वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २६६ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १४४ |
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था। फिर उन प्रभुकी बात सुनकर गण्डकीने उन्हें साष्टाङ्ग प्रणाम कर इस प्रकार स्तुति प्रारम्भ की—'भगवन्! मैंने आपके जिस रूपका दर्शन किया है, वह देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। इस स्थावर-जङ्गममय सम्पूर्ण संसारकी सृष्टि आपकी ही कृपाका प्रसाद है। जिस समय आप नेत्र बंद कर लेते हैं, उस समय सारा विश्व संहृत हो जाता है। श्रुतिके निर्देशानुसार अनादि, अनन्त एवं असीमस्वरूप जो ब्रह्म है, वह आप ही हैं। महाविष्णो! जो आपको जानता है, वह वेदका तत्त्वज्ञ पुरुष है। आपकी ही आदिशक्ति योगमाया तथा प्रधान प्रकृति नामसे प्रसिद्धि है। आप अव्यक्त, चित्स्वरूप, निर्गुण, निरञ्जन, निर्विकार एवं आनन्दस्वरूप परम शुद्ध परमात्मा हैं। आप स्वयं सृष्टिकी रचनासे पृथक् रहते हैं और आपकी योगमाया सभी कार्योंका सम्पादन करती है। आपके निरञ्जन रूपको भला मैं एक मूर्ख अबला यथार्थतः कैसे जानूँ?'
गण्डकीकी प्रार्थनासे प्रभावित होकर भगवान् विष्णुने कहा—'देवि! तुम्हारी जो इच्छा हो, जो अन्य मनुष्योंके लिये सब प्रकारसे दुर्लभ एवं अप्राप्य है, वह वर मुझसे माँग लो। भला मेरा दर्शन हो जानेपर प्राणीका कौन-सा मनोरथ अपूर्ण रह सकता है?'
हिमांशो! इसपर जनताको तारनेवाली देवी गण्डकीने श्रीहरिके सामने हाथ जोड़कर नम्रतापूर्वक मधुर वचनोंमें कहा—'भगवन्! आप यदि प्रसन्न हैं तो मुझे अभिलषित वर देनेकी कृपा कीजिये। मैं चाहती हूँ कि आप मेरे गर्भमें आकर निवास करें।'
इसपर भगवान् विष्णु प्रसन्न होकर सोचने लगे कि मेरे साथ सदा रहनेका लाभ उठानेवाली इस गण्डकी नदीने कैसा अद्भुत वर माँगा है। इससे सम्पूर्ण प्राणियोंका तो बन्धन कट सकता है। अतः इसे यह वर अवश्य दूँगा। अतः वे प्रसन्नतापूर्वक बोले—'देवि! मैं शालग्रामशिलाका रूप धारण कर तुम्हारे गर्भ (bed of river)-में निवास करूँगा और मेरी संनिधिके कारण तुम नदियोंमें श्रेष्ठ मानी जाओगी। तुम्हारे दर्शन, स्पर्श, जलपान तथा अवगाहन करनेसे मनुष्योंके मन, वाणी एवं कर्मसे बने हुए पापोंका नाश होगा। जो पुरुष तुम्हारे जलमें स्नान करके देवताओं, ऋषियों एवं पितरोंका तर्पण करेगा, वह अपने पितरोंको तारकर उन्हें स्वर्गमें पहुँचा देगा। साथ ही मेरा प्रिय बनकर वह स्वयं भी ब्रह्मलोकमें चला जायगा। तुम्हारे तटपर मृत प्राणियोंको मेरे लोककी प्राप्ति होगी, जहाँ जाकर सोच नहीं होता।'
इस प्रकार देवी गण्डकीको वर देकर भगवान् विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये। शशाङ्क! तबसे हम और भगवान् विष्णु इस क्षेत्र*में निवास करते हैं।
**भगवान् वराह कहते हैं—**वसुंधरे! इस प्रकार कहकर भगवान् शंकरने चन्द्रमाको प्रभा प्रदान कर उनके अङ्गोंपर अपना हाथ भी फेरा। इससे वे तत्क्षण परम स्वच्छ हो गये। फिर भगवान् शंकर वहाँसे प्रस्थान कर गये। इसी 'सोमेश्वर' लिङ्गके दक्षिणभागमें रावणने बाणसे पर्वतका भेदन किया था, जहाँसे जलकी एक पवित्र धारा निकली। यह स्नान करनेवालेके पापोंको हरण करती तथा प्रचुर पुण्य प्रदान करती है। इसका नाम 'बाणगङ्गा' है। सोमेश्वरके पूर्वभागमें रावणका वह तपोवन है, जहाँ तीन राततक रहकर उसने तपस्या और नृत्यकार्य किये थे और उसके नृत्यसे संतुष्ट होकर भगवान् शंकरने उसे वर प्रदान किया था। इस कारण उस स्थानको 'नर्तनाचल' कहते हैं। बाणगङ्गामें
* यह शालग्राम-क्षेत्र नेपालका 'मुक्तिनाथ' है।