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वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

१६३- पतिव्रताके माहात्म्यका वर्णन

अध्याय २०४-२०६ ] कर्मविपाक-निरूपण ३६१

कर्मविपाक-निरूपण

ऋषिपुत्र नचिकेता कहते हैं—विप्रो! अब मैं धर्मराज और चित्रगुप्त-संवादका एक दूसरा प्रसङ्ग कहता हूँ, आप उसे सुनें। चित्रगुप्त धर्मराजसे कह रहे थे—'यह मनुष्य स्वर्गमें जाय, यह प्राणी वृक्षकी योनिमें जन्म ले, यह पशुकी योनिमें जाय और इस प्राणीको मुक्त कर दिया जाय। इस व्यक्तिको उत्तम गति प्राप्त होनी चाहिये। इसे अपने पिता-पितामहप्रभृति पूर्वजोंसे मिलना चाहिये। फिर वे दूसरे दूतोंसे कहने लगे—'महान् पराक्रमी वीरो! यह व्यक्ति सदा धर्मसे विमुख रहा है। इसने साध्वी स्त्रीका परित्याग किया है। इसके पास पुत्र-पौत्र भी नहीं हैं, अतः इसे रौरव नरकमें फेंक दो।'

'ये सभी बड़े धर्मात्मा व्यक्ति हैं। ऐसे मानव न हुए हैं और न होंगे ही। इनमें पापका लेशमात्र भी नहीं है। अतः बहुत शीघ्र इन्हें यहाँसे जानेके लिये कह दो। इन व्यक्तियोंने जीवनभर किसीकी निन्दा नहीं की है। सम्पत्ति अथवा विपत्ति—किसी भी स्थितिमें इन्होंने सम्पूर्ण धर्मोंका पालन किया है, अतः ये स्वर्गमें जाकर अनेक कल्पोंतक वहाँ निवास करें। यह व्यक्ति पूर्वकालमें परम धार्मिक पुरुष रहा है, पर यह स्त्रीमें अधिक आसक्त रहा, अतः कलियुगमें मनुष्यकी योनि प्राप्त करे। इसके बाद स्वर्गमें वास करनेकी सुविधा मिलेगी। यह व्यक्ति युद्धभूमिमें शत्रुको मारकर पीछे स्वयं मरा है। ब्राह्मण, गौ अथवा राष्ट्रके लिये लड़ाई छिड़ी थी। उसमें इसने प्राण-विसर्जन किये हैं। अतः तुम्हें विनयके साथ इससे निवेदन करना चाहिये कि यह व्यक्ति विमानपर चढ़कर इन्द्रकी अमरावती पुरीमें जाय और एक कल्पतक वहाँ निवास करे। उसीके समान यह भी एक धर्मात्मा पुरुष है। इस परम भाग्यशाली प्राणीने निरन्तर धर्मका पालन किया है। इसके सभी क्षण दान करनेमें ही व्यतीत हुए हैं। यह समस्त प्राणियोंपर दया करता था। इसका गन्धों और मालाओंसे यथाशीघ्र सम्मान करो। इस महात्मा व्यक्तिके लिये तुमलोगोंसे मेरा यह आदेश है कि इसके ऊपर चँवर झले जायँ और इसकी भली प्रकारसे पूजा होनी चाहिये।'

(किसी अन्य धर्मात्माको लक्ष्य कर) 'यह भी एक यशस्वी पुरुष है। इससे सभी प्राणी सुख पाते रहे हैं। इसका कल्याण होना चाहिये। इसे सैकड़ों गुणोंसे शोभा पानेवाले इन्द्रकी अमरावतीमें भेजा जाय। यह धर्मात्मा प्राणी स्वर्गमें तबतक रहेगा, जबतक वहाँ इन्द्र रहेंगे। जितने समयतक इसका धर्म साथ देता रहेगा, उतने कालतक स्वर्गमें आनन्द भोगनेका इसे सुअवसर मिले। वहाँसे समयानुसार इसे उतरना पड़े तो मनुष्यकी योनिमें जन्म पाकर सुख भोगे। इसने रत्नोंकी बाँसुरी बनवाकर दान किये हैं तथा सम्पूर्ण धर्मोंका विधिपूर्वक पालन किया है। इसको अश्विनीकुमारके लोकमें ले जाओ। क्योंकि उस लोकमें सब प्रकारकी सुख-सामग्री सुलभ रहती है।'

(किसी अन्यके प्रति दृष्टि डालकर) 'यह महान् भाग्यशाली पुरुष है। यह देवाधिदेव सनातन श्रीहरिके पास पधारे। इसकी त्यागवृत्ति असीम थी। यह सुखसे दूध देनेवाली गौएँ दान करता था। अपनी सभी शक्तियोंका उपयोग कर यह ब्राह्मणोंको गो-दान देनेमें उत्सुक रहता था। विशेषता यह थी कि इसने परम पवित्र ब्राह्मणोंको बहुत-सा अन्न भी दिया है। रुद्रधेनुकी तुलना

१६४- कर्मविपाक एवं पापमुक्तिके उपाय

३७० संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय २०४-२०६

करनेवाली वे मनोहारिणी गौएँ कल्पपर्यन्त इसका साथ देंगी। यह पुरुष एक कल्पतक रुद्रके लोकमें रहेगा—इसमें कोई संशय नहीं। इसने अनेक मधुर पदार्थ, सुगन्धित वस्तुएँ तथा रस-दूधसे परिपूर्ण सवत्सा गौ ब्राह्मणोंको दी थीं, जिनके सभी अङ्ग सुवर्णसे सुशोभित थे। इस महान् दानी पुरुषसे सम्बन्ध रखनेवाली पुस्तिका मैंने देखी है। उसमें लिखा है, तीन करोड़ वर्षोंतक यह स्वर्गमें निवास करेगा। तत्पश्चात् ऋषियोंके कुलमें इसका जन्म होगा।'

(किसी अन्य प्राणीके विषयमें) 'इसने सुवर्णका दान किया है। इसको देवताओंके पास भेज देना चाहिये। उनसे आज्ञा पाकर उमापति भगवान् रुद्रके लोकमें यह जाय। यह निश्चय ही महान् तेजस्वी जान पड़ता है। वहाँ जाकर अपनी इच्छाके अनुसार कामनाएँ पूर्ण करे।' (किन्हीं अन्य प्राणियोंको देखकर) 'इन व्यक्तियोंने दान करनेका नियम बना लिया था। अनेक प्रकारके प्राणी इनका अभिवादन करते थे। अतः ये स्वर्गमें जायें।' (किसी औरके प्रति) 'यह परम कुशल पुरुष है। इससे जनताकी आवश्यकता पूरी होती थी। सबके हित-साधनमें यह संलग्न रहता था। सभी कामनाओंको पूरा करनेवाला यह प्राणी सबके लिये आदरका पात्र था। इसने ब्राह्मणोंको पृथ्वी दान की है।' अतः स्वर्गमें जाय और वहीं बहुत दिनोंतक रहे। इसके बाद अपने अनुयायियोंके साथ ब्रह्माजीके लोकमें स्थान पावे। इस श्रेष्ठ मानवकी अनेक प्रकारके इच्छित भोगोंसे सेवा होनी चाहिये। इसका स्थान अक्षय और अजर होगा। महर्षिगण इसका आदर करेंगे।'

(किसी अन्य पुरुषको देखकर) 'यह प्राणी सभीके लिये अतिथिके रूपमें यहाँ आया है। सब इन्द्रियाँ इसके अधीन हैं। यह सम्पूर्ण प्राणियोंपर कृपा करता था। प्रायः सभीको समानरूपसे अन्न-दान करनेमें इसकी प्रवृत्ति थी। परिवारमें सब भोजन कर लेते थे, तब यह अन्न ग्रहण करता था। मेरे प्रिय भृत्यो! तुम्हें इसको यहाँसे अभी विदा कर देना चाहिये। धर्मराजने ऐसा निर्णय कर दिया है।'

'इस प्राणीने कई कन्याओंका दान किया तथा यज्ञ सम्पन्न किये हैं। अतः इसे दस हजार वर्षोंतक स्वर्गमें सुख भोगनेका सुअवसर प्रदान करो। इसके पश्चात् यह मर्त्यलोक-निवासी किसी उत्तम कुलमें सर्वप्रथम जन्म पायगा। यह दयालु पुरुष दस हजार वर्षोंतक देवताओंके समान सुखपूर्वक स्वर्गमें विराजमान रहे, इसके बाद यह मनुष्यकी योनिमें जन्म पाये और सभी इसका सम्मान करें।' (किसी अन्यके विषयमें) 'यह वही व्यक्ति है, जिसने छाता, जूता और कमण्डलु बार-बार दान किये हैं, इसकी तुमलोग पूजा करो। जिस देशमें हजारों सभा-मण्डप हैं, उस देशमें विद्याधर बनकर यह चार महापद्म वर्षोंतक निरन्तर निवास करे।'

**नचिकेताने कहा—**विप्रो! चित्रगुप्तद्वारा कथित एक अन्य महत्त्वकी बात बतलाता हूँ, उसे सुनें। वे कहते थे—'गौएँ दिव्य प्राणी हैं। इनके सम्पूर्ण अङ्गोंमें सभी देवताओंका निवास है। अपने शरीरमें अमृत धारण करना और धरातलपर उसको बाँट देना इनका स्वाभाविक गुण है। ये तीर्थोंमें परम तीर्थ, पवित्र करनेवाले पदार्थोंमें परम पवित्रकर तथा पुष्टिकारकोंमें परम पुष्टिप्रद हैं। इनसे प्राणी शुद्ध हो जाता है। अतएव प्राचीन समयसे 'गौओंके दानकी परम्परा चली आ रही है। इनके दहीसे समस्त देवता, दूधसे भगवान्

अध्याय २०७] दान-धर्मका महत्त्व ३७१


शंकर, घृतसे अग्निदेव तथा खीरसे पितामह ब्रह्मा तृप्तिका अनुभव करते हैं। इनके पञ्चगव्यके प्राशनसे अश्वमेधयज्ञका पुण्य प्राप्त होता है। गौके दाँतोंमें मरुद्गण, जिह्वामें सरस्वती, खुरके मध्यमें गन्धर्व, खुरोंके अग्रभागमें नागगण, सभी संधियोंमें साध्यगण, आँखोंमें चन्द्रमा एवं सूर्य, ककुद (मौर)-में सभी नक्षत्र, पूँछमें धर्म, अपानमें अखिल तीर्थ, योनिमें गङ्गा नदी तथा अनेक द्वीपोंसे सम्पन्न चारों समुद्र, रोमकूपोंमें ऋषि-समुदाय, गोमयमें पद्मा लक्ष्मी, रोयेंमें समस्त देवतागण तथा इनके चर्म और केशोंमें उत्तर एवं दक्षिण—दोनों अयन निवास करते हैं। इतना ही नहीं, स्थैर्य, धृति, कान्ति, पुष्टि, वृद्धि, स्मृति, मेधा, लज्जा, वपु, कीर्ति, विद्या, शान्ति, मति और संतति—ये सब गौओंके पीछे चलती हैं, इसमें कोई संशय नहीं। जहाँ गौओंका निवास है, वहीं सारा जगत्, प्रधान देवता, श्री-लक्ष्मी तथा ज्ञान एवं धर्म—ये सभी निवास करते हैं।*' [अध्याय २०४-२०६]

