वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २८० | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १५० |
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लाभ एवं हानिसे निश्चिन्त होकर वहाँ निवास करनेवाला मनुष्य सूर्यलोकका उल्लङ्घन कर मेरे लोकमें प्रतिष्ठा पाता है।
देवि! दसों दिशाओंमें चारों ओर फैला हुआ यह मेरा 'द्वारकाक्षेत्र' तीस योजनके प्रमाणमें है। वरारोहे! वहाँ जो पुण्यात्मा मनुष्य मेरा भक्तिपूर्वक दर्शन करेंगे, उन्हें बहुत शीघ्र ही परम गति प्राप्त हो जायगी। यह प्रसङ्ग आख्यानोंमें महान् आख्यान, शान्तियोंमें परम शान्ति, धर्मोंमें परम धर्म, द्युतियोंमें परम द्युति, लाभोंमें परम लाभ, क्रियाओंमें परम क्रिया, श्रुतियोंमें परम श्रुति तथा तपस्याओंमें परम तपस्या है। भद्रे! जो मानव प्रातःकाल उठकर इसका अध्ययन करता है, वह अपने कुलकी इक्कीस पीढ़ियोंको तार देता है। देवि! द्वारकाक्षेत्रके इस पुनीत प्रसङ्गको मैंने तुम्हें सुना दिया। अब उचित एवं लोकोपकारी अन्य कोई प्रसङ्ग तुम पूछना चाहती हो तो पूछो!
[अध्याय १४९]
सानन्दूर-माहात्म्य
पृथ्वी बोली— प्रभो! आपने कृपापूर्वक मुझे द्वारका-माहात्म्यका वर्णन सुनाया। इस परम पवित्र विषयको सुननेसे मैं कृतकृत्य हो गयी। जगत्प्रभो! यदि इससे भी अधिक कोई गुह्य प्रसङ्ग हो तो वह भी मैं सुनना चाहती हूँ। जनार्दन! यदि मुझपर आपकी अपार दया हो तो वह भी कहनेकी कृपा कीजिये।
भगवान् वराह कहते हैं— देवि! 'सानन्दूर' नामसे प्रसिद्ध मेरा एक परम गुप्त निवासस्थल है। यह क्षेत्र समुद्रसे उत्तर और मलयगिरिसे दक्षिणकी ओर है। वहाँ मेरी एक मध्यम प्रमाणकी अत्यन्त आश्चर्यमयी प्रतिमा है। जिसे कुछ लोग लोहेकी, कुछ लोग ताँबेकी और कितने व्यक्ति कांस्य (काँसा) धातुसे निर्मित समझते हैं तथा कुछ लोग कहते हैं कि यह सीसेकी बनी है। मेरी उस प्रतिमाको अन्य व्यक्ति प्रस्तरकी बनी हुई भी कहते हैं। भूमे! अब वहाँके स्थानोंका वर्णन करता हूँ, सुनो। यशस्विनि! इस 'सानन्दूर' नामक मेरे क्षेत्रकी ऐसी महिमा है कि वहाँ जानेवाले मानव संसार-सागरसे पार हो जाते हैं।
वरानने! 'सानन्दूर' क्षेत्रमें संगमन नामका एक मेरा परम उत्तम गुह्य क्षेत्र है। प्रिये! रामसर और समुद्रके समागमका वह स्थान है। महाभागे! वहाँ स्वच्छ जलवाला एक कुण्ड है। बहुत-सी वल्लरियों, लताओं और पक्षियोंसे उसकी विचित्र शोभा होती है। समुद्रके संनिकटमें ही कुछ योजन दूरीपर वह स्थान है। अनेक सुगन्धित उत्तम कुमुद एवं कमलके पुष्प उसकी सदा मनोहरता बढ़ाते रहते हैं। मनुष्यको चाहिये कि वहाँ छः दिनोंतक निवास एवं अवगाहन करे। इसके प्रभावसे वह कुछ समय समुद्रके भवनमें रहकर मेरे धाममें चला जाता है।
सुमध्यमे! सानन्दूर-क्षेत्रमें 'शक्रसर' नामसे विख्यात मेरा एक परम गुह्य क्षेत्र है। वहाँसे पूर्व-भागमें कुछ योजनकी दूरीपर वह स्थान है। उस कुण्डके मध्यभागमें विषमरूपसे जलकी चार धाराएँ गिरती हैं। कल्याणि! उन धाराओंके जल अत्यन्त निर्मल होते हैं। चार दिनोंतक रहकर वहाँ मनुष्यको स्नान करना चाहिये। इस पुण्यसे वह चार लोकपालोंके उत्तम नगरोंमें जानेका अधिकारी होता है। वहाँके तालाबका नाम 'शक्रसर' है। यदि वहाँ कोई व्यक्ति प्राण परित्याग करता है तो वह लोकपालोंका स्थान छोड़कर मेरे धाममें