भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२८६ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १५३-१५५

पीवरीने कहा—'राजन्! आप यह क्या कह रहे हैं?' राजाने उत्तर दिया—'प्रिये! जो किसी मादक वस्तु आदिके सेवनसे बेसुध रहता है, नींदमें रहता है अथवा जिसका चित्त विक्षिप्त रहता है, उसके मुखसे असम्बद्ध शब्दोंका निकल जाना स्वाभाविक है। मैं नींदमें था, इसीसे ये शब्द निकल गये। अतः इस विषयमें तुम्हें नहीं पूछना चाहिये।' फिर रानीके बार-बार आग्रह करनेपर यक्ष्मधनुने कहा—'शुभानने! यदि मेरी बात तुम्हें सुननी आवश्यक जान पड़ती है तो हम दोनों मथुरापुरी चलें। वहीं मैं तुम्हें यह बात बताऊँगा। ग्राम, रत्न, खजाना और जनताकी सँभालके लिये पुत्रको राज्यपर अभिषिक्त कर देना चाहिये। देवि! विद्याके समान कोई आँख नहीं है, धर्मके समान कोई बल नहीं है, रागके समान कोई दुःख नहीं है और त्यागसे बढ़कर दूसरा कोई सुख नहीं है। संसारका संग्रह करनेवालेकी अपेक्षा त्यागी पुरुष सदैव श्रेष्ठ माना गया है।'

वसुंधरे! राजा यक्ष्मधनुने इस प्रकार अपनी पत्नी पीवरीसे सलाहकर अपने ज्येष्ठ पुत्रका राज्याभिषेक किया और उसके साथ श्रेष्ठ पुरुषों (मन्त्री आदि)-के रहनेकी व्यवस्था कर दी। फिर पुरवासी जनतासे विदा ले हाथी, घोड़ा, कोष और कुछ पैदल चलनेवाले पुरुषोंको साथ लेकर वे दोनों मथुराके लिये चल पड़े और बहुत दिनोंके बाद वे मथुरा पहुँचे। मथुरापुरी उस समय देवताओंकी पुरी 'अमरावती'-जैसी प्रतीत हो रही थी। बारह तीर्थोंसे सम्पन्न उस पुण्यमयी पुरीने मानो पापोंको नष्ट करनेके लिये अपनेको मनोहर बना लिया हो।

वसुंधरे! जब राजा यक्ष्मधनु और पीवरीने मथुरापुरीका दर्शन किया तो उनका हृदय प्रसन्न हो गया। फिर उस रानीने उस रहस्यको पूछा, जिसके लिये वे मथुरा आये थे। इसपर यक्ष्मधनुने कहा—'पहले तुम अपनी रहस्यपूर्ण बात बताओ, तब मैं बताऊँगा।'

पीवरी बोली—पहले मेरा निवास गङ्गाके तटपर था, किंतु वहाँ भी मेरा नाम 'पीवरी' ही था। एक बार मैं कार्तिक द्वादशीके दिन इस मथुरापुरीके दर्शनके लिये यहाँ आयी। उसी समय नावद्वारा यमुनाको पार करते समय मैं अचानक 'धारापतन' तीर्थके गहरे जलमें गिर गयी, जिससे मेरे प्राण निकल गये। इसी तीर्थके प्रभावसे मेरा काशी-नरेशके यहाँ जन्म तथा फिर आपसे विवाह हुआ।

वसुंधरे! इसके बाद राजा यक्ष्मधनुने जिस प्रकार संयमन-तीर्थमें उसकी मृत्यु हुई थी, वह सब कथा पीवरीसे सुनायी। अब वे दोनों मथुरामें ही रहने लगे और यमुनामें स्नान करनेका नियम बना लिये। प्रतिदिन नियमसे वे मेरा दर्शन करते। कालान्तरमें वहीं शरीर त्यागकर सभी बन्धनोंसे मुक्त होकर वे मेरे लोकको प्राप्त हुए।

देवि! उसी मथुरामें 'मधुवन' नामक एक अत्यन्त सुन्दर स्थान है और यहीं एक 'कुन्दवन'के नामसे मेरा प्रसिद्ध स्थान है, जहाँ जानेपर ही व्यक्ति सफल-मनोरथ हो जाता है। यहीं वनोंमें प्रधान एक 'काम्यकवन' है, जहाँ स्नान करनेसे मनुष्य मेरे धामको प्राप्त होता है। यहींके 'विमलकुण्ड' तीर्थमें स्नान करनेसे प्राणीके सम्पूर्ण पाप धुल जाते हैं और जो वहीं प्राणोंका परित्याग करता है, वह मेरे लोकमें प्रतिष्ठा पाता है। पाँचवें वनको 'वकुलवन' कहते हैं। वहाँ स्नान कर मनुष्य 'अग्निलोक' को प्राप्त करता है। यमुनाके उस पार 'भद्रवन' नामका छठा वन है। मेरी भक्तिमें परायण रहनेवाले पुरुष ही वहाँ जा पाते हैं और उन्हें नागलोककी प्राप्ति होती है।