दान-धर्मका महत्त्व

**ऋषिपुत्र नचिकेता कहते हैं—**विप्रो! नारदजी यद्यपि परम सात्त्विक पुरुष हैं, किंतु उनके मनमें कलह देखनेकी भी रुचि रहती है। इसी प्रकार वे एक बार कौतूहलवश घूमते हुए धर्मराजकी सभामें पधारे, जहाँ उनका राजाने बड़ा स्वागत किया। फिर उन्होंने नारदजीसे कहा—'द्विजवर! आप यहाँ मेरे बड़े सौभाग्यसे पधारे हैं। महामुने! आप सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, सम्पूर्ण धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ तथा गन्धर्व-विद्या एवं इतिहासके पूर्ण ज्ञाता हैं। विभो! आप यहाँ पधारे और हमें दर्शन मिल गया, इससे हम सभी पवित्र हो गये। हमारा अन्तःकरण परम शुद्ध हो गया। मुनिवर! यही नहीं, यह देश भी सब ओरसे पुनीत हो गया। भगवन्! अब आप अपने मनोरथकी बात कहें।' विप्रो! नारदजी धर्मके पूरे मर्मज्ञ हैं। धर्मराजकी उक्त बात सुनकर प्रश्नके रूपमें जो उन्होंने कहा, वह भी एक महान् गूढ़ विषय है। वही मैं तुमसे कहूँगा।

**नारदजी बोले—**भगवन्! आपका शासन धर्मके अनुसार होता है। आप सत्य, तप, शान्ति और धैर्यसे सम्पन्न हैं। सुव्रत! मेरे मनमें एक महान् संदेह उत्पन्न हो गया है, उसे आप बतानेकी कृपा करें। सुरोत्तम! मेरे संशयका विषय यह है कि 'प्राणी किस व्रत, नियम, दान, धर्म और तपस्या करनेके प्रभावसे अमरत्व प्राप्त करता है तथा उसकी क्या विधि है? बहुत-से महात्मा तो संसारमें अतुलनीय श्री, कीर्ति, महान् फल तथा परम दुर्लभ सनातन पदतक प्राप्त कर


*

दन्तेषु मरुतो देवा जिह्वायां तु सरस्वती ।खुरमध्ये तु गन्धर्वाः खुराग्रेषु तु पन्नगाः ॥
सर्वसंधिषु साध्याश्च चन्द्रादित्यौ तु लोचने ।ककुदे तु नक्षत्राणि लाङ्गूले धर्म आश्रितः ॥
अपाने सर्वतीर्थानि प्रस्त्रावे जाह्नवी नदी ।नानाद्वीपसमाकीर्णाश्चत्वारः सागरास्तथा ॥
ऋषयो रोमकूपेषु गोमये पद्मधराणि ।रोमे वसन्ति देवाश्च त्वक्केशेष्वयनद्वयम् ॥
स्थैर्यं धृतिश्च कान्तिश्च पुष्टिर्वृद्धिस्तथैव च ।स्मृतिमैधा तथा लज्जा वपुः कीर्तिस्तथैव च ॥
विद्या शान्तिर्मतिश्चैव संततिः परमा तथा ।गच्छन्तमनुगच्छन्ति होता गावो न संशयः ॥
यत्र गावो जगत्तत्र देवदेवपुरोगमाः ।यत्र गावस्तत्र लक्ष्मीः सांख्यधर्मश्च शाश्वतः ॥

(२०६।२९-३५)

वराहपुराणका यह वर्णन बड़े महत्त्वका है। ऐसा वर्णन अथर्ववेद ९।४।१—२६, ब्रह्माण्डपुराण, महाभारत १४।१०३।४५-५६, स्कन्दपुराण ५।२।८३।१०४-१२, पद्मपुराण १।४८, भविष्यपुराण ६।१५६।१६-२० आदिमें भी है। विशेष जानकारीके लिये 'कल्याण' का 'गो-अङ्क' देखना चाहिये।

३७२संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय २०७

लेते हैं। इसके विपरीत कुछ लोग जीवनभर क्लेश भोगकर मरनेपर नरकमें आ जाते हैं। आप तत्त्वपूर्वक हमसे सभी विषय स्पष्ट करनेकी कृपा कीजिये।'

**धर्मराजने कहा—**तपोधन! मैं विस्तारके साथ वे सभी बातें बता रहा हूँ; आप उन्हें सुनें। अधर्मियोंके लिये नरकका निर्माण हुआ है। यहाँ पापी मानव ही आते हैं। जो अग्निहोत्र नहीं करता; संतानहीन है और भूमिदानसे रहित है, ऐसा मनुष्य मरकर नरकमें आता है। जो वेदोंके पारगामी विद्वान् तथा शूरवीर पुरुष हैं, उनकी आयु सौ वर्षोंकी हो जाती है। जो मानव स्वामीकी आज्ञाका नियमसे पालन करते तथा सदा सत्य भाषण करते हैं, वे कभी नरकमें नहीं आते। जिन्होंने इन्द्रियोंको वशमें कर लिया है, स्वामीमें श्रद्धा रखते हैं, हिंसा नहीं करते, यत्नसे ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं, जो इन्द्रियनिग्रही एवं ब्राह्मणभक्त हैं, वे नरकमें नहीं आते। जो स्त्रियाँ पतिव्रता हैं तथा जो पुरुष एक पत्नीव्रतका पालन करनेवाले, शान्तस्वभाव, परायी स्त्रीसे विमुख, सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने समान माननेवाले तथा समस्त जीवोंपर कृपा करनेमें उद्यत रहते हैं, ऐसे मनुष्य अन्धकारसे आवृत एवं पापियोंसे भरे हुए इस नरकसंज्ञक देशमें नहीं आते हैं।

इसी प्रकार जो द्विज ज्ञानी हैं, जिन्होंने साङ्गोपाङ्ग विद्याका अध्ययन कर लिया है, जो जगत्‌से उदासीन रहते हैं तथा जिन व्यक्तियोंने स्वामीके लिये अपने प्राणोंको होम दिया है, जो संसारमें सदा दान करते एवं सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें संलग्न रहते हैं तथा जो माता-पिताकी भली प्रकार सेवा करते हैं, वे नरकमें नहीं जाते। जो प्रचुर मात्रामें तिल, गौ और पृथ्वीका दान करते हैं, वे नरकमें नहीं जाते, यह निश्चित है। जो शास्त्रोक्त विधिसे यज्ञ करते-कराते और चातुर्मास्य एवं आहिताग्नि-व्रतका नियम पालन तथा मौनव्रतका आचरण करते हैं, जो सदा स्वाध्याय करते हैं तथा शान्त स्वभाववाले एवं सभ्य हैं, ऐसे द्विज यमपुरीमें आकर मेरा दर्शन नहीं करते। जो जितेन्द्रिय व्यक्ति पर्वसे भिन्न समयमें केवल अपनी ही स्त्रीके पास जाते हैं, वे भी नरकमें नहीं जाते। ऐसे ब्राह्मण तो साक्षात् देवता बन जाते हैं—इसमें कोई संशय नहीं है। जिनकी सम्पूर्ण कामनाएँ निवृत्त हो चुकी हैं, जो किसीसे कुछ आशा नहीं रखते और अपनी इन्द्रियोंको सदा वशमें रखते हैं, वे इस घोर स्थानपर कभी नहीं आते।

**नारदजीने पूछा—**सुव्रत! कौन-सा दान श्रेष्ठ है और कैसे पात्रको दान देनेसे उत्तम फलकी प्राप्ति होती है अथवा कौन-सा ऐसा श्रेष्ठ कर्म है, जिसका सम्पादन करनेपर प्राणी स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठा पाता है ? किस दानकी ऐसी महिमा है, जिसके परिणामस्वरूप प्राणी सुन्दर रूप, धन, धान्य, आयु तथा उत्तम कुल प्राप्त कर सकता है ? यह मुझे बतानेकी कृपा कीजिये।

**धर्मराज बोले—**देवर्षे! दानकी विधियाँ तथा उनकी गतियाँ अगणित हैं, जिसे कोई सौ वर्षोंमें भी बता पानेमें असमर्थ है। फिर भी मनुष्य जिसके प्रभावसे उत्कृष्ट फल प्राप्त करते हैं, उसे संक्षेपमें बताता हूँ। तपस्या करनेसे स्वर्ग सुलभ होता है, तपस्यासे दीर्घ आयु और भोगकी वस्तुएँ मिलती हैं। ज्ञान-विज्ञान, आरोग्य, रूप, सौभाग्य, सम्पत्ति—ये सभी तपस्यासे प्राप्त होते हैं। केवल मनमें संकल्प कर लेनेमात्रसे कोई भी सुख-भोग प्राप्त नहीं हो जाता। मौनव्रत पालन करनेसे अव्याहत आज्ञा-शक्ति प्राप्त होती है। दान करनेसे उपभोगकी सामग्रियाँ तथा ब्रह्मचर्यके पालनसे दीर्घ जीवन प्राप्त होता है। अहिंसाके फलस्वरूप सुन्दर रूप

१६५- पाप-नाशके उपायका वर्णन

अध्याय २०७] दान-धर्मका महत्त्व ३७३

तथा दीक्षा ग्रहण करनेसे उत्तम कुलमें जन्म मिलता है। फल और मूल खाकर निर्वाह करनेवाले प्राणी राज्य एवं केवल पत्तेके आहारपर अवलम्बित व्यक्ति स्वर्ग प्राप्त करते हैं। पयोव्रत करनेसे स्वर्ग तथा गुरुकी सेवामें रत रहनेसे प्रचुर लक्ष्मी प्राप्त होती है। श्राद्ध, दान करनेके प्रभावसे पुरुष पुत्रवान् होते हैं। जो उचित विधिसे दीक्षा लेते अथवा तृण आदिकी शय्यापर शयन करके तप करते हैं, उन्हें गौ आदि सम्पत्तियाँ प्राप्त होती हैं। जो प्रातः, मध्याह्न और सायंकालमें त्रिकाल स्नानका अभ्यासी है, वह ब्रह्मको प्राप्त करता है। केवल जल पीकर तपस्या करनेवाला अपना अभीष्ट प्राप्त कर लेता है*। सुव्रत! यज्ञशाली पुरुष स्वर्ग तथा उपहार पानेका अधिकारी है। जो दस वर्षोंतक विशेष रूपसे जल पीकर ही तपस्यामें तत्पर रहते हैं तथा लवण आदि रासायनिक पदार्थोंका सेवन नहीं करते, उन्हें सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। मांस-त्यागी व्यक्तिकी संतान दीर्घायु होती है। चन्दन और मालासे रहित तपस्वी मानव सुन्दर स्वरूपवाला होता है। अन्नका दान करनेसे मानव बुद्धि और स्मरणशक्तिसे सम्पन्न होता है। छाता दान करनेसे उत्तम गृह, जूतादानसे रथ तथा वस्त्र-दान करनेसे सुन्दर रूप, प्रचुर धन एवं पुत्रोंसे प्राणी सम्पन्न होते हैं। प्राणियोंको जल पिलानेसे पुरुष सदा तृप्त रहता है। अन्न और जल—दोनोंका दान करनेके प्रभावसे प्राणियोंकी सभी कामनाएँ पूर्ण होती हैं। जो सुगन्धित फूलों एवं फलोंसे लदे हुए वृक्ष ब्राह्मणको दान करता है, वह सब प्रकारकी उपयोगी वस्तुओंसे भरा गृह प्राप्त करता है। सुन्दरी स्त्रियाँ और अमूल्य रत्न उस गृहमें परिपूर्ण रहते हैं। अन्न, वस्त्र, जल और रस प्रदान करनेसे व्यक्तिको दूसरे जन्ममें वे सभी सुलभ होते हैं। जो ब्राह्मणोंको धूप और चन्दन दान करता है, वह अगले जन्ममें सुन्दर तथा नीरोग होता है। जो व्यक्ति किसी ब्राह्मणको अन्न तथा सभी उपकरणोंसे युक्त गृह दान करता है, उसे जन्मान्तरमें बहुत-से हाथी, घोड़े और स्त्री-धन आदिसे परिपूर्ण उत्तम महल निवास करनेके लिये प्राप्त होते हैं। धूप प्रदान करनेसे मानवको गोलोकमें तथा वसुओंके लोकमें रहनेका सुअवसर सुलभ होता है। हाथी तथा हृष्ट-पुष्ट बैल दान करनेसे प्राणी स्वर्गमें जाता है और वहाँ उसे कभी समाप्त न होनेवाला दिव्य सुख-भोग प्राप्त होता है। घृतका दान करनेसे तेज एवं सुकुमारता तथा तैलदानसे प्राणमें स्फूर्ति और शरीरमें कोमलता उपलब्ध होती है। शहद दान करनेसे प्राणी दूसरे जन्ममें अनेक प्रकारके रसोंसे सदा तृप्त रहता है। दीपक दान करनेसे अन्धकारका कष्ट नहीं होता तथा खीर दान करनेवाले व्यक्तिका शरीर हृष्ट-पुष्ट होता है। खिचड़ी दान करनेसे कोमलता और सौभाग्य प्राप्त होता है। फल दान करनेवाला व्यक्ति पुत्रवान् तथा भाग्यशाली होता है। रथ दान करनेसे दिव्य विमान तथा दर्पणोंका दान करनेसे प्राणी उत्तम भाग्य प्राप्त करता है, इसमें कोई संशय नहीं। डरे हुए प्राणीको अभय प्रदान करनेसे मनुष्यकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। [अध्याय २०७]


