वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २०९ ] पतिव्रताके माहात्म्यका वर्णन ३७७
आप बतानेकी कृपा करें।'
राजा जनक बोले—महादेवि! ये विश्वके प्रधान देवता भगवान् विवस्वान् हैं, जो तुमपर कृपा करनेके लिये गगन-मण्डलसे यहाँ आये हैं, इन्होंने ही ये सब पदार्थ दिये हैं।
राजा मिथिसे यह वचन सुनकर रानी रूपवतीने कहा—'प्राणनाथ! इन सूर्यदेवकी प्रसन्नताके लिये मैं क्या करूँ? आप इनकी अभिलाषा जाननेका प्रयत्न करें।' राजा जनक महान् तेजस्वी पुरुष थे। रानीके यह कहनेपर उन्होंने भगवान् सूर्यके सामने दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कहा—'भगवन्! आपका मैं कौन-सा प्रिय कार्य करूँ?' राजाकी प्रार्थनापर भगवान् भास्करने कहा—'मानद! मेरी हार्दिक इच्छा यह है कि स्त्रियोंसे मुझे कभी कोई भय न हो।'
राजा मिथि सबका सम्मान करनेमें कुशल व्यक्ति थे। रानी रूपवती उनके हृदयको सदा आह्लादित रखती थीं। भुवनभास्करकी बात सुननेके उपरान्त राजाने अपनी स्त्रीसे सारा प्रसङ्ग सुना दिया। उनके वचन सुनकर मनको प्रसन्न करनेमें परम कुशल रानी आनन्दसे भर उठी। अतः उस देवीने अपना उद्गार प्रकट किया—'देव! अपनी तीव्र किरणोंसे रक्षाके लिये आपने छातेका दान किया, साथ ही एक दिव्य जलपात्र दिया। ये दोनों उपानह (जूते) पैरोंको सकुशल रखनेके लिये दान दिये हैं। ये सभी परम आवश्यक वस्तुएँ हैं। अतः महाभाग! आपने जैसा वर माँगा है, वैसा ही होगा। आपको स्त्रियोंसे किसी प्रकारका भय नहीं करना चाहिये। अपनी इच्छाके अनुसार कार्य करनेमें आप स्वतन्त्र हैं।'
यमराजने कहा—'विप्र! यही इस स्त्रीकी कथा है और तबसे इस प्रकारकी पतिव्रताओंका मैं पूजन तथा नमन करता हूँ।'
[ अध्याय २०८ ]
पतिव्रताके माहात्म्यका वर्णन
नारदजी बोले—धर्मराज! मैं जानना चाहता हूँ कि तपोधना स्त्रियाँ किस कर्म अथवा तपसे सर्वोत्तम गति पानेकी अधिकारिणी बन सकती हैं? आप मुझे यह बतानेकी कृपा करें।
यमराजने उत्तर दिया—उत्तम सुव्रत द्विजवर! वैसी स्थिति प्राप्त करनेके लिये नियम और तप कोई भी उपयोगी साधन नहीं हैं। महामुने! उपवास, दान अथवा देवार्चन भी यथेष्ट गति प्रदान करनेमें असमर्थ हैं। यह स्थिति जिस प्रकारसे सुलभ हो सकती है, वह संक्षेपसे बताता हूँ, सुनें। जो स्त्री अपने पतिके सो जानेपर सोती और उसके जगनेके पूर्व ही स्वयं निद्रा त्याग देती है तथा पतिके भोजन कर लेनेपर भोजन करती है, उसकी मृत्युपर विजय हो जाती है—यह सत्य है। द्विजवर! जो स्त्री पतिके मौन होनेपर मौन रहती और उसके आसन ग्रहण कर लेनेपर स्वयं भी बैठ जाती है, वह मृत्युको परास्त कर सकती है। तपोधन! जिसकी दृष्टि एकमात्र पतिपर ही पड़ती है, जिसका मन सदा पतिमें ही लगा रहता है तथा जो स्वामीकी आज्ञाका निरन्तर पालन करनेमें तत्पर रहती है, उस पतिव्रतासे हम सब लोग एवं अन्य सभी भय मानते हैं। जो स्वामीके वचनोंपर श्रद्धा रखती है और कभी भी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं करती, उस साध्वीकी संसारमें परम शोभा होती है। देवतालोग भी उसका सम्मान करते हैं। द्विजवर! जो प्रत्यक्ष