वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१२७- द्वारका-माहात्म्य
| २७० | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १४५ |
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भगवान्ने सुदर्शन चक्रसे ग्राहके मुँहको चीर डाला। वसुंधरे! वे अपने चक्रको बार-बार चला रहे थे। इससे शिलाओंपर भी चोट पहुँची। अतः चक्रके आघातसे शिलाओंमें भी उनके चिह्न पड़ गये जिससे वे शिलाएँ वज्रकीटद्वारा खायी-सी दीखती हैं। सुन्दरि! इस त्रिवेणीक्षेत्रके विषयमें तुम्हें संदेह करना ठीक नहीं है। इस क्षेत्रकी ऐसी महिमा है, जिसका वर्णन मैंने तुमसे किया।^१
वसुंधरे! राजा भरत भी पुलह-पुलस्त्यमुनिके आश्रमके निकट जाकर 'त्रिजलेश्वर'भगवान्की पूजामें संलग्न हुए तो उनकी संसारसे सर्वथा विरति हो गयी और मृगके शरीर छूटनेके पश्चात् वे जडभरत हुए^२। इस जन्ममें भी पुनः उन्होंने इनकी पूजा की। इसीसे वे जलेश्वर या जडेश्वर भी कहलाने लगे। भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करनेसे योग-सिद्धि प्राप्त हो जाती है। सुभगे! जब मैं श्रेष्ठ शालग्राम-क्षेत्रमें था तो वहीं मुझे यह बात विदित हुई कि जलेश्वर (जडभरत)-ने मेरी स्तुति की है। वसुधे! भक्तोंपर कृपा करनेके लिये मैं विवश हो जाता हूँ, अतः मैंने अपना सुदर्शन चक्र चलाया। मेरा प्रथम चक्र जहाँ गिरा, वहाँ 'चक्रतीर्थ' बन गया। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य तेजसे सम्पन्न होकर सूर्यके लोकमें प्रतिष्ठा पाता है और मरकर मेरे लोकको प्राप्त होता है। मेरे तथा भगवान् शंकरके वहाँ रहनेके कारण ही यह तीर्थ 'हरिहरक्षेत्र' कहलाने लगा।
यहाँ 'त्रिधारक' नामका तीर्थ है, जिसके पूर्वभागमें 'हंसतीर्थ' नामसे प्रसिद्ध एक स्थान है। वहाँका एक कौतुकपूर्ण सर्वोत्कृष्ट वृत्तान्त बताता हूँ, सुनो। किसी समयकी शिवरात्रिके दिन जब इस मन्दिरमें उत्सव चल रहा था, अनेक प्रकारके नैवेद्य अर्पण करके शंकरजीकी उपासना चल रही थी, इतनेमें ही कुछ भूखे कौए उस अन्नपर टूट पड़े और एक कौआ अन्न उठाकर ऊपर उड़ गया और दूसरा उसको छीननेके लिये उसपर झपटा। इस प्रकार वे दोनों परस्पर लड़ते हुए एक कुण्डमें गिर पड़े। वहाँ गिरते ही सहसा उनकी आकृति हंसके समान हो गयी और जब वे बाहर निकले तो उनसे चन्द्रमाके तुल्य प्रकाश फैलने लगा। वहाँकी जनता यह देखकर महान् आश्चर्यमें भर गयी। तबसे लोग उस स्थानको 'हंसतीर्थ' कहने लगे। बहुत पहले यहीं यक्षोंने भगवान् शंकरकी आराधना की थी। उस समयसे वह 'यक्षतीर्थ'के नामसे कहा जाता है। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य पवित्र होकर यक्षोंके लोकमें प्रतिष्ठा पाता है। [ अध्याय १४४ ]
शालग्राम-क्षेत्रका माहात्म्य
धरणीने पूछा— भगवान्! आप सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी हैं। मैं जानना चाहती हूँ कि मुनिवर सालङ्कायनने आपके उस मुक्तिप्रद क्षेत्रमें तपस्या करते हुए अन्य कौन-सा कार्य किया और कौन-सी सिद्धि प्राप्त की?'
भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! सालङ्कायन मुनि वहाँ दीर्घ कालतक तप करते रहे। उनके सामने शालका एक उत्तम वृक्ष था, जिससे सुगन्ध फैल रही थी। सालङ्कायन ऋषि निरन्तर तप करनेसे थक गये थे। इतनेमें उनकी दृष्टि उस शाल-वृक्षपर पड़ी। वे उस विशाल वृक्षके नीचे गये और विश्राम करने लगे। उनके मनमें मेरे दर्शनकी अभिलाषा बनी रही। उस समय शाल-वृक्षके पूर्वभागमें पश्चिमकी ओर मुख करके मुनि
१. इसमें तथा श्रीमद्भागवत ८। २—४ एवं वामन-पुराणके 'गजेन्द्रमोक्ष' कथामें कुछ अन्तर है।
२. यह कथा भागवत ५। १० में है।
अध्याय १४५ ] शालग्राम-क्षेत्रका माहात्म्य २७१
बैठे थे। मेरी मायाने उन्हें ज्ञानशून्य बना दिया था, अतः वे मुझे देख न सके। सुन्दरि ! कुछ दिनोंके बाद जब वैशाख मासकी द्वादशी तिथि आयी तो वहीं पूर्व दिशामें ही उन्हें मेरा दर्शन प्राप्त हुआ। उस समय उत्तम व्रतका पालन करनेवाले उन तपस्वी मुनिने मुझे वहाँ देखकर बार-बार प्रणाम किया और वेदके मन्त्रोंसे मेरी स्तुति करने लगे। उस अवसरपर मेरे तीक्ष्ण तेजसे मुनिके नेत्र चौंधिया गये, अतः उन्होंने धीरेसे अपने नेत्र बंद कर लिये और स्तुति करने लगे। फिर ज्यों ही उन्होंने अपनी आँखें खोलीं तो उन्होंने देखा कि मैं उस वृक्षके दक्षिणभागमें खड़ा हूँ। अब वे ऋषि मेरे सामने आकर बैठ गये और ऋग्वेदकी ऋचाओंसे मेरी स्तुति करने लगे। तबतक मैं शालके पश्चिम ओर चला गया। तब वे मुनि भी वहीं पश्चिमकी ओर जाकर बैठ गये और 'यजुर्वेद' के मन्त्रोंसे मेरी स्तुति की। देवि ! इसके बाद मैं उसके उत्तर दिशामें चला गया। वहाँ भी वे सामवेदके मन्त्रोंका गान करके मेरी स्तुति करने लगे। सुन्दरि ! फिर तो उन ऋषिप्रवर सालङ्कायनकी स्तुतियोंसे संतुष्ट होकर मैं उनपर अत्यन्त प्रसन्न हो गया। अतः उनसे कहा— 'मुनिवर सालङ्कायन ! तुम्हारे इस तप एवं स्तुतिके प्रभावसे मैं परम संतुष्ट हूँ। तपस्याके फलस्वरूप तुम्हें परम सिद्धि प्राप्त हो गयी है।'
इसपर सालङ्कायन मुनिने विनयपूर्वक मुझसे कहा—'हरे ! मैं भूमण्डलपर निरन्तर भ्रमण तथा तप करता रहा। किंतु निश्चित रूपसे मुझे आज ही आपका शुभ दर्शन प्राप्त हुआ है। यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और मुझे वर देना चाहते हैं तो जगन्नाथ ! मुझे भगवान् शिवके समान पुत्र देनेकी कृपा कीजिये। मुनीश्वर ! ईश्वरकी ही एक दूसरी मूर्ति नन्दिकेश्वरके नामसे प्रसिद्ध है जो (नन्दिकेश्वर) आपके दाहिने अङ्गसे पुत्रके रूपमें प्रकट हो चुके हैं। ब्राह्मणदेव ! अब आप तपसे उपरत हों। योगमायाकी शक्तिसे सम्पन्न होकर वे इस समय मेरे साथ व्रजमें विराज रहे हैं। आपके शिष्य आमुष्यायणको मथुरासे बुलाकर उनके साथ वे शूलपाणि-रूपमें वहाँ अवस्थित हैं। अब एक दूसरी गुप्त बात भी बताता हूँ, उसे सुनें। आजसे यह उत्तम क्षेत्र 'शालग्राम' क्षेत्र कहलायगा। साथ ही आपने जो यह वृक्ष देखा है, वह भी निःसंदेह मैं ही हूँ। इसे भगवान् शंकरके अतिरिक्त अन्य कोई भी व्यक्ति नहीं जानता। मैं अपनी योगमायासे सदा छिपा रहता हूँ, किंतु आपके तपसे मैं प्रकट हुआ हूँ।'
वसुधे ! उस समय सालङ्कायन मुनिको इस प्रकार वर देकर उनके देखते-ही-देखते मैं अन्तर्धान हो गया। उस वृक्षकी प्रदक्षिणा करके सालङ्कायन मुनि भी अपने आश्रमको चल पड़े।
वसुंधरे ! अब एक दूसरा महान् आश्चर्यपूर्ण स्थान बतलाता हूँ। यहाँ 'शङ्खप्रभ' नामसे प्रसिद्ध मेरा एक परम गुह्य क्षेत्र है। वहाँ द्वादशीके पर्वपर आधी रातमें शङ्खकी ध्वनि सुनायी देती है। उसी क्षेत्रके दक्षिण दिशामें 'गदाकुण्ड' नामसे विख्यात मेरा एक अन्य स्थान भी है, जहाँसे एक जल-स्रोत प्रवाहित है। वहाँ तीन दिनोंतक रहकर स्नान करनेकी विधि है। इसमें स्नान करनेवाला व्यक्ति वेदान्तवादी ब्राह्मणोंके समान फलभागी होता है। यदि श्रद्धालु एवं गुणवान् मनुष्य उस क्षेत्रमें प्राणका परित्याग करता है तो वह हाथमें गदा लिये हुए विशालकाय होकर मेरे लोकको प्राप्त करता है।
वसुंधरे ! यहीं 'देवह्रद' संज्ञावाला मेरा एक दूसरा क्षेत्र भी है। यह अगाध जलवाला श्रेष्ठ देव-सरोवर सुन्दर एवं शीतल जलसे सम्पन्न होकर
१२८- सानन्दूर-माहात्म्य
| २७२ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १४५ |
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सबको सुख पहुँचाता है। देवता भी उसके लिये तरसते हैं। पृथ्वी देवि! वह ह्रद सदा जलसे परिपूर्ण रहता है। उसमें अनेक ऐसी मछलियाँ भी विचरण करती रहती हैं, जिनपर चक्रका चिह्न अङ्कित रहता है।
सुनयने! अब वहाँका एक दूसरा प्रसङ्ग बताता हूँ, उसे सुनो। वहाँ एक आश्चर्ययुक्त घटना निरन्तर घटती रहती है। मुझमें श्रद्धा रखनेवाला मानव ही इस अलौकिक आश्चर्यमय दृश्यको देख सकता है, पापी पुरुष उसे देखनेमें असमर्थ है। उस परम पवित्र देवह्रदमें सूर्योदयके समय सुनहरे रंगके छत्तीस स्वर्णकमल दिखायी पड़ते हैं, जिन्हें सभी लोग मध्याह्न कालतक देखते हैं। उसमें स्नान करनेपर मानसिक, वाचिक एवं शारीरिक मल धुल जाते हैं और वे शुद्ध होकर स्वर्ग चले जाते हैं। जो व्यक्ति दस दिनोंतक वहाँ निवास एवं स्नान करता है, उसे विधिपूर्वक अनुष्ठित दस अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। यदि मेरे चिन्तनमें संलग्न प्राणी वहाँ अपना प्राण त्याग करता है तो वह अश्वमेध-यज्ञके फलको भोगकर मेरा सारूप्य मोक्ष प्राप्त करता है।
