटनेपर जब शत्रुघ्नने लवणासुरके वधका यथावत् समाचार श्रीरामसे कहा, तब उस असुरकी मृत्युका वृत्तान्त सुनकर भगवान् राघवेन्द्रने

३००संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[अध्याय १६४-१६५

प्रसन्न होकर उनसे कहा—'शत्रुघ्न! तुम्हारे मनमें जिस वस्तुकी अभिलाषा हो, वह तुम मुझसे वरके रूपमें माँग लो। उस समय श्रीरामकी बात सुनकर शत्रुघ्नने कहा—'भगवन्! आप मेरे पूज्य हैं। यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और वर देना चाहते हैं तो मुझे यह भगवान् 'कपिलवराह' की प्रतिमा देनेकी कृपा करें।' तब शत्रुघ्नके वचन सुनकर श्रीरामने कहा—'शत्रुघ्न! तुम इन वराह भगवान्‌की प्रतिमा ले जा सकते हो। तुम्हारे अनुगत मण्डलीको धन्यवाद और संसारमें पवित्र उस मथुरापुरीको धन्यवाद! मथुराका वह जनसमाज धन्य है, जो सदा 'श्रीकपिलवराह' का दर्शन करेगा। शत्रुघ्न! जो इन कपिलवराहका दर्शन, स्पर्श एवं ध्यान करता है और इन्हें प्रतिदिन स्नान कराता तथा इनका अनुलेपन करता है, उसके सब पापोंको ये हर लेते हैं। जो इनकी पूजा तथा दर्शन करता है उसके समस्त पापोंका नाश करके ये मोक्षतक दे डालते हैं।'

पृथ्वि! इस प्रकार कहकर श्रीरामने कपिलवराह-की यह प्रतिमा शत्रुघ्नको दे दी। उसे लेकर शत्रुघ्न मथुरापुरी चले गये और वहाँ उन्होंने मेरे पास ही उसकी स्थापना कर दी। मध्यभागमें स्थापित करके उनकी विधिवत् पूजा की। 'गया' में तथा ज्येष्ठ मासमें 'पुष्कर'क्षेत्रमें पिण्डदान करनेसे एवं 'सेतुबन्ध-रामेश्वर' के दर्शन करनेसे मनुष्य जो फल पाता है, वह इनका दर्शन करनेसे पा जाता है। वैसा ही फल विश्रान्तिसंज्ञक, गोविन्द, केशव तथा दीर्घविष्णुके प्रति श्रद्धा होनेपर प्राप्त होता है। मेरा तेज प्रातःकाल 'विश्रान्तिसंज्ञक' में, मध्याह्नके अवसरपर 'दीर्घविष्णु' में तथा दिनके चतुर्थ भाग अर्थात् सायंकालमें 'केशव' में प्रतिष्ठित रहता है। देवि! यह ब्रह्मविद्या (वराहपुराण) परम प्राचीन है। [अध्याय १६३]


अन्नकूट (गोवर्धन)-पर्वतकी परिक्रमाका प्रभाव

भगवान् वराह कहते हैं—देवि! मथुराके पास ही पश्चिम दिशामें दो योजनके विस्तारमें गोवर्धन नामसे प्रसिद्ध एक क्षेत्र है, जहाँ वृक्षों और लताओंसे मण्डित एक सुन्दर सरोवर भी है। मथुराके पूर्व भागमें 'इन्द्र' तीर्थ, दक्षिणमें 'यम' तीर्थ, पश्चिममें 'वरुण' तीर्थ और उत्तरमें 'कुबेर' तीर्थ—ये चार तीर्थ हैं। भद्रे! यहाँ 'अन्नकुण्ड' नामका भी एक क्षेत्र है, इसकी परिक्रमा करनेवाले मानवका संसारमें फिर जन्म नहीं होता। फिर 'मानसी-गङ्गा' में स्नानकर गोवर्धनगिरिपर भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करना चाहिये। जो इस गोवर्धनपर्वतकी प्रदक्षिणा कर लेता है, उसके लिये कोई कर्तव्य शेष नहीं रह जाता। सोमवती अमावास्याके दिन जो यहाँ जाकर पितरोंको पिण्ड प्रदान करता है, उसे राजसूय-यज्ञका फल प्राप्त हो जाता है। गयातीर्थमें जाकर पिण्डदान करनेवाले मनुष्योंको जो फल मिलता है, वही गोवर्धनपर पिण्डदानसे सुलभ हो जाता है, इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं। गोवर्धन-भगवान्‌की परिक्रमा करनेसे राजसूय और अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्राप्त होता है।

