भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३७६संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय २०८

रानीकी बात सुनकर राजा मिथिने मधुर वचनोंमें कहा—'प्रिये! पहलेके ही समान यहाँ भी सम्पत्तिका संग्रह हो सकता है। सुन्दरि! बहुत सन्निकट, पासमें ही पानीकी व्यवस्था हो सकती है और चार मनुष्योंके आ जानेपर यहाँ किंचिन्मात्र भी असुविधा नहीं रहेगी। महादेवि! देखो, यह घर है। यहाँ किसी प्रकारकी बाधा नहीं आ सकती है।' इतना कहनेके उपरान्त राजा अपनी पत्नीके साथ उस क्षेत्रका शोधन करने लगे। इधर सूर्य जब आकाशके मध्यभागमें चले गये और उनका उग्र ताप फैल गया, तब रानी सहसा प्याससे व्याकुल हो गयी। उस तपस्विनीको भूख भी सताने लगी। उसके पैरके कोमल तलवे ताँबेके समान लाल हो गये। तापके कारण वे संतप्त हो उठे। अब उस देवीने अत्यन्त व्यथित होकर पतिदेवसे कहा—'महाराज! मैं ग्रीष्मसे पीड़ित होकर प्याससे व्याकुल हो गयी हूँ। राजन्! कृपापूर्वक मुझे शीघ्र जल देनेकी व्यवस्था करें।' उस समय देवी रूपवती दुःखसे अत्यन्त संतप्त होनेके कारण अपनी सुध-बुध खो चुकी थी। अतः वह पृथ्वीपर पड़ गयी। उसी अवस्थामें उसके नेत्र सूर्यपर पड़ गये। गिरते समय उसके मनमें क्रोधका भाव भी आ गया था और उसकी दृष्टि स्वतः सूर्यपर पड़ गयी थी। फिर तो आकाशमें रहते हुए भी भगवान् भास्कर भयसे काँप उठे। उन महान् तेजस्वी देवको आकाश छोड़कर धरातलपर आ जानेके लिये विवश हो जाना पड़ा। इस प्रकृतिविरुद्ध बातको देखकर राजा जनकने कहा—'तेजस्विन्! आप आकाश-मण्डलका त्याग करके यहाँ कैसे पधारे हैं? आप परम तेजस्वी देवता हैं। सभी व्यक्तियोंके द्वारा आपका अभिवादन होता है। मैं आपका क्या स्वागत करूँ?'

राजा मिथिसे सूर्यने विनयपूर्वक कहा—'राजन्! यह पतिव्रता मुझपर अत्यन्त क्रुद्ध हो गयी थी, अतएव मैं आकाशसे आपकी आज्ञाके पालनार्थ यहाँ आया हूँ। इस समय भूमण्डलमें, स्वर्गमें, अथवा तीनों लोकोंमें इसके समान कोई भी ऐसी पतिव्रता स्त्री दृष्टिगोचर नहीं होती है। इसमें असीम शक्ति है। इसके तप, धैर्य, निष्ठा एवं पराक्रम एक-से-एक आश्चर्यकर हैं। इसके अन्य गुण भी प्रशंसनीय हैं। महाभाग! इसका चित्त भी आपके चित्तका सदा अनुसरण करता है। सुपात्र व्यक्तिका सुपात्रसे सम्बन्ध हो जाय—इसमें उसके पुण्यका महान् फल समझना चाहिये। आप दोनों शची एवं इन्द्रके समान सर्वथा एक-दूसरेके अनुरूप हैं। राजन्! आपकी अभिलाषा किसी प्रकार भी व्यर्थ नहीं होनी चाहिये। महाराज! यदि भोजनके उचित प्रबन्धके लिये आपके मनमें खेतीका कार्य उत्तम प्रतीत होता है तो इसे अवश्य करें। इस विचारका व्यक्ति आपके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है। आपका यह प्रयास सफल, यश देनेवाला तथा अभिलाषा पूर्ण करनेवाला होगा।'

ऐसा कहकर भगवान् सूर्यने उनके लिये जलसे भरे हुए एक पात्रका निर्माण किया। फिर वह पात्र, एक जोड़ा जूता तथा दिव्य अलङ्कारोंसे अलङ्कृत एक छाता—ये सभी वस्तुएँ उन्होंने उन राजा मिथिको दीं। भगवान् भास्करने यह भी बतला दिया कि यह इस स्त्रीके ही पुण्यकर्मका फल है। रानी रूपवती जल पाकर तृप्त हुई। वे अब सचेत और अभय हो गयीं। फिर वे इस आश्चर्यको देखकर राजासे बोलीं—'राजन्! किसने यह स्वच्छ एवं शीतल जल दिया है और ये दिव्य छत्र और उपानह किसने दिये हैं? तपोधन!