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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२६८ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १४४

पृथ्वी बोली—प्रभो! मैंने तो सुना है कि त्रिवेणी केवल प्रयागमें ही है, जहाँ भगवान् महेश्वर एक 'शूलटङ्क' नामसे तथा दूसरे सोमेश्वर' नामसे प्रसिद्ध हैं। साथ ही वहाँ स्वयं श्रीहरि भी 'वेणीमाधव' नामसे विराजते हैं। वहाँ गङ्गा, यमुना और सरस्वती—ये तीन नदियाँ हैं, वहाँ सम्पूर्ण देवताओं, ऋषियों, नदियों एवं तीर्थोंका समाज भी विराजमान रहता है। उस 'तीर्थराज' में स्नान करनेवाले तथा प्राणत्याग करनेवाले व्यक्ति मोक्षके भागी होते हैं। फिर आप जो गण्डकीकी 'त्रिवेणी' बता रहे हैं, यह वही 'त्रिवेणी' है या कोई दूसरी? महाभाग! आप अखिल जगत्का हित करनेकी इच्छासे इसे बतानेकी कृपा करें। दयानिधे! मेरी कलुषित बुद्धिपर ध्यान न देकर इस प्रसङ्गको स्पष्ट करनेकी अवश्य कृपा करें।

भगवान् वराह कहते हैं—देवि! इस विषयमें एक प्राचीन इतिहास प्रसिद्ध है। हिमालय पर्वतके रमणीय स्थलमें देवतालोग निवास करते हैं। बहुत पहले जगत्के हित-सम्पादनके विचारसे भगवान् विष्णु वहीं तपस्या करने लगे। कुछ समय बाद उनके श्रीविग्रहसे एक अत्यन्त दिव्य तेज प्रकट हुआ, जिससे चर और अचर—सम्पूर्ण संसार जलने लगा और विष्णुके गण्डस्थल (कपोल) पसीनेसे भींग गये तथा उसी स्वेदसे दिव्य नदी गङ्गा प्रवाहित हुई। इस अद्भुत घटनासे जन-महर्लोक प्रभृति सभी आश्चर्यमें भर गये और गङ्गाके प्रादुर्भावस्थलका पता लगाने चले, पर पता न लग सका। अन्तमें ब्रह्मासहित सभी देवता भगवान् शंकरके पास पहुँचे और उन्हें प्रणाम कर एक ओर खड़े हो गये और फिर उनसे गङ्गाके उद्गमका पता पूछा। इसपर भगवान् शंकर कुछ क्षणके लिये ध्यानस्थ हुए। और फिर बोले—

'आप लोगोंको इसका उत्पत्तिस्थल दिखाता हूँ।' यों कहकर वे उमादेवी, अपने गणों तथा देवताओंके सहित उस ओर प्रस्थित हो गये, जहाँ भगवान् विष्णु तपस्यामें स्थित थे। वहाँ पहुँचकर उन्होंने कहा—'भगवन्! आप सर्वसमर्थ हैं। अखिल जगत् आपसे बना है। आपके मनमें क्या अभिलाषा उत्पन्न हो गयी कि आप तप कर रहे हैं? सम्पूर्ण संसार आपपर आश्रय पाये हुए हैं। आप सभीके अधिष्ठाता हैं। फिर आपके लिये कौन-सा दुर्लभ पदार्थ है, जिसके लिये आप यह कठोर तप कर रहे हैं?'

इसपर जगत्प्रभु विष्णुने उन्हें प्रणाम करके उत्तर दिया—'मैं संसारकी हितकामनासे तप करनेके लिये उद्यत हुआ हूँ। आपके दर्शन करनेके लिये भी मनमें बड़ी उत्सुकता थी। जगत्प्रभो! इस समय आपका दर्शन पा जानेसे मेरा यह मनोरथ सफल हो गया।'

भगवान् शंकर बोले—भगवन्! यह मुक्तिक्षेत्र है। इसके दर्शन करनेसे ही मनुष्य मुक्ति पानेका अधिकारी हो जाता है। क्योंकि यहाँ आपके गण्डस्थल (कपोल)-से प्रकट हुई 'गण्डकी' नदी नदियोंमें श्रेष्ठ होगी, जिसके गर्भमें आप सुशोभित होंगे; इसमें कोई संशय नहीं है। आप जगत्के स्वामी हैं। जब आपका यहाँ निवास होगा तो केशव! आपके सम्पर्कसे मैं, शिव, ब्रह्मा, समस्त देवता, ऋषि, यज्ञ एवं तीर्थ—प्रायः सभी इस गण्डकी नदीमें सदा निवास करेंगे। प्रभो! जो मनुष्य पूरे कार्तिक मासमें यहाँ स्नान करेगा, उसके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जायँगे और वह निश्चय ही मुक्तिका भागी होगा। यह तीर्थोंमें परम तीर्थ तथा मङ्गलोंमें परम मङ्गल है। यहाँ स्नान करनेसे मानव गङ्गा-स्नानके फलके भागी हो जायँगे। इसके स्मरण करने, देखने तथा स्पर्श

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