भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३७८संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय २१०

अथवा परोक्षमें भी किसी अन्य पुरुषका ध्यान नहीं करती, उसे 'पतिव्रता' कहते हैं। ऐसी स्त्रीको मृत्युका भय नहीं रहता। जो सदा स्वामीके हित-साधनमें संलग्न रहती है, वह अभय रहती है। ब्रह्मनन्दन! जो पतिव्रता पतिकी आज्ञाका सदा अनुसरण करती है, वह मृत्युके द्वारा जीती नहीं जा सकती।

यमराजने कहा—द्विजवर! जो स्त्री पतिके विषयमें यह विचार करती है कि यही मेरे लिये माता, पिता, भाई एवं परम देवता हैं, सदा पतिकी शुश्रूषामें संलग्न रहती है, उसपर मेरा कोई शासन सफल नहीं होता। स्वामीके ध्यान और उनके अनुसरण-अनुगमनके अतिरिक्त जिसका एक क्षण भी व्यर्थ चिन्तनमें नष्ट नहीं होता है, वह परम साध्वी है। मैं उसके सामने हाथ जोड़ता हूँ। जो स्वामीके विचारके बाद अपना अनुकूल विचार प्रकट करती है, उस पतिव्रताको मृत्युका आभास नहीं देखना पड़ता। नृत्य, गीत और वाद्य—ये प्रायः सभी देखने एवं सुननेके विषय हैं, किंतु जिस स्त्रीके नेत्र तथा कान इनपर नहीं जाते हैं, बल्कि पतिकी सेवामें ही निरन्तर लगे रहते हैं, वह मृत्युके दरवाजेको नहीं देखती। जो स्नान करने, स्वच्छन्द बैठने अथवा केश सँवारनेके समय मनसे भी किसी दूसरे व्यक्तिपर दृष्टि नहीं डालती, उसे मृत्युका दरवाजा नहीं देखना पड़ता। द्विजवर! पति देवताकी आराधना कर रहा हो अथवा भोजनमें संलग्न हो, उस समय भी जो चित्तसे सदा उसीका चिन्तन करती रहती है, उसे मृत्युका द्वार नहीं देखना पड़ता। तपोधन! जो स्त्री सूर्योदयके पूर्व ही नित्य उठकर घरको बुहारने—साफ करनेमें उद्यत रहती है, उसकी दृष्टि मृत्युके फाटकपर नहीं पड़ती। जिसके नेत्र, शरीर और भाव सदा सुसंयत रहते हैं तथा जो अपने शुद्ध आचार एवं विचारसे सदा संयुक्त रहती है, उस साध्वी स्त्रीको मृत्युका दरवाजा नहीं देखना पड़ता। जो स्वामीके मुखको देखने, उसके चित्तका अनुसरण करने अथवा उसके हितमें अपना समय सार्थक करनेमें तत्पर रहती है, उसके सामने मृत्युका भय नहीं आता।

द्विजवर! संसारमें यशस्वी मनुष्योंकी ऐसी अनेक स्त्रियाँ हैं, जो स्वर्गमें निवास करती हैं और जिनका देवतालोग भी दर्शन करते हैं। वही पतिव्रता मेरे सामने विराजमान थी। भगवान् सूर्यके द्वारा पतिव्रताकी यह महिमा सुननेका मुझे अवसर मिला था। विप्रवर! उन्हींकी कृपासे ये सभी गोपनीय रहस्यभरी बातें यथावत् मेरे कर्णगोचर हो गयीं। तभीसे मैं पतिव्रताओंको देखकर उनकी भक्तिभावसे पूजा करता हूँ। [अध्याय २०९]


कर्मविपाक एवं पापमुक्तिके उपाय

नारदजी कहते हैं— 'यशस्विन्! आपने भगवान् सूर्यके मतानुसार पतिव्रता स्त्रियोंके उत्तम धर्मोंका रहस्यात्मक उपाख्यान कहा, जिसे मैंने बड़े ध्यानसे सुना। किंतु सभी प्राणियोंसे सम्बद्ध कर्मफलों (सुख-दुःखों)-के विषयमें जाननेकी मुझे बड़ी उत्कण्ठा है। महातपा! मैं उसे सुनना चाहता हूँ, कृपया उसे कहें। जो मनुष्य दुःख और तापसे संतप्त होकर सुखके लिये कठोर तपस्या तो करते हैं, पर उनके मनोरथ पूर्ण होते नहीं दीखते; वे सब प्रकारके सांसारिक प्रिय तथा अप्रियको त्यागकर सुखके लिये अनेक व्रत एवं उपायका आचरण करते हैं, फिर भी सफल नहीं