वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 295, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ें| २८४ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १५२ |
|---|
प्रतीत नहीं होता। इसी पुरीमें मेरा श्रीकृष्णावतार हुआ, अतः यह पुष्कर, प्रयाग, उज्जैन, काशी एवं नैमिषारण्यसे भी बढ़कर है। यहाँ विधिपूर्वक निवास करनेवाला मानव निःसंदेह आवागमनसे मुक्त हो जाता है। माघमासके उत्तम पर्वपर प्रयागमें निवास करनेसे मनुष्यको जो पुण्य-फल प्राप्त होता है, वह मथुरामें एक दिन रहनेपर ही मिल जाता है। इसी प्रकार वाराणसीमें हजार वर्षोंतक निवास करनेसे जिस फलकी प्राप्ति होती है, वह मथुरामें एक क्षण निवास करनेपर सुलभ हो जाता है। वसुंधरे! कार्तिक मासमें पुष्करक्षेत्रके निवासका जो सुविख्यात पुण्य (फल) है, वही पुण्य मथुरामें निवास करनेवाले जितेन्द्रिय पुरुषको सहज प्राप्त हो जाता है। यदि कोई 'मथुरामण्डल' का नाम भी उच्चारण करता है और उसे दूसरा कोई सुन लेता है तो सुननेवाला भी सब पापोंसे छूट जाता है। भूमण्डलपर समुद्रपर्यन्त जितने तीर्थ एवं सरोवर हैं, वे सभी मथुराके अन्तर्गत स्थित हैं, क्योंकि साक्षात् भगवान् श्रीहरि ही गुप्तरूपसे वहाँ निरन्तर निवास करते हैं। कुब्जाम्रक, सौकरव और मथुरा —ये परम विशिष्ट तीर्थ हैं, जहाँ योग-तपकी साधना न रहनेपर भी इन स्थानोंके निवासी सिद्धि पा जाते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है।
देवि! द्वापरयुग आनेपर मैं वहाँ राजा ययातिके वंशमें अवतार ग्रहण करूँगा और मेरी क्षत्रिय जाति होगी। उस समय मैं चार मूर्ति—कृष्ण, बलराम, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध बनकर चतुर्व्यूहके रूपमें सौ वर्षोंतक वहाँ निवास करूँगा। मेरे ये चारों विग्रह क्रमशः चन्दन, सुवर्ण, अशोक एवं कमलके सदृश रूपवाले होंगे। उस समय धर्मसे द्वेष करनेवाले कंस आदि महान् भयंकर बत्तीस दैत्य उत्पन्न होंगे, जिनका मैं संहार करूँगा, वहाँ सूर्यकी पुत्री यमुनाका सुन्दर प्रवाह सदा संनिकट शोभा पाता है। मथुरामें मेरे और बहुत-से गुप्त तीर्थ हैं। देवि! उन तीर्थोंमें स्नान करनेपर मनुष्य मेरे लोकमें प्रतिष्ठित होता है और वहाँ मरनेपर वह चार भुजाओंसे युक्त होकर मेरा स्वरूप बन जाता है।
देवि! मथुरामण्डलमें 'विश्रान्ति' नामका एक तीर्थ है, जो तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। वहाँ स्नान करनेवाला मानव मेरे लोकमें रहनेका स्थान पाता है और वहाँ मेरी प्रतिमाका दर्शनकर सम्पूर्ण तीर्थोंके अवगाहनका फल प्राप्त करता है। जो दो बार उसकी प्रदक्षिणा कर लेता है, वह विष्णुलोकका भागी होता है। इसी प्रकार एक कनखल नामक अत्यन्त गुह्य स्थान है, जहाँ केवल स्नान करनेसे ही मनुष्य स्वर्ग-सुखका अधिकारी हो जाता है। ऐसे ही 'विन्दुक' नामसे विख्यात मेरा एक परम गोप्य क्षेत्र है। देवि! उस क्षेत्रमें स्नान करनेवाला व्यक्ति मेरे लोकमें प्रतिष्ठा पाता है।
वसुंधरे! अब उस तीर्थमें घटित एक प्राचीन इतिहास सुनो। पाञ्चालदेशमें प्रसिद्ध काम्पिल्य* नगरमें राजा ब्रह्मदत्त रहते थे। वहीं तिन्दुक नामक एक नाई रहता था। बहुत दिनोंतक यहाँ निवास करनेके बाद उसका पूरा परिवार क्षीण हो गया और वह पीड़ित होकर वहाँसे मथुरा चला आया और एक ब्राह्मणके घर रहने लगा। वहाँ वह ब्राह्मणके सैकड़ों कार्य करते हुए प्रतिदिन यमुना-स्नान भी करता। इस प्रकार दीर्घकाल व्यतीत होनेपर उसकी इसी तीर्थमें मृत्यु हुई, जिससे दूसरे जन्ममें वह जातिस्मर ब्राह्मण हुआ।
इसी मथुरामें एक 'सूर्यतीर्थ' है, जो सब पापोंसे मुक्त करनेवाला है, जहाँ विरोचनपुत्र
* फर्रूखाबाद जिलेका 'कम्पिल' नगर।