वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 280, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १४४] सोमेश्वरलिङ्ग, मुक्तिक्षेत्र (मुक्तिनाथ) और त्रिवेणी आदिका माहात्म्य २६९
करनेसे मनुष्य पापसे छूट सकता है। इसकी समता करनेवाली दूसरी कोई नदी नहीं है। केवल गङ्गा इससे श्रेष्ठ है। भुक्ति-मुक्ति देनेवाली परम पुण्यमयी वह गण्डकी जहाँ है, वहीं 'देविका' नामसे प्रसिद्ध एक दूसरी नदी भी गण्डकीके साथ मिल गयी है। यहींसे थोड़ी दूरपर पुलस्त्य और पुलह मुनि आश्रम बनाकर सृष्टिका विधान सम्पन्न होनेके लिये महान् तपस्या कर रहे थे। तपके फलस्वरूप उन्हें सृष्टि करनेकी शक्ति सुलभ हो गयी। उसी समय ब्रह्माके शरीरसे एक पुण्यमयी नदी गङ्गा जो नदियोंमें प्रधान मानी जाती है वह तथा एक और नदी देविका गण्डकीमें आकर मिल गयी। अतः उस महान् पवित्र नदीका नाम त्रिवेणी पड़ गया, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। वह पवित्र मुक्तिप्रद क्षेत्र एक योजनके विस्तारमें है।
देवि! पूर्व समयकी बात है। वेद-विद्याविशारद कर्दममुनिके दो पुत्र थे, जिनका नाम क्रमशः जय और विजय था। ये दोनों यज्ञविद्यामें निपुण तथा वेद एवं वेदाङ्गके पारगामी विद्वान् थे और भगवान् श्रीहरिमें भी उनकी बड़ी निष्ठा थी। संयोगसे कभी उन दोनों परम कुशल ब्राह्मणोंको राजा मरुतने यज्ञके लिये बुलाया। यज्ञ समाप्त हो जानेपर राजाने उन दोनों भाइयोंकी पूजा की और उन्हें प्रभूत दक्षिणा दी। अब वे दोनों ब्राह्मण घर आ गये और दक्षिणामें मिली हुई सम्पत्तिको बाँटने लगे। इसी समय उनमें आपसमें संघर्ष छिड़ गया। बड़े पुत्र जयका कथन था कि धनको बराबर-बराबर बाँटना चाहिये। विजयने कहा— जिसने जो अर्जन किया है, वह धन उसका है। तब जयने विजयसे कहा—'क्या मुझे तुम शक्तिहीन मानकर ऐसा कहते हो। सब सम्पत्ति लेकर तुम जो मुझे देना नहीं चाहते तो ग्राह बन जाओ।'
इसपर विजयने भी जयसे कहा—'क्या धनके लोभसे तुम सर्वथा अन्धे ही हो गये हो? तुम मदान्ध होकर जो मुझसे इस प्रकार कह रहे हो तो तुम मदान्ध हाथी ही हो जाओ।'
इस प्रकार एक दूसरेके शापके कारण वे दोनों ब्राह्मण अलग-अलग गज और ग्राह बन गये। इनमें विजय तो गण्डकी नदीमें जातिस्मर ग्राह हुआ और जय त्रिवेणीके वन्य क्षेत्रमें हाथी। वह हाथीके बच्चों और हथिनियोंके साथ क्रीडा करता हुआ वहीं वनमें रहने लगा। इस प्रकार ग्राह और गजराज—दोनोंको वहीं रहते हुए कई हजार वर्ष बीत गये। एक समयकी बात है—वह हाथी कभी हथिनियोंके झुंडको साथ लेकर त्रिवेणीमें पहुँचा और उसके बीचमें जाकर स्नान करने लगा। वह हथिनियोंपर जल छिड़कता और हथिनियाँ उसपर जल छिड़कतीं। वह सूँडसे स्वयं ही जल पीता और उन हथिनियोंको भी पिलाता। इस प्रकार प्रसन्न-मन होकर वह उनके साथ क्रीडा करता रहा। उसकी इसी क्रीडाके बीच दैवयोगसे प्रेरित वह ग्राह अपने पूर्व वैरका स्मरण करता हुआ उस हाथीके पास आया और उसके पैरको अत्यन्त दृढतासे पकड़ लिया। इसपर हाथीने भी उसपर अपने दाँतोंसे प्रहार किया। इधर अब वह ग्राह उस हाथीको जलमें खींचने लगा। हाथी बाहर निकलना चाहता और ग्राह उसे भीतर खींच ले जाना चाहता था। इस प्रकार उन दोनोंमें कई हजार वर्षोंतक युद्ध चलता रहा।
इस प्रकार मत्सर (द्वेष एवं क्रोध)—से परिपूर्ण गज एवं ग्राह—इन दोनोंके परस्पर लड़नेसे वहाँके बहुत-से प्राणियोंको महान् पीड़ा पहुँची। बहुतेरे जीव तो अपने प्राणोंसे भी हाथ धो बैठे। तब उस क्षेत्रके स्वामी 'जलेश्वर' ने भगवान् श्रीहरिको इसकी सूचना दी और इसपर कृपालु