गोवर्धनकी परिक्रमाकी विधि यह है कि भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी पुण्यमयी एकादशी तिथिके दिन इस पर्वतके पास उपवास रहकर प्रातःकाल सूर्योदयके समय स्नानकर पर्वतपर स्थित श्रीहरिकी पूजा करनी चाहिये। इसके बाद 'पुण्डरीक' तीर्थपर जाकर वहाँके कुण्डमें स्नानकर देवताओं और पितरोंका सम्यक् प्रकारसे अर्चन करके भगवान् पुण्डरीकका पूजन करे। वहाँ निर्मल जलसे पूर्ण एक 'अप्सरा-

१४०- सुगेका मथुरा जाना और वसुकर्णसे वार्तालाप

अध्याय १६४-१६५] अन्नकूट (गोवर्धन)-पर्वतकी परिक्रमाका प्रभाव ३०१

कुण्ड' है। वहाँ स्नान करनेसे सभी पाप धुल जाते हैं। उस कुण्डपर तर्पण करनेसे राजसूय और अश्वमेध-यज्ञोंका फल निश्चय ही मिल जाता है। मथुरामें 'संकर्षण' नामसे विख्यात एक तीर्थ है, उसके रक्षक बलभद्रजी हैं। वहाँ जाने एवं स्नान करनेसे पहलेसे लगी हुई गोहत्याके पापसे मुक्ति हो जाती है।

पृथ्वि! गोवर्धनके पासमें ही एक 'शक्रतीर्थ' है। यहाँ श्रीकृष्णने इन्द्रकी पूजाके लिये किये जा रहे यज्ञको नष्ट कर दिया था। उस यज्ञके अवसरपर भोज्य आदि पदार्थोंकी बहुत बड़ी ऊँची ढेरी लग गयी थी। उस समय इन्द्रके साथ श्रीकृष्णका विवाद छिड़ गया। इन्द्रने घोर वृष्टि की। वह जल व्रजवासियों तथा गौओंके लिये कष्टप्रद होने लगा। श्रीकृष्णने उनकी रक्षा करनेके निमित्त इस श्रेष्ठ पर्वत (गोवर्धन)-को हाथपर उठा लिया था। तभीसे यह पर्वत 'अन्नकूट-पर्वत' के नामसे विख्यात हो गया। यहीं आगे एक स्वच्छ जलवाला 'कदम्बखण्ड' नामक कुण्ड है। वहाँ स्नान करके पितरोंका तर्पण करनेसे ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है। इसके बाद सौ शिखरवाले देवगिरिपर जाय, जहाँ स्नान एवं दर्शन करनेसे 'वाजपेय' यज्ञका फल मिलता है।

देवि! जब 'मानसीगङ्गा' के उत्तर तटपर चक्र धारण करनेवाले देवेश्वर श्रीहरिका अरिष्टासुरके साथ घोर युद्ध हुआ था, तब उस असुरने अपना वेष बैलका बना लिया था। उसकी जीवनलीला श्रीकृष्णके ही हाथ समाप्त हुई। उसके क्रोधपूर्वक एड़ीके प्रहारसे पृथ्वीपर एक तीर्थ बन गया। यह वृषाभासुरके वधसे निर्मित तीर्थ अत्यन्त अद्भुत है—यह जानने योग्य बात है। उस वृषभरूपी महासुरको मारनेके पश्चात् श्रीकृष्णने उसी तीर्थमें स्नान किया था। यह जानकर श्रीकृष्णके मनमें

