भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 278

अध्याय १४४ ] सोमेश्वरलिङ्ग, मुक्तिक्षेत्र ( मुक्तिनाथ) और त्रिवेणी आदिका माहात्म्य २६७

स्नान करने तथा 'बाणेश्वर' का दर्शन करनेपर मनुष्यको गङ्गामें स्नान करनेका फल मिलता है और देवताकी भाँति उसे स्वर्गमें आनन्द भोगनेका सौभाग्य प्राप्त होता है।

वसुंधरे ! उसी समय सालङ्कायन मुनि भी मेरे शालग्राम-क्षेत्रमें आकर महान् तप करने लगे। उनके मनमें इच्छा थी कि 'मुझे शिवजीके ही समान पुत्र चाहिये।' मुनिके इस श्रेष्ठ भावको जानकर भगवान् शंकरने अपना एक दूसरा सुन्दर सुखप्रद रूप निर्माण किया और अपनी योगमायाकी सहायतासे वे सालङ्कायनके पुत्र बनकर उनके दक्षिणभागमें विराज गये; परंतु सालङ्कायन मुनि इसे न जान सके। वे मेरी आराधनामें बैठे ही रहे। तब शंकरकी ही दूसरी मूर्ति नन्दीने हँसकर सालङ्कायन मुनिसे कहा—'मुनिवर! आप अब उपासनासे विरत हों। आपका मनोरथ सफल हो गया।'

देवि ! नन्दीकी यह बात सुनकर मुनिवर सालङ्कायनका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा। वे आश्चर्यसे बोले—'अहो! यदि मेरे इस तपका फल उदय हो गया तो भगवान् विष्णुको भी अवश्य दर्शन देना चाहिये। मैं जबतक उन्हें न देखूँगा, तबतक मैं तपस्यासे उपरत न होऊँगा।' फिर वे नन्दीसे बोले—'पुत्र! मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, तुम योगका आश्रय लेकर मथुरा जाओ। वहाँ मेरा एक पवित्र आश्रम है। उस जगह मेरी प्रचुरमात्रामें गोसम्पत्ति पड़ी है। वहाँ आमुष्यायण नामका मेरा शिष्य भी है। उन्हें लेकर तुम यथाशीघ्र यहाँ आ जाओ।' सालङ्कायन मुनिकी आज्ञासे नन्दी उसी क्षण मथुराको चल पड़े। वहाँ पहुँचकर उन्होंने ऋषिके आश्रमका अन्वेषण किया और आमुष्यायण उन्हें दिखायी पड़ गये। पुनः कुशल-प्रश्नके बाद घरपर स्थित गो आदि सम्पत्तिके विषयमें भी बातचीत की। उन्होंने उत्तर दिया—'साधो! तपस्याके परमधनी मेरे गुरुदेवकी कृपासे यहाँ सर्वत्र कुशल है। अब आप मेरे गुरुजीकी कुशल बतानेकी कृपा करें। इस समय वे कहाँ विराजमान हैं? आप कहाँसे पधारे हैं और आपके यहाँ आनेका प्रयोजन क्या है? यह बात विस्तारपूर्वक बतायें और अर्घ्य आदि स्वीकार करें।' आमुष्यायणके इस प्रकार कहनेपर नन्दीने उनका दिया हुआ अर्घ्य स्वीकार किया और सालङ्कायन मुनिका वृत्तान्त बताया तथा अपने आनेकी बात स्पष्ट कर दी। फिर नन्दी आमुष्यायणके साथ गोधन लेकर वहाँसे वापस हुए। बहुत दिनोंतक चलनेके बाद वे गण्डकी नदीके तीरपर त्रिवेणीसङ्गमपर पहुँचे। 'देविका'<sup></sup> नामकी एक नदी भी वहीं आकर तपस्या कर रही थी। पुलस्त्य एवं पुलह मुनिके आश्रम<sup></sup> के पास यह तथा गङ्गा नदी भी आकर मिली। इन तीन नदियोंके एक साथ मिल जानेके कारण यह स्थान 'त्रिवेणी-सङ्गम' नामसे प्रसिद्ध हुआ। आगे चलकर इस महान् तीर्थका नाम 'कामिक' हुआ। इस तीर्थसे पितृगण बहुत प्रसन्न होते हैं। यहाँ भगवान् शंकरका एक महान् लिङ्ग है, जिसे 'त्रिजलेश्वर' महादेव कहते हैं। इसके दर्शन करनेसे भुक्ति एवं मुक्ति दोनों सुलभ हो जाती हैं और सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।


१. यहाँ यह 'देविका' मुक्तिनाथ पर्वतपरकी एक छोटी-सी नदी है।
२. पुलहाश्रमका वर्णन 'श्रीमद्भागवत' ५।७।८, ११; ८।३० आदिमें भी आया है। यह आजका नेपाल राज्यके अन्तर्गतका 'मुक्तिनाथ' पर्वत ही है ('कल्याण' का 'तीर्थाङ्क' पृ० १५४)। यहाँ प्रकरणके अन्तमें आगे 'हरिहरक्षेत्र' (सोनपुर)-का वर्णन हुआ है, जो पटनाके सामने गङ्गाके उत्तरतटपर स्थित है।

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