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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२६४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १४४

देवि! अब उस क्षेत्रका मण्डल बतलाता हूँ, सुनो। मेरुपर्वतपर स्थित 'मन्दर' नामक एक स्थान है, जो 'स्यमन्तपञ्चक' नामसे प्रसिद्ध है, वहाँ मैं सदा निवास करता हूँ। विन्ध्यकी ऊँची शिलापर दक्षिणकी ओर चक्र, वामभागमें गदा और आगे हल-मूसल और शङ्ख विराजमान रहते हैं। यह गुह्य रहस्य है। देवि! जो मानव मेरी शरणमें आ जाते हैं, वे ही इस परम पवित्र रहस्यको जानते हैं, अन्य मनुष्य नहीं; क्योंकि मेरी मायाने उनकी बुद्धिको मोहित कर रखा है। [अध्याय १४३]


सोमेश्वरलिङ्ग, मुक्तिक्षेत्र (मुक्तिनाथ) और त्रिवेणी आदिका माहात्म्य

पृथ्वी बोली— प्रभो! आपकी कृपासे मैं मन्दारका वर्णन सुन चुकी। अब इससे जो श्रेष्ठ स्थान हो, उसे बतानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् वराह कहते हैं— देवि! 'शालग्राम' (मुक्तिनाथ क्षेत्र) नामसे मेरा एक परम प्रिय एवं प्रसिद्ध स्थान है। पहले द्वापरयुगमें यदुवंशमें शूरसेन नामके एक कुशल कर्मठ व्यक्ति हुए, जिनके पुत्र वसुदेवजी हुए। वसुधे! उनकी सहधर्मिणीका नाम देवकी है। महाभागे! उसी देवकीके गर्भसे मैं अवतार धारण करता हूँ और करूँगा। देवताओंके शत्रुओंका मर्दन करना मेरे अवतारोंका मुख्य उद्देश्य है। उस समय 'वासुदेव' नामसे मेरी प्रसिद्धि होगी। यादवोंके कुलको बढ़ानेवाले शूरसेनके वहाँ रहते समय एक श्रेष्ठ महर्षि, जिनका नाम सालङ्कायन था, मेरी आराधना करनेके लिये दसों दिशाओंमें भ्रमण कर रहे थे। पहले उन्होंने मेरुगिरिकी चोटीपर जाकर पुत्रके लिये तपस्या आरम्भ की। वसुंधरे! इसके बाद वे 'पिण्डारक'¹ में और फिर 'लोहार्गल'² क्षेत्रमें भी जाकर एक हजार वर्षतक तप करते रहे। देवि! ब्रह्मर्षि 'सालङ्कायन' वहाँ इधर-उधर मेरा अन्वेषण कर रहे थे, किंतु मेरे वहाँ रहनेपर भी उन्हें मेरा दर्शन नहीं हुआ।

भगवान् शंकर भी वहाँ शिलाके रूपमें विराजने लगे, जहाँ मैं शालग्राम-शिलारूपमें विराजता हूँ। वहाँकी चक्राङ्कित शिलाएँ सब मेरा ही स्वरूप हैं। पुनः वहाँकी कुछ शिलाएँ 'शिवनाभा' और कुछ 'चक्रनाभा' नामसे प्रसिद्ध हैं। यह शिवरूप पर्वत सोमेश्वर नामसे प्रसिद्ध है। चन्द्रदेव अपना शाप मिटानेके लिये यहाँ एक हजार वर्षांतक तपस्या करते रहे, जिससे वे शापमुक्त होकर परम तेजस्वी बन गये और भगवान् शंकरकी स्तुति की। उनकी दिव्य स्तुतिसे प्रसन्न होकर वर देनेवाले भगवान् शंकर 'सोमेश्वरलिङ्ग' से प्रकट होकर तीन नेत्रोंसे सम्पन्न होकर सामने स्थित हो गये।

चन्द्रमाने कहा— 'जिनका सौम्य स्वरूप है, उमादेवी जिनकी पत्नी हैं, भक्तोंपर कृपा करनेके


¹ १. इसका महाभारत १।३५।११, ३।८२।६५; ८८।२१, ५।१०३।१४ आदिमें तथा भागवत ११।१।११ में भी उल्लेख है। अब इसका नाम 'पिण्डार' है, यह द्वारकासे २० मील दूर जामनगर जिलेमें, कल्याणपुर तालुकेमें स्थित है। (J. B. I. XIV)
² २. एक लोहार्गल (लोहागर) राजस्थानमें नवलगढ़से २० मीलकी दूरीपर है (तीर्थाङ्क पृष्ठ २८२)। पर नन्दलाल देके अनुसार, जिन्होंने 'वराहपुराण' पर विशेष शोध किया था, यह हिमालयमें कूर्माचल (कुमायूँ)-के अन्तर्गत चम्पावतसे ३ मील उत्तर 'लोहाघाट' है। This is a sacred place in the Himalaya (Varaha purana, chapter, 140. 5, 144. 8, 151). Lohaghat in Kumaun, 3 miles to the north of Champwat, on the river Loha. The place is sacred to Visnu. (Brahmanda Purana ch. 51) (Geographical Dictionary of Ancient and Mediaeval India, page—115) आगे १५१ वें अध्यायमें इसका विस्तृत माहात्म्य है।