भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय १४६ ] रुरुक्षेत्र एवं हृषीकेशके माहात्म्यका वर्णन २७३

देता है। ऐसा मानव मृत्युके समय कभी मोहमें नहीं पड़ता। वह यदि परम सिद्धि चाहता है तो मेरे धाममें चला जाता है। महादेवि! मैंने तुमसे शालग्राम-क्षेत्रके इस श्रेष्ठ माहात्म्यका वर्णन कर दिया। अब तुम्हें अन्य कौन-सा प्रसङ्ग सुननेकी इच्छा है? कहो! [अध्याय १४५]


रुरुक्षेत्र* एवं हृषीकेशके माहात्म्यका वर्णन

**पृथ्वी बोली—**प्रभो! आपने जो शालग्राम-क्षेत्रके बहुत अद्भुत माहात्म्यका वर्णन किया, उसके श्रवण करनेसे मेरी चिन्ता शान्त हो गयी। अब मैं यह जानना चाहती हूँ कि ‘रुरु’-खण्डकी प्रसिद्धि कैसे हुई और वह उत्तम क्षेत्र आपका शुभ आश्रम कैसे बन गया? जगन्नाथ! आप इसे मुझे बतानेकी कृपा करें।

**भगवान् वराह कहते हैं—**देवि! पहले भृगुवंशमें देवदत्त नामके एक वेद-वेदाङ्गपारगामी विद्वान् ब्राह्मण रहते थे। वे अपने पवित्र आश्रममें रहकर दस हजार वर्षोंतक कठोर तपस्या करते रहे। इससे इन्द्रके मनमें महान् चिन्ता उत्पन्न हो गयी। अतः उन्होंने कामदेव, वसन्त-ऋतु तथा गन्धर्वोंके साथ प्रम्लोचा नामकी अप्सराको बुलाकर उनकी तपस्यामें विघ्न डालनेके लिये भेजा और वह अप्सरा इनके साथ मुनिवर देवदत्तके आश्रमपर चली गयी। वहाँ अनेक प्रकारकी लताएँ और वृक्ष पहलेसे ही उनके आश्रमकी शोभा बढ़ा रहे थे तथा कोकिलोंका समूह मधुर कूजन कर रहा था। आम्रकी मञ्जरियाँ, भौंरोंका गुञ्जन, गन्धर्वोंका संगीत, शीतल-मन्द-सुगन्धित वायु—ये एक-से-एक रागोद्दीपक थे। अत्यन्त स्वच्छ सुगन्धित और मधुर जलसे सरोवर भरा था, जिसमें कमलोंका समुदाय खिला हुआ था। इसी समय उस परम सुन्दरी अप्सराने अत्यन्त मधुर संगीतका तान छेड़ा। इधर कामदेवने भी अपना पुष्पमय धनुष खींचा और उसपर बाणोंका संधान कर शान्त चित्तवाले मुनिवर देवदत्तको अपना लक्ष्य बनाया।

रम्य आलापसे सम्पन्न उस सुमधुर संगीतको सुनकर उन उत्तम व्रती मुनिवर देवदत्तका चित्त विक्षुब्ध हो उठा। अब वे इधर-उधर देखते हुए आश्रममें घूमने लगे। इसी बीच सुन्दर अङ्गोंसे शोभा पानेवाली वह प्रम्लोचा भी उन्हें दीख गयी। उस समय वह गेंद उछाल रही थी। उसकी दृष्टि पड़ते ही मुनिवर देवदत्त कामदेवके बाणसे बिंध गये। उसी समय प्रम्लोचाके अङ्गोंपर मलयवायुका झोंका लगा, जिससे उसके वस्त्र भी खिसक गये। अब मुनि अपनेको सँभाल न सके। उन्होंने उससे पूछा—'सुभगे! तुम कौन हो तथा इस उपवनमें कैसे आयी हो?' अन्तमें उसकी सम्मतिसे उसके साथ रहते हुए उन्होंने अपने तपके प्रभावसे अनेक मनोहर भोगोंको भोगा। सुख-भोगमें आसक्त होकर दिन-रात वे कभी सोते भी न थे। इस प्रकार बहुत दिन व्यतीत हो गये।

एक दिनकी बात है, उनका विवेक जाग्रत् हुआ और वे अज्ञानरूपी नींदसे सहसा जाग उठे। वे कहने लगे—'अहो! भगवान् श्रीहरिकी माया कैसी प्रबल है, जिसके प्रभावसे मैं भी मोहके गर्तमें डूब गया। यह जानते हुए भी कि इससे मेरी तपस्या नष्ट हो जायगी, प्रबल दैवके अधीन होनेके कारण मैंने यह कुत्सित कार्य कर डाला। 'सुभाषित' के नामसे यह प्रवाद प्रसिद्ध है कि नारी अग्निके कुण्ड-जैसी है और पुरुष घृतके घड़ेके समान, पर मेरी समझसे तो यह मूर्खोंका


* श्रीविष्णुपुराण १। १५। १३ आदिके अनुसार यह भी 'मुक्तिनाथ' के ही आसपासका पर्वत है।