देवि! यहीं श्रीकृष्णके विग्रहसे 'कृष्णगण्डकी' का प्रादुर्भाव हुआ है। इसी प्रकार 'त्रिशूलगङ्गा' नामकी प्रसिद्ध विशाल नदी जो शिवके शरीरसे निकली है, वह भी यहीं है। इस प्रकार दोनों नदियोंके बीचका यह प्रदेश तीर्थ बन गया है। इस स्थानको 'सर्वतीर्थकदम्बक' कहते हैं। यहाँका कदली-वन शिववनकी सुषमा बढ़ाता है। निचुल, जायफल, नागकेसर, खजूर, अशोक, वकुल, आम्र, प्रियालक, नारियल, सोपारी, चम्पा, जामुन, धव, नारङ्गी, बेर, जम्बीर, मातुलुङ्ग, केतकी, मल्लिका (चमेली), यूथिका (जूही), कूई, कोरया, कुटन और अनार आदि अनेक फलों तथा फूलोंवाले वृक्षोंसे उसकी अनुपम शोभा होती रहती है। देवता लोग अपनी पत्नियोंके साथ वहाँ आकर आनन्दका अनुभव करते हैं। इस परम पुण्यमय सरोवरमें उन दो महान् नदियोंका सङ्गम है। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य सौ अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्राप्त करता है। वहाँ वैशाख मासमें स्नान करनेसे एक हजार गाय दान करनेका, माघ महीनेमें स्नान करनेका तथा प्रयागमें मकर स्नानका फल पा लेता है। कार्तिक मासमें सूर्य जब तुला राशिपर आ जायँ, तब वहाँ विधिपूर्वक स्नान करनेवाला निश्चय ही मुक्तिफलका अधिकारी हो जाता है। देवि! इस प्रकार यह हम लोगोंका 'हरिहरात्मक' क्षेत्र है। जो यहाँ शरीरका त्याग करते हैं, उन मेरे कर्मके अनुसरण करनेवाले व्यक्तियोंको उत्तम गति प्राप्त होती है। पहले 'मुक्तिक्षेत्र', तब 'रुरुखण्ड' फिर उन दोनों दिव्य स्थलोंसे निर्मित बहाव-प्रदेश और त्रिवेणी-सङ्गम—इन तीर्थोंमें उत्तरोत्तर क्रमशः एक-से-एक श्रेष्ठ माने जाते हैं। गण्डकीसे सङ्गम-क्षेत्रको परम प्रमाण जानना चाहिये। देवि! इस प्रकार नदियोंमें वह गण्डकी नदी सर्वश्रेष्ठ है। भागीरथी गङ्गासे वह जहाँ मिलती है, वहाँ स्नान करनेसे बहुत फल होता है। यह वही महान् क्षेत्र है, जिसे 'हरिहर-क्षेत्र' कहते हैं। यहाँ पवित्र गण्डकी नदी भगवती भागीरथीसे मिलती है। इस तीर्थके महत्त्वको तो देवतालोग भी भलीभाँति नहीं जानते।
भद्रे! मैं तुमसे शालग्राम-क्षेत्र* और सब पापोंको नष्ट करनेवाले गण्डकीके माहात्म्यका वर्णन कर चुका।
जो मानव प्रातःकाल उठकर इसका सदा पाठ करता है, वह अपनी इक्कीस पीढ़ियोंको तार
* विल्फोर्ड तथा पद्मपुराण, पातालखण्ड अ० ७८के अनुसार यह शालग्राम पर्वत 'मुक्तिनाथ' ही है। द्रष्टव्य—'कल्याण' का तीर्थाङ्क'।
१२९- लोहार्गल-क्षेत्रका माहात्म्य
अध्याय १४६ ] रुरुक्षेत्र एवं हृषीकेशके माहात्म्यका वर्णन २७३
देता है। ऐसा मानव मृत्युके समय कभी मोहमें नहीं पड़ता। वह यदि परम सिद्धि चाहता है तो मेरे धाममें चला जाता है। महादेवि! मैंने तुमसे शालग्राम-क्षेत्रके इस श्रेष्ठ माहात्म्यका वर्णन कर दिया। अब तुम्हें अन्य कौन-सा प्रसङ्ग सुननेकी इच्छा है? कहो! [अध्याय १४५]
रुरुक्षेत्र* एवं हृषीकेशके माहात्म्यका वर्णन
**पृथ्वी बोली—**प्रभो! आपने जो शालग्राम-क्षेत्रके बहुत अद्भुत माहात्म्यका वर्णन किया, उसके श्रवण करनेसे मेरी चिन्ता शान्त हो गयी। अब मैं यह जानना चाहती हूँ कि ‘रुरु’-खण्डकी प्रसिद्धि कैसे हुई और वह उत्तम क्षेत्र आपका शुभ आश्रम कैसे बन गया? जगन्नाथ! आप इसे मुझे बतानेकी कृपा करें।
**भगवान् वराह कहते हैं—**देवि! पहले भृगुवंशमें देवदत्त नामके एक वेद-वेदाङ्गपारगामी विद्वान् ब्राह्मण रहते थे। वे अपने पवित्र आश्रममें रहकर दस हजार वर्षोंतक कठोर तपस्या करते रहे। इससे इन्द्रके मनमें महान् चिन्ता उत्पन्न हो गयी। अतः उन्होंने कामदेव, वसन्त-ऋतु तथा गन्धर्वोंके साथ प्रम्लोचा नामकी अप्सराको बुलाकर उनकी तपस्यामें विघ्न डालनेके लिये भेजा और वह अप्सरा इनके साथ मुनिवर देवदत्तके आश्रमपर चली गयी। वहाँ अनेक प्रकारकी लताएँ और वृक्ष पहलेसे ही उनके आश्रमकी शोभा बढ़ा रहे थे तथा कोकिलोंका समूह मधुर कूजन कर रहा था। आम्रकी मञ्जरियाँ, भौंरोंका गुञ्जन, गन्धर्वोंका संगीत, शीतल-मन्द-सुगन्धित वायु—ये एक-से-एक रागोद्दीपक थे। अत्यन्त स्वच्छ सुगन्धित और मधुर जलसे सरोवर भरा था, जिसमें कमलोंका समुदाय खिला हुआ था। इसी समय उस परम सुन्दरी अप्सराने अत्यन्त मधुर संगीतका तान छेड़ा। इधर कामदेवने भी अपना पुष्पमय धनुष खींचा और उसपर बाणोंका संधान कर शान्त चित्तवाले मुनिवर देवदत्तको अपना लक्ष्य बनाया।
रम्य आलापसे सम्पन्न उस सुमधुर संगीतको सुनकर उन उत्तम व्रती मुनिवर देवदत्तका चित्त विक्षुब्ध हो उठा। अब वे इधर-उधर देखते हुए आश्रममें घूमने लगे। इसी बीच सुन्दर अङ्गोंसे शोभा पानेवाली वह प्रम्लोचा भी उन्हें दीख गयी। उस समय वह गेंद उछाल रही थी। उसकी दृष्टि पड़ते ही मुनिवर देवदत्त कामदेवके बाणसे बिंध गये। उसी समय प्रम्लोचाके अङ्गोंपर मलयवायुका झोंका लगा, जिससे उसके वस्त्र भी खिसक गये। अब मुनि अपनेको सँभाल न सके। उन्होंने उससे पूछा—'सुभगे! तुम कौन हो तथा इस उपवनमें कैसे आयी हो?' अन्तमें उसकी सम्मतिसे उसके साथ रहते हुए उन्होंने अपने तपके प्रभावसे अनेक मनोहर भोगोंको भोगा। सुख-भोगमें आसक्त होकर दिन-रात वे कभी सोते भी न थे। इस प्रकार बहुत दिन व्यतीत हो गये।
एक दिनकी बात है, उनका विवेक जाग्रत् हुआ और वे अज्ञानरूपी नींदसे सहसा जाग उठे। वे कहने लगे—'अहो! भगवान् श्रीहरिकी माया कैसी प्रबल है, जिसके प्रभावसे मैं भी मोहके गर्तमें डूब गया। यह जानते हुए भी कि इससे मेरी तपस्या नष्ट हो जायगी, प्रबल दैवके अधीन होनेके कारण मैंने यह कुत्सित कार्य कर डाला। 'सुभाषित' के नामसे यह प्रवाद प्रसिद्ध है कि नारी अग्निके कुण्ड-जैसी है और पुरुष घृतके घड़ेके समान, पर मेरी समझसे तो यह मूर्खोंका
* श्रीविष्णुपुराण १। १५। १३ आदिके अनुसार यह भी 'मुक्तिनाथ' के ही आसपासका पर्वत है।
| २७४ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १४६ |
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प्रवादमात्र है। विचारकी दृष्टिसे देखा जाय तो वस्तुतः इनमें बड़ा अन्तर है। क्योंकि घीका घड़ा तो आगपर रखनेसे पिघलता है, न कि देखनेमात्रसे। किंतु पुरुष तो स्त्रीको देखकर ही पिघल उठता है। तथापि इस स्त्रीका यहाँ कोई अपराध नहीं है; क्योंकि मैं स्वयं अपनी इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त करनेमें असमर्थ था।'
इस प्रकार पश्चात्ताप करते हुए उन्होंने प्रम्लोचाको वहाँसे विदा कर दिया। फिर वे सोचने लगे—'इस स्थानमें यह विघ्न हुआ, अतः मैं अब इस आश्रमका परित्यागकर कहीं अन्यत्र चलूँ और वहाँ तीव्र तपस्याका आश्रय लेकर इस शरीरको सुखा दूँ। इस प्रकार निश्चय कर वे भृगुमुनिके आश्रमपर गये और वहाँ गण्डकी नदीके सङ्गममें स्नानकर देवताओं और पितरोंका उन्होंने तर्पण किया एवं भगवान् विष्णु और शिवकी भलीभाँति पूजा की। फिर वे भगवान् शंकरके दर्शनकी अभिलाषासे गण्डकीके तटपर स्थित भृगुतुङ्ग^१ पर कठोर तपस्या करने लगे। इस प्रकार बहुत दिन बीतनेपर भगवान् शंकर उन मुनिपर संतुष्ट हुए। उनके लिङ्गरूपमें सहसा ऊपर एवं नीचेसे जलकी तिरछी धाराएँ निकलने लगीं। फिर वे बोले—'मुने! इधर मुझे देखो, मैं शिव हूँ। तुम्हें जानना चाहिये कि विष्णु भी मैं ही हूँ। हम दोनोंमें तत्त्वतः कोई भेद नहीं है। इसके पूर्वके तपमें तुम्हारी मुझमें और विष्णुमें भेद-दृष्टि थी, अतः तुम्हें विघ्नोंका सामना करना पड़ा तथा तुम्हारी महान् तपस्या क्षीण हो गयी। अब तुम हम दोनोंको समानभावसे ही देखो। इससे तुम्हें फिर शीघ्र ही सिद्धि सुलभ हो जायगी। जहाँ तुमने तपस्या की है और अनेकों शिवलिङ्गोंका प्राकट्य हुआ है, यह स्थान 'सङ्गम'–नामसे प्रसिद्ध होगा। इस गण्डकी-तीर्थमें स्नान करके जो यहाँ मेरे इन लिङ्गोंकी पूजा करेगा, उसे सम्यक् प्रकारसे योगका उत्तम फल प्राप्त हो जायगा, इसमें कोई संदेह नहीं।' मुनिको वर देकर भगवान् शंकर वहीं अन्तर्धान हो गये और वे उनके बताये मार्गका अनुसरण करने लगे। अतः वे परम सायुज्य-पदको प्राप्त हुए।
इधर मुनिके सम्पर्कसे प्रम्लोचा भी गर्भवती हो गयी थी। आश्रमके पास ही उससे एक कन्या उत्पन्न हुई, जिसे वहीं छोड़कर वह स्वर्गलोकमें चली गयी। उससे उत्पन्न हुई कन्या भी 'रुरु' नामक मृगोंद्वारा पालित होकर धीरे-धीरे बड़ी हुई, अतः उसका नाम भी 'रुरु'^२ हुआ। वह अपने पिता देवदत्तके आश्रमपर ही रहती, अनेक युवक उसे अपनी पत्नी बनाना चाहते, किंतु उसने किसीकी भी बात न मानी और भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये तपस्या करने लगी। वह कठोर तप करती हुई केवल सूखे पत्ते खाकर रहती और बादमें पत्ते खाना भी छोड़कर केवल वायुके आहारपर रहती हुई वह भगवान् श्रीहरिकी आराधनामें तत्पर हो गयी। इस प्रकार सौ वर्षोंतक द्वन्द्वोंको सहती हुई निश्चलभावसे भगवद्ध्यानमें समाधिस्थ होकर स्थाणु (ठूँठ)-के समान निश्चल रहने लगी। अब उसके शरीरके दिव्य प्रकाशसे सारा संसार व्याप्त हो गया।
अब मैं उसके सामने प्रत्यक्ष हुआ। नियन्त्रित
१. श्रीनन्दलाल 'दे' आदिके अनुसार यह गण्डकीके पूर्वोत्तरतटपर नेपालका 'मुक्तिनाथ' पर्वत ही है। 'महाभारत' १।७५, ५७, २१६।२; ३।९४।५०, ८५।९१-९२;९०।२३; १३।२५।१८-१९ में भी इस (भृगुतुङ्ग)-का उल्लेख है। टीकाकार पं० नीलकण्ठके अनुसार यह 'तुङ्गनाथ' है।' According to Nilkantha it is 'Tunganath' (Geog Dic. of Anc. & Med. India P. 34)
२. स्वल्पान्तरसे यह कथा श्रीमद्भागवत ४।३०।१३ तथा 'विष्णुपुराण' के प्रथम अंशके १५वें अध्यायमें भी है।
१३०- मथुरातीर्थकी प्रशंसा
