वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २७० | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १४५ |
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भगवान्ने सुदर्शन चक्रसे ग्राहके मुँहको चीर डाला। वसुंधरे! वे अपने चक्रको बार-बार चला रहे थे। इससे शिलाओंपर भी चोट पहुँची। अतः चक्रके आघातसे शिलाओंमें भी उनके चिह्न पड़ गये जिससे वे शिलाएँ वज्रकीटद्वारा खायी-सी दीखती हैं। सुन्दरि! इस त्रिवेणीक्षेत्रके विषयमें तुम्हें संदेह करना ठीक नहीं है। इस क्षेत्रकी ऐसी महिमा है, जिसका वर्णन मैंने तुमसे किया।^१
वसुंधरे! राजा भरत भी पुलह-पुलस्त्यमुनिके आश्रमके निकट जाकर 'त्रिजलेश्वर'भगवान्की पूजामें संलग्न हुए तो उनकी संसारसे सर्वथा विरति हो गयी और मृगके शरीर छूटनेके पश्चात् वे जडभरत हुए^२। इस जन्ममें भी पुनः उन्होंने इनकी पूजा की। इसीसे वे जलेश्वर या जडेश्वर भी कहलाने लगे। भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करनेसे योग-सिद्धि प्राप्त हो जाती है। सुभगे! जब मैं श्रेष्ठ शालग्राम-क्षेत्रमें था तो वहीं मुझे यह बात विदित हुई कि जलेश्वर (जडभरत)-ने मेरी स्तुति की है। वसुधे! भक्तोंपर कृपा करनेके लिये मैं विवश हो जाता हूँ, अतः मैंने अपना सुदर्शन चक्र चलाया। मेरा प्रथम चक्र जहाँ गिरा, वहाँ 'चक्रतीर्थ' बन गया। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य तेजसे सम्पन्न होकर सूर्यके लोकमें प्रतिष्ठा पाता है और मरकर मेरे लोकको प्राप्त होता है। मेरे तथा भगवान् शंकरके वहाँ रहनेके कारण ही यह तीर्थ 'हरिहरक्षेत्र' कहलाने लगा।
यहाँ 'त्रिधारक' नामका तीर्थ है, जिसके पूर्वभागमें 'हंसतीर्थ' नामसे प्रसिद्ध एक स्थान है। वहाँका एक कौतुकपूर्ण सर्वोत्कृष्ट वृत्तान्त बताता हूँ, सुनो। किसी समयकी शिवरात्रिके दिन जब इस मन्दिरमें उत्सव चल रहा था, अनेक प्रकारके नैवेद्य अर्पण करके शंकरजीकी उपासना चल रही थी, इतनेमें ही कुछ भूखे कौए उस अन्नपर टूट पड़े और एक कौआ अन्न उठाकर ऊपर उड़ गया और दूसरा उसको छीननेके लिये उसपर झपटा। इस प्रकार वे दोनों परस्पर लड़ते हुए एक कुण्डमें गिर पड़े। वहाँ गिरते ही सहसा उनकी आकृति हंसके समान हो गयी और जब वे बाहर निकले तो उनसे चन्द्रमाके तुल्य प्रकाश फैलने लगा। वहाँकी जनता यह देखकर महान् आश्चर्यमें भर गयी। तबसे लोग उस स्थानको 'हंसतीर्थ' कहने लगे। बहुत पहले यहीं यक्षोंने भगवान् शंकरकी आराधना की थी। उस समयसे वह 'यक्षतीर्थ'के नामसे कहा जाता है। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य पवित्र होकर यक्षोंके लोकमें प्रतिष्ठा पाता है। [ अध्याय १४४ ]
शालग्राम-क्षेत्रका माहात्म्य
धरणीने पूछा— भगवान्! आप सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी हैं। मैं जानना चाहती हूँ कि मुनिवर सालङ्कायनने आपके उस मुक्तिप्रद क्षेत्रमें तपस्या करते हुए अन्य कौन-सा कार्य किया और कौन-सी सिद्धि प्राप्त की?'
भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! सालङ्कायन मुनि वहाँ दीर्घ कालतक तप करते रहे। उनके सामने शालका एक उत्तम वृक्ष था, जिससे सुगन्ध फैल रही थी। सालङ्कायन ऋषि निरन्तर तप करनेसे थक गये थे। इतनेमें उनकी दृष्टि उस शाल-वृक्षपर पड़ी। वे उस विशाल वृक्षके नीचे गये और विश्राम करने लगे। उनके मनमें मेरे दर्शनकी अभिलाषा बनी रही। उस समय शाल-वृक्षके पूर्वभागमें पश्चिमकी ओर मुख करके मुनि
१. इसमें तथा श्रीमद्भागवत ८। २—४ एवं वामन-पुराणके 'गजेन्द्रमोक्ष' कथामें कुछ अन्तर है।
२. यह कथा भागवत ५। १० में है।