भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय १५३-१५५ ] मथुरा, यमुना और अक्रूरतीर्थोंके माहात्म्य २८७

'खदिर वन' सातवाँ है और आठवाँ 'महावन'। नवें वनका नाम 'लौहजङ्घवन' है, क्योंकि लौहजङ्घ ही इसकी रक्षा करता था। दसवें वनका नाम 'बिल्ववन' है। वहाँ जाकर प्राणी ब्रह्माजीके लोकमें प्रतिष्ठा पाता है। 'भाण्डीर' वन ग्यारहवाँ है, जिसके दर्शनमात्रसे मनुष्य माताके गर्भमें नहीं आता। बारहवाँ वन 'वृन्दावन' है, जहाँकी अधिष्ठात्री वृन्दादेवी हैं। देवि! समस्त पापोंका संहार करनेवाला यह स्थान मुझे बहुत प्रिय है। वसुंधरे! वृन्दावन जाकर जो गोविन्दका दर्शन करते हैं, उन्हें यमपुरीमें कदापि नहीं जाना पड़ता। उनको पुण्यात्मा पुरुषोंकी गति सहज सुलभ हो जाती है।

यमुनेश्वर-तीर्थके 'धारापतन' में स्नान करनेपर मनुष्य स्वर्गका आनन्द पाता है और यहाँ प्राण त्यागनेवाला मेरे धामको जाता है। इसके आगे नागतीर्थ एवं 'घण्टाभरणतीर्थ' है, जिसमें स्नानकर मनुष्य सूर्यलोकमें जाता है। वसुधे! यहाँ 'सोमतीर्थ' का वह पवित्र स्थान है, जहाँ द्वापरमें चन्द्रमा मेरा दर्शन करते हैं। इसमें अभिषेककर मनुष्य चन्द्रलोकमें निवास करता है। यहीं जहाँ सरस्वती नदी ऊपरसे उतरी है, वह पवित्र स्थान सम्पूर्ण पापोंको हरनेवाला है।

मथुराके पश्चिममें ऋषिगण निरन्तर मेरी पूजा करते हैं। प्राचीन कालमें सृष्टिके अवसरपर ब्रह्माद्वारा मनसे निर्मित होनेके कारण इसका नाम 'मानसतीर्थ' पड़ गया है। यहाँ जो स्नान करते हैं, उन्हें स्वर्ग मिलता है। यहीं भगवान् श्रीगणेशका एक पुण्यमय तीर्थ है, जिसके प्रभावसे पाप दूरसे ही भाग जाते हैं। यहाँ चतुर्थी, अष्टमी और चतुर्दशीके दिन स्नान करनेसे मनुष्योंके सामने श्रीगणेशजीके प्रभावसे दुःख पासमें नहीं फटकते। विद्या आरम्भ की जाय अथवा यज्ञ एवं दान आदिकी क्रियाएँ सम्पन्न करनी हों तो सभी समयोंमें गौरीनन्दन गणेशजी धर्मकर्ता पुरुषके कार्यको सदा निर्विघ्न पूर्ण कर देते हैं। यहीं आधा कोसके परिमाणवाला परम दुष्कर 'शिवक्षेत्र' है, जहाँ रहकर भगवान् शंकर इस मथुरापुरीकी निरन्तर रक्षा करते हैं। उसके जलमें स्नान और उस जलका पान कर मनुष्य मथुरावासका फल प्राप्त करता है।

भगवान् वराह कहते हैं— देवि! अब मैं एक दूसरे दुर्लभ 'अक्रूर 'तीर्थका वर्णन करता हूँ। अयन* विषुव† तथा विष्णुपदीके‡ शुभ अवसरपर मैं श्रीकृष्णरूपमें वहाँ स्थित रहता हूँ। यहाँ सूर्यग्रहणके समय स्नान करनेसे मनुष्य 'राजसूय' एवं 'अश्वमेध' यज्ञोंका फल प्राप्त करता है। अब इस तीर्थके एक बहुत पुराने इतिहासको सुनो। पहले यहाँ सुधन नामका एक धनी एवं भक्त वैश्य रहता था। वह स्त्री-पुत्र और अपने बन्धुओंके साथ सदा मेरी उपासनामें लगा रहता तथा गन्ध, पुष्प, धूप तथा दीप अर्पण करके नित्य नियमानुसार मुझ श्रीहरिकी पूजा करता था। वह प्रायः एकादशीको इसी अक्रूरतीर्थमें आकर मेरे सामने नृत्य करता।

एक बार वह रात्रिजागरण, नृत्य तथा कीर्तन आदि करनेके उद्देश्यसे मेरे पास आ रहा था कि किसी भयंकर ब्रह्मराक्षसने उसके पैर पकड़ लिये। उसकी आकृति बड़ी डरावनी थी तथा बाल ऊपरको उठे हुए थे। उसने सुधनसे कहा—


* सूर्यके कर्कराशिमें आनेपर दक्षिणायन एवं मकर-राशिमें आनेपर उत्तरायण होता है। सूर्यकी इस षाण्मासिक गति एवं स्थितिको 'अयन' कहते हैं।
† जिस समय दिन और रातका मान बराबर होता है—उसका नाम 'विषुव' है। यह स्थिति प्रायः २१ मार्च और २३ सितम्बरको होती है।
‡ वृष, सिंह, वृश्चिक और कुम्भ राशियोंकी सूर्य-संक्रान्तियोंका नाम 'विष्णुपदी' है।

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