चिन्ता उत्पन्न हो गयी कि यह पापी अरिष्टासुर बैलके रूपमें था और मेरे हाथ इसकी हत्या हो गयी है। इतनेहीमें भगवती श्रीराधादेवी श्रीकृष्णके समीप पधारीं। उन्होंने अपने नामसे सम्बद्ध उस स्थानको एक तीर्थरूप कुण्ड बना दिया। तबसे समस्त पापोंको हरनेवाले उस शुभ स्थानकी 'राधाकुण्ड' नामसे प्रसिद्धि हुई। प्रसङ्गतया लोग उसे 'अरिष्टकुण्ड' और 'राधाकुण्ड' भी कहते हैं। वहाँ स्नान करनेसे राजसूय और अश्वमेध-यज्ञोंका फल मिलता है। मथुराके पूर्व दिशामें एक तीर्थ 'इन्द्रध्वज' के नामसे विख्यात है, वहाँ स्नान करनेवाले स्वर्गलोकमें जाते हैं। यहाँ परिक्रमा एवं यात्राका पुण्य भगवान्को समर्पित कर देना चाहिये। मनुष्यका कर्तव्य है कि प्रारम्भ करते समय 'चक्रतीर्थ' में स्नान करे और यात्रा समाप्तिके अवसरपर 'पञ्चतीर्थकुण्ड' में स्नान कर ले। यहाँ रात्रि-जागरणका भी नियम है। इससे मनुष्यके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।

भद्रे! 'अन्नकूटपर्वत' की परिक्रमाका विधान मैंने तुमसे बतला दिया। इसी प्रकार इसी क्रमसे आषाढ़में भी प्रदक्षिणा की जाती है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक भगवान् श्रीहरिके इस तीर्थकी प्रदक्षिणाके प्रसङ्गका तथा गोवर्धनके माहात्म्यको सुनता है, उसे गङ्गामें स्नान करनेका फल मिल जाता है।

**भगवान् वराह कहते हैं—**पृथ्वि! अब एक इतिहासयुक्त दूसरा प्रसङ्ग सुनो। मथुराके दक्षिण किसी नगरमें सुशील नामक एक धनी वैश्य रहता था। उस वैश्यका प्रायः सारा जीवन क्रय-विक्रयमें ही बीत गया। न कभी उसे किसी प्रकारका सत्सङ्ग प्राप्त हुआ और न उसने कोई दान-धर्म आदि सत्कर्म ही किये। इस प्रकार गृह-कुटुम्बमें आसक्त रहते ही वह वैश्य कालवश होकर इस लोकसे चल बसा और उसे प्रेतयोनि

३०२ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १६४-१६५

मिली और बिना जलवाले तथा छायारहित जङ्गलोंमें भूख-प्याससे व्याकुल होकर वह इधर-उधर भटकने लगा। यों घूमता हुआ वह भयंकर प्रेत मरुस्थलमें पहुँच गया और बहुत दिनोंतक वहाँ एक वृक्षपर निवास करता रहा।

पृथ्वि! इस प्रकार बहुत समय व्यतीत हो जानेपर दैवयोगसे वहाँ एक खरीद-बिक्री करनेवाला वैश्य आया, जिसे देखकर उस प्रेतको अत्यन्त प्रसन्नता हुई और नाचते हुए वह बोला—'अहो! तुम इस समय मेरा आहार बनकर यहाँ आ गये हो।' अब क्या था, प्रेतकी बात सुनकर वह व्यापारी वैश्य अत्यन्त भयभीत होकर भाग चला। पर प्रेतने दौड़कर उसे पकड़ लिया और कहा—'अब मैं तुम्हें खाऊँगा।' उस प्रेतकी बात सुनकर महाजनने कहा—'राक्षस! मैं अपने परिवारके भरण-पोषणके विचारसे इस घोर वनमें आया हूँ। मेरे घरमें बूढ़े पिता और माता हैं, एक पतिव्रता पत्नी भी है। यदि तुम मुझे खा लोगे तो उन सबकी मृत्यु हो जायगी।' उस वैश्यकी बात सुनकर प्रेतने पूछा—'महामते! तुम किस स्थानसे यहाँ कैसे आये हो? सब सत्य-सत्य बताओ।'