अध्याय १४७] 'गोनिष्क्रमण'-तीर्थ और उसका माहात्म्य २७५
इन्द्रियोंवाली उस कन्याके सामने स्वयं मैं नियन्त्रित-रूपसे प्रकट हुआ, अतः तबसे मैं 'हृषीकेश' नामसे यहाँ स्थित हुआ*। फिर मैंने उससे कहा—'बाले! तुम्हारी इस उत्तम तपस्यासे मैं पूर्ण संतुष्ट हूँ। तुम्हारे मनमें जो कुछ बात हो, वह मुझसे वररूपमें माँग लो। अन्य किन्हीं व्यक्तियोंके लिये जो अत्यन्त दुर्लभ है, ऐसा अदेय वर भी मैं तुम्हें इस समय देनेके लिये तत्पर हूँ।'
तब 'रुरु' नामकी उस दिव्य कन्याने मुझ श्रीहरिकी बारंबार प्रणाम-स्तुति की और कहा—'जगत्पते! आप यदि मुझे वर देना चाहते हैं तो देवाधिदेव! आप इसी रूपसे यहाँ विराजनेकी कृपा कीजिये।' तब मैंने उससे कहा—'बाले! तुम्हारा कल्याण हो। मैं तो यहीं हूँ, अब तुम मुझसे कोई अन्य वर भी माँग लो।' इसपर उसने मुझे प्रणाम कर कहा—'देवेश! आप यदि मुझपर प्रसन्न हैं तो आप ऐसी कृपा करें कि यह क्षेत्र मेरे ही नामसे प्रसिद्ध हो जाय—इसके अतिरिक्त मेरी अन्य कोई अभिलाषा नहीं है।' सुभगे! तब मैंने कहा—'देवि! ऐसा ही होगा, तुम्हारा यह शरीर सर्वोत्तम तीर्थ होगा और यह समस्त क्षेत्र भी तुम्हारे ही नामसे विख्यात होगा। साथ ही जो मनुष्य इस तीर्थमें तीन रातोंतक निवास एवं स्नान करेगा, वह मेरे दर्शनसे पवित्र हो जायगा—इसमें कोई संशय नहीं। उसके जाने-अनजाने किये गये सभी पाप नष्ट हो जायँगे—इसमें कोई संदेह नहीं।'
देवि! इस प्रकार 'रुरु'को वर देकर मैं वहीं अन्तर्धान हो गया और वह भी समयानुसार पवित्र तीर्थ बन गयी।
[अध्याय १४६]
'गोनिष्क्रमण'-तीर्थ और उसका माहात्म्य
धरणीने कहा—भगवन्! आपकी कृपासे मैंने रुरुक्षेत्र हृषीकेशकी महिमाका वर्णन सुना। देवेश! अब जो अन्य पावन क्षेत्र हैं, उन्हें बतानेकी कृपा कीजिये।
भगवान् वराह कहते हैं—देवि! हिमालय-पर्वतके शिखरपर मेरा एक क्षेत्र है, जिसका नाम है—'गोनिष्क्रमण', जहाँ पहले सुरभी आदि गौएँ समुद्रसे तैरकर बाहर निकली थीं। बहुत पहले 'और्वनाम' से प्रसिद्ध एक प्रजापति थे, जिन्होंने यहाँ दीर्घ कालतक निष्कामभावसे तपस्या की थी। वसुंधरे! कुछ दिनोंके बाद जिस ऊँचे पर्वतपर वे तपस्या कर रहे थे, फलों एवं फूलोंसे परिपूर्ण लक्ष्मी भी वहाँ प्रकट हो गयीं। अतः वहाँ कुछ और तपस्वी ब्राह्मण आ गये। इसी समय कहींसे घूमते हुए वहाँ महान् तेजस्वी भगवान् शंकर भी आ गये। एक बार और्वमुनि जब कुछ कमलपुष्पोंके लिये हरिद्वार गये थे कि महादेवने अपने उग्र तेजसे और्वमुनिके उस प्रिय आश्रमको भस्म कर दिया और फिर वहाँसे यथाशीघ्र अपने वासस्थान हिमालयपर चले गये। देवि! ठीक उसी समय मुनिवर और्व पत्र-पुष्पकी टोकरी लिये हरिद्वारसे अपने उस आश्रमपर आ गये। यद्यपि मुनि शान्त एवं मृदु स्वभावके क्षमाशील एवं सत्यव्रतमें तत्पर रहनेवाले थे, तथापि प्रभूत फूलों, फलों एवं जलोंसे सम्पन्न उस आश्रमको दग्ध हुआ देखकर वे क्रोधसे भर गये। दुःखके कारण उनकी आँखें डबडबा गयीं और क्रोधसे भरकर उन्होंने यह शाप दिया—'प्रचुर फूलों, फलों और उदकोंसे सम्पन्न मेरे इस आश्रमको जिसने जलाया है, वह भी दुःखसे
* हृषीकाणि नियम्याहं यतः प्रत्यक्षतां गतः। 'हृषीकेश' इति ख्यातो नाम्ना तत्रैव संस्थितः॥ (वराहपुराण १४६।७३)
| २७६ | संक्षिप्त श्रीवराहपुराण | [ अध्याय १४७ |
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संतप्त होकर सारे संसारमें भटकता फिरेगा। फलतः भगवान् शंकर समस्त संसारके स्वामी होते हुए भी उसी क्षण व्याकुल हो उठे और उन्होंने उमा देवीसे कहा—'प्रिये! और्वमुनिकी कठिन तपस्या देखकर देवसमुदायके हृदयमें आतङ्क छा गया था। इसलिये मुझसे उन्होंने प्रार्थना की कि 'भगवन्! अखिल जगत् जल रहा है। फिर भी वे (और्व) इससे बचानेके लिये कोई चेष्टा नहीं करते। हमारी प्रार्थना है कि आप उसके निवारणके लिये कोई ऐसा उपाय कीजिये, जिससे सबकी सुरक्षा हो सके।' जब देवताओंने मुझसे इस प्रकार कहा, तब मैंने और्वके आश्रमपर तृतीय नेत्रकी दृष्टि डाल दी, अतः उनका वह आश्रम भस्म हो गया। हमलोग तो वहाँसे बाहर निकल गये; किंतु आश्रमके जलनेसे और्वको महान् दुःख तथा संताप हुआ। शिवे! वे क्रोधसे भर उठे हैं और अब उनके रोषयुक्त शापसे हमारे मनमें भी बड़ी व्यथा हो रही है।'
वसुंधरे! फिर महाभाग शम्भुने अशान्त होकर इधर-उधर भ्रमण करना आरम्भ किया; किंतु किसी क्षण वे शान्त न रह सके। मैं भी उनके आत्मा होनेसे उस समय उनके दुःखसे दुःखी और संतप्त होकर निश्चेष्ट-सा हो गया। इधर पार्वतीने भगवान् शंकरसे कहा—'अब हमलोग भगवान् नारायणके पास चलें। सम्भव है, उनकी वाणी और परामर्शसे हमें शान्ति मिल जाय। अथवा भगवान् नारायणको साथ ले फिर हम सभी और्वके पास चलें और उनसे प्रार्थना करें कि आपने जो शाप दिया है, उसे वापस कर लें; क्योंकि इससे हम सभी जल रहे हैं।'
देवि! फिर उस समय इस प्रकारके सभी प्रयत्न किये गये, किंतु और्वने उत्तर दिया—'मेरी बात कभी भी मिथ्या नहीं हो सकती। हाँ, मैं उपाय बतला सकता हूँ, सुरभि गायोंको लेकर आप लोग वहाँ जायँ और ये गौएँ अपने दूधसे रुद्रको स्नान करायें तो निश्चय ही इस शापसे आप सब छूट जायँगे, इसमें संदेह नहीं।'
कल्याणि! उस अवसरपर मैंने महान् शक्तिशालिनी सतहत्तर सुरभि गायोंको स्वर्गसे नीचे उतारा और उनके दूधसे सिक्त हो जानेपर रुद्र एवं अन्य सबोंकी जलन भी सदाके लिये शान्त हो गयी। तबसे उस स्थानका नाम 'गोनिष्क्रमण'-तीर्थ हो गया। जो मनुष्य वहाँ एक रात भी निवास एवं स्नान करता है, वह 'गोलोक' में जाकर आनन्दका उपभोग करता है। उत्तम धर्मके आचरण करनेके पश्चात् यदि उसकी वहाँ (गोनिष्क्रमण-तीर्थमें) मृत्यु होती है तो वह शङ्ख, चक्र एवं गदासे सम्पन्न होकर मेरे लोकमें प्रतिष्ठा पाता है।
यहाँ गौओंके मुखसे निकला हुआ एक अत्यन्त श्रुति-सुखद शब्द सुनायी पड़ता है। एक बार ज्येष्ठ मासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिको मैंने स्वयं ऐसा सुसंस्कृत शब्द सुना था, अतः इसमें कोई संदेह नहीं करना चाहिये। ऐसा ही गोस्थलका नामका एक परम पवित्र क्षेत्र है। वहाँ मुझमें श्रद्धा रखनेवाले पवित्रात्मा पुरुषको शुभ कर्म करना चाहिये। उसके प्रभावसे वह पापोंसे यथाशीघ्र छूट जाता है। महाभागे! जिस समय शंकरको और्वमुनिका शाप लगा था और वे उससे जल रहे थे, तब वे मरुद्गणोंके साथ वहाँ गये तथा शापसे उनकी मुक्ति हो गयी, इसीसे इस क्षेत्रकी ऐसी महिमा है। यह 'गोस्थलका' नामवाला क्षेत्र परम श्रेष्ठ एवं सब प्रकारसे शान्ति प्रदान करनेवाला है।
महाभागे! यह प्रसङ्ग सम्पूर्ण मङ्गलोंको प्रदान करनेवाला और मेरे मार्गका अनुसरण करनेवाले भक्तोंमें श्रद्धाकी वृद्धि करनेवाला है। यह श्रेष्ठोंमें
१३१- मथुरा, यमुना और अक्रूरतीर्थोंके माहात्म्य
अध्याय १४८ ] स्तुतस्वामीका माहात्म्य २७७
परम श्रेष्ठ, मङ्गलोंमें परम मङ्गल, लाभोंमें परम लाभ और धर्मोंमें उत्तम धर्म है। यशस्विनि! मेरे निर्दिष्ट पथके पथिक पुरुष इसका पाठ करनेके प्रभावसे तेज, शोभा, लक्ष्मी तथा सब मनोरथोंको प्राप्त कर लेते हैं। मनस्विनि! इसके पाठक इस अध्यायमें जितने अक्षर हैं, उतने वर्षोंतक मेरे धाममें सुशोभित होते हैं। प्रतिदिन इसे पढ़नेवाले मानवका कभी पतन नहीं होता और उसकी इक्कीस पीढ़ियाँ तर जाती हैं। निन्दक, मूर्ख और दुष्टोंके सामने इसका प्रवचन नहीं करना चाहिये। इसके स्वाध्याय करनेकी योग्यतावाले पुत्र या शिष्यको ही इसे सुनाना चाहिये। वसुंधरे! पाँच योजनके विस्तारवाले इस क्षेत्रसे मेरा अतिशय प्रेम है। अतएव मैं यहाँ सदा निवास करता हूँ। यहाँ गङ्गाकी धारा पूर्व दिशासे होकर पश्चिम दिशामें विपरीत बहती है।* ऐसे गुह्य रहस्यकी जानकारी सभी सत्कर्मोंमें सुख प्रदान करती है। महाभागे! यही वह गुप्त क्षेत्र है, जिसके विषयमें तुमने पूछा था। [अध्याय १४७]
स्तुतस्वामीका माहात्म्य
पृथ्वी बोली— जगत्प्रभो! गौओंकी महिमा बड़ी विचित्र है। इसे सुनकर मेरी सम्पूर्ण शङ्काएँ शान्त हो गयीं। नारायण! ऐसे ही अन्य भी कुछ गुप्त तीर्थोंको बतानेकी कृपा कीजिये। प्रभो! यदि इस क्षेत्रसे भी कोई विशिष्ट श्रेष्ठ क्षेत्र हो तो उसे भी सुनाइये।
भगवान् वराह कहते हैं— महाभागे! अब मैं तुम्हें एक दूसरा क्षेत्र बताता हूँ, जिसका नाम है 'स्तुतस्वामी'। सुन्दरि! द्वापरयुग आनेपर मैं वहाँ निवास करूँगा। उस समय श्रीवसुदेवजी मेरे पिता होंगे और देवकी माता; कृष्ण मेरा नाम होगा और उस समय मैं सभी असुरोंका संहार करूँगा। उस समय मेरे पाँच—शाण्डिल्य, जाजलि, कपिल, उपसायक और भृगु नामक धर्मनिष्ठ शिष्य होंगे और मैं वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध—इन चार रूपोंमें सदा प्रत्यक्ष रहूँगा। उस समय कुछ लोग इस चतुर्व्यूहकी उपासनासे, कुछ ज्ञानके प्रभावसे और कुछ व्यक्ति सत्कर्ममें परायण रहकर मुक्त होंगे। सुश्रोणि! कितनोंको तो इच्छानुसार किया हुआ यज्ञ तथा बहुतोंको कर्मयोग इस संसारसे तार देता है। कुछ सज्जन योगका फल भोगकर मुझमें स्थित संसारको देखते हैं। मुझमें विधिपूर्वक निष्ठा रखनेवाले कितने मनुष्य सब जीवोंमें मेरा ही रूप देखते हैं। भूमे! बहुत-से पुरुष अखिल धर्मोंका आचरण करते, सब कुछ भोजन कर लेते और सभी पदार्थोंका विक्रय भी करते हैं, तब भी यदि उनका चित्त मुझमें एकाग्र रहा और वे उचित व्यवस्थामें लगे रहे तो उन्हें मेरा दर्शन सुलभ हो जाता है।