* ज्ञानविज्ञानमारोग्यं रूपसौभाग्यसम्पदः । तपसा प्राप्यते भोगो मनसा नोपदिश्यते ॥
एवं प्राप्नोति पुण्येन मौनेनाज्ञां महामुने । उपभोगांस्तु दानेन ब्रह्मचर्येण जीवितम् ॥
अहिंसया परं रूपं दीक्षया कुलजन्म च । फलमूलाशनो राज्यं स्वर्गः पर्णाशिनां भवेत् ॥
पयोभक्ष्या दिवं यान्ति जायते द्रविणाढ्यता । गुरुशुश्रूषया नित्यं श्राद्धदानेन संततिः ॥
गवाद्याः कालदीक्षाभिर्ये तु वा तृणशायिनः । स्वयं त्रिपवणाद् ब्रह्म त्वपः पीत्वेष्टलोकभाक् ॥
(२०७। ३८-४२)
कर्मविपाकका इसी प्रकारका परम सुन्दर वर्णन ब्रह्मपुराण अध्याय २१७ में भी प्राप्त होता है।

३७४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय २०८

पतिव्रतोपाख्यान

**ऋषिपुत्र नचिकेता कहते हैं—**विप्रो! इसी बीच यायावर,* शिलोञ्छजीवी स्वाध्यायव्रती तपस्वी ब्राह्मणोंको अपने ऊपरसे जाते देखकर यमराज अत्यन्त उदास हो गये। ब्राह्मणो! इतनेमें ही वहाँ विमानपर सवार होकर अपने पतिदेवके साथ एक परम तेजस्विनी पतिव्रता स्त्री आ गयी। उसके साथमें बहुत-से अनुचर तथा परिकर-परिच्छद भी विराजमान थे। उस प्रियदर्शना देवीके आगमनकालमें नरसिंगे आदि वाद्योंकी विपुल ध्वनि होने लगी। जीवमात्रपर अनुग्रह रखनेवाली उस देवीको धर्मकी पूर्ण जानकारी थी। उसके सारे प्रयासमें धर्मराजका हित भरा था। इस प्रकार साधन-सम्पन्न वह शुभाङ्गना विमानपर बैठे-बैठे ही धर्मराजको तपस्वियोंसे ईर्ष्या न करने तथा उनके प्रति सद्भाव रखनेका परामर्श देकर एवं उनसे पूजित हो आकाशमें अदृश्य हो गयी—जैसे बिजली बादलमें समा जाती है। इस अवसरपर धर्मराजके द्वारा सुपूजित उस स्त्रीको देखकर नारदजीने पूछा—'राजन्! जो आपके द्वारा अर्चित होनेके बाद हितकी बात कहकर पुनः यहाँसे प्रस्थित हो गयी, वह स्त्रियोंमें सर्वोत्तम देवी कौन है? यह तो परम भाग्यशालिनी जान पड़ती है। इसका रूप बड़ा दिव्य है। अनुपम भाग्योंसे शोभा पानेवाले राजन्! मैं इस रहस्यको जानना चाहता हूँ। क्योंकि इससे मेरे मनमें महान् आश्चर्य हो रहा है। अतः इसे संक्षेपमें बतानेकी कृपा करें।'

**धर्मराजने कहा—**देवर्षे! मैंने जिस देवीकी पूजा की है, उसकी कथा परम सुखद है। उसे मैं आपके सामने विस्तारसे स्पष्ट करता हूँ। तात! पूर्व कल्पके सत्ययुगकी बात है—निमि नामसे प्रसिद्ध एक महान् तेजस्वी, सत्यवादी एवं प्रजापालक राजा थे। उनके पुत्र मिथि हुए। केवल पितासे जन्म होनेके कारण जनताने उनका नाम जनक रख दिया। उनकी पत्नीका नाम 'रूपवती' था। वह निरन्तर अपने पतिके हितमें तत्पर रहती थी। पतिकी आज्ञाका पालन करना, उनमें अपार श्रद्धा-भक्ति रखना तथा शुभ कर्मोंमें लगे रहना उसका स्वाभाविक गुण था। स्वामीके वचनानुसार अत्यन्त प्रसन्नताके साथ वह कार्यमें तत्पर रहती थी। महाराज मिथि भी महान् तपस्वी, सत्यके समर्थक तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें ही अपने सारे समयका उपयोग करते थे। वे श्रम एवं धर्मपूर्वक सम्पूर्ण भूमण्डलका पालन करते थे। उनके शासनकालमें रोग, बुढ़ापा और मृत्युकी शक्ति कुण्ठित हो गयी थी। उन परम तेजस्वी नरेशके राष्ट्रमें देवता समयानुसार सदा जल बरसाते थे। उनके राज्यमें कोई भी ऐसा व्यक्ति दृष्टिगोचर नहीं होता था, जो दुःखी, मरणासन्न या व्याधियोंसे ग्रस्त अथवा दरिद्रतासे पीड़ित हो।

विप्रवर! बहुत समय व्यतीत हो जानेके पश्चात् एक दिन उनकी रानीने उनसे नम्रतासे भरी


* 'वृत्त्या वरया यातीति यायावरत्वम्' (बौधायनधर्म-सूत्र ३।१।४, श्रौतसूत्र २४।३१) आदि वचनानुसार शिल आदि श्रेष्ठ वृत्तिसे जीवन-यापन करनेवाले ब्राह्मण 'यायावर' हैं। इस वराह तथा अन्य पुराणोंमें एवं पाणिनि ३।२।१७६, 'काव्यमीमांसा', 'बालरामायण' १।१३, 'भट्टिकाव्य' २।२० आदिमें यह शब्द इसी अर्थमें प्रयुक्त है। पाणि० ३।१।३ के अनुसार इन्हें ही 'शालीन' भी कहते हैं। 'Most probably it reffred to those householders, who like Janaka lived in their home, although following the ascetic dicipline'—'यायावरा ह वै नामर्षय आसंस्तेऽध्वन्य श्राम्यं समस्तमजुहवुः।' (श्रौ०सू०) (Agrawāla Pāṇiṇi P. 387)।

अध्याय २०८ ] पतिव्रतोपाख्यान [ ३७५

हुई वाणीमें कहा—'राजन्! हमारी सारी सम्पत्ति भृत्यों, ब्राह्मणों और परिजनोंके प्रबन्धमें शनैः-शनैः समाप्त हो गयी। अब आपके कोषमें कुछ भी अवशेष नहीं है। अधिक क्या? इस समय अपने भोजनकी भी कोई व्यवस्था नहीं है। हमारे पास अब कोई गो-धन, कपड़े-लत्ते या बर्तन भी नहीं बचे हैं। राजन्! इस समय मेरे लिये जो उचित कर्तव्य हो, वह बतानेकी कृपा कीजिये। मैं आपकी आज्ञाकारिणी दासी हूँ।'

राजा मिथिने कहा—'भामिनि*! तुम्हारी भावनाके विरुद्ध मैं कभी कुछ कहना नहीं चाहता, फिर भी सुनो। सौ वर्ष तो हमलोगोंको हविष्य भोजनपर ही रहते हो गये हैं। प्रिये! अब हमलोग कुद्दाल और काष्ठकी सहायतासे खेतीका काम करें। इस प्रकार काम करने तथा जीवन-निर्वाह करनेसे हमें शुद्ध धर्मकी प्राप्ति हो सकती है, इसमें कोई संशय नहीं। ऐसा करनेसे हमें भक्ष्य एवं भोज्यकी आवश्यक वस्तुएँ भी उपलब्ध हो जायँगी और हमारा जीवन भी सुखमय बन जायगा।'

राजा मिथिके इस प्रकार कहनेपर रानी रूपवतीने कहा—'राजन्! आप महान् यशस्वी पुरुष हैं। आपके महलपर सेवकों, शूरवीरों, हाथियों, घोड़ों, ऊँटों, भैंसों और गदहोंकी संख्या कई हजार है। राजन्! क्या आपकी इच्छाके अनुसार ये सभी लोग कृषि आदि कार्य नहीं कर सकते हैं?'

राजा मिथि बोले—वरानने! मेरे पास जितने सेवक हैं, वे सभी राष्ट्र-रक्षाके अपने-अपने काममें नियुक्त हैं और सभी अपने काममें संलग्न भी हैं। देवि! अपने पासके सभी पशु—हृष्ट-पुष्ट बैल, खच्चर, घोड़ा, हाथी और ऊँट भी राज्यके काममें ही नियुक्त हैं। अनिन्दिते! इसी प्रकार लोहे, राँगे, ताँबे, सोने और चाँदीसे बने हुए उपकरण भी राष्ट्रमें काम दे रहे हैं। देवि! इस समय अब अपने लिये कहीं चलकर कोई उपयुक्त भूमि तथा लोहा आदि द्रव्यकी खोज करनी चाहिये, जिससे मैं उपयुक्त भूमि तथा एक कुद्दाल बनवा सकूँ एवं सुगमतासे कृषि कर सकूँ।

रानीने उत्तर दिया—'राजन्! आप अपनी इच्छाके अनुसार चलें। मैं भी आपके पीछे-पीछे चलूँगी।' इस प्रकार बातचीत होनेके पश्चात् महाराज मिथि अपनी सहधर्मिणीके साथ वहाँसे चल पड़े। स्थान-क्षेत्र आदिकी तलाश करते जब वे दोनों पर्याप्त मार्ग पार कर चुके, तब राजाने एक स्थानको लक्ष्यकर कहा—'वरवर्णिनि! यह क्षेत्र कल्याणप्रद प्रतीत होता है। अब तुम यहाँ रुको। भद्रे! जबतक मैं इन घासों और काँटोंको काटता हूँ, तबतक तुम भी यहाँ कुछ ठीक-ठाककर तृणपत्रोंको दूर करो।'

तपोधन! राजा मिथिके इस प्रकार कहनेपर रानी हँसती हुई मधुर वाणीमें कहने लगी—'प्रभो! यहाँ केवल वृक्ष और सुनहरे रङ्गवाली लताएँ तो दिखायी पड़ती हैं, किंतु पासमें किंचिन्मात्र भी जलका दर्शन नहीं होता। यहाँ खेतीका काम करनेपर तो हृदयमें चिन्ता ही बनी रहेगी, फिर खेतीका काम हमलोग कैसे कर सकेंगे? यहाँ यह वेगवती नदी भी बहती है, यह वृक्ष है तथा यहाँकी भूमि भी कंकड़वाली है। ऐसे स्थानमें खेतीका काम करनेपर हमलोगोंको कैसे सफलता मिल सकेगी?'


