भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय २११-२१२ ] पाप-नाशके उपायका वर्णन [ ३८१

यमराजने कहा—मुने! स्वयम्भू ब्रह्माजी प्रजाजनके स्रष्टा हैं। इस धर्मके विषयमें उन्होंने जिस प्रकारका वर्णन किया है, वही मैं उन्हें प्रणाम करके व्यक्त करता हूँ। प्राणियोंका कल्याण तथा पापोंका विनाश ही इसका प्रधान उद्देश्य है। हाँ, क्रिया करना परम आवश्यक है, उसे कहता हूँ, सुनें। कैवल्यके प्रति श्रद्धालु बननेपर मनुष्यको ज्ञान होता है। जो व्यक्ति अपने अन्तःकरणको परम शुद्ध करके धर्मसे ओतप्रोत यह प्रसङ्ग सुनता है, उसकी सभी अभिलषित कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं तथा पापोंसे छूटकर वह इच्छानुसार सुख प्राप्त कर सकता है।

(ब्रह्माजीके कहे हुए उपदेशप्रद वचन ये हैं—) शिशुमारचक्र उनका ही स्वरूप है। जो मनुष्य उनके इस रूपकी प्रतिमा बनाकर अपने शरीरमें भावना करके प्रयत्नपूर्वक उसका अर्चन एवं अभिवादन करता है, उसके पाप नष्ट हो जाते हैं और उस व्यक्तिका उद्धार हो जाता है। अपने उदरमें स्थित उसके स्वरूपका दर्शन करनेसे मन, वाणी तथा कर्मसे जो कुछ भी पाप बन गया है, वह दूर हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं है। जब उस चक्रमें स्थित सोम एवं गुरु आदि सभी ग्रहोंकी वह मानसिक प्रदक्षिणा तथा ध्यान करता है तो मानव अनेक पापोंसे मुक्त हो जाता है। शुक्र, बुध, शनैश्चर तथा मङ्गल—ये सभी बलवान् ग्रह हैं। चन्द्रमाका सौम्य रूप है। हृदयमें इन ग्रहोंकी भावना करके जब मनुष्य प्रदक्षिणा एवं ध्यान करता है, तब उसके पापका सदाके लिये शोधन हो जाता है। उस समय पुरुषको ऐसी शुद्धता प्राप्त हो जाती है, मानो शरद् ऋतुका चन्द्रमा हो। सौ बार प्राणायाम करनेसे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्ति मिल जाती है। मुने! मनुष्यको चाहिये कि यत्नपूर्वक शुद्ध होकर जघन-स्थानमें स्थित चन्द्रमाका दर्शन तथा नमन करे। इसके फलस्वरूप समस्त पापोंसे वह मुक्त हो सकता है। 'शिशुमारचक्र' एक सौ आठ अक्षरोंसे सम्पन्न है। इसे जलमें भिगोकर स्वयं भी आर्द्र हो ध्यान करना चाहिये। चन्द्रमा और सूर्य—ये दोनों स्वयं स्वच्छ देवता हैं। अपने तेजसे प्रकाशमान ये दोनों जब परस्पर एक-दूसरेको देखते हों, उस समय हृदयमें इनका ध्यान करना चाहिये। इससे सदाके लिये पाप-शमन हो जाता है। महामुने! मानव इस प्रकारकी कल्पना करे कि ये श्रीहरि ही शिशुमारचक्रमय वामनरूपमें अवतीर्ण हुए तथा इन्होंने ही वराहका रूप धारणकर जलपर दर्शन दिया था और इन्हींकी दाढ़पर पृथ्वी शोभा पा रही थी तथा ये ही नृसिंहके रूपमें अवतीर्ण हुए थे। जल या दुग्धके आहारपर रहकर उनकी आराधना करे। इससे उसका सम्पूर्ण पापोंसे उद्धार हो जाता है। जो विधिपूर्वक उन्हें प्रणाम करता है, वह भी सभी पापोंसे छूट जाता है।

[ अध्याय २१० ]


पाप-नाशके उपायका वर्णन

ऋषिपुत्र नचिकेता कहते हैं—विप्रो! धर्मराजकी इस प्रकारकी शुभ वाणी सुनकर नारदजीने भक्ति एवं भावसे पूर्ण पुनः उनसे यह वचन कहा।

नारदजी बोले—महाबाहो! धर्मराज! आप मेरे पिताके समान शक्तिशाली हैं तथा स्थावर एवं जङ्गम—सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति समान व्यवहार करते हैं। आपने अबतक द्विजातियोंके हितके