देवि! यह वराहपुराण संसारसे उद्धार करनेके लिये परम साधन एवं महान् शास्त्र है। मेरे भक्तोंकी व्यवस्था ठीक रूपसे चल सके, इसलिये मैंने इस परम प्रिय प्रयोगका वर्णन किया है। शाण्डिल्यप्रभृति मेरे वे शिष्य इच्छानुसार इन साधनोंका प्रचार (प्रवचन) करेंगे।
मेरे इस 'स्तुतस्वामी' क्षेत्रसे लगभग पाँच कोसकी दूरीपर पश्चिम दिशामें एक कुण्ड है। उसका जल मुझे बहुत प्रिय लगता है। उस अगाध जलवाले सरोवरका पानी स्वर्ण अथवा मरकतमणिके समान चमकता है। मेरे इस सरोवरमें पाँच दिनोंतक स्नान करनेसे मनुष्यके सभी पाप धुल
* अनुमानतः यह स्थान ऋषिकेशके ऊपर व्यासघाटसे कुछ दूर आगे है।
२७८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १४९
जाते हैं। इसके समीप ही 'धूतपाप' नामक तीर्थ है, जो मणिपूरगिरिके ऊपर है। वहाँ निवास करनेवाले प्राणीपर तबतक जलधारा नहीं गिरती, जबतक उसके सभी पाप समाप्त न हो जायें। यह बड़े आश्चर्यकी बात है। सुश्रोणि! सम्पूर्ण पापोंके नष्ट हो जानेपर ही प्राणीपर जलधारा वहाँ गिरती है। ऐसे ही वहाँ एक पीपलका वृक्ष भी है।
पृथ्वी बोली— 'भगवन्! आप ही 'स्तुतस्वामी' हैं, मैंने ऐसी बात सुनी है। अब इस 'स्तुतस्वामी' नामसे आपका अभिप्राय क्या है? इसे बतानेकी कृपा कीजिये।
भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! जब मैं 'मणिपूर' नामक स्थानपर था, उस समय मन्त्रोंके प्रवचन करनेवाले ब्रह्मा आदि बहुत-से देवतालोग मेरी स्तुति करने लगे। परम सौभाग्यवती देवि! इसी कारण नारद, असित, देवल तथा पर्वत नामवाले मुनिगणोंने भक्तिसे सम्पन्न होकर उस समय उस 'मणिपूर'-पर्वतपर मेरा नाम 'स्तुतस्वामी' रखा। तबसे मेरे सत्कर्मसे सम्बन्धित मेरा यह 'स्तुतस्वामी' नाम विख्यात हुआ। भद्रे! मैंने तुमसे अखिल धर्मोंको आश्रय देनेवाला यह 'श्रीस्तुतस्वामीका माहात्म्य' बतलाया। अब तुम दूसरा कौन प्रसङ्ग पूछना चाहती हो, यह बतलाओ। [अध्याय १४८]
द्वारका-माहात्म्य
पृथ्वी बोली— भगवन्! देवेश्वर! आपकी कृपासे 'स्तुतस्वामी' का माहात्म्य सुननेका सौभाग्य मिला है। कृपानिधे! अब इन स्तुतस्वामीके गुण एवं माहात्म्य मुझे सुनानेकी कृपा करें।
भगवान् वराह कहते हैं— देवि! द्वापरयुगमें यादवोंके कुलमें कुलोद्धारक 'शौरि-वसुदेव' नामसे मेरे पिता होंगे। उस समय विश्वकर्माद्वारा निर्मित दिव्य पुरी द्वारकामें मैं पाँच सौ वर्षोंतक निवास करूँगा। उन्हीं दिनों दुर्वासा नामसे विख्यात एक ऋषि होंगे, जो मेरे कुलको शाप दे देंगे। पृथ्वि! उन ऋषिके शापसे संतप्त होनेके कारण वृष्णि, अन्धक एवं भोज-कुलके सभी व्यक्तियोंका संहार हो जायगा। उसी समय जाम्बवती नामवाली मेरी एक प्रिय पत्नी होगी। वह मेरे सुखकी साधिका बनेगी। उससे एक महान् भाग्यशाली पुत्रका जन्म होगा। रूप एवं यौवनका गर्व करनेवाला मेरा वह परम सुन्दर पुत्र साम्ब नामसे विख्यात होगा, जो मुझे प्रिय होगा।
अब मैं वैष्णव पुरुषोंको सुख प्रदान करनेवाले द्वारकाके स्थानोंका वर्णन करता हूँ, सुनो। 'पञ्चसर' नामसे विख्यात मेरा एक गुह्य क्षेत्र है। समुद्रके तटसे कुछ दूर जाकर मेरे कर्ममें (भक्तिमें) संलग्न मानवको सुखी बनानेवाले उस क्षेत्रमें छः दिनोंतक निवासकर स्नान करना चाहिये। इसके फलस्वरूप स्नान करनेवाला मनुष्य अप्सराओंसे भरे हुए स्वर्गलोकमें आनन्दका उपभोग करता है। उस 'पञ्चसर' धाममें प्राण-त्याग करनेवाला मनुष्य मेरे लोक (वैकुण्ठ)-में प्रतिष्ठा पाता है। वहीं समुद्रमें मकरकी आकृतिवाला एक स्थान है, जहाँ अनेक मगरमच्छ इधर-उधर घूमते हुए दिखलायी पड़ते हैं, पर जलमें स्नान करनेवाले व्यक्तियोंके प्रति वे कुछ भी अपराध नहीं करते। मानव उस विमल जलमें जब पिण्डोंको फेंकते हैं तो उन्हें दूर रहनेपर भी वे झपटकर ले लेते हैं, परंतु बिना दिये वे उन्हें नहीं लेते। इसी प्रकार यदि कोई पापी मनुष्य जलमें पिण्ड देता है तो उसे वे नहीं लेते, किंतु धर्मात्मा पुरुषोंके फेंके हुए पिण्डोंको वे ग्रहण कर लेते हैं।
अध्याय १४९ ] द्वारका-माहात्म्य २७९
देवि! मेरे इस द्वारकाक्षेत्रमें 'पञ्चपिण्ड' नामसे प्रसिद्ध एक गुह्य स्थान है, उसमें अगाध जल है। उसे पार करना सभीके लिये कठिन है। वह एक कोसके विस्तारमें फैला है। मनुष्य पाँच रात वहाँ रहकर मेरा अभिषेक करे। इससे वह इन्द्रके लोकमें निःसंदेह आनन्द भोगता है। यशस्विनि ! यदि वहाँ उसके प्राण शरीरसे निकल गये तो फिर वह वहाँसे मेरे धाममें पहुँच जाता है। उसी द्वारकाक्षेत्रमें हंसकुण्ड-नामसे विख्यात एक तीर्थ है, जहाँ 'मणिपूर' पर्वतसे होकर एक जलकी धारा गिरती है। उस तीर्थमें छः दिनोंतक रहकर स्नान करनेकी बड़ी महिमा है। महाभागे ! इसमें स्नान करनेवाला व्यक्ति आसक्तिरहित होकर वरुणलोकमें आनन्द प्राप्त करता है। वरानने ! यदि उस 'हंसतीर्थ' में वह अपने पाञ्चभौतिक शरीरका त्याग करता है तो वरुणलोकका परित्याग कर मेरे लोकमें पहुँचकर प्रतिष्ठा पाता है। उसी प्रसिद्ध द्वारकाक्षेत्रमें 'कदम्ब' नामसे प्रसिद्ध एक स्थान है। यह वह स्थान है, जहाँ वृष्णिकुलके शुद्ध व्यक्ति मेरे धाम सिधारे थे। मनुष्यको चाहिये कि चार राततक वहाँ निवास करके मेरा अभिषेक करे। ऐसा करनेसे वह पुण्यात्मा पुरुष निःसंदेह ऋषियोंके लोकोंको प्राप्त कर लेता है।
वसुंधरे! मेरे उसी द्वारकाक्षेत्रमें 'चक्रतीर्थ' नामसे प्रसिद्ध एक श्रेष्ठ स्थान है। वहाँ मणिपूर पर्वतसे होती हुई जलकी पाँच धाराएँ गिरती हैं। पाँच दिनोंतक वहाँ रहकर अभिषेक करनेवाला मनुष्य दस हजार वर्षोंतक स्वर्गमें सुख भोगता है। लोभ और मोहसे मुक्त होकर मानव यदि वहाँ प्राण छोड़ता है तो सम्पूर्ण आसक्तियोंका परित्याग कर वह मेरे धाममें चला जाता है। उसी द्वारकाक्षेत्रमें एक 'रैवतक' नामका तीर्थ है, जहाँ मैं लीला करता हूँ, वह स्थान समस्त लोकोंमें प्रसिद्ध है। बहुत-सी लताएँ, वल्लरियाँ और फूल उसकी छवि छिटकाते रहते हैं। उसके दसों दिशाओंमें अनेक वर्णवाले पत्थर तथा गुहाएँ हैं और वह वापियों तथा कन्दराओंसे भी युक्त है तथा देवसमुदायके लिये भी दुर्लभ है। मनुष्यको छः दिनोंतक वहाँ रहकर अभिषेक करना चाहिये। फिर तो वह कृतकृत्य होकर निश्चय ही चन्द्रमाके लोकमें चला जाता है। मेरी पूजामें निरत वह पुरुष यदि वहाँ प्राणोंका त्याग करता है तो उस लोकसे मेरे धाममें निवास करने चला जाता है। महाभागे ! वहाँकी भी एक अलौकिक बात बतलाता हूँ, सुनो। धर्मके अभिलाषी प्रायः सभी पुरुष वह दृश्य देख सकते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। वहाँ सम्पूर्ण वृक्षोंके बहुत-से पत्ते गिरते हैं, किंतु एक भी पत्ता किसीको दिखायी नहीं पड़ता। सभी पत्ते विमल जलमें चले जाते हैं। एक विशाल वृक्ष मेरे पूर्वभागमें है तथा इसके अतिरिक्त कुछ वृक्ष मेरे पार्श्वभागमें हैं। देवतालोग भी इन वृक्षोंका दर्शन करनेमें असमर्थ हैं। पाँच कोसका विस्तारवाला वह स्थान तथा महान् वृक्ष—ये दोनों अत्यन्त शोभनीय हैं। सुन्दर गन्धवाले पद्म एवं उत्पल उसे चारों ओरसे घेरे हुए हैं। बहुत-सी मछलियाँ और जलोंसे पूर्ण तालाब भी उसके सभी भागोंमें हैं। मनुष्यको आठ दिनोंतक वहाँ रहकर अभिषेक करना चाहिये। इसमें स्नान करनेवाला अप्सराओंसे युक्त दिव्य नन्दनवनमें विहार करता है।
वसुंधरे! मेरे इस द्वारका-क्षेत्रमें 'विष्णुसंक्रम' नामका एक स्थान है, जहाँ 'जरा' नामक व्याधने मुझे अपने बाणसे मारा था। मैंने वहाँ पुनः अपनी मूर्तिकी स्थापना कर दी है। महाभागे! वहाँ एक कुण्ड भी है। यह स्थान 'मणिपूर पर्वत' पर है, ऐसा सुना जाता है। वहाँ जलकी एक धारा गिरती है।
| २८० | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १५० |
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लाभ एवं हानिसे निश्चिन्त होकर वहाँ निवास करनेवाला मनुष्य सूर्यलोकका उल्लङ्घन कर मेरे लोकमें प्रतिष्ठा पाता है।
देवि! दसों दिशाओंमें चारों ओर फैला हुआ यह मेरा 'द्वारकाक्षेत्र' तीस योजनके प्रमाणमें है। वरारोहे! वहाँ जो पुण्यात्मा मनुष्य मेरा भक्तिपूर्वक दर्शन करेंगे, उन्हें बहुत शीघ्र ही परम गति प्राप्त हो जायगी। यह प्रसङ्ग आख्यानोंमें महान् आख्यान, शान्तियोंमें परम शान्ति, धर्मोंमें परम धर्म, द्युतियोंमें परम द्युति, लाभोंमें परम लाभ, क्रियाओंमें परम क्रिया, श्रुतियोंमें परम श्रुति तथा तपस्याओंमें परम तपस्या है। भद्रे! जो मानव प्रातःकाल उठकर इसका अध्ययन करता है, वह अपने कुलकी इक्कीस पीढ़ियोंको तार देता है। देवि! द्वारकाक्षेत्रके इस पुनीत प्रसङ्गको मैंने तुम्हें सुना दिया। अब उचित एवं लोकोपकारी अन्य कोई प्रसङ्ग तुम पूछना चाहती हो तो पूछो!
