वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २७२ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १४५ |
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सबको सुख पहुँचाता है। देवता भी उसके लिये तरसते हैं। पृथ्वी देवि! वह ह्रद सदा जलसे परिपूर्ण रहता है। उसमें अनेक ऐसी मछलियाँ भी विचरण करती रहती हैं, जिनपर चक्रका चिह्न अङ्कित रहता है।
सुनयने! अब वहाँका एक दूसरा प्रसङ्ग बताता हूँ, उसे सुनो। वहाँ एक आश्चर्ययुक्त घटना निरन्तर घटती रहती है। मुझमें श्रद्धा रखनेवाला मानव ही इस अलौकिक आश्चर्यमय दृश्यको देख सकता है, पापी पुरुष उसे देखनेमें असमर्थ है। उस परम पवित्र देवह्रदमें सूर्योदयके समय सुनहरे रंगके छत्तीस स्वर्णकमल दिखायी पड़ते हैं, जिन्हें सभी लोग मध्याह्न कालतक देखते हैं। उसमें स्नान करनेपर मानसिक, वाचिक एवं शारीरिक मल धुल जाते हैं और वे शुद्ध होकर स्वर्ग चले जाते हैं। जो व्यक्ति दस दिनोंतक वहाँ निवास एवं स्नान करता है, उसे विधिपूर्वक अनुष्ठित दस अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। यदि मेरे चिन्तनमें संलग्न प्राणी वहाँ अपना प्राण त्याग करता है तो वह अश्वमेध-यज्ञके फलको भोगकर मेरा सारूप्य मोक्ष प्राप्त करता है।
देवि! यहीं श्रीकृष्णके विग्रहसे 'कृष्णगण्डकी' का प्रादुर्भाव हुआ है। इसी प्रकार 'त्रिशूलगङ्गा' नामकी प्रसिद्ध विशाल नदी जो शिवके शरीरसे निकली है, वह भी यहीं है। इस प्रकार दोनों नदियोंके बीचका यह प्रदेश तीर्थ बन गया है। इस स्थानको 'सर्वतीर्थकदम्बक' कहते हैं। यहाँका कदली-वन शिववनकी सुषमा बढ़ाता है। निचुल, जायफल, नागकेसर, खजूर, अशोक, वकुल, आम्र, प्रियालक, नारियल, सोपारी, चम्पा, जामुन, धव, नारङ्गी, बेर, जम्बीर, मातुलुङ्ग, केतकी, मल्लिका (चमेली), यूथिका (जूही), कूई, कोरया, कुटन और अनार आदि अनेक फलों तथा फूलोंवाले वृक्षोंसे उसकी अनुपम शोभा होती रहती है। देवता लोग अपनी पत्नियोंके साथ वहाँ आकर आनन्दका अनुभव करते हैं। इस परम पुण्यमय सरोवरमें उन दो महान् नदियोंका सङ्गम है। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य सौ अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्राप्त करता है। वहाँ वैशाख मासमें स्नान करनेसे एक हजार गाय दान करनेका, माघ महीनेमें स्नान करनेका तथा प्रयागमें मकर स्नानका फल पा लेता है। कार्तिक मासमें सूर्य जब तुला राशिपर आ जायँ, तब वहाँ विधिपूर्वक स्नान करनेवाला निश्चय ही मुक्तिफलका अधिकारी हो जाता है। देवि! इस प्रकार यह हम लोगोंका 'हरिहरात्मक' क्षेत्र है। जो यहाँ शरीरका त्याग करते हैं, उन मेरे कर्मके अनुसरण करनेवाले व्यक्तियोंको उत्तम गति प्राप्त होती है। पहले 'मुक्तिक्षेत्र', तब 'रुरुखण्ड' फिर उन दोनों दिव्य स्थलोंसे निर्मित बहाव-प्रदेश और त्रिवेणी-सङ्गम—इन तीर्थोंमें उत्तरोत्तर क्रमशः एक-से-एक श्रेष्ठ माने जाते हैं। गण्डकीसे सङ्गम-क्षेत्रको परम प्रमाण जानना चाहिये। देवि! इस प्रकार नदियोंमें वह गण्डकी नदी सर्वश्रेष्ठ है। भागीरथी गङ्गासे वह जहाँ मिलती है, वहाँ स्नान करनेसे बहुत फल होता है। यह वही महान् क्षेत्र है, जिसे 'हरिहर-क्षेत्र' कहते हैं। यहाँ पवित्र गण्डकी नदी भगवती भागीरथीसे मिलती है। इस तीर्थके महत्त्वको तो देवतालोग भी भलीभाँति नहीं जानते।
भद्रे! मैं तुमसे शालग्राम-क्षेत्र* और सब पापोंको नष्ट करनेवाले गण्डकीके माहात्म्यका वर्णन कर चुका।
जो मानव प्रातःकाल उठकर इसका सदा पाठ करता है, वह अपनी इक्कीस पीढ़ियोंको तार
* विल्फोर्ड तथा पद्मपुराण, पातालखण्ड अ० ७८के अनुसार यह शालग्राम पर्वत 'मुक्तिनाथ' ही है। द्रष्टव्य—'कल्याण' का तीर्थाङ्क'।