* 'भाम' शब्दका मुख्य अर्थ प्रकाश है। यह स्त्री आरम्भसे ही अनुगुण रूप, शील, आचार नामवती है। छान्दोग्योप० ४। १५। ४ के—'एष उ भामनीरेष हि सर्वेषु लोकेषु भाति' (भाति—दीप्यते—शां०भा०) एवं 'सत्यभामा' (कृष्णपत्नी) आदिमें भी यही भाव है।

१६६- गोकर्णेश्वरका माहात्म्य

३७६संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय २०८

रानीकी बात सुनकर राजा मिथिने मधुर वचनोंमें कहा—'प्रिये! पहलेके ही समान यहाँ भी सम्पत्तिका संग्रह हो सकता है। सुन्दरि! बहुत सन्निकट, पासमें ही पानीकी व्यवस्था हो सकती है और चार मनुष्योंके आ जानेपर यहाँ किंचिन्मात्र भी असुविधा नहीं रहेगी। महादेवि! देखो, यह घर है। यहाँ किसी प्रकारकी बाधा नहीं आ सकती है।' इतना कहनेके उपरान्त राजा अपनी पत्नीके साथ उस क्षेत्रका शोधन करने लगे। इधर सूर्य जब आकाशके मध्यभागमें चले गये और उनका उग्र ताप फैल गया, तब रानी सहसा प्याससे व्याकुल हो गयी। उस तपस्विनीको भूख भी सताने लगी। उसके पैरके कोमल तलवे ताँबेके समान लाल हो गये। तापके कारण वे संतप्त हो उठे। अब उस देवीने अत्यन्त व्यथित होकर पतिदेवसे कहा—'महाराज! मैं ग्रीष्मसे पीड़ित होकर प्याससे व्याकुल हो गयी हूँ। राजन्! कृपापूर्वक मुझे शीघ्र जल देनेकी व्यवस्था करें।' उस समय देवी रूपवती दुःखसे अत्यन्त संतप्त होनेके कारण अपनी सुध-बुध खो चुकी थी। अतः वह पृथ्वीपर पड़ गयी। उसी अवस्थामें उसके नेत्र सूर्यपर पड़ गये। गिरते समय उसके मनमें क्रोधका भाव भी आ गया था और उसकी दृष्टि स्वतः सूर्यपर पड़ गयी थी। फिर तो आकाशमें रहते हुए भी भगवान् भास्कर भयसे काँप उठे। उन महान् तेजस्वी देवको आकाश छोड़कर धरातलपर आ जानेके लिये विवश हो जाना पड़ा। इस प्रकृतिविरुद्ध बातको देखकर राजा जनकने कहा—'तेजस्विन्! आप आकाश-मण्डलका त्याग करके यहाँ कैसे पधारे हैं? आप परम तेजस्वी देवता हैं। सभी व्यक्तियोंके द्वारा आपका अभिवादन होता है। मैं आपका क्या स्वागत करूँ?'

राजा मिथिसे सूर्यने विनयपूर्वक कहा—'राजन्! यह पतिव्रता मुझपर अत्यन्त क्रुद्ध हो गयी थी, अतएव मैं आकाशसे आपकी आज्ञाके पालनार्थ यहाँ आया हूँ। इस समय भूमण्डलमें, स्वर्गमें, अथवा तीनों लोकोंमें इसके समान कोई भी ऐसी पतिव्रता स्त्री दृष्टिगोचर नहीं होती है। इसमें असीम शक्ति है। इसके तप, धैर्य, निष्ठा एवं पराक्रम एक-से-एक आश्चर्यकर हैं। इसके अन्य गुण भी प्रशंसनीय हैं। महाभाग! इसका चित्त भी आपके चित्तका सदा अनुसरण करता है। सुपात्र व्यक्तिका सुपात्रसे सम्बन्ध हो जाय—इसमें उसके पुण्यका महान् फल समझना चाहिये। आप दोनों शची एवं इन्द्रके समान सर्वथा एक-दूसरेके अनुरूप हैं। राजन्! आपकी अभिलाषा किसी प्रकार भी व्यर्थ नहीं होनी चाहिये। महाराज! यदि भोजनके उचित प्रबन्धके लिये आपके मनमें खेतीका कार्य उत्तम प्रतीत होता है तो इसे अवश्य करें। इस विचारका व्यक्ति आपके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है। आपका यह प्रयास सफल, यश देनेवाला तथा अभिलाषा पूर्ण करनेवाला होगा।'

ऐसा कहकर भगवान् सूर्यने उनके लिये जलसे भरे हुए एक पात्रका निर्माण किया। फिर वह पात्र, एक जोड़ा जूता तथा दिव्य अलङ्कारोंसे अलङ्कृत एक छाता—ये सभी वस्तुएँ उन्होंने उन राजा मिथिको दीं। भगवान् भास्करने यह भी बतला दिया कि यह इस स्त्रीके ही पुण्यकर्मका फल है। रानी रूपवती जल पाकर तृप्त हुई। वे अब सचेत और अभय हो गयीं। फिर वे इस आश्चर्यको देखकर राजासे बोलीं—'राजन्! किसने यह स्वच्छ एवं शीतल जल दिया है और ये दिव्य छत्र और उपानह किसने दिये हैं? तपोधन!

अध्याय २०९ ] पतिव्रताके माहात्म्यका वर्णन ३७७

आप बतानेकी कृपा करें।'

राजा जनक बोले—महादेवि! ये विश्वके प्रधान देवता भगवान् विवस्वान् हैं, जो तुमपर कृपा करनेके लिये गगन-मण्डलसे यहाँ आये हैं, इन्होंने ही ये सब पदार्थ दिये हैं।

राजा मिथिसे यह वचन सुनकर रानी रूपवतीने कहा—'प्राणनाथ! इन सूर्यदेवकी प्रसन्नताके लिये मैं क्या करूँ? आप इनकी अभिलाषा जाननेका प्रयत्न करें।' राजा जनक महान् तेजस्वी पुरुष थे। रानीके यह कहनेपर उन्होंने भगवान् सूर्यके सामने दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कहा—'भगवन्! आपका मैं कौन-सा प्रिय कार्य करूँ?' राजाकी प्रार्थनापर भगवान् भास्करने कहा—'मानद! मेरी हार्दिक इच्छा यह है कि स्त्रियोंसे मुझे कभी कोई भय न हो।'

राजा मिथि सबका सम्मान करनेमें कुशल व्यक्ति थे। रानी रूपवती उनके हृदयको सदा आह्लादित रखती थीं। भुवनभास्करकी बात सुननेके उपरान्त राजाने अपनी स्त्रीसे सारा प्रसङ्ग सुना दिया। उनके वचन सुनकर मनको प्रसन्न करनेमें परम कुशल रानी आनन्दसे भर उठी। अतः उस देवीने अपना उद्गार प्रकट किया—'देव! अपनी तीव्र किरणोंसे रक्षाके लिये आपने छातेका दान किया, साथ ही एक दिव्य जलपात्र दिया। ये दोनों उपानह (जूते) पैरोंको सकुशल रखनेके लिये दान दिये हैं। ये सभी परम आवश्यक वस्तुएँ हैं। अतः महाभाग! आपने जैसा वर माँगा है, वैसा ही होगा। आपको स्त्रियोंसे किसी प्रकारका भय नहीं करना चाहिये। अपनी इच्छाके अनुसार कार्य करनेमें आप स्वतन्त्र हैं।'

यमराजने कहा—'विप्र! यही इस स्त्रीकी कथा है और तबसे इस प्रकारकी पतिव्रताओंका मैं पूजन तथा नमन करता हूँ।'

[ अध्याय २०८ ]


पतिव्रताके माहात्म्यका वर्णन

नारदजी बोले—धर्मराज! मैं जानना चाहता हूँ कि तपोधना स्त्रियाँ किस कर्म अथवा तपसे सर्वोत्तम गति पानेकी अधिकारिणी बन सकती हैं? आप मुझे यह बतानेकी कृपा करें।

यमराजने उत्तर दिया—उत्तम सुव्रत द्विजवर! वैसी स्थिति प्राप्त करनेके लिये नियम और तप कोई भी उपयोगी साधन नहीं हैं। महामुने! उपवास, दान अथवा देवार्चन भी यथेष्ट गति प्रदान करनेमें असमर्थ हैं। यह स्थिति जिस प्रकारसे सुलभ हो सकती है, वह संक्षेपसे बताता हूँ, सुनें। जो स्त्री अपने पतिके सो जानेपर सोती और उसके जगनेके पूर्व ही स्वयं निद्रा त्याग देती है तथा पतिके भोजन कर लेनेपर भोजन करती है, उसकी मृत्युपर विजय हो जाती है—यह सत्य है। द्विजवर! जो स्त्री पतिके मौन होनेपर मौन रहती और उसके आसन ग्रहण कर लेनेपर स्वयं भी बैठ जाती है, वह मृत्युको परास्त कर सकती है। तपोधन! जिसकी दृष्टि एकमात्र पतिपर ही पड़ती है, जिसका मन सदा पतिमें ही लगा रहता है तथा जो स्वामीकी आज्ञाका निरन्तर पालन करनेमें तत्पर रहती है, उस पतिव्रतासे हम सब लोग एवं अन्य सभी भय मानते हैं। जो स्वामीके वचनोंपर श्रद्धा रखती है और कभी भी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं करती, उस साध्वीकी संसारमें परम शोभा होती है। देवतालोग भी उसका सम्मान करते हैं। द्विजवर! जो प्रत्यक्ष

३७८संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय २१०

अथवा परोक्षमें भी किसी अन्य पुरुषका ध्यान नहीं करती, उसे 'पतिव्रता' कहते हैं। ऐसी स्त्रीको मृत्युका भय नहीं रहता। जो सदा स्वामीके हित-साधनमें संलग्न रहती है, वह अभय रहती है। ब्रह्मनन्दन! जो पतिव्रता पतिकी आज्ञाका सदा अनुसरण करती है, वह मृत्युके द्वारा जीती नहीं जा सकती।

यमराजने कहा—द्विजवर! जो स्त्री पतिके विषयमें यह विचार करती है कि यही मेरे लिये माता, पिता, भाई एवं परम देवता हैं, सदा पतिकी शुश्रूषामें संलग्न रहती है, उसपर मेरा कोई शासन सफल नहीं होता। स्वामीके ध्यान और उनके अनुसरण-अनुगमनके अतिरिक्त जिसका एक क्षण भी व्यर्थ चिन्तनमें नष्ट नहीं होता है, वह परम साध्वी है। मैं उसके सामने हाथ जोड़ता हूँ। जो स्वामीके विचारके बाद अपना अनुकूल विचार प्रकट करती है, उस पतिव्रताको मृत्युका आभास नहीं देखना पड़ता। नृत्य, गीत और वाद्य—ये प्रायः सभी देखने एवं सुननेके विषय हैं, किंतु जिस स्त्रीके नेत्र तथा कान इनपर नहीं जाते हैं, बल्कि पतिकी सेवामें ही निरन्तर लगे रहते हैं, वह मृत्युके दरवाजेको नहीं देखती। जो स्नान करने, स्वच्छन्द बैठने अथवा केश सँवारनेके समय मनसे भी किसी दूसरे व्यक्तिपर दृष्टि नहीं डालती, उसे मृत्युका दरवाजा नहीं देखना पड़ता। द्विजवर! पति देवताकी आराधना कर रहा हो अथवा भोजनमें संलग्न हो, उस समय भी जो चित्तसे सदा उसीका चिन्तन करती रहती है, उसे मृत्युका द्वार नहीं देखना पड़ता। तपोधन! जो स्त्री सूर्योदयके पूर्व ही नित्य उठकर घरको बुहारने—साफ करनेमें उद्यत रहती है, उसकी दृष्टि मृत्युके फाटकपर नहीं पड़ती। जिसके नेत्र, शरीर और भाव सदा सुसंयत रहते हैं तथा जो अपने शुद्ध आचार एवं विचारसे सदा संयुक्त रहती है, उस साध्वी स्त्रीको मृत्युका दरवाजा नहीं देखना पड़ता। जो स्वामीके मुखको देखने, उसके चित्तका अनुसरण करने अथवा उसके हितमें अपना समय सार्थक करनेमें तत्पर रहती है, उसके सामने मृत्युका भय नहीं आता।

द्विजवर! संसारमें यशस्वी मनुष्योंकी ऐसी अनेक स्त्रियाँ हैं, जो स्वर्गमें निवास करती हैं और जिनका देवतालोग भी दर्शन करते हैं। वही पतिव्रता मेरे सामने विराजमान थी। भगवान् सूर्यके द्वारा पतिव्रताकी यह महिमा सुननेका मुझे अवसर मिला था। विप्रवर! उन्हींकी कृपासे ये सभी गोपनीय रहस्यभरी बातें यथावत् मेरे कर्णगोचर हो गयीं। तभीसे मैं पतिव्रताओंको देखकर उनकी भक्तिभावसे पूजा करता हूँ। [अध्याय २०९]