[अध्याय १४९]
सानन्दूर-माहात्म्य
पृथ्वी बोली— प्रभो! आपने कृपापूर्वक मुझे द्वारका-माहात्म्यका वर्णन सुनाया। इस परम पवित्र विषयको सुननेसे मैं कृतकृत्य हो गयी। जगत्प्रभो! यदि इससे भी अधिक कोई गुह्य प्रसङ्ग हो तो वह भी मैं सुनना चाहती हूँ। जनार्दन! यदि मुझपर आपकी अपार दया हो तो वह भी कहनेकी कृपा कीजिये।
भगवान् वराह कहते हैं— देवि! 'सानन्दूर' नामसे प्रसिद्ध मेरा एक परम गुप्त निवासस्थल है। यह क्षेत्र समुद्रसे उत्तर और मलयगिरिसे दक्षिणकी ओर है। वहाँ मेरी एक मध्यम प्रमाणकी अत्यन्त आश्चर्यमयी प्रतिमा है। जिसे कुछ लोग लोहेकी, कुछ लोग ताँबेकी और कितने व्यक्ति कांस्य (काँसा) धातुसे निर्मित समझते हैं तथा कुछ लोग कहते हैं कि यह सीसेकी बनी है। मेरी उस प्रतिमाको अन्य व्यक्ति प्रस्तरकी बनी हुई भी कहते हैं। भूमे! अब वहाँके स्थानोंका वर्णन करता हूँ, सुनो। यशस्विनि! इस 'सानन्दूर' नामक मेरे क्षेत्रकी ऐसी महिमा है कि वहाँ जानेवाले मानव संसार-सागरसे पार हो जाते हैं।
वरानने! 'सानन्दूर' क्षेत्रमें संगमन नामका एक मेरा परम उत्तम गुह्य क्षेत्र है। प्रिये! रामसर और समुद्रके समागमका वह स्थान है। महाभागे! वहाँ स्वच्छ जलवाला एक कुण्ड है। बहुत-सी वल्लरियों, लताओं और पक्षियोंसे उसकी विचित्र शोभा होती है। समुद्रके संनिकटमें ही कुछ योजन दूरीपर वह स्थान है। अनेक सुगन्धित उत्तम कुमुद एवं कमलके पुष्प उसकी सदा मनोहरता बढ़ाते रहते हैं। मनुष्यको चाहिये कि वहाँ छः दिनोंतक निवास एवं अवगाहन करे। इसके प्रभावसे वह कुछ समय समुद्रके भवनमें रहकर मेरे धाममें चला जाता है।
सुमध्यमे! सानन्दूर-क्षेत्रमें 'शक्रसर' नामसे विख्यात मेरा एक परम गुह्य क्षेत्र है। वहाँसे पूर्व-भागमें कुछ योजनकी दूरीपर वह स्थान है। उस कुण्डके मध्यभागमें विषमरूपसे जलकी चार धाराएँ गिरती हैं। कल्याणि! उन धाराओंके जल अत्यन्त निर्मल होते हैं। चार दिनोंतक रहकर वहाँ मनुष्यको स्नान करना चाहिये। इस पुण्यसे वह चार लोकपालोंके उत्तम नगरोंमें जानेका अधिकारी होता है। वहाँके तालाबका नाम 'शक्रसर' है। यदि वहाँ कोई व्यक्ति प्राण परित्याग करता है तो वह लोकपालोंका स्थान छोड़कर मेरे धाममें
१३२- मथुरा-मण्डलके 'वृन्दावन' आदि तीर्थ और उनमें स्नान-दानादिका महत्त्व
अध्याय १५१ ] लोहार्गल-क्षेत्रका माहात्म्य २८१
आनन्दपूर्वक निवास करता है। महाभागे! वहाँ जो आश्चर्यकी बात देखी जाती है, उसे कहता हूँ, सुनो। भूमे! जिनका अन्तःकरण पवित्र है तथा जो मुझमें श्रद्धा रखते हैं, वे ही उस दृश्यको देख पाते हैं। उस दृश्यके प्रभावसे संसार-सागरसे पुरुषोंका उद्धार हो जाता है। भद्रे! वहाँ चारों दिशाओंसे जलकी चार धाराएँ गिरती हैं। वहाँका गिरा हुआ जल न अधिक बढ़ता है और न कम ही होता है, उसकी स्थिति सदा समान बनी रहती है। भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशी तिथिके पुण्य पर्वपर कानोंको मनोहर सुनायी पड़नेवाला उत्तम गीत वहाँ उच्चरित होता रहता है।
वसुंधरे! शूर्पारक नामसे प्रसिद्ध मेरा एक परम पवित्र एवं गुह्य क्षेत्र है, जो परशुराम और श्रीरामके आश्रमोंसे सुशोभित है। देवि! वह पावन स्थल समुद्रके तटपर है। मैं वहाँ शाल्मली वृक्षके नीचे निवास करता हूँ। वहाँ पाँच दिनोंतक रहकर मनुष्यको स्नान करना चाहिये। इसके फलस्वरूप मनुष्य ऋषिलोकमें जाकर अरुन्धतीका दर्शन कर सकता है। यदि मेरे शुद्ध सत्कर्ममें संलग्न रहता हुआ वह पुरुष अपने प्राणोंका त्याग करता है, तो ऋषिलोकको छोड़कर मेरे स्थानमें पहुँच जाता है। महाभागे! इसकी एक आश्चर्यमयी बात यह है कि यहाँ जो मुझे एक बार प्रणाम करता है, वह बारह वर्षोंतक किये गये नमस्कारके फलका भागी हो जाता है। इस शूर्पारक*क्षेत्रमें निष्ठावान् पुरुष ही मेरा दर्शन कर पाते हैं, मायासे मोहित व्यक्ति मुझे नहीं देख पाते।
महाभागे! इसी 'सानन्दूर'क्षेत्रमें मेरा एक परम गुप्त स्थान है। वायव्य (पश्चिम और उत्तरके) कोणमें विराजमान उस क्षेत्रका नाम 'जटाकुण्ड' है। प्रिये! चारों ओर वह दस योजनतक फैला है। यह स्थान मलयाचलके दक्षिण और समुद्रके उत्तर भागमें है। यहाँ रहकर मानवको पाँच दिनोंतक स्नान करना चाहिये। इसके फलस्वरूप वह व्यक्ति अगस्त्यमुनिके आश्रममें जाकर निश्चय ही आनन्दपूर्वक निवास कर सकता है। यदि मेरा चिन्तन करता हुआ मानव वहाँ प्राण-विसर्जन करता है तो वह उस स्थानको छोड़कर मेरे लोकमें जानेका पूर्ण अधिकारी बन जाता है। सुश्रोणि! उस कुण्डकी नौ जलकी धाराएँ हैं।
भद्रे! यह 'सानन्दूर' क्षेत्रकी महिमाका मैंने वर्णन किया। इसे सुननेसे भगवान् श्रीहरिमें भक्ति और श्रद्धा बढ़ती है। यह क्षेत्र गुह्योंमें परम गुह्य और स्थानोंमें सर्वोत्तम स्थान है। सुश्रोणि! नौ प्रकारकी भक्तियोंमें संलग्न जो व्यक्ति इस 'सानन्दूर'क्षेत्रमें जाता है, उसे मेरे कथनानुसार परम सिद्धि प्राप्त हो जाती है। जो मनुष्य प्रतिदिन प्रसन्नताके साथ इसे पढ़ता है अथवा सुनता है, उसके अठारह पीढ़ीके पूर्वपुरुष तर जाते हैं। [अध्याय १५०]
लोहार्गल-क्षेत्रका माहात्म्य
**पृथ्वी बोली—**विष्णो! आप जगत्के स्वामी हैं। मैं आपके मुखसे 'सानन्दूर'क्षेत्रकी परम उत्तम एवं रहस्यपूर्ण महिमा सुन चुकी। इसके सुननेसे मुझे परम शान्ति प्राप्त हुई। यदि इससे भिन्न और कोई सुखदायी गुप्त क्षेत्र हो तो मैं उसे भी जानना चाहती हूँ, आप कृपया उसे भी बतलायें।
**भगवान् वराह कहते हैं—**देवि! मैं अब तत्त्वपूर्वक एक दूसरे गुप्त क्षेत्रका प्रसङ्ग बताता
* 'शूर्पारक' क्षेत्र आजके बम्बई नगरका 'थाणा' स्थान है। इसका भागवत १०।७९।२० तथा महाभारत २।३१।६५; ३।८५। ४३; १९८।८; १२।४९।६६-६७, जातक ४। १३८ आदिमें भी वर्णन आया है। एवं इसका सोपार या ओपार नामसे बाइबिलमें भी उल्लेख मिलता है।
| २८२ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १५१ |
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हूँ, सुनो। 'सिद्धवट' नामक स्थानसे तीस योजनकी दूरीपर म्लेच्छोंका देश है, जिसके मध्य दक्षिण भागमें हिमालयपर्वत स्थित है। वहीं मेरा 'लोहार्गल'* नामसे प्रसिद्ध एक गुप्त क्षेत्र है। वह पंद्रह आयामका क्षेत्र चारों ओर पाँच योजनतक फैला है। चतुर्दिक् वेष्टित वह स्थान पापियोंके लिये दुर्गम एवं दुःसह है, पर जो सदा मेरे चिन्तनमें तत्पर रहते हैं और जिनका सारा समय पुण्यकार्यमें लगता है, उनके लिये वह परम सुलभ है। भद्रे ! उस स्थानके उत्तर दिशामें मैं निवास करता हूँ। वहाँ सुवर्णमयी मेरी प्रशस्त प्रतिमा है।
वसुंधरे! एक समय मेरे उस उत्तम स्थानपर सम्पूर्ण दानवोंने आक्रमण कर दिया। मायाके बलसे उन्होंने मेरी अवहेलना भी कर दी थी, तब ब्रह्मा, रुद्र, स्कन्द, इन्द्र, मरुद्गण, आदित्य, वसुगण, वायु, अश्विनीकुमार, चन्द्रमा, बृहस्पति तथा समस्त देव-समुदायको मैंने वहाँ सुरक्षित किया और अपना तेजस्वी सुदर्शनचक्र उठाकर उन निशाचरोंका संहार कर दिया। इससे देवगण आनन्दित हो विचरने लगे। तभीसे मैंने उस स्थानका नाम 'लोहार्गल' रख दिया और प्रबल शक्तिशाली देवसमुदायकी वहाँ प्रतिष्ठा कर अपनी भी प्रतिमा प्रतिष्ठित कर दी। उस स्थानपर मेरी प्रतिष्ठित मूर्तिका जो व्यक्ति यत्नपूर्वक दर्शन करता है, भूमे! वह मेरा भक्त हो जाता है। जो मनुष्य तीन रातोंतक वहाँ निवास करके शास्त्रविहित कर्म करता है और नियमके साथ वहाँके कुण्डमें स्नान करता है, वह कई हजार वर्षोंतक स्वर्गमें जाकर आनन्द भोगता है—इसमें कुछ भी संशय नहीं। यदि अपने कर्ममें भलीभाँति तत्पर रहनेवाला वह व्यक्ति वहाँ प्राण त्यागता है तो उन स्वर्गलोकोंसे भी आगे मेरे धाममें चला जाता है।
एक बार मैंने एक अश्वकी रचनाकर उसे अखिल आभूषणोंसे अलंकृत किया। वह अश्व श्वेत कमल, शङ्ख अथवा कुन्दपुष्पके समान विद्योतित हो रहा था। धनुष, अक्षसूत्र और कमण्डलु लेकर तथा उसपर आसीन होकर मैंने यात्रा आरम्भ की और चलते-चलते सीधे श्वेतपर्वतपर पहुँचा, जहाँ कुरुवंशी रहते थे। फिर वहाँसे मैंने उन्हें गिराना आरम्भ किया और आकाशतलसे बहुतसे दूसरोंको भी मार गिराया। इस प्रकार सभीको नष्टकर भी वह अश्व आकाशमें शान्त, ज्यों-का-त्यों सुरक्षित तथा सुस्थिर रहा।
