वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १५२ ] मथुरातीर्थकी प्रशंसा [ २८३
देवि! इस ‘लोहार्गल’क्षेत्रमें मेरा एक पञ्चकुण्ड नामक प्रधान तीर्थ है, जहाँ हिमालयसे निकलकर जलकी पाँच धाराएँ गिरती हैं। वहाँ पाँच दिनोंतक निवास एवं स्नानकर मनुष्य ‘पञ्चशिख’ स्थानपर निवास करता है। यदि इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर वह मेरा भक्त वहाँ प्राण त्यागता है तो वह मेरे लोकको प्राप्त कर लेता है।
इसी ‘लोहार्गल’ क्षेत्रमें ‘सप्तर्षिकुण्ड’ संज्ञक एक अन्य तीर्थ है। वहाँके स्नानके पुण्यसे पुरुष ऋषियोंके लोकोंमें जाकर हर्षपूर्वक निवास करता है। देवि! वहीं ‘अग्निसर’ नामसे विख्यात एक कुण्ड है, जहाँ आठ रातोंतक रहकर तथा उस कुण्डमें स्नानकर प्राणी सभी सुखोंका उपभोगकर अङ्गिरामुनिके लोकको प्राप्त होता है, इसमें कोई संशय नहीं। यदि मुझसे सम्बन्धित कर्ममें तत्पर वह पुरुष वहाँ प्राण छोड़ता है तो अग्निके लोकका त्यागकर मेरे धामको प्राप्त होता है।
देवि! उसी ‘लोहार्गल’क्षेत्रमें ‘उमाकुण्ड’ नामसे एक प्रसिद्ध स्थान है। यह वह स्थान है, जहाँ भगवान् शंकरकी परमसुन्दरी पत्नी गौरीका प्राकट्य हुआ था। वहाँ दस रातोंतक रहकर मनुष्यको स्नान करना चाहिये। इससे उसे गौरीका दर्शन सुलभ होता है और उनके लोकमें वह सानन्द निवास करता है। यदि आयु क्षीण होनेपर वह मनुष्य उस स्थानपर प्राणका त्याग करता है तो उस लोकसे हटकर मेरे धाममें शोभा पाता है। भगवान् शंकरके साथ उमादेवीका यहीं विवाह हुआ था। इसमें हंस, कारण्डव, चक्रवाक, सारस आदि पक्षी सदा निवास करते हैं। हिमालय-पर्वतसे होकर यहाँ निर्मल जलकी तीन धाराएँ गिरती हैं। मनुष्य बारह दिनोंतक यहाँ निवास और स्नान करे तो वह रुद्रलोकमें आनन्द करता है। यदि वहाँ वह अत्यन्त कठिन कर्म करके प्राणोंको छोड़ता है तो रुद्रलोकसे पृथक् होकर मेरे स्थानकी यात्रा करता है। वहीं ‘ब्रह्मकुण्ड’ नामक स्थानमें चारों वेदोंकी उत्पत्ति हुई थी। इसीके उत्तर-पार्श्वमें सुवर्णके समान रंगवाली एक स्वच्छ जलकी धारा गिरती है, जहाँ ऋग्वेदकी ध्वनि हुई थी। यहीं पश्चिमभागमें यजुर्वेदसे युक्त धारा तथा दक्षिण-पार्श्वमें अथर्ववेदसे समन्वित धारा गिरती है। सात रातोंतक रहकर जो मनुष्य वहाँ स्नान करता है, वह ब्रह्माके लोकको प्राप्त करता है। यदि अहंकारशून्य होकर वह व्यक्ति वहाँ प्राण त्यागता है तो उस लोकका परित्याग करके मेरे लोकमें आ जाता है। महाभागे! मेरे इस ‘लोहार्गल’क्षेत्रकी कथा बड़ी ही रहस्यात्मक है। सिद्धि चाहनेवाले मनुष्यको वहाँ अवश्य जाना चाहिये। वरानने! वह क्षेत्र पचीस योजनकी दूरीमें चारों ओर फैला है और स्वयं ही प्रकट हुआ है। यह विषय आख्यानोंमें परम आख्यान, धर्मोंमें सर्वोत्कृष्ट धर्म तथा पवित्रोंमें परम पवित्र है। जो श्रद्धालु पुरुष इसका पाठ करते हैं अथवा सुनते हैं, उनके माता एवं पिता—इन दोनों कुलोंके दस-दस पूर्वपुरुषोंका संसार-सागरसे उद्धार हो जाता है।
[ अध्याय १५१ ]
मथुरातीर्थकी प्रशंसा
**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! भगवान् श्रीहरिके द्वारा ‘लोहार्गल’क्षेत्रकी महिमा सुनकर पृथ्वीको बड़ा आश्चर्य हुआ और वे बोलीं—
प्रभो! आपकी कृपासे मैंने ‘लोहार्गल’क्षेत्रका माहात्म्य सुना। यदि इससे भी श्रेष्ठ तीर्थोंमें सर्वोत्तम एवं सबके लिये कल्याणकारी कोई तीर्थ हो तो उसे बतानेकी कृपा कीजिये।
**भगवान् वराह कहते हैं—**वसुंधरे! मथुराके समान मेरे लिये दूसरा कोई भी तीर्थ आकाश, पाताल एवं मर्त्य—इन तीनों लोकोंमें कहीं प्रिय