कर्मविपाक एवं पापमुक्तिके उपाय

नारदजी कहते हैं— 'यशस्विन्! आपने भगवान् सूर्यके मतानुसार पतिव्रता स्त्रियोंके उत्तम धर्मोंका रहस्यात्मक उपाख्यान कहा, जिसे मैंने बड़े ध्यानसे सुना। किंतु सभी प्राणियोंसे सम्बद्ध कर्मफलों (सुख-दुःखों)-के विषयमें जाननेकी मुझे बड़ी उत्कण्ठा है। महातपा! मैं उसे सुनना चाहता हूँ, कृपया उसे कहें। जो मनुष्य दुःख और तापसे संतप्त होकर सुखके लिये कठोर तपस्या तो करते हैं, पर उनके मनोरथ पूर्ण होते नहीं दीखते; वे सब प्रकारके सांसारिक प्रिय तथा अप्रियको त्यागकर सुखके लिये अनेक व्रत एवं उपायका आचरण करते हैं, फिर भी सफल नहीं

१६७- गोकर्णमाहात्म्य और नन्दिकेश्वरको वर-प्रदान

अध्याय २१०] कर्मविपाक एवं पापमुक्तिके उपाय ३७९

होते हैं, किसी-न-किसी प्रकार विफल कर दिये जाते हैं। लोकमें यह श्रुति प्रसिद्ध है कि धर्मके आचरणसे कल्याण होता है, पर देखा यह जाता है कि भलीभाँति कठोर तप करनेवाले भी क्लेशके भागी बन जाते हैं। यह क्यों? कौन इस (उद्भिज्ज, स्वेदज, अण्डज और जरायुज) चार प्रकारके भूतग्रामवाले जगत्का संचालन करता है? धर्मात्मन्! कौन किस द्वेषके कारण मनुष्यकी बुद्धिको पापकी ओर प्रेरित कर देता है? वह कौन है, जो इस लोकमें सुख तथा अत्यन्त कठोर दुःख भी उत्पन्न करता है?'

नारदजीके इस प्रकार कहनेपर महामना धर्मराजने कहा—'आपने जो यह पुण्यमय प्रश्न पूछा है, मैं उसका उत्तर देता हूँ, आप उसे ध्यान देकर सुनें। मुनिवर! इस संसारमें न कोई कर्ता दीखता है और न करनेकी प्रेरणा देनेवाला ही दृष्टिगोचर होता है। जिसमें कर्म प्रतिष्ठित है—जिसके अधीन कर्म है, जिसके नामका कीर्तन होता है, जिससे जगत् आदेशित होता है—प्रेरणा पाता है तथा जो कार्यका सम्पादन करता है, उसके विषयमें कहता हूँ, सुनिये। ब्रह्मन्! एक समय इस दिव्य सभामें बहुतसे ब्रह्मर्षि विराजमान थे। वहाँ जो (विचार-विमर्श हुआ और) मैंने जैसा देखा-सुना, उसे ही कहता हूँ। तात! मानव जिसे अपनी शक्तिसे स्वयं करता है, वही उसका स्वकर्म प्रारब्ध बनकर (परिणामरूपमें) भोगनेके लिये उसके सामने आ जाता है, चाहे वह सुकृत हो या दुष्कृत—सुख देनेवाला हो या दुःख देनेवाला। जो संसारके थपेड़ों (दुःखादि द्वन्द्वोंसे) पीड़ित हों, उन्हें चाहिये कि अपनेसे अपना उद्धार करें, क्योंकि मनुष्य अपने-आप ही अपना शत्रु और बन्धु* है। जीव अपने-आपका पहलेका किया हुआ कर्म ही निश्चित रूपसे इस संसारमें सैकड़ों योनियोंमें जन्म लेकर भोगता है। यह संसार सर्वथा सत्य है—ऐसी धारणा बन जानेके कारण वह आवागमनमें सर्वत्र भटकता है। प्राणी जो कुछ कर्म करता जाता है, वह उसके लिये संचित हो जाता है। फिर पुरुषका पाप-कर्म जैसे-जैसे क्षीण होता जाता है, वैसे-वैसे ही उसे शुभ बुद्धि प्राप्त होती जाती है। दोषयुक्त व्यक्ति शरीरधारी होकर संसारमें जन्म पाता है। जगत्में गिरे हुए प्राणियोंके बुरे कर्मका अन्त हो जानेपर शुद्ध बुद्धि या ज्ञानका प्रादुर्भाव होता है। प्राणीको पूर्वशरीरसे सम्बन्ध रखनेवाली शुभ अथवा अशुभ बुद्धि प्राप्त होती है। पुरुषके स्वयं उपार्जित किये हुए दुष्कृत एवं सुकृत दूसरे जन्ममें अनुरूप सहायक बनते हैं। पापका अन्त होते ही क्लेश शान्त हो जाता है। फलस्वरूप प्राणी शुभ कर्ममें लग जाता है।

इस प्रकार मनुष्य जब सत्कर्मका फल शुभ और दुष्कर्मका फल अशुभ भोग लेता है, तब उसके विस्तृत कर्ममें निर्मलता आ जाती है और सत्समाजमें उसकी प्रतिष्ठा होने लगती है। शुभ कर्मोंके फलस्वरूप उसे स्वर्ग मिलता तथा अशुभ कर्मोंसे वह नरकमें जाता है। वस्तुतः न तो दूसरा कोई किसी दूसरेको कुछ देता है और न कोई किसीका कुछ छीनता ही है।

**नारदजीने पूछा—**यदि ऐसा ही नियम है कि अपना ही किया हुआ शुभ अथवा अशुभ कर्म सामने आता है और शुभसे अभ्युदय तथा अशुभसे ह्रास होता है तो प्राणी मन, वाणी, कर्म या तपस्या—इनमेंसे किसकी सहायता ले, जिससे वह इस संसाररूपी क्लेशसे बच सके, आप उसे


* तुलनीय गीता—६।५।

३८०संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय २१०

बतानेकी कृपा कीजिये।

यमराजने कहा— मुनिवर! यह प्रसङ्ग अशुभोंको भी शुभ बनानेवाला, परम पवित्र, पुण्यस्वरूप तथा पाप एवं दोषका सदा संहारक है। अब मैं उन जगत्स्रष्टा जगदीश्वरको, जिनकी इच्छासे संसार चलता है, प्रणामकर आपके सामने इसका सम्यक् प्रकारसे वर्णन करता हूँ। चर और अचर सम्पूर्ण प्राणियोंसे सम्पन्न इस त्रिलोकका जिन्होंने सृजन किया है, वे आदि, मध्य एवं अन्तसे रहित हैं। देवता और दानव—किन्हींमें यह शक्ति नहीं है कि उन्हें जान सकें। जो समस्त प्राणियोंमें समान दृष्टि रखता है, वह वेद-तत्त्वको जाननेवाला सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। जिसकी आत्मा वशमें है, जिसके मनमें सदा शान्ति विराजती है तथा जो ज्ञानी एवं सर्वज्ञ है, वह पापोंसे मुक्त हो जाता है। धर्मका सार अर्थ एवं प्रकृति तथा पुरुषके विषयमें जिसकी पूर्ण जानकारी है अथवा जान लेनेपर जो पुनः प्रमाद नहीं कर बैठता, उसीको सनातनपद सुलभ होता है। गुण, अवगुण, क्षय एवं अक्षयको जो भलीभाँति जानता है तथा ध्यानके प्रभावसे जिसका अज्ञान नष्ट हो गया है, वह पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो संसारके सभी आकर्षणों एवं प्रलोभनोंकी ओरसे निराश होकर शुद्ध जीवन व्यतीत करता है तथा इष्ट वस्तुओंमें जिसका मन नहीं लुभाता एवं आत्माको संयममें रखकर प्राणोंका त्याग करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। अपने इष्टदेवमें जिसकी श्रद्धा है, जिसने क्रोधपर विजय प्राप्त कर ली है, जो दूसरेकी सम्पत्ति नहीं लेना चाहता एवं किसीसे द्वेष नहीं करता, वह मनुष्य सभी पापोंसे छूट जाता है। जो गुरुकी सेवामें सदा संलग्न रहता है, जो कभी किसी प्राणीकी हिंसा नहीं करता है तथा जो नीच वृत्तिका आचरण नहीं करता, वह मनुष्य सभी पापोंसे छूट जाता है। जो प्रशस्त धर्म-कर्मोंका आचरण करता है और निन्दित कर्मोंसे दूर रहता है, वह सभी पापोंसे छूट जाता है। जो अपने अन्तःकरणको परम शुद्ध करके तीर्थोंमें भ्रमण करता है तथा दुराचरणसे सदा दूर रहता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य ब्राह्मणको देखकर भक्तिभावसे भर उठता और समीप जाकर प्रणाम करता है, वह भी सब पापोंसे छूट जाता है।

नारदजी बोले— परंतप! जो सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये कल्याणप्रद, हितकर एवं परम उपयोगी है, उसका वर्णन आपके द्वारा भलीभाँति सम्पन्न हो गया। प्रभो! तत्त्वार्थदर्शी व्यक्तियोंको सम्यक् प्रकारसे इसका पालन अवश्य करना चाहिये। आपकी कृपासे मेरा संदेह दूर हो गया। महाभाग! अब आप योगकी अपेक्षा कोई छोटा उपाय जो पापको दूर कर सके, उसे मुझे बतानेकी कृपा कीजिये; क्योंकि आप योगधर्मसे सम्बद्ध साधन पहले कह चुके हैं। पापको दूर करना महान् कठिन कार्य है। अतः कोई दूसरा ऐसा साधन बतायें जिससे जगत्में सुखप्राप्तिका लक्ष्य सिद्ध करनेके लिये अल्प प्रयास करना पड़े। इस लोक अथवा परलोकमें भी जो आत्मजयी व्यक्ति हैं तथा अनेक प्रकारके गुणोंकी जिनमें अधिकता है, वे सज्जन नित्य जिस साधनको काममें लेते हैं, मैं उसे जानना चाहता हूँ। महान् तपस्वी प्रभो! अनेक योनियोंमें प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और उनसे अशुभ कर्म बने रहते हैं। अतः उनको दूर करनेके लिये कोई सरल सुगम उपाय हो तो बतायें।

अध्याय २११-२१२ ] पाप-नाशके उपायका वर्णन [ ३८१

यमराजने कहा—मुने! स्वयम्भू ब्रह्माजी प्रजाजनके स्रष्टा हैं। इस धर्मके विषयमें उन्होंने जिस प्रकारका वर्णन किया है, वही मैं उन्हें प्रणाम करके व्यक्त करता हूँ। प्राणियोंका कल्याण तथा पापोंका विनाश ही इसका प्रधान उद्देश्य है। हाँ, क्रिया करना परम आवश्यक है, उसे कहता हूँ, सुनें। कैवल्यके प्रति श्रद्धालु बननेपर मनुष्यको ज्ञान होता है। जो व्यक्ति अपने अन्तःकरणको परम शुद्ध करके धर्मसे ओतप्रोत यह प्रसङ्ग सुनता है, उसकी सभी अभिलषित कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं तथा पापोंसे छूटकर वह इच्छानुसार सुख प्राप्त कर सकता है।