**भगवान् वराह बोले—**सुमध्यमे ! तबसे पुरुष उत्तम कुलके अश्वोंपर चढ़कर स्वर्गतककी यात्रा करने लगे। देवि! 'पञ्चसार' नामसे प्रसिद्ध मेरा एक परम गुप्त क्षेत्र है। वहाँ शङ्खके समान सफेद एवं तीव्र गतिसे बहनेवाली जलकी चार धाराएँ गिरती हैं। उस क्षेत्रमें चार दिनोंतक रहकर व्यक्ति 'चैत्राङ्गद' लोकमें जाकर गन्धर्वोंके साथ विहार करता है और वहाँ प्राणत्यागकर प्राणी मेरे लोकको प्राप्त होता है। यहीं 'नारदकुण्ड' नामसे विख्यात मेरा एक दूसरा उत्तम क्षेत्र है, जहाँ तालवृक्षके समान मोटी जलकी पाँच धाराएँ गिरती हैं। उस तीर्थमें एक दिन निवास और स्नान कर पुरुष देवर्षि नारदजीके दर्शनका सौभाग्य प्राप्त करता है तथा वहाँ मरकर मेरे धामको जाता है। यहीं एक वसिष्ठकुण्ड है, जिसमें जलकी तीन धाराएँ गिरती हैं। वहाँ पाँच रात स्नान तथा निवास कर मनुष्य वसिष्ठजीके लोकमें आनन्द प्राप्त करता है। मेरे कर्मोंमें लगा वह पुरुष यदि यहाँ प्राण छोड़ता है तो उस लोकको छोड़कर मेरे धाममें पहुँच जाता है।
* इसका वर्णन अ० १४०।५ आदिमें भी आया है, यह लोहानदीपर स्थित 'लोहाघाट' है। देखिये पृष्ठ २६४ की टिप्पणी।
'Lohaghat in kumauon, 3 miles north to the champawat, on the river Loha.' (N.L.Dey.Geog. Dic. of Anc. & Med. India, P. 115)
१३३- मथुरा-तीर्थका प्रादुर्भाव, इसकी प्रदक्षिणाकी विधि एवं माहात्म्य
अध्याय १५२ ] मथुरातीर्थकी प्रशंसा [ २८३
देवि! इस ‘लोहार्गल’क्षेत्रमें मेरा एक पञ्चकुण्ड नामक प्रधान तीर्थ है, जहाँ हिमालयसे निकलकर जलकी पाँच धाराएँ गिरती हैं। वहाँ पाँच दिनोंतक निवास एवं स्नानकर मनुष्य ‘पञ्चशिख’ स्थानपर निवास करता है। यदि इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर वह मेरा भक्त वहाँ प्राण त्यागता है तो वह मेरे लोकको प्राप्त कर लेता है।
इसी ‘लोहार्गल’ क्षेत्रमें ‘सप्तर्षिकुण्ड’ संज्ञक एक अन्य तीर्थ है। वहाँके स्नानके पुण्यसे पुरुष ऋषियोंके लोकोंमें जाकर हर्षपूर्वक निवास करता है। देवि! वहीं ‘अग्निसर’ नामसे विख्यात एक कुण्ड है, जहाँ आठ रातोंतक रहकर तथा उस कुण्डमें स्नानकर प्राणी सभी सुखोंका उपभोगकर अङ्गिरामुनिके लोकको प्राप्त होता है, इसमें कोई संशय नहीं। यदि मुझसे सम्बन्धित कर्ममें तत्पर वह पुरुष वहाँ प्राण छोड़ता है तो अग्निके लोकका त्यागकर मेरे धामको प्राप्त होता है।
देवि! उसी ‘लोहार्गल’क्षेत्रमें ‘उमाकुण्ड’ नामसे एक प्रसिद्ध स्थान है। यह वह स्थान है, जहाँ भगवान् शंकरकी परमसुन्दरी पत्नी गौरीका प्राकट्य हुआ था। वहाँ दस रातोंतक रहकर मनुष्यको स्नान करना चाहिये। इससे उसे गौरीका दर्शन सुलभ होता है और उनके लोकमें वह सानन्द निवास करता है। यदि आयु क्षीण होनेपर वह मनुष्य उस स्थानपर प्राणका त्याग करता है तो उस लोकसे हटकर मेरे धाममें शोभा पाता है। भगवान् शंकरके साथ उमादेवीका यहीं विवाह हुआ था। इसमें हंस, कारण्डव, चक्रवाक, सारस आदि पक्षी सदा निवास करते हैं। हिमालय-पर्वतसे होकर यहाँ निर्मल जलकी तीन धाराएँ गिरती हैं। मनुष्य बारह दिनोंतक यहाँ निवास और स्नान करे तो वह रुद्रलोकमें आनन्द करता है। यदि वहाँ वह अत्यन्त कठिन कर्म करके प्राणोंको छोड़ता है तो रुद्रलोकसे पृथक् होकर मेरे स्थानकी यात्रा करता है। वहीं ‘ब्रह्मकुण्ड’ नामक स्थानमें चारों वेदोंकी उत्पत्ति हुई थी। इसीके उत्तर-पार्श्वमें सुवर्णके समान रंगवाली एक स्वच्छ जलकी धारा गिरती है, जहाँ ऋग्वेदकी ध्वनि हुई थी। यहीं पश्चिमभागमें यजुर्वेदसे युक्त धारा तथा दक्षिण-पार्श्वमें अथर्ववेदसे समन्वित धारा गिरती है। सात रातोंतक रहकर जो मनुष्य वहाँ स्नान करता है, वह ब्रह्माके लोकको प्राप्त करता है। यदि अहंकारशून्य होकर वह व्यक्ति वहाँ प्राण त्यागता है तो उस लोकका परित्याग करके मेरे लोकमें आ जाता है। महाभागे! मेरे इस ‘लोहार्गल’क्षेत्रकी कथा बड़ी ही रहस्यात्मक है। सिद्धि चाहनेवाले मनुष्यको वहाँ अवश्य जाना चाहिये। वरानने! वह क्षेत्र पचीस योजनकी दूरीमें चारों ओर फैला है और स्वयं ही प्रकट हुआ है। यह विषय आख्यानोंमें परम आख्यान, धर्मोंमें सर्वोत्कृष्ट धर्म तथा पवित्रोंमें परम पवित्र है। जो श्रद्धालु पुरुष इसका पाठ करते हैं अथवा सुनते हैं, उनके माता एवं पिता—इन दोनों कुलोंके दस-दस पूर्वपुरुषोंका संसार-सागरसे उद्धार हो जाता है।
[ अध्याय १५१ ]
मथुरातीर्थकी प्रशंसा
**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! भगवान् श्रीहरिके द्वारा ‘लोहार्गल’क्षेत्रकी महिमा सुनकर पृथ्वीको बड़ा आश्चर्य हुआ और वे बोलीं—
प्रभो! आपकी कृपासे मैंने ‘लोहार्गल’क्षेत्रका माहात्म्य सुना। यदि इससे भी श्रेष्ठ तीर्थोंमें सर्वोत्तम एवं सबके लिये कल्याणकारी कोई तीर्थ हो तो उसे बतानेकी कृपा कीजिये।
**भगवान् वराह कहते हैं—**वसुंधरे! मथुराके समान मेरे लिये दूसरा कोई भी तीर्थ आकाश, पाताल एवं मर्त्य—इन तीनों लोकोंमें कहीं प्रिय
| २८४ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १५२ |
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प्रतीत नहीं होता। इसी पुरीमें मेरा श्रीकृष्णावतार हुआ, अतः यह पुष्कर, प्रयाग, उज्जैन, काशी एवं नैमिषारण्यसे भी बढ़कर है। यहाँ विधिपूर्वक निवास करनेवाला मानव निःसंदेह आवागमनसे मुक्त हो जाता है। माघमासके उत्तम पर्वपर प्रयागमें निवास करनेसे मनुष्यको जो पुण्य-फल प्राप्त होता है, वह मथुरामें एक दिन रहनेपर ही मिल जाता है। इसी प्रकार वाराणसीमें हजार वर्षोंतक निवास करनेसे जिस फलकी प्राप्ति होती है, वह मथुरामें एक क्षण निवास करनेपर सुलभ हो जाता है। वसुंधरे! कार्तिक मासमें पुष्करक्षेत्रके निवासका जो सुविख्यात पुण्य (फल) है, वही पुण्य मथुरामें निवास करनेवाले जितेन्द्रिय पुरुषको सहज प्राप्त हो जाता है। यदि कोई 'मथुरामण्डल' का नाम भी उच्चारण करता है और उसे दूसरा कोई सुन लेता है तो सुननेवाला भी सब पापोंसे छूट जाता है। भूमण्डलपर समुद्रपर्यन्त जितने तीर्थ एवं सरोवर हैं, वे सभी मथुराके अन्तर्गत स्थित हैं, क्योंकि साक्षात् भगवान् श्रीहरि ही गुप्तरूपसे वहाँ निरन्तर निवास करते हैं। कुब्जाम्रक, सौकरव और मथुरा —ये परम विशिष्ट तीर्थ हैं, जहाँ योग-तपकी साधना न रहनेपर भी इन स्थानोंके निवासी सिद्धि पा जाते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है।
देवि! द्वापरयुग आनेपर मैं वहाँ राजा ययातिके वंशमें अवतार ग्रहण करूँगा और मेरी क्षत्रिय जाति होगी। उस समय मैं चार मूर्ति—कृष्ण, बलराम, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध बनकर चतुर्व्यूहके रूपमें सौ वर्षोंतक वहाँ निवास करूँगा। मेरे ये चारों विग्रह क्रमशः चन्दन, सुवर्ण, अशोक एवं कमलके सदृश रूपवाले होंगे। उस समय धर्मसे द्वेष करनेवाले कंस आदि महान् भयंकर बत्तीस दैत्य उत्पन्न होंगे, जिनका मैं संहार करूँगा, वहाँ सूर्यकी पुत्री यमुनाका सुन्दर प्रवाह सदा संनिकट शोभा पाता है। मथुरामें मेरे और बहुत-से गुप्त तीर्थ हैं। देवि! उन तीर्थोंमें स्नान करनेपर मनुष्य मेरे लोकमें प्रतिष्ठित होता है और वहाँ मरनेपर वह चार भुजाओंसे युक्त होकर मेरा स्वरूप बन जाता है।
देवि! मथुरामण्डलमें 'विश्रान्ति' नामका एक तीर्थ है, जो तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। वहाँ स्नान करनेवाला मानव मेरे लोकमें रहनेका स्थान पाता है और वहाँ मेरी प्रतिमाका दर्शनकर सम्पूर्ण तीर्थोंके अवगाहनका फल प्राप्त करता है। जो दो बार उसकी प्रदक्षिणा कर लेता है, वह विष्णुलोकका भागी होता है। इसी प्रकार एक कनखल नामक अत्यन्त गुह्य स्थान है, जहाँ केवल स्नान करनेसे ही मनुष्य स्वर्ग-सुखका अधिकारी हो जाता है। ऐसे ही 'विन्दुक' नामसे विख्यात मेरा एक परम गोप्य क्षेत्र है। देवि! उस क्षेत्रमें स्नान करनेवाला व्यक्ति मेरे लोकमें प्रतिष्ठा पाता है।
वसुंधरे! अब उस तीर्थमें घटित एक प्राचीन इतिहास सुनो। पाञ्चालदेशमें प्रसिद्ध काम्पिल्य* नगरमें राजा ब्रह्मदत्त रहते थे। वहीं तिन्दुक नामक एक नाई रहता था। बहुत दिनोंतक यहाँ निवास करनेके बाद उसका पूरा परिवार क्षीण हो गया और वह पीड़ित होकर वहाँसे मथुरा चला आया और एक ब्राह्मणके घर रहने लगा। वहाँ वह ब्राह्मणके सैकड़ों कार्य करते हुए प्रतिदिन यमुना-स्नान भी करता। इस प्रकार दीर्घकाल व्यतीत होनेपर उसकी इसी तीर्थमें मृत्यु हुई, जिससे दूसरे जन्ममें वह जातिस्मर ब्राह्मण हुआ।
इसी मथुरामें एक 'सूर्यतीर्थ' है, जो सब पापोंसे मुक्त करनेवाला है, जहाँ विरोचनपुत्र
* फर्रूखाबाद जिलेका 'कम्पिल' नगर।
अध्याय १५३—१५५ ] मथुरा, यमुना और अक्रूरतीर्थोंके माहात्म्य २८५
