भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय २१०] कर्मविपाक एवं पापमुक्तिके उपाय ३७९

होते हैं, किसी-न-किसी प्रकार विफल कर दिये जाते हैं। लोकमें यह श्रुति प्रसिद्ध है कि धर्मके आचरणसे कल्याण होता है, पर देखा यह जाता है कि भलीभाँति कठोर तप करनेवाले भी क्लेशके भागी बन जाते हैं। यह क्यों? कौन इस (उद्भिज्ज, स्वेदज, अण्डज और जरायुज) चार प्रकारके भूतग्रामवाले जगत्का संचालन करता है? धर्मात्मन्! कौन किस द्वेषके कारण मनुष्यकी बुद्धिको पापकी ओर प्रेरित कर देता है? वह कौन है, जो इस लोकमें सुख तथा अत्यन्त कठोर दुःख भी उत्पन्न करता है?'

नारदजीके इस प्रकार कहनेपर महामना धर्मराजने कहा—'आपने जो यह पुण्यमय प्रश्न पूछा है, मैं उसका उत्तर देता हूँ, आप उसे ध्यान देकर सुनें। मुनिवर! इस संसारमें न कोई कर्ता दीखता है और न करनेकी प्रेरणा देनेवाला ही दृष्टिगोचर होता है। जिसमें कर्म प्रतिष्ठित है—जिसके अधीन कर्म है, जिसके नामका कीर्तन होता है, जिससे जगत् आदेशित होता है—प्रेरणा पाता है तथा जो कार्यका सम्पादन करता है, उसके विषयमें कहता हूँ, सुनिये। ब्रह्मन्! एक समय इस दिव्य सभामें बहुतसे ब्रह्मर्षि विराजमान थे। वहाँ जो (विचार-विमर्श हुआ और) मैंने जैसा देखा-सुना, उसे ही कहता हूँ। तात! मानव जिसे अपनी शक्तिसे स्वयं करता है, वही उसका स्वकर्म प्रारब्ध बनकर (परिणामरूपमें) भोगनेके लिये उसके सामने आ जाता है, चाहे वह सुकृत हो या दुष्कृत—सुख देनेवाला हो या दुःख देनेवाला। जो संसारके थपेड़ों (दुःखादि द्वन्द्वोंसे) पीड़ित हों, उन्हें चाहिये कि अपनेसे अपना उद्धार करें, क्योंकि मनुष्य अपने-आप ही अपना शत्रु और बन्धु* है। जीव अपने-आपका पहलेका किया हुआ कर्म ही निश्चित रूपसे इस संसारमें सैकड़ों योनियोंमें जन्म लेकर भोगता है। यह संसार सर्वथा सत्य है—ऐसी धारणा बन जानेके कारण वह आवागमनमें सर्वत्र भटकता है। प्राणी जो कुछ कर्म करता जाता है, वह उसके लिये संचित हो जाता है। फिर पुरुषका पाप-कर्म जैसे-जैसे क्षीण होता जाता है, वैसे-वैसे ही उसे शुभ बुद्धि प्राप्त होती जाती है। दोषयुक्त व्यक्ति शरीरधारी होकर संसारमें जन्म पाता है। जगत्में गिरे हुए प्राणियोंके बुरे कर्मका अन्त हो जानेपर शुद्ध बुद्धि या ज्ञानका प्रादुर्भाव होता है। प्राणीको पूर्वशरीरसे सम्बन्ध रखनेवाली शुभ अथवा अशुभ बुद्धि प्राप्त होती है। पुरुषके स्वयं उपार्जित किये हुए दुष्कृत एवं सुकृत दूसरे जन्ममें अनुरूप सहायक बनते हैं। पापका अन्त होते ही क्लेश शान्त हो जाता है। फलस्वरूप प्राणी शुभ कर्ममें लग जाता है।

इस प्रकार मनुष्य जब सत्कर्मका फल शुभ और दुष्कर्मका फल अशुभ भोग लेता है, तब उसके विस्तृत कर्ममें निर्मलता आ जाती है और सत्समाजमें उसकी प्रतिष्ठा होने लगती है। शुभ कर्मोंके फलस्वरूप उसे स्वर्ग मिलता तथा अशुभ कर्मोंसे वह नरकमें जाता है। वस्तुतः न तो दूसरा कोई किसी दूसरेको कुछ देता है और न कोई किसीका कुछ छीनता ही है।

**नारदजीने पूछा—**यदि ऐसा ही नियम है कि अपना ही किया हुआ शुभ अथवा अशुभ कर्म सामने आता है और शुभसे अभ्युदय तथा अशुभसे ह्रास होता है तो प्राणी मन, वाणी, कर्म या तपस्या—इनमेंसे किसकी सहायता ले, जिससे वह इस संसाररूपी क्लेशसे बच सके, आप उसे


* तुलनीय गीता—६।५।