वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २०८ ] पतिव्रतोपाख्यान [ ३७५
हुई वाणीमें कहा—'राजन्! हमारी सारी सम्पत्ति भृत्यों, ब्राह्मणों और परिजनोंके प्रबन्धमें शनैः-शनैः समाप्त हो गयी। अब आपके कोषमें कुछ भी अवशेष नहीं है। अधिक क्या? इस समय अपने भोजनकी भी कोई व्यवस्था नहीं है। हमारे पास अब कोई गो-धन, कपड़े-लत्ते या बर्तन भी नहीं बचे हैं। राजन्! इस समय मेरे लिये जो उचित कर्तव्य हो, वह बतानेकी कृपा कीजिये। मैं आपकी आज्ञाकारिणी दासी हूँ।'
राजा मिथिने कहा—'भामिनि*! तुम्हारी भावनाके विरुद्ध मैं कभी कुछ कहना नहीं चाहता, फिर भी सुनो। सौ वर्ष तो हमलोगोंको हविष्य भोजनपर ही रहते हो गये हैं। प्रिये! अब हमलोग कुद्दाल और काष्ठकी सहायतासे खेतीका काम करें। इस प्रकार काम करने तथा जीवन-निर्वाह करनेसे हमें शुद्ध धर्मकी प्राप्ति हो सकती है, इसमें कोई संशय नहीं। ऐसा करनेसे हमें भक्ष्य एवं भोज्यकी आवश्यक वस्तुएँ भी उपलब्ध हो जायँगी और हमारा जीवन भी सुखमय बन जायगा।'
राजा मिथिके इस प्रकार कहनेपर रानी रूपवतीने कहा—'राजन्! आप महान् यशस्वी पुरुष हैं। आपके महलपर सेवकों, शूरवीरों, हाथियों, घोड़ों, ऊँटों, भैंसों और गदहोंकी संख्या कई हजार है। राजन्! क्या आपकी इच्छाके अनुसार ये सभी लोग कृषि आदि कार्य नहीं कर सकते हैं?'
राजा मिथि बोले—वरानने! मेरे पास जितने सेवक हैं, वे सभी राष्ट्र-रक्षाके अपने-अपने काममें नियुक्त हैं और सभी अपने काममें संलग्न भी हैं। देवि! अपने पासके सभी पशु—हृष्ट-पुष्ट बैल, खच्चर, घोड़ा, हाथी और ऊँट भी राज्यके काममें ही नियुक्त हैं। अनिन्दिते! इसी प्रकार लोहे, राँगे, ताँबे, सोने और चाँदीसे बने हुए उपकरण भी राष्ट्रमें काम दे रहे हैं। देवि! इस समय अब अपने लिये कहीं चलकर कोई उपयुक्त भूमि तथा लोहा आदि द्रव्यकी खोज करनी चाहिये, जिससे मैं उपयुक्त भूमि तथा एक कुद्दाल बनवा सकूँ एवं सुगमतासे कृषि कर सकूँ।
रानीने उत्तर दिया—'राजन्! आप अपनी इच्छाके अनुसार चलें। मैं भी आपके पीछे-पीछे चलूँगी।' इस प्रकार बातचीत होनेके पश्चात् महाराज मिथि अपनी सहधर्मिणीके साथ वहाँसे चल पड़े। स्थान-क्षेत्र आदिकी तलाश करते जब वे दोनों पर्याप्त मार्ग पार कर चुके, तब राजाने एक स्थानको लक्ष्यकर कहा—'वरवर्णिनि! यह क्षेत्र कल्याणप्रद प्रतीत होता है। अब तुम यहाँ रुको। भद्रे! जबतक मैं इन घासों और काँटोंको काटता हूँ, तबतक तुम भी यहाँ कुछ ठीक-ठाककर तृणपत्रोंको दूर करो।'
तपोधन! राजा मिथिके इस प्रकार कहनेपर रानी हँसती हुई मधुर वाणीमें कहने लगी—'प्रभो! यहाँ केवल वृक्ष और सुनहरे रङ्गवाली लताएँ तो दिखायी पड़ती हैं, किंतु पासमें किंचिन्मात्र भी जलका दर्शन नहीं होता। यहाँ खेतीका काम करनेपर तो हृदयमें चिन्ता ही बनी रहेगी, फिर खेतीका काम हमलोग कैसे कर सकेंगे? यहाँ यह वेगवती नदी भी बहती है, यह वृक्ष है तथा यहाँकी भूमि भी कंकड़वाली है। ऐसे स्थानमें खेतीका काम करनेपर हमलोगोंको कैसे सफलता मिल सकेगी?'
* 'भाम' शब्दका मुख्य अर्थ प्रकाश है। यह स्त्री आरम्भसे ही अनुगुण रूप, शील, आचार नामवती है। छान्दोग्योप० ४। १५। ४ के—'एष उ भामनीरेष हि सर्वेषु लोकेषु भाति' (भाति—दीप्यते—शां०भा०) एवं 'सत्यभामा' (कृष्णपत्नी) आदिमें भी यही भाव है।