वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १५१ ] लोहार्गल-क्षेत्रका माहात्म्य २८१
आनन्दपूर्वक निवास करता है। महाभागे! वहाँ जो आश्चर्यकी बात देखी जाती है, उसे कहता हूँ, सुनो। भूमे! जिनका अन्तःकरण पवित्र है तथा जो मुझमें श्रद्धा रखते हैं, वे ही उस दृश्यको देख पाते हैं। उस दृश्यके प्रभावसे संसार-सागरसे पुरुषोंका उद्धार हो जाता है। भद्रे! वहाँ चारों दिशाओंसे जलकी चार धाराएँ गिरती हैं। वहाँका गिरा हुआ जल न अधिक बढ़ता है और न कम ही होता है, उसकी स्थिति सदा समान बनी रहती है। भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशी तिथिके पुण्य पर्वपर कानोंको मनोहर सुनायी पड़नेवाला उत्तम गीत वहाँ उच्चरित होता रहता है।
वसुंधरे! शूर्पारक नामसे प्रसिद्ध मेरा एक परम पवित्र एवं गुह्य क्षेत्र है, जो परशुराम और श्रीरामके आश्रमोंसे सुशोभित है। देवि! वह पावन स्थल समुद्रके तटपर है। मैं वहाँ शाल्मली वृक्षके नीचे निवास करता हूँ। वहाँ पाँच दिनोंतक रहकर मनुष्यको स्नान करना चाहिये। इसके फलस्वरूप मनुष्य ऋषिलोकमें जाकर अरुन्धतीका दर्शन कर सकता है। यदि मेरे शुद्ध सत्कर्ममें संलग्न रहता हुआ वह पुरुष अपने प्राणोंका त्याग करता है, तो ऋषिलोकको छोड़कर मेरे स्थानमें पहुँच जाता है। महाभागे! इसकी एक आश्चर्यमयी बात यह है कि यहाँ जो मुझे एक बार प्रणाम करता है, वह बारह वर्षोंतक किये गये नमस्कारके फलका भागी हो जाता है। इस शूर्पारक*क्षेत्रमें निष्ठावान् पुरुष ही मेरा दर्शन कर पाते हैं, मायासे मोहित व्यक्ति मुझे नहीं देख पाते।
महाभागे! इसी 'सानन्दूर'क्षेत्रमें मेरा एक परम गुप्त स्थान है। वायव्य (पश्चिम और उत्तरके) कोणमें विराजमान उस क्षेत्रका नाम 'जटाकुण्ड' है। प्रिये! चारों ओर वह दस योजनतक फैला है। यह स्थान मलयाचलके दक्षिण और समुद्रके उत्तर भागमें है। यहाँ रहकर मानवको पाँच दिनोंतक स्नान करना चाहिये। इसके फलस्वरूप वह व्यक्ति अगस्त्यमुनिके आश्रममें जाकर निश्चय ही आनन्दपूर्वक निवास कर सकता है। यदि मेरा चिन्तन करता हुआ मानव वहाँ प्राण-विसर्जन करता है तो वह उस स्थानको छोड़कर मेरे लोकमें जानेका पूर्ण अधिकारी बन जाता है। सुश्रोणि! उस कुण्डकी नौ जलकी धाराएँ हैं।
भद्रे! यह 'सानन्दूर' क्षेत्रकी महिमाका मैंने वर्णन किया। इसे सुननेसे भगवान् श्रीहरिमें भक्ति और श्रद्धा बढ़ती है। यह क्षेत्र गुह्योंमें परम गुह्य और स्थानोंमें सर्वोत्तम स्थान है। सुश्रोणि! नौ प्रकारकी भक्तियोंमें संलग्न जो व्यक्ति इस 'सानन्दूर'क्षेत्रमें जाता है, उसे मेरे कथनानुसार परम सिद्धि प्राप्त हो जाती है। जो मनुष्य प्रतिदिन प्रसन्नताके साथ इसे पढ़ता है अथवा सुनता है, उसके अठारह पीढ़ीके पूर्वपुरुष तर जाते हैं। [अध्याय १५०]
लोहार्गल-क्षेत्रका माहात्म्य
**पृथ्वी बोली—**विष्णो! आप जगत्के स्वामी हैं। मैं आपके मुखसे 'सानन्दूर'क्षेत्रकी परम उत्तम एवं रहस्यपूर्ण महिमा सुन चुकी। इसके सुननेसे मुझे परम शान्ति प्राप्त हुई। यदि इससे भिन्न और कोई सुखदायी गुप्त क्षेत्र हो तो मैं उसे भी जानना चाहती हूँ, आप कृपया उसे भी बतलायें।
**भगवान् वराह कहते हैं—**देवि! मैं अब तत्त्वपूर्वक एक दूसरे गुप्त क्षेत्रका प्रसङ्ग बताता
* 'शूर्पारक' क्षेत्र आजके बम्बई नगरका 'थाणा' स्थान है। इसका भागवत १०।७९।२० तथा महाभारत २।३१।६५; ३।८५। ४३; १९८।८; १२।४९।६६-६७, जातक ४। १३८ आदिमें भी वर्णन आया है। एवं इसका सोपार या ओपार नामसे बाइबिलमें भी उल्लेख मिलता है।