(ब्रह्माजीके कहे हुए उपदेशप्रद वचन ये हैं—) शिशुमारचक्र उनका ही स्वरूप है। जो मनुष्य उनके इस रूपकी प्रतिमा बनाकर अपने शरीरमें भावना करके प्रयत्नपूर्वक उसका अर्चन एवं अभिवादन करता है, उसके पाप नष्ट हो जाते हैं और उस व्यक्तिका उद्धार हो जाता है। अपने उदरमें स्थित उसके स्वरूपका दर्शन करनेसे मन, वाणी तथा कर्मसे जो कुछ भी पाप बन गया है, वह दूर हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं है। जब उस चक्रमें स्थित सोम एवं गुरु आदि सभी ग्रहोंकी वह मानसिक प्रदक्षिणा तथा ध्यान करता है तो मानव अनेक पापोंसे मुक्त हो जाता है। शुक्र, बुध, शनैश्चर तथा मङ्गल—ये सभी बलवान् ग्रह हैं। चन्द्रमाका सौम्य रूप है। हृदयमें इन ग्रहोंकी भावना करके जब मनुष्य प्रदक्षिणा एवं ध्यान करता है, तब उसके पापका सदाके लिये शोधन हो जाता है। उस समय पुरुषको ऐसी शुद्धता प्राप्त हो जाती है, मानो शरद् ऋतुका चन्द्रमा हो। सौ बार प्राणायाम करनेसे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्ति मिल जाती है। मुने! मनुष्यको चाहिये कि यत्नपूर्वक शुद्ध होकर जघन-स्थानमें स्थित चन्द्रमाका दर्शन तथा नमन करे। इसके फलस्वरूप समस्त पापोंसे वह मुक्त हो सकता है। 'शिशुमारचक्र' एक सौ आठ अक्षरोंसे सम्पन्न है। इसे जलमें भिगोकर स्वयं भी आर्द्र हो ध्यान करना चाहिये। चन्द्रमा और सूर्य—ये दोनों स्वयं स्वच्छ देवता हैं। अपने तेजसे प्रकाशमान ये दोनों जब परस्पर एक-दूसरेको देखते हों, उस समय हृदयमें इनका ध्यान करना चाहिये। इससे सदाके लिये पाप-शमन हो जाता है। महामुने! मानव इस प्रकारकी कल्पना करे कि ये श्रीहरि ही शिशुमारचक्रमय वामनरूपमें अवतीर्ण हुए तथा इन्होंने ही वराहका रूप धारणकर जलपर दर्शन दिया था और इन्हींकी दाढ़पर पृथ्वी शोभा पा रही थी तथा ये ही नृसिंहके रूपमें अवतीर्ण हुए थे। जल या दुग्धके आहारपर रहकर उनकी आराधना करे। इससे उसका सम्पूर्ण पापोंसे उद्धार हो जाता है। जो विधिपूर्वक उन्हें प्रणाम करता है, वह भी सभी पापोंसे छूट जाता है।

[ अध्याय २१० ]


पाप-नाशके उपायका वर्णन

ऋषिपुत्र नचिकेता कहते हैं—विप्रो! धर्मराजकी इस प्रकारकी शुभ वाणी सुनकर नारदजीने भक्ति एवं भावसे पूर्ण पुनः उनसे यह वचन कहा।

नारदजी बोले—महाबाहो! धर्मराज! आप मेरे पिताके समान शक्तिशाली हैं तथा स्थावर एवं जङ्गम—सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति समान व्यवहार करते हैं। आपने अबतक द्विजातियोंके हितके

स्नानं कृत्वा यथान्यायं कृत्याभ्यर्च्य विधानतः ।
मदीयं प्रवरं लोकमनन्तमधिगच्छति ॥ ८८ ॥
अधौताम्बरसंवीतः केशवेशं विमुच्य च ।
अकृत्वा पादशौचं च आचान्तोऽप्याचमन्त्यजेत् ॥ ८९ ॥
न स्वापयेन्न चोत्थापयेन्न च पञ्चामृतैः स्नापयेत् ।
न च मन्त्रैरुपहरेन्नोपचारैरुपाचरेत् ॥ ९० ॥
प्रणमेन्न च मां मूढः स्तवैर्वा नोपतिष्ठते ।
एवंविधस्तु मां मुक्त्वा याति घोरं यमक्षयम् ॥ ९१ ॥
यस्तु मत्कर्मनिरतो यत्नवान् वैष्णवो द्विजः ।
नित्यं कुर्याद्यथान्यायं मद्भावगतमानसः ॥ ९२ ॥
स मां प्राप्नोति तं दृष्ट्वा सर्वमङ्गलमङ्गले ।
प्रसीदामि वरारोहे ! सुदुर्लभतमो ह्यहम् ॥ ९३ ॥
अस्पृश्यस्पर्शनाच्छूद्रस्पर्शनाद्वा न संशयेत् ।
गौडं पापरसं यत्तु सुरापानसमं भवेत् ॥ ९४ ॥
यदा पतति वै भूमौ मद्रूपे भक्तितः शिवे ।
गोमूत्रेण तु तद् द्रव्य

अध्याय २११-२१२] पाप-नाशके उपायका वर्णन ३८३

मुक्ति—ये दोनों सुलभ हो जाती हैं। मुनिवर! वह भगवान् विष्णुके व्यक्त और अव्यक्त रूपकी मूर्ति है, जो मर्त्यलोकमें आयी है। इसकी उपासना करनेवालेके करोड़ों जन्मोंके अशुभ नष्ट हो जाते हैं। प्राचीन समयकी बात है—भगवान् श्रीहरि वराहके रूपमें पधारे थे। ऐसे अवसरपर सम्पूर्ण संसारके कल्याणके विचारसे पृथ्वीदेवीने एकादशीको ही हृदयमें रखकर पूछा था।

धरणीने कहा—प्रभो! यह कलियुग प्रायः सभीके लिये भयानक है। इसमें मनुष्य सदा पापमें ही संलग्न रहते हैं। गुरु, ब्राह्मणका धन हड़प लेना और उनका वधतक लोगोंके लिये साधारण-सी बात हो जाती है। भगवन्! कलियुगके लोग गुरु, मित्र और स्वामीके प्रति वैर रखनेमें तत्पर रहते हैं। परायी स्त्रीसे अनुचित सम्बन्ध करनेमें भी वे लोक-परलोकका भय नहीं करते। सुरेश्वर! दूसरेकी सम्पत्तिपर अधिकार जमाना, अभक्ष्य-भक्षण कर लेना तथा देवता एवं ब्राह्मणकी निन्दा करना उनका स्वभाव बन जाता है। प्रायः कलियुगके लोग दाम्भिक एवं मर्यादाहीन होते हैं। कुछ लोग तो अनीश्वरवादीतक बन जाते हैं। इसमें मनुष्य निन्दित दान लेने और अगम्यागमनमें रुचि रखनेवाले होते हैं। विभो! वे ये तथा इनके अतिरिक्त भी अनेक पाप करते हैं, उनका श्रेय कैसे हो?

भगवान् वराहने उत्तर दिया—भगवान् विष्णु-की सर्वोत्कृष्ट शक्तिने कलियुगके नाना प्रकारके घोर पापोंमें रत मनुष्योंके कल्याणके लिये ही एकादशीका रूप धारण किया था। इसलिये सभी मासोंके दोनों पक्षोंकी एकादशीको व्रत करना चाहिये। इससे मुक्ति सुलभ होती है। एकादशीके दिन अन्न नहीं खाना चाहिये। पूर्णरूपसे उपवासकर व्रत रहना चाहिये। यदि विशेष कारणसे पूर्ण उपवास सम्भव न हो तो नक्तव्रत करे। मनुष्यको प्रबोधिनी एकादशीका व्रत तो अवश्य ही करना चाहिये। सोम-मङ्गलवार तथा पूर्व एवं उत्तर-भाद्रपद नक्षत्रोंके योगमें इस एकादशीका महत्त्व करोड़ गुना बढ़ जाता है। उस दिन स्वर्णकी प्रतिमा बनवाकर भगवान् विष्णुकी तथा उनके दस अवतारोंकी भी विधिवत् पूजा करनेका विधान है। प्रबोधिनीकी महिमा हजारों मुखसे नहीं कही जा सकती। हजारों जन्मकी शिवोपासनासे प्राप्त होनेवाली वैष्णवता विश्वमें सर्वाधिक दुर्लभ वस्तु है, अतएव विद्वान् पुरुष प्रयत्नपूर्वक विष्णुभक्त बननेकी चेष्टा करे*। इसके पाठसे दुःस्वप्न एवं सभी भय नष्ट हो जाते हैं।

यमराजने कहा—'मुने! उत्तम व्रतके पालनमें सदा तत्पर रहनेवाली महाभागा धरणीने जब भगवान् वराहकी यह बात सुनी तो वे जगत्प्रभुकी विधिवत् आराधना करके उनमें लीन हो गयीं।'

नारदजी कहते हैं—'धर्मराज! आप सम्पूर्ण धर्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ हैं। आपने जो यह दिव्य कथा कही है, यह धर्मसे ओतप्रोत है। अतः मैं भी आपद्वारा निर्दिष्ट धर्ममार्गकी व्याख्यासे संतुष्ट हो गया। अब मैं यथाशीघ्र उन लोकोंमें जाना चाहता हूँ, जहाँ मेरे मनमें आनन्दकी अनुभूति होती है। महाराज! आपका कल्याण हो।'


दक्षिणावर्तशङ्खेन कृत्वा चैव करे जलम्। शिरसा तद् गृहीत्वा तु विप्रो हृष्टमनाः शुचिः॥
तस्य जन्मकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति। प्राक्स्रोतसं नदीं गत्वा नाभिमात्रजले स्थितः॥
स्नात्वा कृष्णतिलैर्मिश्रा दद्यात् सप्ताञ्जलीन्नरः। प्राणायामत्रयं कृत्वा ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः॥
यावज्जीवकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति। अच्छिद्रपद्मपत्रेण सर्वरत्नोदकेन तु॥
त्रिधा यस्तु नरः स्नायात् सर्वपापैः प्रमुच्यते। (२११।८—११, १३, १८)

* दुर्लभं वैष्णवत्वं हि त्रिषु लोकेषु सुन्दरि। जन्मान्तरसहस्रेषु समाराध्य वृषध्वजम्॥
वैष्णवत्वं लभेत् कश्चित् सर्वपापक्षये सति। (२११।८७-८८)

१६८- गोकर्णेश्वर तथा जलेश्वरके माहात्म्यका वर्णन

३८४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय २१३

नचिकेता कहते हैं—विप्रो! इस प्रकार कहकर मुनिवर नारदने यमलोकसे प्रस्थान किया। वे मुनिवर अपनी इच्छाके अनुसार सर्वत्र विचरनेमें समर्थ हैं। जाते समय आकाश उनके तेजसे प्रकाशित हो गया, मानो वे दूसरे सूर्य हों। धर्मराज धर्मपर विशेष आस्था रखते हैं। मुनिके जानेके बाद उन्होंने फिर बड़ी प्रसन्नतासे मुझे प्रणाम किया और आदर-सत्कारपूर्वक यह प्रिय वचन कहा—'सुव्रत! अब आप भी यहाँसे पधार सकते हैं।' उस समय शक्तिशाली धर्मराजकी अन्तरात्मा प्रसन्नतासे भर चुकी थी। विप्रो! मैंने भी उन धर्मराजकी उत्तम पुरीमें देखी-सुनी अपनी जानकारीकी सभी बातें आपलोगोंको सुना दी।

