वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 276, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १४४ ] सोमेश्वरलिङ्ग, मुक्तिक्षेत्र ( मुक्तिनाथ ) और त्रिवेणी आदिका माहात्म्य २६५
लिये जो सदा आतुर रहते हैं, ऐसे पञ्चमुख भगवान् त्रिलोचन नीलकण्ठ शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ। जिनके ललाटपर चन्द्रमा सुशोभित हैं, जो हाथमें पिनाक धनुष धारण किये हुए हैं तथा भक्तोंको अभयदान देना जिनका स्वभाव है, ऐसे दिव्य रूपधारी देवेश्वर शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ। जिनके हाथमें त्रिशूल और डमरू है, अनेक प्रकारके मुखवाले गण जिनकी सदा सेवा करते रहते हैं, उन भगवान् वृषध्वजको मैं प्रणाम करता हूँ। जो त्रिपुर, अन्धक एवं महाकाल नामके भयंकर असुरोंके संहारक हैं, जो हाथीके चर्मको पहनते हैं, उन प्रलयमें भी अचल भगवान् शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ। जो सर्पका यज्ञोपवीत पहनते हैं, रुद्राक्षकी माला जिनकी छवि छिटकाती है, भक्तोंकी इच्छा पूर्ण करना जिनका स्वाभाविक गुण है तथा जो सबके शासक हैं, उन अद्भुत रूपधारी भगवान् शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ। सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि जिनके नेत्र हैं, मन एवं वाणीकी जिनके पास पहुँच नहीं है तथा जिन्होंने अपने जटासमूहसे गङ्गाको प्रकट किया एवं हिमालय पर्वतके कैलासशिखरपर अपना आश्रम बना रखा है, उन भगवान् शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ।'
देवि! चन्द्रमाने जब भगवान् शंकरकी इस प्रकार स्तुति की तो उन्होंने कहा—'गोपते! मुझसे तुम अपना अभिलषित वर माँग लो।'
चन्द्रमाने कहा—'भगवन् ! आप यदि वर देना चाहते हैं तो मेरी यह अभिलाषा है कि आप मेरे इस 'सोमेश्वर' लिङ्गमें सदा निवास करें और इसमें श्रद्धा रखकर उपासना करनेवाले पुरुषोंका मनोरथ पूर्ण करनेकी कृपा करें।'
देवेश्वर शंकरने कहा—'शीत किरणोंके स्वामी शशाङ्क! भगवान् विष्णुके साथ मैं यहाँ सदा निवास करता आया हूँ। तुम भी मेरे ही स्वरूप हो, पर अब मैं आजसे यहाँ विशेषरूपसे रहूँगा और इस लिङ्गकी पूजा करनेवाले श्रद्धालु पुरुषोंको सदा मेरी पूजाका फल प्राप्त होता रहेगा। तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुम्हें देवदुर्लभ वर दे रहा हूँ। यहाँ पहले सालङ्कायन मुनिने भी महान् तप किया है। उनकी तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान् विष्णुने उन्हें उनके साथ रहनेका वर दे रखा है। अतः कलानिधे! हम दोनोंका यहाँ रहना पहलेसे ही निश्चित है। श्रीहरिके द्वारा अधिष्ठित पर्वतका नाम 'शालग्राम'-गिरि है और मैं 'सोमेश्वर' नामसे स्थित हूँ। इन दोनों पर्वतोंसे सम्बन्ध रखनेवाली ये शिलाएँ भी 'विष्णुशिला' तथा 'शिवशिला' नामसे प्रसिद्ध होंगी। पूर्व समयमें रेवाने भी मेरी प्रसन्नता प्राप्त करनेके लिये तपस्या की थी। उसके मनमें इच्छा थी कि मुझे भगवान् शिवके समान पुत्र चाहिये। मैंने सोचा कि मैं तो किसीका भी पुत्र नहीं हूँ, फिर अब क्या करूँ। सोम! उस समय बहुत सोच-विचारकर मैंने उससे कहा था—'देवि! तुमने मेरी अपार भक्ति की है, अतः मैं पुत्र बनकर गणेशके सहित लिङ्गरूपसे तुम्हारे गर्भ (तलहटी the bed)-में निवास करूँगा। इस प्रकार रेवाने मेरा सांनिध्य प्राप्त कर लिया और यहाँ आ गयी। तबसे इसकी भी 'रेवाखण्ड' नामसे प्रसिद्धि हुई। साथ ही गण्डकी भी सूखे पत्ते खाकर तथा वायु पीकर देवताओंके वर्षसे सौ वर्षोंतक तपस्यामें तत्पर रही। उस समय वह सदा भगवान् विष्णुका ही चिन्तन करती थी। अन्तमें जगत्के स्वामी श्रीहरि वहाँ स्वयं पधारे और बोले—'पुण्यमयी गण्डकि! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। सुव्रते! तुम मुझसे वर माँगो।'
इसके पूर्व भी गण्डकीको एक बार शङ्ख, चक्र एवं गदाधारी भगवान्का दर्शन प्राप्त हुआ