बलिने पहले सूर्यदेवकी उपासना की थी। उसकी उपासनासे प्रसन्न होकर भगवान् सूर्यदेवने तपका कारण पूछा। इसपर बलिने कहा—‘देवेश्वर! पातालमें मेरा निवास है। इस समय मैं राज्यसे वञ्चित हो गया हूँ एवं धनहीन हूँ।’ इसपर भगवान् सूर्यने बलिको अपने मुकुटसे चिन्तामणि निकालकर दिया, जिसे लेकर बलि पाताललोक चले गये। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्यके समस्त पाप समाप्त हो जाते हैं और वहाँ मरनेपर उस प्राणीको मेरे लोककी प्राप्ति होती है। देवि! प्रत्येक रविवारके दिन, संक्रान्तिके अवसरपर अथवा सूर्य एवं चन्द्रग्रहणमें उस तीर्थमें स्नान करनेसे राजसूय-यज्ञके समान फल मिलता है। ध्रुवने भी यहीं स्नानादिपूर्वक कठोर तपस्या की थी, जिससे वह आज भी ‘ध्रुवलोक’ में प्रतिष्ठा पाता है। वसुंधे! जो पुरुष इस ‘ध्रुवतीर्थ’ में श्रद्धा रखता है, उसके सभी पितर तर जाते हैं। ‘ध्रुवतीर्थ’ के दक्षिणभागमें तीर्थराजका स्थान है। देवि! वहाँ अवगाहन कर मानव मेरा धाम प्राप्त करता है। देवि! मथुरामें ‘कोटितीर्थ’ नामक एक स्थान है, जिसका दर्शन देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। वहाँ स्नान एवं दान करनेसे मेरे धाममें प्रतिष्ठा मिलती है। उस ‘कोटितीर्थ’ में स्नान करके पितरों एवं देवताओंका तर्पण करना चाहिये। इससे पितामह आदि सभी पितर तर जाते हैं। उस तीर्थमें स्नान करनेवाला मनुष्य ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा पाता है। यहीं पितरोंके लिये भी दुर्लभ एक ‘वायुतीर्थ’ है, जहाँ पिण्डदान करनेसे पुरुष पितृलोकमें जाता है। देवि! गयामें पिण्डदान करनेसे मनुष्यको जो फल मिलता है, वही फल यहाँ ज्येष्ठमें पिण्ड देनेसे प्राप्त हो जाता है—इसमें कोई संशय नहीं। इन बारह तीर्थोंका केवल स्मरण करनेसे भी पाप दूर हो जाते हैं और मनुष्यकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। [ अध्याय १५२ ]
मथुरा, यमुना और अक्रूरतीर्थोंके माहात्म्य
**भगवान् वराह कहते हैं—**वसुंधरे! ‘शिवकुण्ड’—के उत्तर ‘नवक’नामक एक पवित्र क्षेत्र है, जहाँ स्नान करनेमात्रसे ही प्राणीको सौभाग्य सुलभ हो जाता है और पापी पुरुष भी मेरे धाममें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।
अब इस तीर्थकी एक पुरानी घटना सुनो। पहले नैमिषारण्यमें एक दुष्ट निषाद रहता था। एक बार वह किसी मासकी चतुर्दशीको मथुरा आया और उसके मनमें यमुनामें तैरनेकी इच्छा उत्पन्न हुई। यद्यपि वह यमुनामें तैरता हुआ ‘संयमन’ तीर्थतक पहुँच गया, फिर भी दैवयोगसे वह उससे बाहर न निकल पाया और वहीं उसका प्राणान्त भी हो गया। दूसरे जन्ममें वही (निषाद) क्षत्रियवंशमें उत्पन्न होकर सम्पूर्ण भूमण्डलका स्वामी बना, जिसकी राजधानी सौराष्ट्रमें थी और कालान्तरमें वही ‘यक्ष्मधनु’ नामसे प्रख्यात हुआ। वह अपने धर्म (क्षात्रधर्म तथा राजधर्म)-का भलीभाँति पालन करता तथा अपने राज्यकी रक्षा और प्रजाका रञ्जन करनेमें समर्थ और सफल था। उसका विवाह काशिराजकी सुन्दरी कन्या पीवरीसे हुआ। यक्ष्मधनुकी और भी रानियाँ थीं, किंतु सभी रानियोंमें पीवरी ही उसे सबसे अधिक प्रिय थी। वह उसके साथ भवनों, उद्यानों, उपवनों और नदी-तटोंपर विहार करता हुआ राज्यसुखका उपभोग करने लगा। कालान्तरमें उसके सात पुत्र और पाँच पुत्रियाँ उत्पन्न हुईं। इस प्रकार यक्ष्मधनुके सतहत्तर वर्ष बीत गये। एक समय जब वह शयन कर रहा था तो अचानक उसे मथुराके संयमन-तीर्थकी स्मृति हो आयी और उसके मुँहसे ‘हा! हा!’ शब्द निकलने लगा। इसपर पासमें सोयी उसकी पटरानी
२८६ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १५३-१५५
पीवरीने कहा—'राजन्! आप यह क्या कह रहे हैं?' राजाने उत्तर दिया—'प्रिये! जो किसी मादक वस्तु आदिके सेवनसे बेसुध रहता है, नींदमें रहता है अथवा जिसका चित्त विक्षिप्त रहता है, उसके मुखसे असम्बद्ध शब्दोंका निकल जाना स्वाभाविक है। मैं नींदमें था, इसीसे ये शब्द निकल गये। अतः इस विषयमें तुम्हें नहीं पूछना चाहिये।' फिर रानीके बार-बार आग्रह करनेपर यक्ष्मधनुने कहा—'शुभानने! यदि मेरी बात तुम्हें सुननी आवश्यक जान पड़ती है तो हम दोनों मथुरापुरी चलें। वहीं मैं तुम्हें यह बात बताऊँगा। ग्राम, रत्न, खजाना और जनताकी सँभालके लिये पुत्रको राज्यपर अभिषिक्त कर देना चाहिये। देवि! विद्याके समान कोई आँख नहीं है, धर्मके समान कोई बल नहीं है, रागके समान कोई दुःख नहीं है और त्यागसे बढ़कर दूसरा कोई सुख नहीं है। संसारका संग्रह करनेवालेकी अपेक्षा त्यागी पुरुष सदैव श्रेष्ठ माना गया है।'
वसुंधरे! राजा यक्ष्मधनुने इस प्रकार अपनी पत्नी पीवरीसे सलाहकर अपने ज्येष्ठ पुत्रका राज्याभिषेक किया और उसके साथ श्रेष्ठ पुरुषों (मन्त्री आदि)-के रहनेकी व्यवस्था कर दी। फिर पुरवासी जनतासे विदा ले हाथी, घोड़ा, कोष और कुछ पैदल चलनेवाले पुरुषोंको साथ लेकर वे दोनों मथुराके लिये चल पड़े और बहुत दिनोंके बाद वे मथुरा पहुँचे। मथुरापुरी उस समय देवताओंकी पुरी 'अमरावती'-जैसी प्रतीत हो रही थी। बारह तीर्थोंसे सम्पन्न उस पुण्यमयी पुरीने मानो पापोंको नष्ट करनेके लिये अपनेको मनोहर बना लिया हो।
वसुंधरे! जब राजा यक्ष्मधनु और पीवरीने मथुरापुरीका दर्शन किया तो उनका हृदय प्रसन्न हो गया। फिर उस रानीने उस रहस्यको पूछा, जिसके लिये वे मथुरा आये थे। इसपर यक्ष्मधनुने कहा—'पहले तुम अपनी रहस्यपूर्ण बात बताओ, तब मैं बताऊँगा।'
पीवरी बोली—पहले मेरा निवास गङ्गाके तटपर था, किंतु वहाँ भी मेरा नाम 'पीवरी' ही था। एक बार मैं कार्तिक द्वादशीके दिन इस मथुरापुरीके दर्शनके लिये यहाँ आयी। उसी समय नावद्वारा यमुनाको पार करते समय मैं अचानक 'धारापतन' तीर्थके गहरे जलमें गिर गयी, जिससे मेरे प्राण निकल गये। इसी तीर्थके प्रभावसे मेरा काशी-नरेशके यहाँ जन्म तथा फिर आपसे विवाह हुआ।
वसुंधरे! इसके बाद राजा यक्ष्मधनुने जिस प्रकार संयमन-तीर्थमें उसकी मृत्यु हुई थी, वह सब कथा पीवरीसे सुनायी। अब वे दोनों मथुरामें ही रहने लगे और यमुनामें स्नान करनेका नियम बना लिये। प्रतिदिन नियमसे वे मेरा दर्शन करते। कालान्तरमें वहीं शरीर त्यागकर सभी बन्धनोंसे मुक्त होकर वे मेरे लोकको प्राप्त हुए।
देवि! उसी मथुरामें 'मधुवन' नामक एक अत्यन्त सुन्दर स्थान है और यहीं एक 'कुन्दवन'के नामसे मेरा प्रसिद्ध स्थान है, जहाँ जानेपर ही व्यक्ति सफल-मनोरथ हो जाता है। यहीं वनोंमें प्रधान एक 'काम्यकवन' है, जहाँ स्नान करनेसे मनुष्य मेरे धामको प्राप्त होता है। यहींके 'विमलकुण्ड' तीर्थमें स्नान करनेसे प्राणीके सम्पूर्ण पाप धुल जाते हैं और जो वहीं प्राणोंका परित्याग करता है, वह मेरे लोकमें प्रतिष्ठा पाता है। पाँचवें वनको 'वकुलवन' कहते हैं। वहाँ स्नान कर मनुष्य 'अग्निलोक' को प्राप्त करता है। यमुनाके उस पार 'भद्रवन' नामका छठा वन है। मेरी भक्तिमें परायण रहनेवाले पुरुष ही वहाँ जा पाते हैं और उन्हें नागलोककी प्राप्ति होती है।
१३४- देववन और 'चक्रतीर्थ' का प्रभाव
अध्याय १५३-१५५ ] मथुरा, यमुना और अक्रूरतीर्थोंके माहात्म्य २८७
'खदिर वन' सातवाँ है और आठवाँ 'महावन'। नवें वनका नाम 'लौहजङ्घवन' है, क्योंकि लौहजङ्घ ही इसकी रक्षा करता था। दसवें वनका नाम 'बिल्ववन' है। वहाँ जाकर प्राणी ब्रह्माजीके लोकमें प्रतिष्ठा पाता है। 'भाण्डीर' वन ग्यारहवाँ है, जिसके दर्शनमात्रसे मनुष्य माताके गर्भमें नहीं आता। बारहवाँ वन 'वृन्दावन' है, जहाँकी अधिष्ठात्री वृन्दादेवी हैं। देवि! समस्त पापोंका संहार करनेवाला यह स्थान मुझे बहुत प्रिय है। वसुंधरे! वृन्दावन जाकर जो गोविन्दका दर्शन करते हैं, उन्हें यमपुरीमें कदापि नहीं जाना पड़ता। उनको पुण्यात्मा पुरुषोंकी गति सहज सुलभ हो जाती है।
यमुनेश्वर-तीर्थके 'धारापतन' में स्नान करनेपर मनुष्य स्वर्गका आनन्द पाता है और यहाँ प्राण त्यागनेवाला मेरे धामको जाता है। इसके आगे नागतीर्थ एवं 'घण्टाभरणतीर्थ' है, जिसमें स्नानकर मनुष्य सूर्यलोकमें जाता है। वसुधे! यहाँ 'सोमतीर्थ' का वह पवित्र स्थान है, जहाँ द्वापरमें चन्द्रमा मेरा दर्शन करते हैं। इसमें अभिषेककर मनुष्य चन्द्रलोकमें निवास करता है। यहीं जहाँ सरस्वती नदी ऊपरसे उतरी है, वह पवित्र स्थान सम्पूर्ण पापोंको हरनेवाला है।
मथुराके पश्चिममें ऋषिगण निरन्तर मेरी पूजा करते हैं। प्राचीन कालमें सृष्टिके अवसरपर ब्रह्माद्वारा मनसे निर्मित होनेके कारण इसका नाम 'मानसतीर्थ' पड़ गया है। यहाँ जो स्नान करते हैं, उन्हें स्वर्ग मिलता है। यहीं भगवान् श्रीगणेशका एक पुण्यमय तीर्थ है, जिसके प्रभावसे पाप दूरसे ही भाग जाते हैं। यहाँ चतुर्थी, अष्टमी और चतुर्दशीके दिन स्नान करनेसे मनुष्योंके सामने श्रीगणेशजीके प्रभावसे दुःख पासमें नहीं फटकते। विद्या आरम्भ की जाय अथवा यज्ञ एवं दान आदिकी क्रियाएँ सम्पन्न करनी हों तो सभी समयोंमें गौरीनन्दन गणेशजी धर्मकर्ता पुरुषके कार्यको सदा निर्विघ्न पूर्ण कर देते हैं। यहीं आधा कोसके परिमाणवाला परम दुष्कर 'शिवक्षेत्र' है, जहाँ रहकर भगवान् शंकर इस मथुरापुरीकी निरन्तर रक्षा करते हैं। उसके जलमें स्नान और उस जलका पान कर मनुष्य मथुरावासका फल प्राप्त करता है।