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! वे सभी ब्राह्मण तपको अपना धन मानते थे। नचिकेताकी इन बातोंको सुनकर उनके मनमें प्रसन्नता छा गयी और उनकी आँखें आश्चर्यसे भर गयी थीं। उनमें कुछ मुनि तथा विप्र ऐसे थे, जिनकी देशान्तर-भ्रमणमें विशेष रुचि थी। ऐसे ही अन्य ब्राह्मण वनमें निवास करनेके विचारसे आये थे। कुछ ब्राह्मण शालीन (यायावर) एवं कपोती वृत्तिके समर्थक थे। कितने ऐसे ब्राह्मण थे, जिनके मुखसे यह शुभ वाणी निकलती रहती थी कि सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करना कल्याणकर है। वे सभी बार-बार नचिकेताको धन्यवाद दे रहे थे। उनमेंसे कुछ ब्राह्मण शिल एवं उञ्छ^* वृत्तिवाले थे, कुछ महान् तेजस्वी ब्राह्मणोंने काष्ठवृत्तिको अपनाया था। सबकी विधियाँ भिन्न-भिन्न थीं। कुछ लोग सदा आत्म-चिन्तनमें व्यस्त रहते थे। कितने विप्रोंने मौनव्रत तथा जलाशय-व्रतको धारण कर लिया था। कुछ लोग ऊपर मुख करके सोते थे तथा कुछ ब्राह्मणोंका मृगके समान इधर-उधर स्वच्छन्द विचरण करनेका नियम था। कितने ब्राह्मण पञ्चाग्नि-व्रती तथा कुछ ब्राह्मण केवल पत्तेके आहारपर रहते थे। कुछ ब्राह्मणोंकी जीवन-यात्रा केवल जल अथवा कितनोंकी वायुपर अवलम्बित थी। कुछ लोग शाक खाकर रहते थे। इनके अतिरिक्त कुछ लोग घोर तपस्वी एवं ज्ञानयोगी थे। उनका यह कथन था कि जन्म लेने और मरनेके अतिरिक्त संसारमें अन्य कुछ बात नहीं है—वे ही बार-बार इसे दुहराते थे। उनके मनमें संसारसे सदा भय बना रहता था। अतः सावधान होकर उक्त नियमोंका सदा पालन करते थे। उद्दालक-कुमार नचिकेतामें भी धर्मकी प्रबलता थी। इन तपस्वी व्यक्तियोंको देखकर उनके मनमें अपार हर्ष हुआ और फिर उनके द्वारा सदा धर्मका चिन्तन होने लगा। मनका विषय अमित वेदार्थ, शुद्धस्वरूप श्रीहरि तथा चिन्मय भगवद्विग्रह रह गया। फिर तो धर्मात्मा नचिकेता सावधान होकर शुद्ध तपस्याके मार्गपर ही आरूढ़ हो गये।

राजन्! इस उत्तम उपाख्यानके प्रभावसे भगवान्‌में श्रद्धा उत्पन्न होती है। इसे जो सुनेगा अथवा सुनायेगा, उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जायँगी।

[अध्याय २११-२१२]


गोकर्णेश्वरका माहात्म्य

सूतजी कहते हैं—ऋषियो! प्राचीन समयकी बात है, जब 'तारकामय' नामक घोर देवासुर-संग्राम हुआ था। उस उग्र युद्धमें देवता और दानव—दोनोंकी सेनामें एक-से-एक शूरवीर थे। युद्धके अन्तमें देवताओंने दानवोंकी सेनाको परास्त कर दिया था और इन्द्र फिरसे स्वर्गके सिंहासनपर प्रतिष्ठित हो गये। तीनों लोकोंके चर-अचर प्राणियोंमें सुख-शान्ति व्याप्त हो गयी। उन्हीं दिनों पर्वतराज मेरुके एक सुवर्णमय शिखरपर जिसकी विविध रत्न सब ओरसे शोभा बढ़ा रहे थे और कहीं-कहीं विद्रुममणिकी खान भी थी, एक विशाल कमल दिव्य आसनके रूपमें आस्तृत था। उस आसनपर


^* फसल कटनेके बाद पृथ्वीपरसे अन्न चुनकर जीविका चलाना 'शिल' एवं 'उच्छ' वृत्ति है।

अध्याय २१३ ] गोकर्णेश्वरका माहात्म्य [ ३८५

ब्रह्माजी चित्तको एकाग्र करके सुखपूर्वक बैठे थे। एक दिन सनत्कुमारजी वहाँ आये और आते ही उन्होंने पितामहको प्रणाम किया और 'गोकर्ण' के सम्बन्धमें इस प्रकार पूछा।

सनत्कुमारजीने पूछा—भगवन्! तत्त्वके जाननेवाले पुरुषोंमें आप शिरोमणि हैं। महाभाग! मैं आपके श्रीमुखसे ऋषियोंद्वारा कथित पुराण सुनना चाहता हूँ। विभो! उत्तर-गोकर्ण, दक्षिण-गोकर्ण* और शृङ्गेश्वर—ये तीन शिवलिङ्ग परम उत्तम बताये जाते हैं। इनकी कैसे और क्यों प्रतिष्ठा हुई है? भगवान् शंकर मृगका रूप धारण करके वहाँ क्यों विराजते हैं? प्रमुख देवता लोग वहाँ कैसे निवास करते हैं? शंकरके मृगरूप होनेका क्या कारण है? तथा उनके विग्रहकी प्रतिष्ठा किस समय हुई है?

ब्रह्माजी बोले—वत्स! यह पुराण एक रहस्यपूर्ण विषय है। मैंने जैसा सुना है, उसके अनुसार यथार्थ तुम्हें सुनाता हूँ, सुनो। गिरिराज मन्दराचलके परम पवित्र उत्तर भागमें 'मुञ्जवान्' नामसे प्रसिद्ध एक शिखर है, जिसकी शोभाको नन्दन नामक उपवन बढ़ाता रहता है। वहाँके साधारण पत्थर भी हीरा एवं स्फटिकमणिके समान हैं और कुछ (मूँगेके सदृश) लाल बालुकाओंसे सुशोभित हैं, कुछ अन्य शिलाखण्ड नीले और कुछ स्वच्छ भी हैं। वहाँ स्थान-स्थानपर श्रेष्ठ गुफाएँ तथा पानीके झरने हैं। उस पर्वतराजके सभी शिखर विचित्र फूलोंसे भरे हैं। विविध फूल-फलोंसे लदे उस शिखरकी शोभा अत्यन्त मनोमोहक है। वहाँ देवतागण अपनी स्त्रियोंके साथ विहार करते रहते हैं। डालियोंपर कूजनेवाले मतवाले पक्षी उस पर्वत-प्रवरको मुखरित एवं सुशोभित करते रहते हैं। वहाँ उपवनोंमें कहीं कचनार फूले हैं, कहीं हंस और सारस घूम रहे हैं। कहीं विकसित कमलोंवाले तालाब, जिनमें निर्मल जल भरा है, उसकी शोभा बढ़ाते रहते हैं। पशु-पक्षी-नदियोंसे सनाथ और अत्यन्त शोभाशाली उद्यानवाला वह स्थान तपस्याके लिये सर्वथा उपयुक्त है। उसे 'धर्मारण्य' कहते हैं। वहीं भगवान् 'स्थाणु महेश्वर' का स्थान है। वे प्रभु सम्पूर्ण सुरगणोंके गुरु हैं। भक्तोंपर सदा कृपा करनेवाले उन शक्तिशाली प्रभुके साथ गिरिराज-कन्या गौरी निरन्तर विराजती हैं। अपने पार्षदों और स्वामी कार्तिकेयके साथ उनका उस श्रेष्ठ पर्वतपर आसन लगा रहता है। वे देवेश्वर अजन्मा, अविनाशी और परम पूज्य हैं। उनकी सेवा करनेके विचारसे बहुतसे देवता विमानपर चढ़कर वहाँ आते हैं।

त्रेतायुगकी बात है। नन्दी नामसे विख्यात एक महान् मुनि भगवान् शंकरकी आराधना करनेकी अभिलाषासे वहाँ आकर तीव्र एवं कठिन तपस्या करने लगे। वे गरमीके दिनोंमें पञ्चाग्नि तापते और जाड़ेकी ऋतुमें पानीमें खड़ा रहकर तप करते थे। वे बिना किसी अवलम्बके खड़े होकर ऊपर हाथ उठाये तपस्या करते थे। जल, अग्नि और वायु केवल ये ही उनके सहारे थे। अनेक प्रकारके व्रतों और तपोंके नियमको वे पूर्ण करते थे। ब्राह्मणोंमें नन्दीकी बड़ी प्रतिष्ठा थी। वे समय-समयपर जल, फल एवं अन्य उचित उपहारोंसे उन प्रभुकी अर्चना करते रहते थे। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले उन द्विजवरने उग्र तपस्यासे अपनेपर विजय प्राप्त कर ली थी। अन्ततः भगवान् शंकर उनपर परम प्रसन्न हुए और उन्होंने मुनिवर नन्दीको साक्षात् दर्शन दिया और कहा—'मुने! मैं तुम्हें दिव्य नेत्र प्रदान करता हूँ। वत्स! अबतक तो तुम्हारे लिये मेरा रूप अदृश्य था, किंतु मैं प्रसन्न हो गया हूँ, अतः मेरा यह रूप देखो। संसारमें विद्वान् पुरुष ही मेरे इस अप्रतिम एवं ओजस्वी रूपको देख सकते हैं।'

राजन्! उस समय शंकरजीके श्रीविग्रहसे हजारों


* द्रष्टव्य 'तीर्थाङ्क'-पृ० १०९ तथा पृ० ३११। उत्तर-गोकर्ण भी दो हैं:—नेपालके पशुपतिनाथ तथा 'गोला-गोकर्णनाथ', पर यहाँ 'पशुपतिनाथ' ही अभीष्ट है।

३८६ ] [ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण ] [ अध्याय २१३

किरणोंवाले सूर्यके समान प्रकाश फैल रहा था। वे प्रभाके पुञ्ज प्रतीत हो रहे थे। जटाएँ उनके सिरकी छवि बढ़ा रही थीं और चन्द्रमा ललाटको सुशोभित कर रहे थे। भगवान् शंकरके दो नेत्र परम प्रकाशमान थे तथा तीसरा नेत्र अग्निके समान धधक रहा था। कमलकी माला उनके पवित्र अङ्गपर विराजमान थी। हाथमें कमण्डलु लिये हुए थे। शरीरपर बाघाम्बर था। सर्पका यज्ञोपवीत धारण किये हुए थे। ऐसे भगवान् महादेवका दर्शन पाते ही महान् तपस्वी नन्दीको रोमाञ्च हो आया।

राजन्! वे प्रभु सनातन परब्रह्म परमात्माके ही रूपान्तर थे। उनका दर्शन प्राप्त होनेपर मुनिवर नन्दीने अञ्जलि बाँध ली और प्रभुकी इस प्रकार स्तुति करने लगे—'जो स्वयं प्रकट होकर जगत्‌का धारण एवं पोषण करते हैं तथा वर देना जिनका स्वभाव है, उन प्रभुके लिये मेरा नमस्कार है। जो 'त्रिनेत्र', 'शिव', 'शंकर' एवं 'भव' नामसे विख्यात हैं, संसारका संहार एवं पालन भी जिनके ऊपर निर्भर है तथा जो चर्ममय वस्त्र धारण करनेवाले एवं मुनिरूप हैं, उन प्रभुके लिये नमस्कार है। जो नीलकण्ठ, भीम, भूत, भव्य, भव, प्रलम्बभुज, कराल, हरिनेत्र, कपर्दी, विशाल, मुञ्जकेश, धीमान्, शूल, पशुपति, विभु, स्थाणु,गणोंके पति, स्रष्टा, संक्षेप्ता, भीषण, सौम्य, सौम्यतर, त्र्यम्बक, श्मशाननिवास, वरद, कपालमाली एवं 'हरितश्मश्रुधर' अधिनामोंसे सम्बोधित होते हैं, उन भगवान् रुद्रके लिये नमस्कार है। जो भक्तोंको सदा प्रिय हैं, उन परमात्मा शंकरको हमारा बार-बार नमस्कार है।'

इस प्रकार विप्रवर नन्दीने भगवान् रुद्रकी स्तुति की और उनकी सम्यक् प्रकारसे आराधना कर सिर झुकाकर बार-बार नमस्कार किया तथा पुष्पाञ्जलि अर्पित की। भगवान् शंकर ब्राह्मणश्रेष्ठ नन्दीपर संतुष्ट हो गये और उन वरद प्रभुने स्वयं ऋषिसे यह वचन कहा—'विप्रवर! वर माँगो। महामुने! तुम्हारे मनमें जो भी अभिलषित हो, वह सभी मैं देनेके लिये उद्यत हूँ। अतः तुम्हारी जो अभिलाषा हो, वह मुझसे कहो।'

