भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३८०संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय २१०

बतानेकी कृपा कीजिये।

यमराजने कहा— मुनिवर! यह प्रसङ्ग अशुभोंको भी शुभ बनानेवाला, परम पवित्र, पुण्यस्वरूप तथा पाप एवं दोषका सदा संहारक है। अब मैं उन जगत्स्रष्टा जगदीश्वरको, जिनकी इच्छासे संसार चलता है, प्रणामकर आपके सामने इसका सम्यक् प्रकारसे वर्णन करता हूँ। चर और अचर सम्पूर्ण प्राणियोंसे सम्पन्न इस त्रिलोकका जिन्होंने सृजन किया है, वे आदि, मध्य एवं अन्तसे रहित हैं। देवता और दानव—किन्हींमें यह शक्ति नहीं है कि उन्हें जान सकें। जो समस्त प्राणियोंमें समान दृष्टि रखता है, वह वेद-तत्त्वको जाननेवाला सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। जिसकी आत्मा वशमें है, जिसके मनमें सदा शान्ति विराजती है तथा जो ज्ञानी एवं सर्वज्ञ है, वह पापोंसे मुक्त हो जाता है। धर्मका सार अर्थ एवं प्रकृति तथा पुरुषके विषयमें जिसकी पूर्ण जानकारी है अथवा जान लेनेपर जो पुनः प्रमाद नहीं कर बैठता, उसीको सनातनपद सुलभ होता है। गुण, अवगुण, क्षय एवं अक्षयको जो भलीभाँति जानता है तथा ध्यानके प्रभावसे जिसका अज्ञान नष्ट हो गया है, वह पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो संसारके सभी आकर्षणों एवं प्रलोभनोंकी ओरसे निराश होकर शुद्ध जीवन व्यतीत करता है तथा इष्ट वस्तुओंमें जिसका मन नहीं लुभाता एवं आत्माको संयममें रखकर प्राणोंका त्याग करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। अपने इष्टदेवमें जिसकी श्रद्धा है, जिसने क्रोधपर विजय प्राप्त कर ली है, जो दूसरेकी सम्पत्ति नहीं लेना चाहता एवं किसीसे द्वेष नहीं करता, वह मनुष्य सभी पापोंसे छूट जाता है। जो गुरुकी सेवामें सदा संलग्न रहता है, जो कभी किसी प्राणीकी हिंसा नहीं करता है तथा जो नीच वृत्तिका आचरण नहीं करता, वह मनुष्य सभी पापोंसे छूट जाता है। जो प्रशस्त धर्म-कर्मोंका आचरण करता है और निन्दित कर्मोंसे दूर रहता है, वह सभी पापोंसे छूट जाता है। जो अपने अन्तःकरणको परम शुद्ध करके तीर्थोंमें भ्रमण करता है तथा दुराचरणसे सदा दूर रहता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य ब्राह्मणको देखकर भक्तिभावसे भर उठता और समीप जाकर प्रणाम करता है, वह भी सब पापोंसे छूट जाता है।

नारदजी बोले— परंतप! जो सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये कल्याणप्रद, हितकर एवं परम उपयोगी है, उसका वर्णन आपके द्वारा भलीभाँति सम्पन्न हो गया। प्रभो! तत्त्वार्थदर्शी व्यक्तियोंको सम्यक् प्रकारसे इसका पालन अवश्य करना चाहिये। आपकी कृपासे मेरा संदेह दूर हो गया। महाभाग! अब आप योगकी अपेक्षा कोई छोटा उपाय जो पापको दूर कर सके, उसे मुझे बतानेकी कृपा कीजिये; क्योंकि आप योगधर्मसे सम्बद्ध साधन पहले कह चुके हैं। पापको दूर करना महान् कठिन कार्य है। अतः कोई दूसरा ऐसा साधन बतायें जिससे जगत्में सुखप्राप्तिका लक्ष्य सिद्ध करनेके लिये अल्प प्रयास करना पड़े। इस लोक अथवा परलोकमें भी जो आत्मजयी व्यक्ति हैं तथा अनेक प्रकारके गुणोंकी जिनमें अधिकता है, वे सज्जन नित्य जिस साधनको काममें लेते हैं, मैं उसे जानना चाहता हूँ। महान् तपस्वी प्रभो! अनेक योनियोंमें प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और उनसे अशुभ कर्म बने रहते हैं। अतः उनको दूर करनेके लिये कोई सरल सुगम उपाय हो तो बतायें।