भगवान् वराह कहते हैं— देवि! अब मैं एक दूसरे दुर्लभ 'अक्रूर 'तीर्थका वर्णन करता हूँ। अयन* विषुव† तथा विष्णुपदीके‡ शुभ अवसरपर मैं श्रीकृष्णरूपमें वहाँ स्थित रहता हूँ। यहाँ सूर्यग्रहणके समय स्नान करनेसे मनुष्य 'राजसूय' एवं 'अश्वमेध' यज्ञोंका फल प्राप्त करता है। अब इस तीर्थके एक बहुत पुराने इतिहासको सुनो। पहले यहाँ सुधन नामका एक धनी एवं भक्त वैश्य रहता था। वह स्त्री-पुत्र और अपने बन्धुओंके साथ सदा मेरी उपासनामें लगा रहता तथा गन्ध, पुष्प, धूप तथा दीप अर्पण करके नित्य नियमानुसार मुझ श्रीहरिकी पूजा करता था। वह प्रायः एकादशीको इसी अक्रूरतीर्थमें आकर मेरे सामने नृत्य करता।
एक बार वह रात्रिजागरण, नृत्य तथा कीर्तन आदि करनेके उद्देश्यसे मेरे पास आ रहा था कि किसी भयंकर ब्रह्मराक्षसने उसके पैर पकड़ लिये। उसकी आकृति बड़ी डरावनी थी तथा बाल ऊपरको उठे हुए थे। उसने सुधनसे कहा—
* सूर्यके कर्कराशिमें आनेपर दक्षिणायन एवं मकर-राशिमें आनेपर उत्तरायण होता है। सूर्यकी इस षाण्मासिक गति एवं स्थितिको 'अयन' कहते हैं।
† जिस समय दिन और रातका मान बराबर होता है—उसका नाम 'विषुव' है। यह स्थिति प्रायः २१ मार्च और २३ सितम्बरको होती है।
‡ वृष, सिंह, वृश्चिक और कुम्भ राशियोंकी सूर्य-संक्रान्तियोंका नाम 'विष्णुपदी' है।
| २८८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १५३-१५५ |
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‘वैश्य ! आज मैं तुम्हें खाकर तृप्ति प्राप्त करूँगा।’ इसपर सुधन बोला—‘राक्षस ! बस, तुम थोड़ी देर प्रतीक्षा करो, मैं तुम्हें पर्याप्त भोजन दूँगा और बादमें तुम मेरे इस शरीरको भी भक्षण कर लेना। पर इस समय मैं देवेश्वर श्रीहरिके सामने नृत्य एवं रात्रि-जागरण करनेके लिये जा रहा हूँ। मैं अपना यह व्रत पूरा कर प्रातः सूर्यके उदय होते ही तुम्हारे पास वापस आ जाऊँगा तब तुम मेरे इस शरीरको अवश्य खा लेना। भगवान् नारायणकी प्रसन्नताके लिये किये जानेवाले मेरे इस व्रतको भङ्ग करना तुम्हारे लिये उचित नहीं है।’ इसपर ब्रह्मराक्षस आदरपूर्वक मधुर वाणीसे बोला—‘साधो ! तुम यह असत्य बात क्यों कह रहे हो? भला, ऐसा कौन मूर्ख होगा, जो राक्षसके मुखसे छूटकर पुनः स्वेच्छासे उसके पास लौट आये।’
इसपर वैश्यवर बोला—‘सम्पूर्ण संसारकी जड़ सत्य है। सत्यपर ही अखिल जगत् प्रतिष्ठित है। वेदके पारगामी ऋषिलोग सत्यके बलपर ही सिद्धि प्राप्त करते हैं। यद्यपि पूर्वजन्मके कर्मवश मेरी उत्पत्ति धनी वैश्यकुलमें हुई है, फिर भी मैं निर्दोष हूँ। ब्रह्मराक्षस ! मैं प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि वहाँ जागरण और नृत्य करके सुखपूर्वक मैं अवश्य लौट आऊँगा। सत्यसे ही कन्याका दान होता है और ब्राह्मण सदा सत्य बोलते हैं। सत्यसे ही राजाओंका राज्य चलता है। सत्यसे ही पृथ्वी सुरक्षित है। सत्यसे ही स्वर्ग सुलभ होता है और सत्यसे ही मोक्ष मिलता है। अतः यदि मैं तुम्हारे सामने न आऊँ तो पृथ्वीका दान करके पुनः उसका उपभोग करनेसे जो पाप होता है, मैं उसका भागी बनूँ। अथवा क्रोध या द्वेषवश जो पत्नीका त्याग करता है, वह पाप मुझे लगे। यदि मैं पुनः तुम्हारे पास न आऊँ तो एक साथ बैठकर भोजन करनेवाले व्यक्तियोंमें जो पङ्क्तिभेदका पाप करता है, मुझे वह पाप लगे। अथवा यदि मैं फिर तुम्हारे पास पुनः न आऊँ तो एक बार कन्यादान करके फिर दूसरेको दान करने अथवा ब्राह्मणकी हत्या करने, मदिरा पीने, चोरी करने या व्रत भङ्ग करनेपर जो बुरी गति मिलती है, वह गति मुझे प्राप्त हो।
भगवान् वराह कहते हैं—देवि ! सुधनकी बात सुनकर वह ब्रह्मराक्षस संतुष्ट हो गया। उसने कहा—‘भाई ! तुम वन्दनीय हो और अब जा सकते हो।’ इसपर वह कलामर्मज्ञ वैश्य मेरे सामने आकर नृत्यगान करने लगा और प्रातःकालतक नृत्य करता रहा। दूसरे दिन उसने प्रातःकाल ‘ॐ नमो नारायणाय’ का उच्चारण कर यमुनामें गोता लगाया और मथुरा पहुँचकर मेरे दिव्य रूपका दर्शन किया। देवि ! उसी समय मैं एक दूसरा रूप धारणकर उसके सामने प्रकट हुआ और उससे मैंने पूछा—‘आप ! इतनी शीघ्रतासे कहाँ जा रहे हैं?’ इसपर सुधनने कहा—‘मैं अपनी प्रतिज्ञानुसार ब्रह्मराक्षसके पास जा रहा हूँ।’ उस समय मैंने उसे मना किया और कहा—‘अनघ ! तुम्हें वहाँ नहीं जाना चाहिये। जीवन रहनेपर ही धर्मानुष्ठान सम्भव है। इसपर उस वैश्यने उत्तर दिया—‘महाभाग ! मैं ब्रह्मराक्षसके पास अवश्य जाऊँगा, जिससे मेरी (सत्यकी) प्रतिज्ञा सुरक्षित हो। जगत्प्रभु भगवान् विष्णुके निमित्त जागरण और नृत्य करनेका मेरा व्रत था। वह नियम सुखपूर्वक सम्पन्न हो गया।’ इस प्रकार कहकर वह वहाँसे चला गया और ब्रह्मराक्षससे कहा—‘राक्षस ! तुम अब इच्छानुसार मेरे इस शरीरको खा जाओ।’
इसपर ब्रह्मराक्षसने कहा—‘वैश्यवर ! तुम वस्तुतः सत्य एवं धर्मका पालन करनेवाले साधु पुरुष हो, तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुम्हारे व्यवहारसे संतुष्ट हूँ। महाभाग ! अब तुम अपने नृत्य एवं जागरणके पूरे पुण्यको मुझे देनेकी कृपा करो। तुम्हारे प्रभावसे मेरा भी उद्धार हो जायगा।’
१३५- 'कपिल-वराह' का माहात्म्य
अध्याय १५६-१५७] मथुरामण्डलके 'वृन्दावन' आदि तीर्थ और उनमें स्नान-दानादिका महत्त्व २८९
‘राक्षस! मैं तुम्हें अपने रात्रिजागरण एवं नृत्यका पुण्य नहीं दे सकता। आधी रात, एक प्रहर तथा आधे प्रहरके भी जागरणका पुण्य मैं तुम्हें नहीं दे सकता'—वैश्यने कहा।
'तब बस एक नृत्यका ही पुण्य मुझे देनेकी दया करो।'—राक्षस बोला।
'मैं तुम्हें पुण्य तो यह भी नहीं दे सकता। पर जो बात कह चुका हूँ, उसके लिये आ गया हूँ। साथ ही मैं यह भी जानना चाहता हूँ कि तुम किस कर्मके दोषसे ब्रह्मराक्षस हुए? यदि यह बहुत गोप्य न हो तो मुझे बता दो।'—वैश्यने कहा।
अब ब्रह्मराक्षसके मुखपर हँसी छा गयी। उसने कहा—'वैश्यवर! तुम ऐसी बात क्यों कहते हो। मैं तो तुम्हारे पासका ही रहनेवाला हूँ। मेरा नाम 'अग्निदत्त' है। मैं पूर्वजन्ममें वेदाभ्यासी ब्राह्मण था। किंतु चौर्यदोषसे मुझे ब्रह्मराक्षस होना पड़ा। दैवयोगसे तुमसे भेंट हो गयी है। अब तुम मेरा उपकार करनेकी कृपा करो। वैश्यवर! तुम यदि एक ही 'नृत्य एवं गान' का पुण्य मुझे दे दो तो मेरा उद्धार हो जाय।' वैश्यने कहा—'राक्षस! मैंने एक नृत्यके पुण्यका फल तुम्हें दे दिया।' फिर तो उस एक नृत्यके पुण्यके प्रतापसे उसका तत्काल उद्धार हो गया और ब्रह्मराक्षसकी योनिसे सदाके लिये मुक्ति मिल गयी।
भगवान् वराह कहते हैं—देवि! उसी समय वहाँ ब्रह्मराक्षसकी जगह शङ्ख, चक्र, गदा एवं पद्म धारण किये मैं (भगवान् श्रीहरि) प्रकट हो गया। उस समय मेरे (श्रीविष्णुरूपके अपने) श्रीविग्रहकी आभा परम दिव्य थी। भक्तोंकी याचना पूर्ण करनेवाले (श्रीविष्णुरूपमें) मैंने उस वैश्यसे मधुर वाणीमें कहा—'तुम अब सपरिवार उत्तम विमानपर चढ़कर मेरे दिव्य विष्णुलोकको जाओ।'
वसुंधरे! इस प्रकार कहकर मैं (भगवान् श्रीहरि) वहीं अन्तर्धान हो गया और सुधन भी अपने परिवारके सहित दिव्य विमानद्वारा सशरीर विष्णुलोकमें चला गया। देवि! 'अक्रूर-तीर्थ' की यह महिमा मैंने तुम्हें बतला दी। उस कार्तिकमासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिको जो तीर्थमें स्नान करता है, उसे 'राजसूययज्ञ' का फल प्राप्त होता है और वहाँ श्राद्ध तथा वृषोत्सर्ग करनेवाला पुरुष अपने कुलके सभी पितरोंको तार देता है। [अध्याय १५३-१५५]
मथुरामण्डलके 'वृन्दावन' आदि तीर्थ और उनमें स्नान-दानादिका महत्त्व
भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! अब मैं मथुरामण्डलके 'वत्स-क्रीडन' नामक तीर्थका वर्णन करता हूँ। यहाँ लाल रंगकी बहुत-सी शिलाएँ हैं। यहाँ स्नान करनेमात्रसे मनुष्य वायु-देवके लोकको प्राप्त होता है। यहीं दूसरा एक 'भाण्डीर' वन भी है, जिसकी साखू, ताल-तमाल, अर्जुन, इङ्गुदी, पीलुक, करील तथा लाल फूलवाले अनेक वृक्ष शोभा बढ़ाते हैं। यहाँ स्नान करनेसे मनुष्यके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं और वह इन्द्रके लोकको प्राप्त होता है। वल्लरियों तथा लताओंसे आच्छादित यहाँका रमणीय वृन्दावन देवता, दानवों और सिद्धोंके लिये भी दुर्लभ है। गायों और गोपालोंके साथ मैं यहाँ (कृष्णावतारमें) क्रीडा करता हूँ। यहाँ एक रात निवास तथा कालिन्दीमें अवगाहनकर मनुष्य गन्धर्वलोकको प्राप्त होता है और वहाँ प्राणोंका त्याग कर मनुष्य मेरे धामको प्राप्त होता है।
वसुंधरे! यहाँ एक दूसरा तीर्थ 'केशिसथल' है। 'वृन्दावन' के इसी स्थानपर मैंने केशीदैत्यका