भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 285
२७४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १४६

प्रवादमात्र है। विचारकी दृष्टिसे देखा जाय तो वस्तुतः इनमें बड़ा अन्तर है। क्योंकि घीका घड़ा तो आगपर रखनेसे पिघलता है, न कि देखनेमात्रसे। किंतु पुरुष तो स्त्रीको देखकर ही पिघल उठता है। तथापि इस स्त्रीका यहाँ कोई अपराध नहीं है; क्योंकि मैं स्वयं अपनी इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त करनेमें असमर्थ था।'

इस प्रकार पश्चात्ताप करते हुए उन्होंने प्रम्लोचाको वहाँसे विदा कर दिया। फिर वे सोचने लगे—'इस स्थानमें यह विघ्न हुआ, अतः मैं अब इस आश्रमका परित्यागकर कहीं अन्यत्र चलूँ और वहाँ तीव्र तपस्याका आश्रय लेकर इस शरीरको सुखा दूँ। इस प्रकार निश्चय कर वे भृगुमुनिके आश्रमपर गये और वहाँ गण्डकी नदीके सङ्गममें स्नानकर देवताओं और पितरोंका उन्होंने तर्पण किया एवं भगवान् विष्णु और शिवकी भलीभाँति पूजा की। फिर वे भगवान् शंकरके दर्शनकी अभिलाषासे गण्डकीके तटपर स्थित भृगुतुङ्ग^१ पर कठोर तपस्या करने लगे। इस प्रकार बहुत दिन बीतनेपर भगवान् शंकर उन मुनिपर संतुष्ट हुए। उनके लिङ्गरूपमें सहसा ऊपर एवं नीचेसे जलकी तिरछी धाराएँ निकलने लगीं। फिर वे बोले—'मुने! इधर मुझे देखो, मैं शिव हूँ। तुम्हें जानना चाहिये कि विष्णु भी मैं ही हूँ। हम दोनोंमें तत्त्वतः कोई भेद नहीं है। इसके पूर्वके तपमें तुम्हारी मुझमें और विष्णुमें भेद-दृष्टि थी, अतः तुम्हें विघ्नोंका सामना करना पड़ा तथा तुम्हारी महान् तपस्या क्षीण हो गयी। अब तुम हम दोनोंको समानभावसे ही देखो। इससे तुम्हें फिर शीघ्र ही सिद्धि सुलभ हो जायगी। जहाँ तुमने तपस्या की है और अनेकों शिवलिङ्गोंका प्राकट्य हुआ है, यह स्थान 'सङ्गम'–नामसे प्रसिद्ध होगा। इस गण्डकी-तीर्थमें स्नान करके जो यहाँ मेरे इन लिङ्गोंकी पूजा करेगा, उसे सम्यक् प्रकारसे योगका उत्तम फल प्राप्त हो जायगा, इसमें कोई संदेह नहीं।' मुनिको वर देकर भगवान् शंकर वहीं अन्तर्धान हो गये और वे उनके बताये मार्गका अनुसरण करने लगे। अतः वे परम सायुज्य-पदको प्राप्त हुए।

इधर मुनिके सम्पर्कसे प्रम्लोचा भी गर्भवती हो गयी थी। आश्रमके पास ही उससे एक कन्या उत्पन्न हुई, जिसे वहीं छोड़कर वह स्वर्गलोकमें चली गयी। उससे उत्पन्न हुई कन्या भी 'रुरु' नामक मृगोंद्वारा पालित होकर धीरे-धीरे बड़ी हुई, अतः उसका नाम भी 'रुरु'^२ हुआ। वह अपने पिता देवदत्तके आश्रमपर ही रहती, अनेक युवक उसे अपनी पत्नी बनाना चाहते, किंतु उसने किसीकी भी बात न मानी और भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये तपस्या करने लगी। वह कठोर तप करती हुई केवल सूखे पत्ते खाकर रहती और बादमें पत्ते खाना भी छोड़कर केवल वायुके आहारपर रहती हुई वह भगवान् श्रीहरिकी आराधनामें तत्पर हो गयी। इस प्रकार सौ वर्षोंतक द्वन्द्वोंको सहती हुई निश्चलभावसे भगवद्ध्यानमें समाधिस्थ होकर स्थाणु (ठूँठ)-के समान निश्चल रहने लगी। अब उसके शरीरके दिव्य प्रकाशसे सारा संसार व्याप्त हो गया।

अब मैं उसके सामने प्रत्यक्ष हुआ। नियन्त्रित


१. श्रीनन्दलाल 'दे' आदिके अनुसार यह गण्डकीके पूर्वोत्तरतटपर नेपालका 'मुक्तिनाथ' पर्वत ही है। 'महाभारत' १।७५, ५७, २१६।२; ३।९४।५०, ८५।९१-९२;९०।२३; १३।२५।१८-१९ में भी इस (भृगुतुङ्ग)-का उल्लेख है। टीकाकार पं० नीलकण्ठके अनुसार यह 'तुङ्गनाथ' है।' According to Nilkantha it is 'Tunganath' (Geog Dic. of Anc. & Med. India P. 34)
२. स्वल्पान्तरसे यह कथा श्रीमद्भागवत ४।३०।१३ तथा 'विष्णुपुराण' के प्रथम अंशके १५वें अध्यायमें भी है।