वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २८२ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १५१ |
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हूँ, सुनो। 'सिद्धवट' नामक स्थानसे तीस योजनकी दूरीपर म्लेच्छोंका देश है, जिसके मध्य दक्षिण भागमें हिमालयपर्वत स्थित है। वहीं मेरा 'लोहार्गल'* नामसे प्रसिद्ध एक गुप्त क्षेत्र है। वह पंद्रह आयामका क्षेत्र चारों ओर पाँच योजनतक फैला है। चतुर्दिक् वेष्टित वह स्थान पापियोंके लिये दुर्गम एवं दुःसह है, पर जो सदा मेरे चिन्तनमें तत्पर रहते हैं और जिनका सारा समय पुण्यकार्यमें लगता है, उनके लिये वह परम सुलभ है। भद्रे ! उस स्थानके उत्तर दिशामें मैं निवास करता हूँ। वहाँ सुवर्णमयी मेरी प्रशस्त प्रतिमा है।
वसुंधरे! एक समय मेरे उस उत्तम स्थानपर सम्पूर्ण दानवोंने आक्रमण कर दिया। मायाके बलसे उन्होंने मेरी अवहेलना भी कर दी थी, तब ब्रह्मा, रुद्र, स्कन्द, इन्द्र, मरुद्गण, आदित्य, वसुगण, वायु, अश्विनीकुमार, चन्द्रमा, बृहस्पति तथा समस्त देव-समुदायको मैंने वहाँ सुरक्षित किया और अपना तेजस्वी सुदर्शनचक्र उठाकर उन निशाचरोंका संहार कर दिया। इससे देवगण आनन्दित हो विचरने लगे। तभीसे मैंने उस स्थानका नाम 'लोहार्गल' रख दिया और प्रबल शक्तिशाली देवसमुदायकी वहाँ प्रतिष्ठा कर अपनी भी प्रतिमा प्रतिष्ठित कर दी। उस स्थानपर मेरी प्रतिष्ठित मूर्तिका जो व्यक्ति यत्नपूर्वक दर्शन करता है, भूमे! वह मेरा भक्त हो जाता है। जो मनुष्य तीन रातोंतक वहाँ निवास करके शास्त्रविहित कर्म करता है और नियमके साथ वहाँके कुण्डमें स्नान करता है, वह कई हजार वर्षोंतक स्वर्गमें जाकर आनन्द भोगता है—इसमें कुछ भी संशय नहीं। यदि अपने कर्ममें भलीभाँति तत्पर रहनेवाला वह व्यक्ति वहाँ प्राण त्यागता है तो उन स्वर्गलोकोंसे भी आगे मेरे धाममें चला जाता है।
एक बार मैंने एक अश्वकी रचनाकर उसे अखिल आभूषणोंसे अलंकृत किया। वह अश्व श्वेत कमल, शङ्ख अथवा कुन्दपुष्पके समान विद्योतित हो रहा था। धनुष, अक्षसूत्र और कमण्डलु लेकर तथा उसपर आसीन होकर मैंने यात्रा आरम्भ की और चलते-चलते सीधे श्वेतपर्वतपर पहुँचा, जहाँ कुरुवंशी रहते थे। फिर वहाँसे मैंने उन्हें गिराना आरम्भ किया और आकाशतलसे बहुतसे दूसरोंको भी मार गिराया। इस प्रकार सभीको नष्टकर भी वह अश्व आकाशमें शान्त, ज्यों-का-त्यों सुरक्षित तथा सुस्थिर रहा।
**भगवान् वराह बोले—**सुमध्यमे ! तबसे पुरुष उत्तम कुलके अश्वोंपर चढ़कर स्वर्गतककी यात्रा करने लगे। देवि! 'पञ्चसार' नामसे प्रसिद्ध मेरा एक परम गुप्त क्षेत्र है। वहाँ शङ्खके समान सफेद एवं तीव्र गतिसे बहनेवाली जलकी चार धाराएँ गिरती हैं। उस क्षेत्रमें चार दिनोंतक रहकर व्यक्ति 'चैत्राङ्गद' लोकमें जाकर गन्धर्वोंके साथ विहार करता है और वहाँ प्राणत्यागकर प्राणी मेरे लोकको प्राप्त होता है। यहीं 'नारदकुण्ड' नामसे विख्यात मेरा एक दूसरा उत्तम क्षेत्र है, जहाँ तालवृक्षके समान मोटी जलकी पाँच धाराएँ गिरती हैं। उस तीर्थमें एक दिन निवास और स्नान कर पुरुष देवर्षि नारदजीके दर्शनका सौभाग्य प्राप्त करता है तथा वहाँ मरकर मेरे धामको जाता है। यहीं एक वसिष्ठकुण्ड है, जिसमें जलकी तीन धाराएँ गिरती हैं। वहाँ पाँच रात स्नान तथा निवास कर मनुष्य वसिष्ठजीके लोकमें आनन्द प्राप्त करता है। मेरे कर्मोंमें लगा वह पुरुष यदि यहाँ प्राण छोड़ता है तो उस लोकको छोड़कर मेरे धाममें पहुँच जाता है।
* इसका वर्णन अ० १४०।५ आदिमें भी आया है, यह लोहानदीपर स्थित 'लोहाघाट' है। देखिये पृष्ठ २६४ की टिप्पणी।
'Lohaghat in kumauon, 3 miles north to the champawat, on the river Loha.' (N.L.Dey.Geog. Dic. of Anc. & Med. India, P. 115)