वैश्यने कहा—'प्रेत! मैं गिरिराज गोवर्धन और महानदी यमुना—इन दोनोंके बीच मथुरापुरीमें रहता हूँ। मैंने पहलेसे जो कुछ सम्पत्ति संचित की थी, वह सब चोर उठा ले गये और मैं सर्वथा निर्धन हो गया, अतः थोड़ा धन लेकर व्यापारके लिये इस मरुस्थलकी ओर आया हूँ। ऐसी स्थितिमें अब तुम्हें जो जँचे, वह करो।

प्रेतने कहा—'वैश्य! तुमपर मुझे दया आ गयी है, अतः अब मैं तुम्हें खाना नहीं चाहता। यदि तुम मेरे वचनका पालन कर सको तो एक शर्तपर मैं तुम्हें छोड़ दूँगा। तुम मेरा एक कार्य सिद्ध करनेके लिये यहाँसे लौटकर मथुरा जाओ। वहाँ जाकर तुम 'चातुःसामुद्रिक' नामक कूपपर जाकर सविधि स्नानकर मेरे नामका उच्चारण करके अपने घरके धनसे विधिपूर्वक पिण्डदान करो और उन स्नान-दानादि सभी कर्मोंका फल मुझे दे देना। बस, इतना ही काम है, अब तुम सुखपूर्वक जा सकते हो।' प्रेतकी बात सुनकर वैश्यने उत्तर दिया—'प्रेत! मेरे पास एक मकानको छोड़कर घरपर और कोई धन नहीं है।' इसपर प्रेतने उससे मुसकाकर कहा—'वैश्य! मैंने जो तुमसे कहा है कि तुम्हारे घरमें धन है, उसका अभिप्राय यह है—तुम्हारे घरमें एक गढ़ा है और उसमें सुवर्णकी बहुत बड़ी संचित राशि गड़ी है। मैं तुम्हें मथुराका मार्ग भी दिखला देता हूँ।'

सूतजी कहते हैं—ऋषियो! इसपर उस वैश्यने पुनः पूछा—'प्रेत! इस योनिमें तुम्हें ऐसा दिव्य ज्ञान कैसे प्राप्त है?

प्रेतने कहा—'वैश्य! मैं भी पहले जन्ममें मथुराका निवासी था। जहाँ साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण विराजते हैं। एक दिन प्रातःकाल उन भगवान्‌के मन्दिरपर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रजनोंका समाज जुटा था। वहाँ एक श्रेष्ठ कथावाचक बैठे थे जो पुराणोंकी पवित्र कथा कह रहे थे। मेरा एक मित्र भी प्रतिदिन वहीं जाया करता था। उस दिन मित्रकी प्रेरणासे मैं भी वहाँ पहुँच गया। अत्यन्त आदरके साथ समाजने बार-बार मुझे संतुष्ट करनेका प्रयत्न किया। उसमें मैंने सुना कि वहाँ एक पवित्र कूप है जो पापोंको धो डालता है। इस कूपमें चारों समुद्र आ करके प्रतिष्ठित होते हैं। इस कूपके माहात्म्यको सुननेसे महान् फल मिलता है। उस समय सभी श्रेष्ठ पुरुषोंने कथा-वाचकजीको धन दिया, किंतु मैं मौन रह गया। तब मित्रने मुझसे पुनः कहा—'प्रियवर! अपनी शक्तिके अनुसार कुछ अवश्य