राजन्! जब भगवान् शंकरने उन मुनिवर नन्दीसे इस प्रकार कहा, तब उनका अन्तःकरण प्रसन्नतासे भर गया और उन्होंने भगवान् शंकरसे कहा—'प्रभो! मुझे प्रभुत्व, देवत्व, इन्द्रत्व, ब्रह्मत्व, लोकपालत्व, अपवर्ग, अणिमादि आठों सिद्धियाँ, ऐश्वर्य या गाणपत्य—इनमेंसे एक भी पदार्थ नहीं चाहिये। देवेश्वर! आप कल्याणस्वरूप हैं और अपने भक्तोंका कल्याण करनेमें सदा संलग्न रहते हैं, अतः यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो सुरेश्वर! आप कृपापूर्वक मुझे अपनी भक्ति प्रदान करें। महेश्वर! आपके अतिरिक्त अन्य किसी देवतामें मेरी भक्ति न हो और सम्पूर्ण प्राणियोंको आश्रय देनेवाले आप प्रभुमें ही भक्ति सदा स्थिर रहे—यही मेरी सच्ची हार्दिक अभिलाषा है, जिसके फलस्वरूप मैं आपके लिये सदा तपमें संलग्न रह सकूँ और मेरे इस कार्यमें विघ्न न उपस्थित हो। मैं रात-दिन आपका ही नाम जपता रहूँ, मैं यही चाहता हूँ।'

राजन्! विप्रवर नन्दीकी यह बात सुनकर भगवान् शंकरके मुखपर हँसी छा गयी। वे प्रसन्न होकर मधुर वाणीमें नन्दीसे कहने लगे—'विप्रर्षे! उठो। सुव्रत! तुम्हारी इस तपस्यासे मैं परम प्रसन्न हो गया हूँ। महाभाग! तुमने बड़े शुद्ध चित्तसे भक्तिपूर्वक मेरी आराधना की है। तपोधन! तुम्हारी तपश्चर्यासे मुझे परम संतोष हुआ है। वत्स! तुम मेरी आराधनामें दत्तचित्तसे निरन्तर लगे रहे। रुद्रोंके समक्ष तुमने मेरे लिये तीन करोड़ जप किये हैं। महामुने! पूरे एक हजार वर्षोंतक तुमने तीव्र तपस्या की है। ऐसी तपस्या आजसे पहले किसी भी देवता, दानव अथवा ऋषिने नहीं की है। तुम्हारा किया हुआ यह

अध्याय २१४] गोकर्णमाहात्म्य और नन्दिकेश्वरको वर-प्रदान [३८७

अत्यन्त कठिन तप महान् आश्चर्यजनक है। इसके प्रभावसे चर और अचर प्राणियोंसे व्याप्त ये तीनों लोक अत्यन्त क्षुब्ध हो उठे हैं। तुम्हें देखनेके लिये इन्द्रके साथ सभी देवता अभी यहाँ आनेवाले हैं। सुरों और असुरोंके लिये तुम अक्षय, अव्यय तथा अतर्क्य हो। तुम्हारे शरीरसे दिव्य तेज निकल रहा है। अलौकिक आभूषणोंसे अलंकृत होकर तुम परम सुशोभित हो रहे हो। तुममें मुझ-जैसी ही शक्ति आ गयी है। देवता और दानव—ये सभी तुमको अद्वितीय पुरुष मानते हैं। अब तुम मेरे समान रूप धारण करोगे और तुम्हें मुझ-जैसा ही तेज प्राप्त होगा, तुम्हारे तीन नेत्र होंगे। सभी गुणोंकी तुममें प्रधानता रहेगी और देवता तथा दानव तुम्हारी आराधना करेंगे—इसमें कोई संदेह नहीं है। तुम इसी शरीरसे सदा अमर रहोगे। बुढ़ापा और मृत्यु तुम्हारे पास न आ सकेगी। इसको गाणेश्वरीगति कहते हैं। देवताओंके द्वारा भी यह सदाके लिये अलभ्य है। द्विजोत्तम! मेरे पार्षदोंमें तुम्हारा प्रधान स्थान होगा। तुम्हें जनता 'नन्दीश्वर' कहेगी, इसमें कोई संशय नहीं है।

'तपोधन! तुम्हें सात्त्विक ऐश्वर्य या आठों सिद्धियाँ प्राप्त होंगी और तुम मेरे ही एक दूसरे स्वरूप समझे जाओगे। देवता लोग तुम्हें नमस्कार करेंगे। मुनीश्वर! मेरी कृपासे संसारमें तुम स्वामीका पद प्राप्त करोगे। आजसे देवकार्योंमें तुम्हारी सर्वत्र प्रथम पूजा होगी और तुम मेरे पार्षदोंमें प्रधान होगे। मुझसे प्रसन्नता प्राप्त करनेवाले सभी मानव भलीभाँति तुम्हारी ही अर्चना करेंगे। तुम मेरे गण बनो, मेरे द्वारपालपदपर प्रतिष्ठित हो जाओ और विषम समयमें मेरे शरीरकी रक्षा करते रहो। तीनों लोकोंमें वज्र, दण्ड, चक्र अथवा अग्नि—इनमेंसे किसीसे भी तुम्हें कोई बाधा न होगी; देवता, दानव, यक्ष, गन्धर्व, पन्नग, राक्षस तथा जो मेरे भक्त पुरुष हैं, वे सभी तुम्हारा आश्रय ग्रहण करेंगे। अब तुम्हारे संतुष्ट होनेपर मैं संतुष्ट हो जाऊँगा और तुम्हारे कुपित होनेपर मेरे मनमें भी क्रोधका आविर्भाव हो जायगा। द्विजवर! अधिक क्या, तुमसे बढ़कर विश्वमें मेरा दूसरा कोई प्रिय है ही नहीं।'

इस प्रकार द्विजवर नन्दीको वर देकर उमापति भगवान् शंकरने प्रसन्नतापूर्वक स्वयं आकाशको गुँजानेवाली मधुर वाणीमें स्पष्टरूपसे कहा— 'विप्रवर! तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम कृतकृत्य हो गये। मरुद्गणोंके साथ समस्त देवता तुम्हारा दर्शन करनेके लिये यहाँ आ रहे हैं—ऐसा जान लो। वत्स! वह सभी सुरसमुदाय यहाँ आकर जबतक मुझे देख नहीं लेता, इसके पूर्व ही मैं यहाँसे अन्यत्र चला जाना चाहता हूँ।'

बस, इतनी बात कहकर भगवान् शंकर वहीं अन्तर्हित हो गये। [अध्याय २१३]


गोकर्णमाहात्म्य और नन्दिकेश्वरको वर-प्रदान

**ब्रह्माजी कहते हैं—**सनत्कुमार! जब इस प्रकार कहकर भूतभावन भगवान् शंकर वहाँ अन्तर्धान हो गये तो उसी क्षण गणोंके अध्यक्ष नन्दीका शरीर परम दिव्य हो गया। वे चार भुजाओं और तीन नेत्रोंसे सम्पन्न होकर एक दिव्य स्थानपर बैठ गये। उनके विग्रहका वर्ण भी दिव्य हो गया और उससे दिव्य अगुरुकी सुगन्ध फैलने लगी। त्रिशूल, परिघ, दण्ड और पिनाक उनके हाथोंमें सुशोभित होने लगे तथा मूँजकी मेखला कमरकी शोभा बढ़ाने लगी। अपने तेजसे

३८८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय २१४

वे ऐसे प्रतीत होने लगे, मानो दूसरे शंकर ही विराजमान हों। फिर भगवान् वामनकी भाँति उद्यत होकर उन्होंने अपना पैर ऐसे आगे बढ़ाया, मानो वे द्विजवर तीन डगोंसे पृथ्वीको नापनेका विचार कर रहे हों। उन्हें देखकर आकाशमें विचरनेवाले सम्पूर्ण देवताओंका मन आशङ्कित हो गया। उनके आश्चर्यकी सीमा नहीं रही। अतः इन्द्रको इसकी सूचना देनेके लिये वे स्वर्गकी ओर चल पड़े। देवताओंके द्वारा यह वृत्तान्त सुनकर इन्द्र तथा अन्य उपस्थित लोकपालोंको बड़ा विषाद हुआ। उनके मनमें चिन्ता व्याप्त हो गयी। उन सभीने सोचा, यह कोई ऐसा व्यक्ति है, जिसने उमाकान्त भगवान् शंकरसे वर प्राप्त कर लिया है। अतः इसमें अपार शक्ति आ गयी है। अब यह श्रीमान् पुरुष तीनों लोकोंपर अवश्य ही विजय प्राप्त कर लेगा। इसमें जैसा उत्साह, तेज और बल प्रतीत होता है, इससे सिद्ध होता है कि यह अवश्य कोई महान् पराक्रमी पुरुष ही है। यह तो देवताओंके मुख्य स्थानको भी छीन सकता है, अतः अपने तेजके प्रभावसे जबतक यह स्वर्गलोकमें नहीं आ जाता है, इसके पूर्व ही हमलोग वर देनेमें कुशल भगवान् महेश्वरको प्रसन्न करनेमें संलग्न हो जायें।

मुने! इस प्रकार परस्पर वार्तालाप करके वे सभी श्रेष्ठ देवता मेरे साथ 'मुञ्जवान्-पर्वत' के शिखरपर आ गये। वहाँ जगत्के आश्रयदाता, अपार शक्तिवाले भगवान् श्रीहरिने अपने लिये स्थान बना रखा था। जब श्रीहरिको ज्ञात हुआ कि सुरसमुदाय आ रहा है तो वे दौड़कर आगे आ गये। कारण, सबके हृदयकी बात उन्हें विदित थी। अब उनकी कृपासे देवताओं और मुनियोंकी सभी बातें स्पष्ट हो गयीं। तब स्वयं भगवान् विष्णु, देवताओंके साथ मेरी तुलना करनेवाले नन्दीके पास पहुँच गये।

नन्दीने कहा—'ओह! आज मेरा जीवन सफल हो गया। मैंने जितना परिश्रम किया है, वह आज सब सफल हो गया; क्योंकि देवताओंके अध्यक्ष इन्द्र तथा सम्पूर्ण संसारके शासक श्रीहरिके दर्शनका आज मुझे परम श्रेष्ठ सौभाग्य प्राप्त हो गया है। आज मेरे जीवनकी साध पूरी हो गयी और मेरे सभी मनोरथ पूर्ण हो गये। पापोंका संहार करनेवाले भगवान् शिव शान्तस्वरूप हैं। उनकी प्रसन्नता तो मुझे प्राप्त हो ही चुकी है। उन्होंने वर देकर मुझे अपना पार्षद बना ही लिया है। मुझपर उनकी असीम कृपा है। निश्चय ही अब मेरे सारे कल्मष दूर हो गये। भगवान् शंकर बड़े महात्मा पुरुष हैं। उन्होंने देवताओंके विषयमें मेरे सामने जो बात कही है, वह परम हितकर एवं सत्य सिद्ध हो गयी। उसमें कुछ भी अन्यथा नहीं रहा। उन्होंने मुझसे स्पष्ट कहा था कि 'प्रिय नन्दिन्! देवर्षिलोग तुमपर प्रसन्न होकर तुम्हें देखने यहाँ पधार रहे हैं। आज परमेष्ठीद्वारा भी मैं आदर प्राप्त कर चुका। इससे मेरे हृदयमें अपार आनन्द भर गया है।'

देवताओंने कहा—'विप्रवर! नन्दिन्! हमलोग भी उन वरदायी भगवान् शंकरका दर्शन करना चाहते हैं। तुम्हारी तपस्यासे संतुष्ट होकर जिन प्रभुने तुम्हें साक्षात् दर्शन दिया है, उन्हींका अवलोकन हमें भी अभीष्ट है।' इतनी बात कहनेके पश्चात् देवताओंने द्विजवर नन्दीसे पुनः पूछा—'कपाल धारण करनेवाले महाभाग महेश्वरका दर्शन हमलोग किस स्थानपर प्राप्त कर सकेंगे?'

नन्दीने कहा—'वे प्रभु तो मुझपर कृपा करके वहीं अन्तर्धान हो गये। अब मैं नहीं